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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भाग -५
डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल
युगदृष्टा- युगऋषि, वेदमूर्ति, संसार के सबसे बड़े ज्ञानी- ध्यानी ,तपस्वी, लेखक, अध्यात्मवेत्ता, भविष्यवक्ता, अवतारी सत्ता पं. श्रीराम शर्मा आचार्य " 21वीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य" ग्रंथ में भारत व विश्व के भविष्य के संदर्भ में लिखते हैं कि -
" पिछले दिनों बढ़े विज्ञान और बुद्धिवाद ने मनुष्य के लिए अनेक असाधारण सुविधाएँ प्रदान की हैं, किंतु सुविधाएं बढ़ाने के उत्साह में हुए इनके अमर्यादित उपयोगों की प्रतिक्रियाओं ने ऐसे संकट खड़े कर दिए हैं, जिनका समाधान न निकला तो सर्वविनाश प्रत्यक्ष जैसा दिखाई पड़ता है।
*इस सृष्टि का कोई नियंता भी है। उसने अपनी समग्र कलाकारिता बटोर कर इस धरती को और उसकी व्यवस्था के लिए मनुष्य को बनाया है। वह इसका विनाश होते देख नहीं सकता। नियंता ने सामयिक निर्णय लिया है कि विनाश को निरस्त करके संतुलन की पुनः स्थापना की जाए।*
सन 1989 से 2000 तक युग संधिकाल माना गया है। सभी भविष्यवक्ता, दिव्यदर्शी इसे स्वीकार करते हैं। इस अवधि में हर विचारशील, भावनाशील, प्रतिभावान को ऐसी भूमिका निभाने के लिए तैयार- तत्पर होना है, जिससे वे असाधारण श्रेय- सौभाग्य के अधिकारी बन सकें।"
" *बच्चों को एक सीमा तक ही मस्ती करने की छूट दी जाती है। जब भी वे उपयोगी और कीमती चीजे तोड़ने पर उतारू हो जाते हैं, तो उन्हें दुलार करने वाले अभिभावक भी ताड़ना देने पर उतारू हो जाते हैं।* भटकने की भी एक सीमा है। समझदारी बाधित करती है कि पीछे लौट चला जाए। *नियंता ने सामयिक निश्चय लिया है कि विनाश की दिशा में चल रही अंधी दौड़ को रोक दिया जाए और फिर प्रभाव को संतुलित स्तर पर लाया जाए।* शासन संचालक जब अयोग्यता प्रदर्शित करता है, तो राष्ट्रपति शासन लागू होता है और अयोग्यो के स्थान पर सुयोग्याओं के हाथ सत्ता सौंपने हेतु वहीं उच्च स्तरीय नियंत्रण चलता है।
*वर्तमान प्रवाह को चरम विनाश के बिंदु तक जा पहुंचने से पहले सृष्टा ने उस पर रोक लगाने और परिवर्तन का नया माहौल बनाने का निश्चय किया है। इसका अनुमान सभी सूक्ष्मदर्शी समान रूप से लगाने लगे हैं।* नया सोच आरंभ हो रहा है। दृष्टिकोण की दिशा बदल रही है। गतिविधियों के नए निर्धारण की योजनाएं बन रही हैं। यह परिवर्तन मनुष्यों के मूर्धन्य क्षेत्रों में तो चल ही रहा है। व्यापक वातावरण पर नियंत्रण करने वाली अदृश्य शक्तियां अपने ढंग से अपने क्षेत्र में ऐसा कुछ चमत्कार दिखाने पर तुल गई हैं, जो अवांछनीय प्रचलनों को उलटने और उनके स्थान पर नए मूल्यों-कीर्तिमानो की स्थापना कर पाने में सफल हो सके।
हर बात की एक सीमा होती है। रावण, कंस ,हिरणकश्यप , वृतासुर आदि भी उभरे तो तेजी से पर उसी गति से उनका अंत भी हो गया। पानी में बबूले तेजी से उठते हैं और उसी तेजी से वे उछलते और तिरोहित हो जाते हैं। खंडहरों के स्थान पर नई इमारतें खड़ी होती हैं। इसी क्रम के अनुसार अवांछनीयताओं का माहौल अब समाप्त होने ही जा रहा है और उसका स्थान सच्चे अर्थों वाली प्रगतिशीलता ग्रहण करेगी। *लंका दहन के साथ ही रामराज का अवतरण भी जुड़ा हुआ था। वही इस बार भी होने जा रहा है।*
*इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य*
इन आधारों पर 21वीं सदी सुखद संभावनाओं की अवधि है। 20वीं सदी में उपलब्धियां कम और विभिषिकाएं अधिक ऊभरी हैं। अब उस उपक्रम में क्रांतिकारी परिवर्तन होने जा रहा है। प्रातः सायं की संधि बेला की तरह 20वीं सदी का आरंभ वाला यह समय युगसंधि का है। जिस तरह बुझता हुआ दीपक अधिक ऊंची लौ उभारता है, मरते समय चींटी के पंख उगते हैं। प्रसव पीड़ा के समय दो प्रकार की परस्पर विरोधी विचित्रताएं देखी जाती हैं। एक ओर पीड़ा की कराह सुनी जाती है तो दूसरी ओर संतान लाभ की प्रसन्नता भी उस परिवार के सभी लोगों पर छाई होती है। युगसंधि के इस काल में चलने वाली उथल-पुथल भी ज्वार- भाटे जैसी ही है।
*युग संधि की इस ऐतिहासिक बेला में सृजन संभावनाओं के दृश्यमान प्रयत्न जहां शासन,अर्थ क्षेत्र, विज्ञान आदि की परिधि में दिखाई पड़ेंगे, वहां अध्यात्म शक्तियां भी अपने तप- उपचार को ऐसा गतिशील करेंगी, जिससे भागीरथ ,दधीचि, हरिश्चंद्र, विश्वामित्र आदि द्वारा किए गए महान परिवर्तनों की भूमिका निबाही जाती देखी जा सके।* *लोक सेवियों का एक बड़ा वर्ग भी इन्हीं दिनों कार्य क्षेत्र में उतरेगा और राम के रीछ वानरों,कृष्ण के ग्वाल- वालों, बुद्ध के परिव्राजकों की अभिनव भूमिका का निर्वाह करते हुए एक नए इतिहास की नई संरचना करते हुए देखा जाएगा।* यह सब अदृश्य प्रयत्नो की ही अनुकृति समझी जा सकेगी।
*अदृश्य जगत से सक्रिय परिवर्तन की लहरें*
इन दिनों जो हो रहा है उसका कारण लोक प्रचलन तो है ही, अदृश्य जगत के तूफानी प्रवाह भी परिस्थितियों को कम प्रभावित नहीं करते। समाधान के उपाय प्रत्यक्ष स्तर के तो होने ही चाहिए और साथ ही यह भी आवश्यक है कि अध्यात्म उपचारों के जैसे सूक्ष्म क्षेत्र के पुरुषार्थ भी वैसे किए जाएं, जैसे की स्वाधीनता संग्राम के दिनों में महर्षि अरविंद, महर्षि रामण, पौहारी बाबा, रामकृष्ण परमहंस आदि ने किए थे। पक्षी दोनों पंखों के सहारे उड़ता है। विपत्तियों से जूझने और प्रगति के क्षेत्र में ऊंची उडाने उड़ने के लिए न केवल विकास के पक्षधर प्रयासों को क्रियान्वित किया जाना चाहिए, वरन् ऐसा भी कुछ होना चाहिए, जिसमें देवताओं की संयुक्त शक्ति से दुर्गा का अवतरण हुआ था तथा ऋषियों ने रक्त से घड़ा भरकर सीता को उत्पन्न किया था। उनके माध्यम से ही असुर दमन ,लंका दहन और रामराज की पृष्ठभूमि बनाने वाला अदृश्य आधार खड़ा किया था।"
क्रमशः.....
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