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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारत में शिक्षा को लेकर जो दिशा आज साफ़ दिखाई देने लगी है, वह किसी अचानक हुए निर्णय का परिणाम नहीं है। यह एक लंबी वैचारिक यात्रा का अगला पड़ाव है। ऐसी यात्रा, जिसमें अलग-अलग समय पर कांग्रेस और भाजपा—दोनों की सरकारें अपने-अपने तरीकों से शामिल रही हैं। अंतर केवल इतना रहा है कि कांग्रेस ने पहचान-आधारित राजनीति को खुलकर आगे बढ़ाया, जबकि भाजपा के शासनकाल में वही प्रवृत्ति नियमों, समितियों और संस्थागत भाषा के भीतर चुपचाप आगे बढ़ती चली गई।
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार द्वारा ‘रोहित वेमुला अधिनियम’ के नाम पर जो पहल सामने आई, उसे शुरुआत में बहुतों ने एक राज्य-स्तरीय राजनीतिक कदम मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया। यह तर्क दिया गया कि कांग्रेस की राजनीति लंबे समय से जाति को केंद्र में रखकर चलती रही है, इसलिए इसमें नया कुछ नहीं है। लेकिन जब केंद्र के अधीन University Grants Commission ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 अधिसूचित किए, तब यह भ्रम टूट गया। अब यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल किसी एक राज्य या किसी एक दल का एजेंडा नहीं रहा। यह उच्च शिक्षा के राष्ट्रीय ढाँचे में किया जा रहा एक बुनियादी हस्तक्षेप है।
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। देश में इस समय केंद्र में ऐसी सरकार है, जो हिंदुत्व, हिंदू समाज के एकीकरण और जाति-विभाजन से ऊपर उठने की बात करती है। बार-बार यह कहा जाता है कि जाति की राजनीति ने हिंदू समाज को कमज़ोर किया है। लेकिन उसी शासन-व्यवस्था के भीतर, उसी के अधीन काम करने वाली संस्था यदि ऐसे नियम लागू करती है जो शिक्षा को औपचारिक रूप से पहचान-आधारित ढाँचों में बाँध दें, तो इसे केवल प्रशासनिक निर्णय कहकर टाला नहीं जा सकता। यह एक गहरी वैचारिक असंगति का संकेत है।
यूजीसी के इन नियमों को समझने के लिए जटिल भाषा या वैचारिक जार्गन की ज़रूरत नहीं है। इन्हें ज़मीन पर रखकर देखना पर्याप्त है। अब हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में Equal Opportunity Centre बनाना अनिवार्य होगा। कहा जा रहा है कि ये केंद्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग—तीनों—के साथ-साथ दिव्यांगजन और महिलाओं को शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक मार्गदर्शन देंगे। उद्देश्य सुनने में सकारात्मक लगता है। पर व्यवहार में यही केंद्र वह जगह बनेंगे जहाँ से शिकायतें दर्ज होंगी, प्रक्रियाएँ शुरू होंगी और शैक्षणिक जीवन धीरे-धीरे प्रशासनिक निगरानी के दायरे में आएगा।
इसी केंद्र के अंतर्गत Equity Committee का गठन होगा, जिसमें इन सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है। समस्या प्रतिनिधित्व की नहीं है। समस्या उस मूल मान्यता की है, जिस पर यह पूरी व्यवस्था खड़ी की गई है—कि भेदभाव ‘संरचनात्मक’ है, यानी व्यक्ति से अलग, पहले से मौजूद। इसका अर्थ यह होता है कि जब कोई शिकायत आएगी, तो जाँच इस प्रश्न से शुरू नहीं होगी कि वास्तव में क्या हुआ, बल्कि इस धारणा से शुरू होगी कि व्यवस्था दोषी है और कुछ लोग स्वभावतः संदेह के घेरे में हैं।
सबसे संवेदनशील प्रावधान Equity Squads का है, जिन्हें परिसर में “विजिलेंस” यानी निगरानी का कार्य सौंपा गया है। इसका व्यावहारिक अर्थ बहुत सीधा है। अब शिक्षक क्या बोल रहा है, कैसे पढ़ा रहा है, किसे कितने अंक दिए गए, कक्षा में कौन-सा उदाहरण दिया गया—यह सब संभावित शिकायत के रूप में देखा जा सकता है। शिक्षा का वातावरण सहज नहीं रहेगा। उसमें सावधानी, आत्म-संयम और धीरे-धीरे डर प्रवेश करेगा।
नियम यह भी कहते हैं कि ये इकाइयाँ पुलिस, जिला प्रशासन, एनजीओ, स्थानीय मीडिया और कानूनी सेवा प्राधिकरणों से समन्वय करेंगी। इसका मतलब यह है कि विश्वविद्यालय के भीतर का शैक्षणिक या व्यवहारिक विवाद आसानी से बाहरी प्रशासनिक और कानूनी तंत्र तक पहुँच सकता है। अकादमिक असहमति और वास्तविक अपराध के बीच की रेखा धुंधली पड़ने लगेगी।
यदि यह सब केवल आशंका लगे, तो अमेरिका के विश्वविद्यालयों का अनुभव सामने है। वहाँ इसी सोच के आधार पर क्रिटिकल रेस थ्योरी को अकादमिक और नीतिगत समर्थन मिला। नस्ल को केंद्र में रखकर यह मान लिया गया कि कुछ लोग जन्म से उत्पीड़क हैं और कुछ जन्म से पीड़ित। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा का केंद्र व्यक्ति का आचरण नहीं, उसकी पहचान बन गई।
2015 में Yale University में एक साधारण-सा ई-मेल—जिसमें छात्रों से यह कहा गया था कि वे त्योहारों के दौरान अपने पहनावे पर स्वयं विवेक से निर्णय लें—कैंपस में “संरचनात्मक नस्लवाद” का मुद्दा बन गया। महीनों तक विरोध-प्रदर्शन चले। सवाल पढ़ाई का नहीं रहा, पहचान का बन गया।
Harvard University में 2017 से 2019 के बीच नस्ल-आधारित शिकायतों में तेज़ वृद्धि हुई। कई प्रोफेसरों ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि वे कक्षा में बोलते समय आत्म-सेंसरशिप बरतने को मजबूर हैं।
University of California, Berkeley में 2019 के बाद पहचान-आधारित निगरानी इतनी बढ़ी कि कठिन और संवेदनशील विषयों से बचने की प्रवृत्ति आम हो गई। अंततः 2023 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट को कॉलेज प्रवेश में नस्ल-आधारित नीतियों पर रोक लगानी पड़ी, क्योंकि योग्यता और समान अवसर पीछे छूट चुके थे।
यूरोप में भी यही अनुभव सामने आया। फ्रांस सरकार ने 2021 में स्वीकार किया कि अमेरिकी पहचान-राजनीति से प्रेरित अकादमिक मॉडल विश्वविद्यालयों को भीतर से विभाजित कर रहा है। ब्रिटेन में कई विश्वविद्यालयों को पहचान-आधारित मूल्यांकन से पीछे हटना पड़ा, क्योंकि शिक्षा-स्तर और अकादमिक वातावरण पर उसका नकारात्मक असर साफ़ दिखने लगा।
अब भारत में वही प्रयोग जाति के माध्यम से हो रहा है। फर्क केवल नाम का है। वहाँ नस्ल थी, यहाँ जाति है। वहाँ ‘व्हाइट गिल्ट’ की बात थी, यहाँ ‘सवर्ण अपराधबोध’ की अवधारणा गढ़ी जा रही है। और यह सब उस समय हो रहा है, जब सार्वजनिक रूप से सामाजिक समरसता की बात की जाती है।
यह कहना आवश्यक है कि यह चिंता किसी समुदाय के अधिकारों के विरुद्ध नहीं है। अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग—तीनों के साथ अन्याय हुआ है और कई जगह आज भी होता है। इसलिए शिकायत-निवारण तंत्र का होना ज़रूरी है। प्रश्न तंत्र के अस्तित्व का नहीं, उसकी प्रकृति का है। भारत में पहले से ही एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून, आरक्षण, छात्रवृत्तियाँ और संवैधानिक आयोग मौजूद हैं। समाधान उनके ईमानदार और प्रभावी क्रियान्वयन में था—न कि शिक्षा को स्थायी पहचान-संघर्ष के क्षेत्र में बदल देने में।
अंततः प्रश्न किसी एक दल का नहीं है। प्रश्न यह है कि भारत अपने विश्वविद्यालयों को किस रूप में देखना चाहता है—ज्ञान और विवेक के केंद्र के रूप में, या शिकायत और वैचारिक टकराव के अखाड़े के रूप में। अमेरिका और यूरोप का अनुभव सामने है। भारत के पास अभी भी समय है कि वह इन नियमों को लागू करते समय स्पष्ट सीमाएँ खींचे, ताकि वास्तविक भेदभाव पर सख़्ती हो, लेकिन विश्वविद्यालय का सामान्य शैक्षणिक जीवन डर और पहचान-राजनीति के बोझ तले न दब जाए।
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