- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
आज की दुनिया को यदि केवल अख़बार की सुर्ख़ियों से समझने की कोशिश की जाए, तो घटनाएँ बिखरी हुई प्रतीत होती हैं। कहीं युद्ध है, कहीं सरकार गिराई जा रही है, कहीं परिवार टूट रहे हैं, कहीं संस्कृति बदल रही है। पर जब इन घटनाओं को जोड़कर देखा जाए, तो एक साझा धारा स्पष्ट दिखाई देती है। यह धारा किसी विचारधारा से नहीं, बल्कि मुनाफ़े से संचालित होती है। यही वह तंत्र है जिसे आज के समय में वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियाँ कहा जाता है।
वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियाँ कोई एक देश, कोई एक कंपनी या कोई एक संगठन नहीं हैं। यह एक ऐसा तंत्र है, जो पूँजी के उस स्वभाव से पैदा हुआ है, जहाँ लाभ ही अंतिम सत्य बन जाता है। जब पूँजी को न समाज की परवाह रहती है, न संस्कृति की, न प्रकृति की और न ही मनुष्य की गरिमा की—तब वही पूँजी वैश्विक बाज़ारवादी शक्ति का रूप ले लेती है। इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ होती हैं, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ होती हैं, हथियार और तेल उद्योग होते हैं, दवा और जैव-तकनीक से जुड़ी कंपनियाँ होती हैं, बड़े मीडिया समूह होते हैं और उनके साथ वैचारिक एनजीओ का एक जाल होता है। यह पूरा तंत्र मिलकर दुनिया को एक ऐसे बाज़ार में बदलना चाहता है, जहाँ हर व्यक्ति केवल उपभोक्ता हो।
इस तंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सीधे सामने आकर बात नहीं करता। यह पहले धीरे-धीरे काम करता है। किसी देश को आर्थिक रूप से निर्भर बनाया जाता है। कर्ज़, प्रतिबंध और निवेश की शर्तों के माध्यम से उसकी नीतिगत स्वतंत्रता सीमित कर दी जाती है। जब अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो राजनीति अस्थिर होती है। जब राजनीति अस्थिर होती है, तो समाज में असंतोष फैलाया जाता है। और जब यह सब पर्याप्त न हो, तब सैन्य हस्तक्षेप को जायज़ ठहराने के लिए नए-नए कारण गढ़े जाते हैं—कभी मानवाधिकार, कभी तानाशाही, कभी आतंकवाद।
आज वेनेज़ुएला के साथ जो हुआ, वह इसी प्रक्रिया का एक खुला उदाहरण है। अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला पर हमला और वहाँ के राष्ट्रपति को गिरफ्तार किए जाने का दावा इस बात का संकेत है कि अब संप्रभुता केवल एक शब्द भर रह गई है। कहा जा रहा है कि वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था कम्युनिस्ट नीतियों के कारण ध्वस्त हो गई थी। इसमें आंशिक सत्य हो सकता है, पर यह पूरा सत्य नहीं है। पूरा सत्य यह है कि वेनेज़ुएला दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल भंडारों में से एक पर बैठा हुआ देश है। जब तक यह तेल वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियों के नियंत्रण में नहीं आता, तब तक वहाँ संकट बना रहना तय है। नार्को-टेररिज़्म जैसे आरोप केवल उस हस्तक्षेप को वैध ठहराने के औज़ार हैं।
यदि युद्धों को गौर से देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आज युद्ध किसी आदर्श या सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि व्यापार के लिए लड़े जा रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया के सत्तर से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में युद्ध या सशस्त्र संघर्ष चल रहा है। आम आदमी को केवल वही युद्ध दिखाई देते हैं जिन्हें मीडिया बार-बार दिखाता है—रूस-यूक्रेन, इज़रायल-ग़ाज़ा। लेकिन अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के अनेक देशों में छोटे-छोटे संघर्ष लगातार जारी हैं। इन संघर्षों में सबसे अधिक लाभ हथियार बनाने वाली कंपनियों को होता है। जितनी अस्थिरता, उतनी बिक्री। शांति इनके लिए घाटे का सौदा है।
पर वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियों का सबसे गहरा हस्तक्षेप युद्ध से भी आगे जाता है। यह हस्तक्षेप समाज के भीतर होता है। परिवार, धर्म और संस्कृति इनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। जहाँ परिवार मज़बूत होता है, वहाँ उपभोग सीमित रहता है। संयुक्त परिवार में संसाधन साझा होते हैं। वहाँ मनुष्य केवल खरीदने-बेचने की इकाई नहीं बनता। यही कारण है कि परिवार को पिछड़ा, दमनकारी और स्वतंत्रता का शत्रु बताकर प्रस्तुत किया जाता है।
इसका परिणाम हम अपने रोज़मर्रा के जीवन में देख सकते हैं। कुछ दशक पहले तक परिवार बड़े होते थे। एक रसोई, एक बैठक, एक जीवनशैली होती थी। आज हर व्यक्ति को अलग कमरा, अलग स्क्रीन, अलग जीवन चाहिए। यह परिवर्तन केवल सोच का नहीं है, बल्कि बाज़ार की ज़रूरत का परिणाम है। जब परिवार टूटते हैं, तो उपभोग कई गुना बढ़ता है। यही कारण है कि लिव-इन रिलेशनशिप, सिंगल-लिविंग और कैज़ुअल संबंधों को स्वतंत्रता के नाम पर सामान्य बनाया जाता है।
इसी प्रक्रिया का एक छोटा, लेकिन बहुत गहरा उदाहरण हमारे खान-पान में साफ़ दिखाई देता है। रीवा, जो मेरा अपना जिला है, वहाँ कुछ वर्ष पहले तक स्थानीय व्यंजन—रिझा की कढ़ी, इंद्रहार, रिकमच की सब्ज़ी, महुआ की पूरी, शाही कटहल कबाब—सामाजिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थे। विवाह हो, कोई पारिवारिक आयोजन हो या अतिथि आगमन—इन्हीं व्यंजनों की तैयारी होती थी। भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं था; वह परिवार की सहभागिता, पीढ़ियों के संवाद और सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा हुआ कर्म था। रसोई में बैठकर बड़ी उम्र की महिलाएँ छोटी पीढ़ी को केवल पकाने की विधि नहीं सिखाती थीं, बल्कि जीवन की समझ भी सहज रूप से आगे बढ़ती थी।
आज वही स्थान पिज़्ज़ा, बर्गर, चाउमिन और पैकेज्ड स्नैक्स ने ले लिया है। नई पीढ़ी इन पारंपरिक व्यंजनों को पहचानती तक नहीं। यह बदलाव केवल स्वाद का नहीं है। यह उस बाज़ार विस्तार की प्रक्रिया है, जिसमें स्थानीय, मौसमी और सामूहिक श्रम से जुड़े भोजन को धीरे-धीरे अप्रासंगिक बनाया जाता है, ताकि मानकीकृत, ब्रांडेड और हर जगह बिकने वाले उत्पाद टिक सकें। जब स्थानीय व्यंजन समाप्त होते हैं, तभी वैश्विक ब्रांड स्थायी उपभोक्ता पाते हैं।
यही तर्क आज के लैंगिक विमर्श में भी दिखाई देता है। अचानक दर्जनों लैंगिक पहचानों का उभरना केवल सामाजिक जागरूकता या मानवीय संवेदना का स्वतःस्फूर्त परिणाम नहीं है, जैसा अक्सर बताया जाता है। इसके साथ-साथ दवा, हार्मोन थेरेपी, सर्जरी और दीर्घकालिक चिकित्सा सेवाओं से जुड़ा एक विशाल उद्योग भी सक्रिय होता चला गया है। जब पहचान की पूर्ति को चिकित्सकीय हस्तक्षेप से जोड़ दिया जाता है, तो शरीर स्वयं बाज़ार का हिस्सा बन जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया को सामान्य बनाने में मीडिया, सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म की भूमिका निर्णायक रही है। लगातार एक ही प्रकार की कहानियाँ, पात्र और भावनात्मक फ्रेम प्रस्तुत किए जाते हैं, जिससे प्रश्न पूछना असंवेदनशील प्रतीत होने लगे। यह सब किसी एक दिन में नहीं हुआ। यह वर्षों तक चली उस योजनाबद्ध प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें समाज की आदतें, पसंद और सोच धीरे-धीरे बाज़ार के अनुरूप ढाली जाती रही हैं।
वेलेंटाइन डे इसका एक और उदाहरण है। तीन-चार दशक पहले तक भारत में इस दिन का कोई अस्तित्व नहीं था। आज यह अरबों का बाज़ार बन चुका है। जनवरी से फरवरी तक उपहारों की बिक्री चरम पर होती है। इसमें बड़ी संख्या में किशोर शामिल होते हैं, जिन्हें अपने भविष्य और शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए था। यह उत्सव प्रेम का नहीं, उपभोग का है।
इन सबका परिणाम समाज में दिखाई दे रहा है। संबंधों में अस्थिरता, विश्वास की कमी, अपराधों में वृद्धि—ये केवल व्यक्तिगत विफलताएँ नहीं हैं। ये उस सामाजिक ढाँचे के टूटने के संकेत हैं, जिसे लंबे समय से कमजोर किया जा रहा है।
भारतीय परंपरा ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार दिया। यहाँ धर्म का अर्थ पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को धारण करने वाला तत्त्व है। परिवार, समाज और राष्ट्र एक ही धारा के अंग हैं। वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियों के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि जहाँ मनुष्य संबंधों में जीता है, वहाँ वह केवल उपभोक्ता नहीं बनता।
आज वेनेज़ुएला है। कल कोई और देश होगा। भारत पर यह आक्रमण सैन्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप में पहले से जारी है। यदि समय रहते हमने इसे नहीं समझा, तो हमारी संस्कृति, परिवार और समाज धीरे-धीरे खोखले हो जाएँगे।
आज बात किसी दल, किसी सरकार या किसी तात्कालिक राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रह गई है। मूल प्रश्न इससे कहीं आगे का है। प्रश्न यह है कि हम अपने जीवन, अपनी सोच और अपने सामाजिक ढाँचे को बाज़ार की शर्तों पर चलने देंगे या अपनी सभ्यता, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए सचेत खड़े होंगे। क्योंकि बाज़ार को न समाज चाहिए, न परिवार, न परंपरा—उसे केवल उपभोग चाहिए, वह भी निरंतर और बिना किसी नैतिक सीमा के।
यह बात अब अस्पष्ट नहीं रहनी चाहिए कि आज के समय में हमारी सबसे बड़ी शत्रु ग्लोबल मार्केट फोर्सेज हैं। कोई व्यक्ति, कोई देश या कोई विचारधारा नहीं, बल्कि वह वैश्विक बाज़ारवादी तंत्र, जो धर्म, संस्कृति, कला, साहित्य, लोक-परंपराओं और स्थानीय जीवन-पद्धतियों को अपने विस्तार में बाधा मानता है। उसका उद्देश्य समाज को तोड़ना नहीं दिखता, बल्कि उसे इतना बदल देना है कि वह प्रतिरोध की क्षमता ही खो दे। इसका प्रतिकार नारों से नहीं, बल्कि अपने जीवन-व्यवहार से होगा—अपने परिवार, अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों को सहेजकर।
धर्म की रक्षा ही वास्तव में राष्ट्र की रक्षा है। धर्म की सबसे छोटी इकाई परिवार है। परिवार से समाज बनता है और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। धर्म का ही एक सजीव और दृश्य रूप संस्कृति है, जिसे हम हिंदू संस्कृति के रूप में जानते हैं। यही समाज अलग-अलग मतों, पंथों, दर्शनों, परंपराओं और पूजा-पद्धतियों को अपने भीतर स्थान देता है। इसीलिए यह समझना आवश्यक है कि धर्म एक हो सकता है, लेकिन मत, पंथ, संप्रदाय, रिलिजन और मज़हब अनेक हो सकते हैं।
धर्म सृष्टि का शाश्वत नियम है—वह जीवन-दृष्टि जो मनुष्य को संयम, मर्यादा, उत्तरदायित्व और करुणा के साथ जीना सिखाती है। संस्कृति उस स्मृति का नाम है जो पीढ़ियों को जोड़ती है, और परिवार वह आधार है जिस पर व्यक्ति का चरित्र, समाज की स्थिरता और राष्ट्र की चेतना टिकी होती है। जब परिवार कमजोर पड़ता है, तो समाज बिखरता है; और जब समाज बिखरता है, तो राष्ट्र केवल नक़्शे पर खिंची एक रेखा बनकर रह जाता है।
इसी सत्य को पहचानना और उसी के अनुरूप खड़ा होना आज का सबसे बड़ा दायित्व है—क्योंकि अंततः धर्म की रक्षा में ही राष्ट्र की रक्षा निहित है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें