- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
हिंदू समाज मूलतः एक अत्यंत भावुक समाज है। यही भावुकता उसकी सभ्यतागत पहचान भी है और दुर्भाग्य से उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। इस सत्य को सनातन-द्रोही शक्तियाँ बहुत पहले समझ चुकी हैं। उन्हें भली-भाँति ज्ञात है कि हिंदू समाज को सीधे पराजित करना कठिन है, किंतु उसकी भावनाओं को छूकर, उसकी करुणा और क्षमाशीलता को उकसाकर उसे निष्क्रिय किया जा सकता है। पिछले एक हजार वर्षों के इतिहास को यदि निष्पक्ष दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है।
मध्यकालीन आक्रमणों के समय अनेक अवसरों पर हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं को युद्धनीति का हिस्सा बनाया गया। कहा जाता है कि जब आक्रमण होते थे, तो गाय जैसे पवित्र प्रतीकों को आगे कर दिया जाता था। हिंदू राजा धर्मसंकट में पड़ जाते थे और निर्णायक प्रहार से हिचकिचाते थे। परिणामस्वरूप पराजय होती थी। यह हर युद्ध की कहानी नहीं थी, किंतु यह हिंदू मानसिकता के उस पक्ष को अवश्य दर्शाता है, जहाँ भावुकता ने रणनीति पर भारी पड़ने का कार्य किया।
हिंदू मानसिकता का दूसरा, और उससे भी गहरा पक्ष, उसकी अत्यधिक क्षमाशीलता है। हिंदू समाज ने अपने साथ हुए अत्याचारों के बाद भी अत्याचारी को क्षमा किया है। इतिहास गवाह है कि मंदिरों का विध्वंस हुआ, सांस्कृतिक दमन हुआ, व्यापक हिंसा हुई—फिर भी हिंदू समाज ने स्मृति को पकड़कर न्याय की माँग करने के स्थान पर क्षमा को ही अपना आभूषण बनाए रखा। इसी क्षमाशीलता का परिणाम यह हुआ कि इस्लामी आक्रांताओं द्वारा किए गए कृत्यों को लेकर कभी सामूहिक स्तर पर दंड या उत्तरदायित्व का प्रश्न खड़ा नहीं हुआ। आज भी हिंदू समाज के मन में सहज रूप से यह वाक्य आ जाता है—“सारे मुसलमान एक जैसे नहीं होते।” यह कथन अपने आप में गलत नहीं है, किंतु जब इसी के सहारे पूरे ऐतिहासिक अनुभव को भुला दिया जाए, तो वही वाक्य समाज को निरस्त्र बना देता है।
भारत विभाजन इस मानसिकता की सबसे बड़ी और सबसे पीड़ादायक परिणति था। उस त्रासदी में लाखों हिंदू और सिख मारे गए, करोड़ों लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। इसके बावजूद विभाजन के वास्तविक अपराधियों—जिन्ना, मुस्लिम लीग और उनके सामने आत्मसमर्पण करने वाले राजनीतिक नेतृत्व—पर कभी गंभीर और समग्र प्रश्न नहीं उठाया गया। इसके स्थान पर सारा दोष गांधी पर डालकर एक प्रकार का मानसिक समाधान खोज लिया गया। जबकि वास्तविकता यह थी कि उस समय सत्ता की राजनीति ने मुस्लिम लीग के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।
इसी संदर्भ में अमेरिका का उदाहरण ध्यान देने योग्य है। जब अमेरिका में देश टूटने जैसी परिस्थिति बनी, तब अब्राहम लिंकन ने विभाजन स्वीकार करने के बजाय गृहयुद्ध का मार्ग चुना। उस युद्ध की कीमत अत्यंत भारी थी, किंतु उसी संघर्ष का परिणाम आज एक सशक्त, संगठित और शक्तिशाली संयुक्त राज्य अमेरिका के रूप में सामने है। यदि भारत में भी उस समय हिंदू नेतृत्व अखंड भारत के प्रश्न पर अडिग रहता, समाज को संघर्ष के लिए तैयार करता और निर्णायक प्रतिरोध का साहस दिखाता, तो भारत का विभाजन संभवतः नहीं होता। किंतु यहाँ बिना लड़े ही पाकिस्तान थाल में सजाकर दे दिया गया।
जिस समाज ने इस्लामी आक्रांताओं को सदियों तक सहा, जिसने उन्हें पानी पिलाया, उसी भारत में इस्लाम निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सका। जब इस्लाम ने फारस, अरब, उत्तरी अफ्रीका और अन्य सभ्यताओं को निगल लिया, तब वही हठी युद्धक बेड़ा, जिसने सात समुद्र निडर पार किए, भारत आकर ठहर गया। मौलाना ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन हाली के शब्दों में, वही बेड़ा गंगा के मुहाने पर आकर डूब गया। यह भारत की सभ्यतागत शक्ति का प्रमाण था।
जिस समाज ने इस्लाम को निर्णायक रूप से पराजित होने से रोका, उसी समाज ने अंग्रेज़ों को भी अंततः घुटनों पर ला खड़ा किया। पिछले हजार वर्षों में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब भारत में किसी न किसी रूप में आक्रांताओं का प्रतिकार न हुआ हो। किंतु 1947 में वही वीर समाज अपने नेताओं की आत्ममुग्धता और वैचारिक दुर्बलता के कारण विभाजन का साक्षी बन गया। 1948 में सड़कों पर गूँजने वाला नारा—“लड़कर लिया पाकिस्तान, हँसकर लेंगे हिंदुस्तान”—इस बात का प्रतीक था कि हमारे शत्रुओं ने बिना निर्णायक युद्ध के कितनी बड़ी मानसिक जीत हासिल कर ली थी।
यही हिंदू समाज की भावनाओं का सबसे बड़ा दोहन था—और यह दोहन आज भी किसी न किसी रूप में जारी
जो इस्लाम भारत की भूमि पर निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सका, उसी भारत ने आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य को भी अंततः पीछे हटने के लिए विवश किया। यह कथन किसी भावनात्मक गर्व से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया की समझ से जुड़ा है। लगभग एक हजार वर्षों के कालखंड में इस्लामी सत्ता भारत में आई, फैली और कई क्षेत्रों में स्थापित भी हुई, किंतु भारत को वैचारिक और सभ्यतागत रूप से आत्मसात नहीं कर सकी। हर दौर में किसी न किसी रूप में प्रतिरोध जीवित रहा—कभी राजपूतों के माध्यम से, कभी दक्षिण में विजयनगर जैसे राज्यों के द्वारा, कभी मराठा शक्ति के उत्थान से और कभी सिखों द्वारा अफ़ग़ान आक्रमणों के प्रतिकार के रूप में। यह निरंतर संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि भारत सैन्य रूप से पराजित हो सकता था, पर सभ्यतागत रूप से नहीं।
इसी प्रकार अंग्रेज़ों का शासन भी भारत में निर्विरोध स्वीकार नहीं किया गया। 1757 के बाद से लेकर 1857 तक और फिर उसके बाद भी, भारत में असंतोष, विद्रोह और प्रतिरोध की धारा बनी रही। 1857 का विद्रोह भले ही तत्काल सफल न हुआ हो, लेकिन उसने अंग्रेज़ों की अजेयता की छवि को तोड़ दिया। इसके बाद स्वदेशी आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियाँ, सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बने वैश्विक दबाव—इन सबने मिलकर ब्रिटिश शासन को यह समझने पर मजबूर किया कि भारत को लंबे समय तक बलपूर्वक नियंत्रित करना संभव नहीं है। इस अर्थ में अंग्रेज़ भारत से केवल नैतिक आग्रह के कारण नहीं गए, बल्कि लगातार बने दबाव और प्रतिरोध के कारण गए।
इतने लंबे संघर्ष के बाद 1947 में भारत का विभाजन होना इसलिए अधिक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यह प्रश्न इसलिए नहीं कि भारत ने संघर्ष नहीं किया, बल्कि इसलिए कि जिस समाज ने सदियों तक बाहरी आक्रांताओं का सामना किया, वही समाज निर्णायक क्षण में नेतृत्व के स्तर पर दिशाहीन क्यों हो गया। भारत विभाजन किसी सैन्य पराजय का परिणाम नहीं था, बल्कि राजनीतिक निर्णयों और नेतृत्व की प्राथमिकताओं का परिणाम था।
1946 का चुनाव कांग्रेस ने अखंड भारत की पृष्ठभूमि में लड़ा था। जनता के सामने यही संदेश था कि सत्ता का हस्तांतरण एक संयुक्त राष्ट्र के रूप में होगा। उसी समय कैबिनेट मिशन योजना जैसी व्यवस्थाएँ मौजूद थीं, जिनके अंतर्गत विभाजन के बिना सत्ता हस्तांतरण की संभावना बनी हुई थी। इसके बावजूद मुस्लिम लीग की पृथकतावादी राजनीति और हिंसक दबाव के सामने कांग्रेस नेतृत्व ने टकराव के बजाय समझौते का मार्ग चुना। यह आत्मसमर्पण किसी निर्णायक युद्ध में हार के बाद नहीं, बल्कि सत्ता-हस्तांतरण की शीघ्रता और राजनीतिक सुविधा के कारण हुआ।
यही कारण है कि 1948 में यह नारा प्रचलित हुआ—“लड़कर लिया पाकिस्तान, हँसकर लेंगे हिंदुस्तान।” यह नारा केवल उकसावे का नहीं था, बल्कि उस मानसिक स्थिति को दर्शाता था कि पाकिस्तान किसी निर्णायक युद्ध के बाद नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त किया गया। दूसरी ओर हिंदू समाज, जो विभाजन की हिंसा में सबसे अधिक पीड़ित हुआ, वह नेतृत्व के निर्णयों के सामने असहाय बना रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारे विरोधियों ने बिना निर्णायक संघर्ष के एक बड़ी राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक जीत हासिल कर ली।
विडंबना यह रही कि जिस कांग्रेस ने अखंड भारत के नाम पर जनसमर्थन प्राप्त किया था, वही कांग्रेस डेढ़ वर्ष के भीतर मुस्लिम लीग के सामने विभाजन स्वीकार करने की स्थिति में आ गई। इसके बावजूद स्वतंत्रता के बाद के राष्ट्रीय विमर्श में उसी कांग्रेस को देश को स्वतंत्रता दिलाने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में हिंदू समाज की भावनाओं का व्यापक दोहन हुआ—और यह दोहन केवल अतीत की घटना बनकर नहीं रह गया। आज भी “हिंदू एकता” जैसे शब्दों का प्रयोग प्रायः भावनात्मक अपील के रूप में किया जाता है, जबकि दीर्घकालिक सुरक्षा, सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मरक्षा जैसे विषयों पर स्पष्ट नीति-विमर्श से बचा जाता है।
आज परिस्थिति भिन्न है। आज हिंदू समाज के पास जनसंख्या, संसाधन और ऐतिहासिक अनुभव—तीनों हैं। आवश्यकता इस बात की है कि नीतिगत स्तर पर हिंदू समाज को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से सशक्त और संगठित किया जाए। यह कार्य तात्कालिक नारों से नहीं, बल्कि अगले 100 से 200 वर्षों की स्पष्ट दृष्टि से संभव है—जिसमें यह तय हो कि भारत को विश्व की आर्थिक महाशक्ति कैसे बनाना है, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में नेतृत्व कैसे स्थापित करना है, और समाज को आत्मरक्षा के स्तर पर कैसे सक्षम बनाना है।
इस संदर्भ में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि हिंदू समाज की रक्षा और सनातन वैदिक परंपरा की रक्षा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सनातन वैदिक दृष्टि ही भारत की सभ्यतागत रीढ़ है। यदि यही दृष्टि कमजोर हुई, तो भारत का अस्तित्व केवल एक भौगोलिक इकाई तक सीमित रह जाएगा। इसलिए भारत की रक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा भी है।
हिंदू की परिभाषा किसी भौगोलिक सीमा के आधार पर नहीं, बल्कि सनातन वैदिक धर्म के आधार पर निर्धारित होती है। सनातन वैदिक धर्म वह जीवन-दृष्टि है जो आत्मा और ब्रह्म के अस्तित्व को स्वीकार करती है, कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को जीवन की मूल व्यवस्था मानती है, छह दर्शनों की बौद्धिक परंपरा तथा हजारों लोकपरंपराओं को अपने भीतर समाहित करती है। जो इस वैदिक दृष्टि को मानता है—चाहे वह निराकार ब्रह्म में विश्वास रखता हो या साकार ईश्वर में, चाहे स्वयं को आस्तिक कहे या नास्तिक—वह हिंदू है। हिंदू होना किसी पूजा-पद्धति, संप्रदाय या बाहरी पहचान का विषय नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक स्वीकार है।
इस अर्थ में, जो व्यक्ति सनातन वैदिक धर्म को मानता है, वह संसार के किसी भी कोने में रहता हो, वह हिंदू है। और जो इस वैदिक जीवन-दृष्टि को स्वीकार नहीं करता, वह हिंदू नहीं है—भले ही उसका जन्म या निवास भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर ही क्यों न हो। इसलिए हिंदू की परिभाषा को केवल भूगोल से जोड़ना एक गंभीर वैचारिक भूल है। यदि भारत की वास्तविक रक्षा करनी है, तो अपनी पहचान को सनातन वैदिक धर्म के आधार पर ही स्पष्ट और दृढ़ रूप से स्थापित करना होगा।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब धर्म को भी भूगोल के आधार पर परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है। ऐसा करते ही अनेक वैचारिक धाराएँ—जो इस्लाम, ईसाईयत, वामपंथ, पूंजीवाद, समाजवाद, कम्युनिज़्म, सेकुलरिज़्म या राइट-विंग जैसी पहचानों के रूप में सामने आती हैं—समाज को वैचारिक स्तर पर भ्रमित करने लगती हैं। ये धाराएँ ऊपर से भिन्न दिखाई देती हैं, किंतु उनका साझा लक्षण यह है कि वे सनातन वैदिक दृष्टि को या तो नकारती हैं या उसे हाशिये पर धकेल देती हैं।
इसी संदर्भ में असुर, दानव और दैत्य की अवधारणाएँ केवल पौराणिक प्रतीक नहीं रह जातीं, बल्कि उन वैचारिक शक्तियों का बोध कराती हैं जो धर्म को सत्ता, विचारधारा या भौतिक लक्ष्य तक सीमित कर देती हैं। इसके विपरीत सनातन वैदिक धर्म किसी संकीर्ण मज़हब का नाम नहीं है, बल्कि उस शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति है जो इस सृष्टि को धारण करता है—जहाँ सृजन, स्थिति और लय को एक साथ समझा जाता है।
जब तक हिंदू समाज अपनी पहचान को इसी सनातन वैदिक आधार पर स्पष्ट नहीं करेगा, तब तक न भारत की सभ्यतागत रक्षा संभव है और न ही हिंदू समाज वैचारिक रूप से सशक्त हो सकता है।
आज भारत में स्थिति यह है कि अधिकांश हिंदू संगठन, राजनीतिक दल और यहाँ तक कि सामान्य नागरिक भी स्वयं को किसी न किसी आधुनिक वैचारिक खांचे में रखकर परिभाषित करते हैं। कोई अपने को सेकुलर कहता है, कोई कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट, कोई राइट, लेफ्ट या सेंटर का पक्षधर बनकर अपनी पहचान गढ़ता है। कुछ लोग अंत में स्वयं को राष्ट्रवादी कहकर संतोष कर लेते हैं। परंतु इस समस्त वैचारिक शोर के बीच एक बात उल्लेखनीय है—बहुत कम लोग, बहुत कम संगठन या दल यह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनकी विचारधारा हिंदुत्व आधारित है, कि उनकी वैचारिक जड़ें सनातन वैदिक धर्म में हैं, और कि वे स्वयं को सनातनी दृष्टि से परिभाषित करते हैं।
यह मौन कोई साधारण संयोग नहीं है। यह उस वैचारिक संकोच का परिणाम है, जिसमें अपनी मूल सभ्यतागत पहचान को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने से बचा जाता है। जबकि सनातन वैदिक धर्म किसी संकीर्ण मत, पंथ, संप्रदाय या मज़हब का नाम नहीं है। वह अखिल ब्रह्मांड के शाश्वत सत्य का बोध कराता है—वह धर्म जो इस सृष्टि को धारण करता है, जिसमें सृजन भी है, लय भी है और पुनः सृजन भी है। वह ऐसी दृष्टि है जहाँ विचार जन्म लेते हैं, विकसित होते हैं और समय के साथ विलीन भी हो जाते हैं, पर मूल सत्य अक्षुण्ण रहता है।
सनातन वैदिक दृष्टि स्वयं को किसी सीमित पहचान में बाँधने से इंकार करती है। वह रिलिजन, मज़हब या संप्रदाय की संकुचित परिभाषाओं से परे जाकर जीवन और सृष्टि को समग्रता में देखने की क्षमता देती है। किंतु जब हिंदू समाज स्वयं अपनी इस व्यापक वैचारिक पहचान को व्यक्त करने से हिचकता है, तब स्वाभाविक रूप से अन्य आयातित विचारधाराएँ—चाहे वे राजनीतिक हों या दार्शनिक—उस रिक्त स्थान को भरने लगती हैं। यही वैचारिक भ्रम आज हिंदू समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
हिंदू की परिभाषा स्पष्ट करने के बाद अब यह समझना आवश्यक हो जाता है कि जब तक हिंदू समाज को स्पष्ट वैचारिक दिशा नहीं दी जाएगी और भारत को सनातन वैदिक धर्म के प्रतिनिधि राष्ट्र के रूप में स्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी। यह कोई वैचारिक आशंका नहीं, बल्कि इतिहास, समाजशास्त्र और जनसंख्या-आँकड़ों से प्रमाणित यथार्थ है। सनातन दृष्टि में अर्थ और काम कभी भी धर्म के अनुशासन से अलग नहीं माने गए। इसी कारण हमारे ऋषियों ने सृष्टि के आरंभ से ही पुरुषार्थ-चतुष्टय—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—का सिद्धांत दिया। यह केवल नैतिक उपदेश नहीं था, बल्कि सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप—सत्त्व, रजस और तमस—की वैज्ञानिक समझ पर आधारित सामाजिक संतुलन था।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं—
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः”।
यह श्लोक वर्ण-व्यवस्था के शास्त्रीय सिद्धांत को स्पष्ट करता है। किंतु ऐतिहासिक सत्य यह है कि सामाजिक व्यवहार में यह व्यवस्था धीरे-धीरे जन्माधारित बन गई। इस तथ्य से इनकार करना न शास्त्रसम्मत है, न ही वैचारिक रूप से ईमानदार। समस्या यहाँ से आरंभ होती है—जहाँ विकृति के सुधार के स्थान पर पूरी संरचना को ही नष्ट करने का आग्रह किया जाता है।
सृष्टि स्वयं भेद पर आधारित है। उपनिषदों का सूत्र—“एकोऽहम् बहुस्याम्”—स्पष्ट करता है कि विविधता ही सृष्टि का मूल नियम है। प्रकृति में कोई दो पत्ते समान नहीं होते, तो मनुष्य को एक-सा बनाने का आग्रह कैसे स्वाभाविक हो सकता है? किंतु आधुनिक काल में समानता और समता स्थापित करने के नाम पर जो दृष्टि अपनाई गई, वह मूलतः अब्राहमिक सोच से आई, जहाँ एक सत्य, एक मार्ग और एक मानक की कल्पना है। यही दृष्टि आधुनिक डेमोक्रेसी की संरचना में प्रवेश कर हिंदू समाज को भीतर से विखंडित करती चली गई।
हिंदू समाज की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता रही है—विचार की विविधता, उपासना की विविधता और सामाजिक भूमिकाओं की विविधता। यही कारण है कि भारत में दर्शन की छह स्वतंत्र परंपराएँ विकसित हुईं, और शास्त्रार्थ व तर्क की परंपरा बनी रही। किंतु जब इस विविधता को कमजोरी मान लिया गया, जब चातुर्वर्ण्य जैसी प्रकृति-आधारित सामाजिक व्यवस्था को केवल “भेदभाव” कहकर नकार दिया गया, और जब जाति-व्यवस्था की विकृतियों के साथ-साथ उसकी मूल ज्ञान-परंपरा को भी समाप्त करने की बात की गई, तब उसके परिणाम भयावह निकले।
इतिहास इसके ठोस उदाहरण देता है। अफ़ग़ानिस्तान, जो कभी बौद्ध और वैदिक परंपराओं का केंद्र था, वहाँ इन परंपराओं के नष्ट होते ही समाज पूरी तरह इस्लामी ढाँचे में समा गया। भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान अंग्रेज़ी विमर्श के प्रभाव में मूर्ति-पूजा और लोकपरंपराओं को “अंधविश्वास” घोषित किया गया। जिन क्षेत्रों में आर्य समाज का प्रभाव अत्यधिक हुआ, वहाँ स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक निरंतरता टूटी और कुछ ही दशकों में हिंदू समाज लगभग समाप्तप्राय हो गया।
बंगाल में वामपंथी शासन के दौरान जाति-उन्मूलन और धार्मिक पहचान को गौण करने की नीति अपनाई गई। 1951 में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 19% थी; आज यह 30% के आसपास पहुँच चुकी है, और कई ज़िलों में हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं। पंजाब में सिख पंथ के भीतर जाति-विरोधी आग्रह के साथ बड़े पैमाने पर ईसाईकरण हुआ। हाल के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, केवल एक वर्ष में लगभग 3.5 लाख लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया—यह संख्या स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि संगठित सामाजिक रिक्तता का संकेत है।
पूर्वोत्तर भारत की स्थिति और भी गंभीर है। 1951 में अधिकांश पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदू स्पष्ट बहुसंख्यक थे। आज असम और त्रिपुरा को छोड़कर नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्सों में हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं। स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्षों में भारत के नौ राज्यों में हिंदू जनसंख्या अल्पसंख्यक स्थिति में पहुँच चुकी है। यह परिवर्तन किसी युद्ध या सैन्य पराजय का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक और सामाजिक विघटन का परिणाम है।
फर्जी समानता स्थापित करने के नाम पर हिंदू समाज की भावनाओं का सबसे अधिक दोहन हुआ है। राज्य का दायित्व यह हो सकता है कि वह सभी नागरिकों को समान अवसर दे—यह आधुनिक डेमोक्रेसी का भी उचित सिद्धांत है। किंतु अवसर और भूमिका को समान मान लेना स्वयं प्रकृति के विरुद्ध है। हर व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बन सकता, जैसे हर व्यक्ति किसान, शिक्षक या सैनिक नहीं बन सकता। समाज का संतुलन भूमिकाओं की विविधता से बनता है, न कि कृत्रिम समानता से। जब समान अवसर के स्थान पर समानता थोपने का प्रयास किया जाता है, तब उसका परिणाम समाज के विखंडन के रूप में सामने आता है—और आज हिंदू समाज उसी विखंडन को प्रत्यक्ष रूप से भोग रहा है।
तीसरी और निर्णायक बात यह है कि यदि हिंदू समाज के भविष्य को सुरक्षित करना है, तो हमें तात्कालिक प्रतिक्रियाओं, भावनात्मक आवेग और अल्पकालिक राजनीतिक सोच से ऊपर उठकर कम से कम दो सौ वर्षों की सभ्यतागत दृष्टि विकसित करनी होगी। इतिहास साक्षी है कि कोई भी सभ्यता पाँच–दस वर्षों की योजनाओं से नहीं टिकती। रोम, चीन, इस्लामी ख़िलाफ़त या आधुनिक पश्चिम—सभी ने अपनी संस्थाएँ, शिक्षा और अर्थ-व्यवस्था दीर्घकालिक दृष्टि से गढ़ीं। भारत के संदर्भ में भी यह प्रश्न अब टालने योग्य नहीं रहा कि हम आने वाली पीढ़ियों को कैसा समाज और कैसा राष्ट्र सौंपना चाहते हैं।
सनातन परंपरा में अर्थ को कभी गौण नहीं माना गया। मनुस्मृति स्पष्ट कहती है कि अर्थ के बिना धर्म और काम दोनों निष्फल हो जाते हैं, किंतु साथ ही यह भी उतना ही स्पष्ट है कि अर्थ यदि धर्म के अनुशासन से मुक्त हो जाए, तो वही समाज के पतन का कारण बनता है। इसलिए भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का अर्थ पश्चिमी मापदंडों की नकल करना नहीं है, बल्कि स्वावलंबी उत्पादन, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और सामाजिक संतुलन स्थापित करना है। प्राचीन भारत की शक्ति इसी में थी कि उसकी अर्थव्यवस्था केवल उपभोग पर नहीं, बल्कि कृषि, शिल्प, व्यापार और ज्ञान—चारों पर आधारित थी। यही कारण था कि भारत सदियों तक बाहरी दबावों के बावजूद सांस्कृतिक रूप से जीवित रहा।
आधुनिक संदर्भ में यह तथ्य और स्पष्ट हो जाता है। जिन देशों ने अपनी उत्पादन-क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर ध्यान दिया, वे ही वैश्विक व्यवस्था में निर्णायक बने। केवल बाज़ार और उपभोग पर निर्भर समाज न तो सांस्कृतिक नेतृत्व कर पाते हैं, न ही दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित कर पाते हैं। भारत यदि विश्व के मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी केंद्र के रूप में उभरना चाहता है, तो यह केवल आर्थिक नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि सभ्यतागत अनुशासन का प्रश्न है—जहाँ उत्पादन को सम्मान, श्रम को गरिमा और तकनीक को समाज-कल्याण से जोड़ा जाए।
इस पूरी प्रक्रिया में हिंदू युवाओं की भूमिका केंद्रीय है। जनसंख्या का युवा होना अपने आप में शक्ति नहीं है। इतिहास बताता है कि बिना कौशल, अनुशासन और उद्देश्य के युवा समाज के लिए बोझ भी बन सकते हैं। इसलिए हिंदू युवाओं का कौशल विकास केवल रोजगार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें उद्यमी, नवोन्मेषी और समाज-उत्तरदायी बनाना होगा। प्राचीन भारत में वैश्य और शिल्प परंपराएँ इसलिए सशक्त थीं क्योंकि उत्पादन और व्यापार केवल लाभ का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व थे।
इसके साथ ही, हिंदू समाज को मानसिक और बौद्धिक रूप से सुदृढ़ बनाना भी उतना ही आवश्यक है। इतिहास में बार-बार यह देखा गया है कि जिन समाजों ने अपनी वैचारिक स्पष्टता खो दी, वे आर्थिक या सैन्य रूप से सक्षम होते हुए भी टूट गए। शिक्षा यदि केवल रोज़गार का साधन बन जाए और समाज अपने इतिहास, दर्शन और मूल दृष्टि को लेकर भ्रमित हो जाए, तो वह बाहरी प्रभावों के सामने टिक नहीं पाता। इसी कारण सनातन परंपरा में सज्जन शक्ति—अर्थात् चरित्रवान, विवेकशील और उत्तरदायित्वबोध से युक्त नागरिकों—को समाज की रीढ़ माना गया है।
सुरक्षा और आत्मरक्षा का प्रश्न भी इसी संदर्भ में समझना होगा। किसी भी समाज के लिए यह अनिवार्य है कि वह संगठित, सजग और सक्षम हो। यह कोई उग्र या हिंसक विचार नहीं, बल्कि ऐतिहासिक यथार्थ है। जो समाज स्वयं को असहाय मान लेता है, उसके निर्णय दूसरों द्वारा लिए जाने लगते हैं। क्षत्रधर्म का शास्त्रीय अर्थ यही है—अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता, न कि अकारण आक्रामकता। जब समाज का एक जागरूक और अनुशासित वर्ग आत्मरक्षा में सक्षम होता है, तब कोई भी शक्ति उसे हल्के में नहीं लेती।
इन सभी आयामों—अर्थ, संस्कृति, शिक्षा, युवा, सुरक्षा—का केंद्र एक ही है: सनातन आर्थिक और सामाजिक दृष्टि। उपभोक्तावाद, निरंकुश पूंजीवाद और राज्य-केंद्रित समाजवाद—तीनों ने अपने-अपने संदर्भ में सीमाएँ दिखाई हैं। इनके विकल्प के रूप में सनातन दृष्टि यह कहती है कि उत्पादन, उपभोग और वितरण—तीनों धर्म के अनुशासन में हों, ताकि समाज दीर्घकाल तक संतुलित रह सके।
यदि यह दीर्घकालिक, तथ्य-आधारित और धर्म-संयमित दृष्टि नहीं अपनाई गई, तो इतिहास स्वयं को दोहराएगा। हिंदू समाज अपनी ऊर्जा और भावनाओं को बिखेरता रहेगा, और जिन शक्तियों पर वह भरोसा करेगा, वही अंततः उसके लिए संकट बनेंगी। इसके विपरीत, सशक्त, संगठित और वैचारिक रूप से स्पष्ट भारत राष्ट्र ही भारत को सभ्यतागत स्थिरता दे सकता है और सनातन वैदिक परंपरा के पुनः उत्थान का आधार बन सकता है।
कमज़ोर और दिशाहीन समाज न स्वयं की रक्षा कर सकता है, न राष्ट्र की।
इसी यथार्थ को “वीर भोग्या वसुंधरा” मंत्र स्मरण कराता है—यह शक्ति का नहीं, बल्कि कर्तव्य, सामर्थ्य और उत्तरदायित्व का बोध है। यही बोध हिंदू समाज को भावुकता से शक्ति की ओर, और भ्रम से दीर्घकालिक दृष्टि की ओर ले जा सकता है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें