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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
हिंदू समाज में जब हम प्रत्येक जीव में नारायण का अंश देखने का भाव विकसित करते हैं, तब वैचारिक भ्रम स्वतः समाप्त हो जाता है। ऐसा समाज स्वयं को हीन, बिखरा हुआ या दिशाहीन नहीं मानता और न ही अपने ही समाज के प्रति नकारात्मक दृष्टि रखता है। यह दृष्टि कोई भावनात्मक कल्पना नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत सिद्धांत है। उपनिषद स्पष्ट कहते हैं—
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
अर्थात् यह सम्पूर्ण चराचर जगत ईश्वर से आच्छादित है।
जिस समाज की मूल दृष्टि यह हो कि समस्त सृष्टि में एक ही तत्त्व व्याप्त है, वह समाज वैचारिक रूप से कभी दिग्भ्रमित नहीं हो सकता।
हिंदू समाज का अस्तित्व किसी ऐतिहासिक कालखंड की उपज नहीं है। यह समाज सृष्टि के आदि से चला आ रहा है। जब सृष्टि की रचना हुई, उसी क्षण इसके मूल तत्त्व भी प्रकट हुए। सृष्टि का स्वभाव निर्माण, स्थिति और लय का है—वह बनती है, बिगड़ती है और पुनः संतुलन में आती है। यही गुण हिंदू समाज का भी है। इसीलिए वेदों को जिस अर्थ में अपौरुषेय कहा गया है—अर्थात् मनुष्यकृत नहीं—उसी अर्थ में हिंदू समाज भी अपौरुषेय है।
वेद किसी व्यक्ति, किसी सत्ता या किसी संस्था की रचना नहीं हैं, बल्कि सृष्टि-सत्य की अनुभूति हैं। उसी प्रकार हिंदू समाज भी किसी एक परिभाषा, किसी भौगोलिक सीमा या किसी भावनात्मक आग्रह से नहीं बँधता। जो किसी भी सीमा से परे है, वही साक्षात् परब्रह्म नारायण का स्वरूप है। ब्रहदारण्यक उपनिषद में कहा गया—
“नेति नेति”
अर्थात् परब्रह्म को किसी एक रूप, एक नाम या एक सीमित परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता।
इसी कारण हिंदू समाज को किसी एक सामाजिक मॉडल में बाँधने का प्रत्येक प्रयास अंततः विफल होता है।
इस भाव को समझे बिना सृष्टि की काल-संरचना को समझना संभव नहीं है। काल से मुक्त न कोई व्यक्ति है, न कोई समाज, और न ही कोई सभ्यता। गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं—
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः।”
अर्थात् मैं ही काल हूँ, जो सृष्टि की गति को संचालित करता है।
आज जिस युग को परंपरा में कलियुग कहा गया है, उसके विषय में पुराणों में स्पष्ट वर्णन है कि इस युग में धर्म पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता, बल्कि उसकी स्थिति क्षीण हो जाती है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि कलियुग में धर्म एक पाद पर स्थित रहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म समाप्त हो गया, बल्कि यह कि विवेक दुर्बल पड़ जाता है और मनुष्य भ्रमित होने लगता है।
इसी भ्रम की अवस्था में यह विचार उत्पन्न होता है कि यदि पूरे समाज को एक-सा बना दिया जाए, तो समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। जबकि शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि सृष्टि का मूल स्वभाव विविधता है, एकरूपता नहीं। त्रिगुणात्मक सृष्टि—सत्त्व, रज और तम—स्वयं यह प्रमाण है कि न प्रकृति एक-सी है, न मनुष्य और न ही समाज।
इसलिए हिंदू समाज की मूल विशेषता यही है कि वह सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप को स्वीकार करता है, उसे नकारता नहीं। यही स्वीकार भाव उसे जीवंत, संतुलित और कालजयी बनाता है।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि यदि पूरा समाज एक-सा हो जाए, तो सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। यह धारणा न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि सृष्टि के स्वभाव के भी विरुद्ध है। महाभारत के बाद के इतिहास को देखिए—पिछले पाँच हजार वर्षों में कितने संप्रदाय बने। यह किसी विघटन का प्रमाण नहीं है, बल्कि उस समाज की जीवंतता का प्रमाण है, जो सत्य को किसी एक मार्ग में बाँधने का आग्रह नहीं करता।
इसके विपरीत, यहूदी, ईसाई और इस्लाम—तीनों अब्राहमिक मत—एक ईश्वर, एक ग्रंथ और एक अंतिम सत्य की बात करते हैं। मूर्तिपूजा को नकारते हैं, ईश्वर को सातवें आसमान में स्थित सत्ता के रूप में देखते हैं और बाइबिल, क़ुरान तथा ओल्ड टेस्टामेंट को अंतिम मानते हैं। फिर भी इतिहास साक्षी है कि इन्हीं मतों के भीतर आपसी संघर्षों में करोड़ों लोग मारे गए। आज भी इनके भीतर संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है। जजमेंट डे और क़यामत जैसी अवधारणाएँ स्वयं यह बताती हैं कि वहाँ संघर्ष को अंतिम परिणति माना गया है। जो स्वयं अपने भीतर एकता स्थापित नहीं कर सके, वे पूरी दुनिया को एक-सा बनाने का दावा कैसे कर सकते हैं—यह प्रश्न अपने आप खड़ा हो जाता है।
वर्णाश्रम व्यवस्था को समझे बिना हिंदू समाज को समझना संभव नहीं है। वर्णाश्रम कोई जातिगत विभाजन नहीं, बल्कि प्रकृति का सामाजिक स्वरूप है। समाज में चार प्रकार की प्रवृत्तियाँ सदा रहेंगी। जब वर्णाश्रम व्यवस्था को हटाया गया, तो उसकी जगह ‘क्लास व्यवस्था’ आ गई—लेकिन वर्ग फिर भी चार ही रहे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि समस्या व्यवस्था में नहीं, उस सोच में है जो यह मान लेती है कि सबको एक-सा कर देने से समाज एक हो जाएगा। यह सोच जागृति नहीं, बल्कि दिग्भ्रम है।
हिंदू समाज पहले से ही जागृत समाज है और संसार का सबसे संगठित तथा संतुलित समाज रहा है। वह सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप—सत्त्व, रज और तम—को अपने भीतर धारण करता है। इसी समाज में धर्म के दस लक्षण—क्षमा, शील, करुणा, मानवता का कल्याण, संयम और प्रकृति को माता के रूप में देखने का भाव—स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं। हिंदू होना किसी पहचान का दावा नहीं, बल्कि असुरत्व से देवत्व की यात्रा है। असुर और देव एक ही पिता की संतान होते हुए भी स्वभाव और प्रकृति में भिन्न होते हैं। जो चराचर जगत में परम तत्त्व का भाव देखता है, जो इस सृष्टि में शिवत्व का दर्शन करता है—वही हिंदू चेतना है।
इसी चेतना के कारण यह समाज हजार वर्षों से अधिक समय तक आक्रमणों, सत्ता-वंचना और सांस्कृतिक दबावों को सहने के बाद भी खड़ा है। जब-जब समाज को एक-सा बनाने का प्रयास हुआ, विकृतियाँ उत्पन्न हुईं। बौद्ध मत के प्रयोग का परिणाम इतिहास जानता है। समाज को एक ही साँचे में ढालने का प्रयास हुआ, जिससे सामाजिक संतुलन टूटा। बाद में उस टूटे हुए ताने-बाने को पुनः सनातन धारा से जोड़ने में शताब्दियाँ लग गईं, और आज भी वह प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आर्य समाज के प्रयोग में भी यही हुआ। जिन क्षेत्रों में यह प्रयोग समाज की जड़ों से कटकर हुआ, वहाँ आज हिंदू समाज कमजोर दिखाई देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज को एक-सा बनाना प्रकृति के सिद्धांत के विरुद्ध है।
हिंदू समाज स्वभावतः अतिवादी नहीं हो सकता। यह उसके गुण में ही नहीं है। इसे समझने के लिए आज का ताज़ा उदाहरण पर्याप्त है। कल अमेरिका ने वेनेज़ुएला पर हमला किया। यह हमला किसी धर्म, किसी मानवता या किसी नैतिक दायित्व के लिए नहीं था। इसका कारण स्पष्ट है—वेनेज़ुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा तेल भंडार है। संसाधनों की लूट के लिए किया गया यह हमला आधुनिक वैश्विक शक्ति-मानसिकता को उजागर करता है, जहाँ लाभ और प्रभुत्व ही अंतिम सत्य बन जाते हैं।
अब प्रश्न यह है कि यदि आज अमेरिका की जगह भारत विश्व की महाशक्ति होता, तो क्या वही होता? क्या भारत भी संसाधनों की लूट के लिए किसी देश पर हमला करता? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। भारतीय चेतना में युद्ध का अर्थ लूट नहीं, धर्म की स्थापना रहा है। भारत किसी पर इसलिए आक्रमण नहीं करता कि वहाँ तेल, खनिज या धन है। भारत तभी शस्त्र उठाता है, जब अधर्म बढ़ जाए, जब सज्जनों, ऋषियों, मुनियों और ज्ञानियों पर अत्याचार हो, जब प्राकृतिक व्यवस्था को ध्वस्त किया जा रहा हो।
यदि भारत विश्व-सत्ता होता, तो संसाधनों की लूट के लिए नहीं, बल्कि मानवता के संतुलन के लिए नेतृत्व करता। वहाँ बाज़ार और हथियारों की नहीं, जीव, आत्मा और ब्रह्म की चर्चा होती। परमाणु शस्त्रों की होड़ नहीं, बल्कि उनके नियंत्रण की बात होती। प्रकृति के साथ बलात्कार नहीं, बल्कि उसके संरक्षण की चिंता होती। क्योंकि हिंदू समाज प्रकृति को माता मानता है और प्रकृति से उतना ही लेता है, जितना आवश्यकता हो।
यही हिंदू समाज का स्वभाव है। उसका जन्म प्रकृति से हुआ है। वह वेदों की तरह अपौरुषेय है। इसलिए इस समाज को एक-सा बनाकर एकता संभव नहीं है। यह समाज स्वयं एक तत्त्व है। जब-जब इस तत्त्व को किसी एक साँचे में ढालने का प्रयास हुआ, तब विकृतियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई दीं।
हिंदू एकता किसी नारे से, किसी संगठनात्मक प्रयोग से या सबको एक-सा बनाने की ज़िद से संभव नहीं है। हिंदू एकता केवल धर्म के सिद्धांत और न्याय के सिद्धांत पर ही संभव है। जहाँ समाज को जबरन एक साँचे में ढालने का प्रयास नहीं होता, वहाँ समाज स्वयं अपने भीतर संतुलन का भाव विकसित करता है। समस्या वहाँ पैदा होती है, जहाँ सृष्टि के स्वभाव को नकारकर उसे बदलने की कोशिश की जाती है।
सृष्टि का स्वरूप ही त्रिस्तरीय है—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक। हिंदू समाज इसी सृष्टिगत संरचना के अनुरूप विकसित हुआ है। वर्णाश्रम व्यवस्था कोई सामाजिक प्रयोग नहीं थी, बल्कि इसी सृष्टि-रचना का सामाजिक रूप थी। जब हम इस सृष्टिगत ढाँचे को समझे बिना समाज को समझने का प्रयास करते हैं, तब भ्रम पैदा होता है। इसी भ्रम के कारण यह मान लिया जाता है कि यदि सबको एक-सा बना दिया जाए, तो हिंदू समाज एक हो जाएगा। यह सोच स्वयं दिग्भ्रम की अवस्था है।
हिंदू समाज में सदा से तीन प्रकार की प्रवृत्तियाँ रही हैं—धर्मनिष्ठ, अधर्मनिष्ठ और प्रमादनिष्ठ। यह कोई दोष नहीं है, यह समाज का प्राकृतिक स्वभाव है। जैसे सृष्टि में सत्त्व, रज और तम—तीन गुण हैं और ये तीनों कभी एक-से नहीं हो सकते। इन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता, केवल संतुलित किया जा सकता है। समाज भी इसी सिद्धांत पर चलता है। इसलिए यह मान लेना कि सभी को एक जैसी चेतना में ढाल दिया जाए, न तो संभव है और न ही वांछनीय।
इसी कारण मैंने कहा है कि हिंदू समाज में नारायण का साक्षात स्वरूप विद्यमान है। हिंदू समाज परब्रह्म का अंश नहीं, बल्कि परब्रह्म की सामाजिक अभिव्यक्ति है। इस समाज को दिग्भ्रमित या असंगठित कहना स्वयं इस समाज को न समझ पाने का प्रमाण है। यदि यह समाज वास्तव में असंगठित होता, दिशाहीन होता, तो यह इतिहास में कब का समाप्त हो चुका होता।
इसी समाज में भगवान राम उत्पन्न हुए, इसी समाज में श्रीकृष्ण, शिव और बुद्ध आए। इसी समाज ने विक्रमादित्य को जन्म दिया, जिसने कलियुग में भी सतयुग का अनुभव कराया। इसी समाज में बप्पा रावल हुए, महाराणा प्रताप हुए, छत्रपति शिवाजी महाराज और बाजीराव बल्लाळ जैसे योद्धा हुए। इसी समाज में अहिल्याबाई होल्कर, महारानी लक्ष्मीबाई, महर्षि अरबिंदो, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद सरस्वती और सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुष उत्पन्न हुए। और आज भी इसी समाज से नेतृत्व उभरता है। यदि यह समाज भ्रमित होता, तो इतनी दीर्घ परंपरा कैसे जीवित रहती?
इतिहास यह भी बताता है कि जिन समाजों में यह आंतरिक धर्म-संरचना नहीं थी, वे बाहरी आक्रमणों और वैचारिक हमलों के सामने टिक नहीं पाए। अमेरिका के मूल निवासियों का विनाश केवल सैन्य शक्ति से नहीं हुआ, बल्कि उसके पीछे मिशनरी तंत्र भी सक्रिय था।
जेसुइट, फ्रांसिस्कन और डोमिनिकन मिशनों ने उनकी भाषा, संस्कृति और सामाजिक संरचना को नष्ट किया। ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी बच्चों को परिवारों से अलग कर उनकी पहचान मिटाई गई, जिसे आज Stolen Generations कहा जाता है। अफ्रीका में भी यही हुआ। फारस समाप्त हुआ, इंडोनेशिया की मूल सभ्यता बदल गई, अफ्रीका की परंपराएँ टूट गईं। इन सबके बीच यदि कोई समाज बचा रहा, तो वह हिंदू समाज है।
अब स्वयं से पूछिए—यदि हिंदू समाज असंगठित और दिग्भ्रमित होता, तो क्या वह इस्लाम और ईसाईयत के चरम काल को झेल पाता? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। हिंदू समाज की शक्ति उसकी सैन्य व्यवस्था में नहीं, बल्कि उसके धर्म में रही है। इसी कारण कहा गया—धर्म की रक्षा करोगे, तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।
रामराज्य की परिकल्पना इसी सत्य का उदाहरण है। कहा गया कि राम के राज्य में कोई अकाल मृत्यु नहीं हुई, कोई भूखा नहीं सोया, दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नहीं थे। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि धर्म-संरक्षण का परिणाम बताया गया है। ऐसा ही कालखंड ढाई हजार वर्ष पूर्व विक्रमादित्य के समय भी आया, जब कलियुग में भी सतयुग का अनुभव हुआ। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि समाज ने धर्म के बीज को सुरक्षित रखा।
आज भी वही सत्य है। यदि हम धर्म के बीज को सुरक्षित रखेंगे, तो इसी समाज से फिर विक्रमादित्य जैसे नेतृत्व जन्म लेंगे। हमारा कार्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ सज्जन शक्ति का संरक्षण करना है—उनकी सुरक्षा करना, उनकी संख्या बढ़ाना। शेष कार्य नारायण स्वयं करते हैं।
नारायण की भाँति पूज्य मानकर इस नारायण-स्वरूप हिंदू समाज की सेवा करना ही वास्तविक कर्तव्य है। इस समाज की रक्षा करना ही हिंदू समाज की रक्षा है, और हिंदू समाज की रक्षा किसी बाहरी व्यवस्था या सत्ता से नहीं, बल्कि अपने स्वधर्म के पालन से होती है। भारतीय चिंतन में धर्म का अर्थ केवल पूजा या कर्मकांड नहीं, बल्कि वह जीवन-पद्धति है जो व्यक्ति, परिवार और समाज को धारण करती है।
जब व्यक्ति अपने स्वधर्म का पालन करता है, तब कुल की रक्षा होती है। कुल सुरक्षित रहता है, तो परिवार सुरक्षित रहता है। परिवार सुरक्षित रहता है, तो समाज और राष्ट्र स्वतः सुरक्षित रहते हैं। इसी क्रम को भारतीय शास्त्रों ने सामाजिक संरचना का मूल आधार माना है। इसीलिए कहा गया है कि कुलधर्म की रक्षा ही धर्मरक्षा है—क्योंकि वही समाज की निरंतरता और स्थिरता को बनाए रखती है।
हिंदू समाज की वास्तविक शक्ति उसकी सबसे छोटी इकाई—कुटुंब—में निहित है। इसी चेतना से वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धांत विकसित हुआ। इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार की हर प्रवृत्ति बिना विवेक के स्वीकार्य है। इसका अर्थ यह है कि जो धर्म को धारण करता है, जो स्वधर्म में स्थित रहता है, वही इस कुटुंब का अंग है। यह सिद्धांत असुरत्व और अधर्म पर लागू नहीं होता। किंतु यदि असुर कुल में जन्म लेकर भी कोई धर्म का पालन करता है, तो वह भी परम तत्त्व को प्राप्त करता है—प्रह्लाद, राजा बलि और विभीषण इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। हिंदू समाज जन्म नहीं, आचरण देखता है।
जब इस समाज में नारायण का दर्शन किया जाता है, तब उसकी शक्ति किसी संगठन, किसी संख्या या किसी कृत्रिम समानता में नहीं, बल्कि उसकी धर्माधारित चेतना में दिखाई देती है। तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या समाज की विविधता नहीं है। समस्या उसे एक-सा बनाने की ज़िद है। हिंदू एकता का मार्ग समानता थोपने से नहीं, बल्कि सृष्टि के स्वरूप को समझकर न्यायपूर्ण ढंग से साथ चलने से निकलता है।
इसी दृष्टि से रामराज्य को समझा गया है। रामराज्य किसी कल्पनालोक का नाम नहीं, बल्कि उस सामाजिक अवस्था का संकेत है जहाँ धर्म सत्ता के ऊपर होता है और शासन मर्यादा से चलता है। परंपरा कहती है कि भगवान राम के राज्य में ग्यारह हज़ार वर्षों तक कोई अकाल मृत्यु नहीं हुई, किसी पिता ने अपने पुत्र का शव नहीं देखा। इसका आशय यह नहीं कि मृत्यु नहीं थी, बल्कि यह कि समाज की संरचना इतनी संतुलित थी कि अन्याय, भूख और अव्यवस्था जीवन पर हावी नहीं होती थीं।
गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में कहते हैं—
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
रामराज नहिं काहुहि ब्यापा॥
और—
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
अर्थात रामराज्य की विशेषता यह नहीं थी कि सब एक जैसे थे, बल्कि यह थी कि सब अपने-अपने स्वधर्म में स्थित थे। राजा स्वयं धर्म के अधीन था और प्रजा न्याय के भरोसे जीवन जीती थी। भय नहीं था, क्योंकि व्यवस्था मर्यादा पर टिकी थी।
यही संतुलन बाद के कालखंडों में भी दिखाई देता है—विक्रमादित्य के समय, और हर उस काल में, जब समाज ने धर्म के बीज को सुरक्षित रखा। जब समाज ने स्वधर्म को छोड़ा, विकृतियाँ आईं; और जब स्वधर्म में स्थित रहा, तो वही समाज कठिन से कठिन समय में भी खड़ा रहा।
हिंदू समाज किसी व्यक्ति, किसी सत्ता या किसी काल की रचना नहीं है। वह वेदों की तरह अपौरुषेय है—सृष्टि के साथ चला आ रहा एक जीवंत तत्त्व। अपने मूल में वह स्वयं नारायण है। और इस नारायण-स्वरूप समाज की रक्षा किसी बाहरी उपाय से नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ जीवन से होती है।
यही उसका स्वभाव है।
यही उसकी शक्ति है।
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