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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारतीय संविधान को अक्सर आधुनिक लोकतांत्रिक आदर्शों का दस्तावेज़ कहा जाता है और सनातन धर्म को प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा का शाश्वत स्रोत। पहली दृष्टि में दोनों अलग संसारों के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं—एक विधिक-राजनीतिक व्यवस्था और दूसरा संस्कृति-आध्यात्मिकता की परम्परा। किंतु यदि भारतीय सभ्यता के गहरे स्रोतों में उतरें, तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संविधान का दार्शनिक मूल और उसका नैतिक आधार उसी सनातन दृष्टि से पोषित है, जिसने इस उपमहाद्वीप की सामाजिक रचना, नैतिक अनुशासन, दार्शनिक अविरलता और समरस व्यवस्था को हजारों वर्षों तक संचालित किया। संविधान आधुनिकता का विधान है, पर उसकी आत्मा भारतीय है; वह वैश्विक आदर्शों का विधान है, पर उसकी जड़ें भारतीय सांस्कृतिक चेतना में जल ग्रहण करती हैं। इसी कारण भारतीय संविधान और सनातन मान्यताएँ टकराव में नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे की पूरक परंपराएँ हैं।
संविधान की प्रस्तावना में प्रतिपादित चार मूल स्तम्भ—न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता—स्वयं में सनातन के सार्वभौमिक मानव-मूल्यों का आधुनिक रूपांतरण हैं। “न्याय” का भारतीय अर्थ केवल विधिक न्याय तक सीमित नहीं, बल्कि धर्म, ऋत और सत्यम् के व्यापक नैतिक अनुशासन से जुड़ा है। ऋग्वैदिक ऋत का अर्थ है—सृष्टि का नैतिक-सौंदर्य और गति का संतुलित नियम; उपनिषदों में “धर्म” मनुष्य के सामान्य और सार्वभौमिक दायित्वों का प्रतीक है। यही वह नैतिक धरातल है, जहाँ संविधान का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक—तीनों प्रकार के न्याय का ताना-बाना निर्मित होता है। संविधान का न्याय न तो प्रतिशोध है, न वर्ग-द्वेष; वह सामूहिक कल्याण, योग्यता-आधारित अवसर और राज्य की निष्पक्षता के सिद्धांत पर टिका है—यही तो सनातन का वह राजधर्म है, जहाँ राजा केवल “धर्म का साधक” होता है, किसी एक मत या वर्ग का प्रतिनिधि नहीं।
इसी प्रकार स्वतंत्रता—विचार, अभिव्यक्ति, आस्था और उपासना की—संविधान की मूल आत्मा है। यह स्वतंत्रता पश्चिमी अर्थ में स्वच्छन्दता नहीं, बल्कि स्वानुशासन और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है। भारतीय दर्शन मानव को मूलतः स्वतंत्र मानता है; वह उसके भीतर ब्रह्मत्व, चेतना और अपार संभावनाओं को प्रतिष्ठित करता है। उपनिषद कहता है—“अहं ब्रह्मास्मि”—जिसका सामाजिक अर्थ है कि प्रत्येक मानव में एक दिव्य चैतन्य विद्यमान है, अतः उसे अपनी मान्यताओं, विचारों और साधना के मार्ग का चयन करने की स्वतंत्रता है। यह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता पर आघात नहीं करती, बल्कि परस्पर सम्मान की भावना में विकसित होती है—यही संविधान का सार है। अरविन्द, टैगौर और गांधीजी का सनातनी दृष्टिकोण भी इसी को स्थापित करता है—स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह सत्य, अहिंसा और आत्म-नियंत्रण से बंधी हो।
समता भी सनातन की देन है। अक्सर कहा जाता है कि समता की अवधारणा पश्चिम से आयातित है, पर यह भारतीय दार्शनिक परंपराओं के इतिहास से अपरिचित दृष्टि है। गीता में “समत्वं योग उच्यते”—कर्म और परिणाम की दृष्टि से समभाव—एक आध्यात्मिक व्याकरण है। उपनिषदों में “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे”—सबके भीतर एक ही परम तत्व—संपूर्ण मानवता को समानता के आध्यात्मिक आधार पर खड़ा करता है। संविधान ने इसी समता को मानवाधिकारों के रूप में मूर्त किया—जाति, धर्म, भाषा, लिंग आदि किसी भी आधार पर भेदभाव न करना; सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना—ये सब भारतीय दृष्टि से स्वाभाविक मूल्य हैं, आयातित सिद्धांत नहीं। समता का यह रूप संघर्ष आधारित नहीं, समरसता-आधारित है; संघर्ष आधारित समता समाज को विभाजित करती है, जबकि सनातन की समता समाज को जोड़ती है, और संविधान इसी समरस दृष्टि को बल देता है।
बंधुता—फ्रांसीसी क्रांति के तीन मूल्यों में से एक—भारतीय संविधान में केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आत्मिक संस्कार है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः”—ये दोनों ही मान्यताएँ सनातन के बंधुत्व को परिभाषित करती हैं। संविधान में बंधुता का तात्पर्य केवल नागरिकों के पारस्परिक सम्मान से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण और सामूहिक उत्तरदायित्व से भी है। अनुच्छेद 51A के मौलिक कर्तव्यों में “सामूहिक संस्कृति का संरक्षण”, “वैज्ञानिक दृष्टिकोण”, “पर्यावरण संरक्षण”, “सभी के प्रति बंधुभाव”—ये सब सनातन के “मानवधर्म” से प्रत्यक्षतः जुड़े हुए हैं—धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध—ये दस मूल्य मानव का सामान्य और शाश्वत धर्म बताए गए हैं, और संविधान इन्हीं को मौलिक कर्तव्यों के रूप में आधुनिक भाषिक संरचना देता है।
नीति-निर्देशक तत्व भी सनातन की गहरी अभिव्यक्ति हैं। “ग्राम-स्वराज”, “समान नागरिक संहिता”, “पशु-पक्षी संरक्षण”, “पर्यावरण रक्षा”, “सामाजिक कल्याण”—ये सभी तत्व या तो कुटुम्ब व्यवस्था, ग्राम व्यवस्था, गो-सम्पदा संरक्षण या प्रकृति-पूजन की भारतीय धारा से उत्पन्न हैं। संविधान सम्पूर्ण राज्य-व्यवस्था को एक ऐसे कल्याणकारी राज्य की ओर ले जाता है जो मनुष्य के सर्वांगीण विकास, ग्रामीण पुनर्जागरण और पर्यावरणीय संतुलन को महत्व देता है—और यही तो सनातन सामाजिक व्यवस्था का मूल दर्शन है।
भारतीय संविधान और सनातन मान्यताओं का संबंध केवल दार्शनिक या नैतिक स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि एक गहरे सांस्कृतिक तंतु से जुड़ा हुआ है। संविधान जब “धर्मनिरपेक्षता” की घोषणा करता है, तो उसका अर्थ यूरोपीय “सेकुलरिज़्म” जैसी धर्म-विमुखता नहीं, बल्कि भारतीय “पंथ-निरपेक्षता”—सबको अपना मार्ग चुनने की स्वतंत्रता, सबकी समान मान्यता, और राज्य का किसी मत के प्रति पक्षपाती न होना। यह भारतीय बहुलतावादी परंपरा की ही आधुनिक अभिव्यक्ति है। भारत में किसी मत को “एकाधिकार सत्य” नहीं माना गया; उपनिषदों का महावाक्य “एको सत विप्रा बहुधा वदन्ति”—एक सत्य है जिसकी अनेक व्याख्याएँ हैं—संविधान में मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में पूर्णतः सुसंगत दिखाई देता है।
इस प्रकार भारतीय संविधान और सनातन मान्यताएँ विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सांस्कृतिक-सामाजिक धारा की दो भिन्न भाषिक अभिव्यक्तियाँ हैं—एक आधुनिक विधिक भाषा में, दूसरी शाश्वत दार्शनिक भाषा में। संविधान के लिए सनातन मान्यताएँ नैतिक आधार, सांस्कृतिक दिशा और सामाजिक समरसता का स्रोत प्रदान करती हैं; और सनातन के लिए संविधान आधुनिक राज्य-व्यवस्था का ढांचा, नागरिक अधिकारों का संरक्षण और समान न्याय की गारंटी सुनिश्चित करता है। दोनों मिलकर भारतीय राज्य की आत्मा और उसकी आधुनिकता के बीच संतुलन बनाते हैं—एक ऐसा संतुलन, जो विश्व में भारतीय लोकतंत्र को सबसे स्थायी और सबसे सभ्य बनाता है।
- कैलाश चन्द्र
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