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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
महेन्द्र सिंह भदौरिया
को
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नया यूजीसी कानून : शिक्षा सुधार नहीं, सत्ता प्रायोजित सामाजिक विभाजन की पटकथा
जब सरकार योग्यता से डरने लगे, तब विश्वविद्यालय प्रयोगशाला बना दिए जाते हैं
भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल डिग्री बाँटने की प्रणाली नहीं रही है। यह राष्ट्र की चेतना, सामाजिक संतुलन और बौद्धिक आत्मविश्वास की रीढ़ रही है। विश्वविद्यालयों ने भारत को सोचने वाले नागरिक दिए, तर्क करने वाले मस्तिष्क दिए और राष्ट्र के लिए खड़े होने वाले नेतृत्व दिए। परंतु आज नया यूजीसी कानून जिस रूप में सामने आया है, वह शिक्षा को ऊँचा उठाने का प्रयास नहीं बल्कि उसे नियंत्रित और वर्गीकृत करने की राजनीतिक योजना अधिक प्रतीत होता है।
सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि यह कानून सुधार से अधिक प्रयोग की भाषा बोलता है। विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन साधने के सरकारी औज़ार बनाए जा रहे हैं। योग्यता, परिश्रम और बौद्धिक क्षमता को पीछे धकेलकर पहचान, श्रेणी और वर्ग को आगे किया जा रहा है। यह शिक्षा नीति नहीं, यह सत्ता की असुरक्षा का दस्तावेज़ है।
नया यूजीसी ढांचा यह संकेत देता है कि सरकार को अब स्वतंत्र और सक्षम विश्वविद्यालयों से असहजता होने लगी है। जब संस्थान सवाल पूछने लगते हैं, जब मेधा सत्ता के अनुकूल नहीं रहती, तब चयन और नियुक्ति की संरचना बदली जाती है। यही इस कानून का मूल स्वर है। विश्वविद्यालयों को वैचारिक रूप से निर्बल बनाना, ताकि वे सत्ता की भाषा बोलें, विचार की नहीं।
इस प्रक्रिया में सबसे सुनियोजित हमला सवर्ण समाज पर दिखाई देता है। बिना किसी समकालीन असमानता के, बिना किसी व्यक्तिगत दोष के, एक पूरे सामाजिक वर्ग को स्थायी अपराधबोध में धकेलने की नीति अब शैक्षणिक कानूनों के माध्यम से लागू की जा रही है। यह सामाजिक न्याय नहीं है। यह राजनीतिक संतुलन के नाम पर किया गया राज्य प्रायोजित भेदभाव है।
सरकार को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि शिक्षा में औसतपन को बढ़ावा देकर सामाजिक स्थिरता लाई जा सकती है। इतिहास गवाह है कि जब भी उत्कृष्टता को संदेह और योग्यता को अपराध बनाया गया है, तब राष्ट्र ने उसका मूल्य चुकाया है। मेधा पलायन, संस्थागत पतन और सामाजिक तनाव उसी के परिणाम होते हैं।
यह बहस आरक्षण के अस्तित्व पर नहीं है। यह उसकी सीमा, विवेक और उद्देश्य पर है। जब आरक्षण नीति स्थायी सत्ता उपकरण बन जाती है और योग्यता को हाशिए पर डाल दिया जाता है, तब शिक्षा व्यवस्था खोखली हो जाती है। विश्वविद्यालय न तो नेतृत्व देते हैं और न ही दिशा। वे केवल आंकड़े पैदा करते हैं।
यह भी समझना होगा कि शिक्षा में किया गया प्रत्येक राजनीतिक हस्तक्षेप दीर्घकालीन घाव छोड़ता है। आज जो तालियों के बीच पारित हो रहा है, कल वही विश्वविद्यालयों में अविश्वास, शिक्षक वर्ग में खेमेबंदी और छात्रों में असुरक्षा बनकर उभरेगा। सरकारें बदल जाएँगी, पर नुकसान राष्ट्र को भुगतना पड़ेगा।
राष्ट्रवादी दृष्टि से यह कानून आत्मघाती है। शिक्षा का कार्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। शिक्षा राष्ट्र निर्माण का माध्यम है, न कि सामाजिक इंजीनियरिंग का औज़ार। जिन मनीषियों ने भारत की शिक्षा परंपरा को दिशा दी, उन्होंने कभी ज्ञान को वर्गों में नहीं बाँटा। उन्होंने चरित्र और क्षमता को ही राष्ट्र की पूँजी माना।
सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को कमजोर बनाकर कोई भी सत्ता मजबूत नहीं होती। जो शासन मेधा से डरने लगे, वह अंततः इतिहास से भी डरने लगता है।
आज यह कहना अनिवार्य है कि शिक्षा कोई प्रयोगशाला नहीं है और समाज कोई परीक्षण सामग्री नहीं। शिक्षा से खिलवाड़ राष्ट्र की जड़ों से खिलवाड़ है। और जो सरकारें जड़ों को कमजोर करती हैं, वे भविष्य में केवल खंडहर छोड़ती हैं।
भारत को जातियों में नहीं, चरित्र में महान बनना है। भारत को श्रेणियों से नहीं, श्रेष्ठता से आगे बढ़ना है। और यदि सरकार यह दायित्व निभाने में असफल होती है, तो राष्ट्र का विवेक उसे याद दिलाएगा।
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