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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
संप्रदायिक-लक्षित विधेयक से शिक्षा नीति तक: हिंदू समाज को जन्मजात अपराधी सिद्ध करने की निरंतर परियोजना
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को यदि केवल प्रशासनिक भाषा में पढ़ लिया जाए, तो वह एक साधारण शैक्षणिक निर्देश प्रतीत होती है। किंतु वैचारिक युद्ध कभी सीधे शब्दों के माध्यम से नहीं लड़ा जाता। वह उन मान्यताओं के माध्यम से लड़ा जाता है, जिन्हें बिना प्रश्न स्वीकार करा दिया जाता है। यही कारण है कि इस अधिसूचना को समझने के लिए यह देखना अधिक आवश्यक है कि उसमें क्या मान लिया गया है, न कि केवल यह कि उसमें क्या लिखा गया है।
UGC की इस अधिसूचना में “Equity”, “Inclusion”, “Social Justice”, “Historically Marginalised Groups”, “Institutional Bias”, “Structural Discrimination” जैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है। यह शब्दावली कोई भारतीय स्वाभाविक सामाजिक भाषा नहीं है। यह सीधे-सीधे पश्चिमी DEIA (Diversity, Equity, Inclusion, Accessibility) फ्रेमवर्क से आई हुई भाषा है, जिसका मूल सिद्धांत यह है कि समाज मूलतः अन्यायपूर्ण है, संस्थाएँ जन्म से पक्षपाती हैं और व्यक्ति का मूल्य उसके कर्म से नहीं, बल्कि उसकी पहचान से निर्धारित होगा।
यही वह बिंदु है जहाँ यह अधिसूचना एक शैक्षणिक निर्देश न रहकर वैचारिक हस्तक्षेप बन जाती है।
यह पहली बार नहीं है जब इस देश में ऐसा प्रयास हुआ हो। संप्रदायिक-लक्षित विधेयक के माध्यम से सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार पहले ही यह स्थापित करने का प्रयास कर चुकी थी कि सामूहिक हिंसा और दंगों की मूल प्रवृत्ति हिंदू समाज में निहित है। उस विधेयक की भाषा भी “निरपेक्ष” और “संवैधानिक” थी, किंतु उसका निष्कर्ष पहले से तय था—हिंदू समाज जन्मजात अपराधी है। राजनीतिक विरोध के कारण वह विधेयक कानून नहीं बन सका, पर उसकी वैचारिक परियोजना समाप्त नहीं हुई। उसने अपना माध्यम बदला। अब वही प्रयोग शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से किया जा रहा है।
इस वैचारिक परियोजना की जड़ें पिछले दो सौ वर्षों में हैं। औपनिवेशिक काल में ईसाई मिशनरियों और अंग्रेज़ी सत्ता ने मिलकर ऐसा इतिहास-लेखन और सामाजिक विमर्श तैयार किया, जिसमें भारतीय समाज को स्वभावतः दमनकारी और अमानवीय सिद्ध किया गया। मैकाले की शिक्षा नीति केवल भाषा परिवर्तन नहीं थी; वह भारत की ज्ञान-परंपरा और सामाजिक स्मृति को तोड़ने की रणनीति थी।
अंग्रेज़ों के आगमन से पूर्व भारत की स्थिति इसके ठीक विपरीत थी। मुग़ल काल से पूर्व भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान लगभग 33 प्रतिशत था। मुग़ल काल के अंत तक यह घटकर लगभग 23 प्रतिशत हुआ, फिर भी भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में बना रहा। सनातन आर्थिक चिंतन में “बेरोज़गारी” जैसी अवधारणा नहीं थी, क्योंकि समाज का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी कर्म, शिल्प, कृषि, व्यापार या सेवा से जुड़ा हुआ था।
अंग्रेज़ों ने इस संरचना को योजनाबद्ध रूप से नष्ट किया। देसी उद्योगों का विनाश हुआ, कारीगर उजाड़े गए, और पारंपरिक उत्पादन प्रणालियाँ तोड़ी गईं। परिणामस्वरूप 1947 के आसपास भारत का वैश्विक औद्योगिक उत्पादन में योगदान घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत रह गया और औद्योगिक हिस्सेदारी लगभग 4.5 प्रतिशत।
अब यदि 545 रियासतों की बात की जाए, तो यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इन रियासतों का वर्गीकरण कभी भी SC/ST/OBC के रूप में नहीं किया गया। फिर भी यह ऐतिहासिक रूप से निर्विवाद है कि बड़ी संख्या में रियासतें उन समुदायों के अधीन थीं जिन्हें आज अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग कहा जाता है—जैसे गोंड, भील, मराठा, जाट, नायर, यादव, कोली, कुर्मी आदि। यह तथ्य उस कथन को झूठा सिद्ध करता है कि ये समुदाय सदैव सत्ता, संपत्ति और शासन से बाहर रहे।
स्वतंत्रता के बाद भी इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के स्थान पर नेहरू युग में शिक्षा और अर्थव्यवस्था को और अधिक केंद्रीकृत किया गया। “लोकतांत्रिक समाजवाद” के नाम पर समाज की भूमिका क्रमशः समाप्त कर दी गई। शिक्षा, जो सदियों तक समाज, गुरुकुल, मठ, आश्रम और आचार्यों द्वारा संचालित होती रही थी, उसे पूरी तरह राज्य के नियंत्रण में दे दिया गया। जब सरकार उद्योग चलाने लगती है और सरकार ही पाठ्यक्रम लिखवाने लगती है, तब समाज की स्वाभाविक भूमिका समाप्त हो जाती है। विश्व में कहीं भी सरकारें ज्ञान का सृजन नहीं करतीं—ज्ञान समाज करता है। भारत में इसी मूल सिद्धांत को उलट दिया गया।
इसी प्रक्रिया में इतिहास-लेखन और वैचारिक विमर्श पर वामपंथी और इस्लामिक दृष्टिकोण हावी होते चले गए। सती-प्रथा को भारत की केंद्रीय सामाजिक बुराई के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि इसके व्यापक और संस्थागत प्रचलन के ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते। इसके विपरीत, बुर्क़ा-प्रथा, हलाला, बहुविवाह जैसी इस्लामिक कुप्रथाओं पर वैसा विमर्श नहीं हुआ। दोष चयनात्मक रूप से केवल सनातन समाज में खोजा गया। झूठे नैरेटिव गढ़े गए और धीरे-धीरे उन्हें ऐतिहासिक सत्य घोषित कर दिया गया।
अब यदि यूजीसी की अधिसूचना को समझना है, तो उसकी पश्चिमी वैचारिक पृष्ठभूमि को समझना अनिवार्य है। पश्चिम में जब नस्लीय राजनीति को बढ़ावा दिया गया, तब यह विचार हर माध्यम से जनता के मन में बैठाया गया कि शोषण करने वाला वर्ग श्वेत होता है और अश्वेत वर्ग शोषित होता है। रेडियो, टेलीविज़न, समाचार-पत्र, सोशल मीडिया और पाठ्यक्रम—कोई भी माध्यम इससे अछूता नहीं रहा। वर्षों तक निरंतर प्रचार के माध्यम से यह धारणा समाज के अवचेतन में स्थापित कर दी गई।
इस प्रक्रिया का परिणाम यह निकला कि “व्हाइट सुप्रीमेसी” अर्थात “श्वेत वर्चस्व” जैसे शब्द गढ़े गए। यह कहा गया कि प्रत्यक्ष शारीरिक शोषण दिखाई न देने पर भी श्वेत वर्ग “अप्रत्यक्ष” रूप से शोषण करता है। इस अप्रत्यक्ष शोषण की परिभाषा को इतना व्यापक बना दिया गया कि आँख घुमाने से लेकर भोजन की पसंद तक को अपराध की श्रेणी में रखा जाने लगा।
जब एक बार यह स्थापित कर दिया गया कि कौन शोषक है और कौन शोषित, तब सरकारों ने ताबड़तोड़ नियम बनाने प्रारंभ किए—सरकारी कार्यालयों में, कॉलेजों में, नगरपालिकाओं में और निजी संस्थानों में भी। इन नियमों में कहीं स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया कि शोषक वर्ग श्वेत ही है, किंतु दशकों के वैचारिक निर्माण के बाद यह संकेत स्वयं स्पष्ट हो जाता है।
इसके बाद श्वेत वर्ग में “व्हाइट गिल्ट” अर्थात अपराध-बोध की भावना उत्पन्न की गई। लोग स्वयं को भूतकाल की कथित गलतियों का उत्तरदायी मानकर आत्मदंड के लिए आगे आने लगे। इतिहास के नायकों की छवियाँ बदली जाने लगीं और सांस्कृतिक पुनर्लेखन को नैतिकता का आवरण दे दिया गया।
यही बाइनरी क्रिटिकल रेस थ्योरी भारत में जाति के रूप में लागू की जा रही है। एससी-एसटी-ओबीसी होना जन्मजात शोषित और पीड़ित घोषित किया जा रहा है तथा सवर्ण होना जन्मजात अपराध। 13 जनवरी 2026 की यूजीसी अधिसूचना वस्तुतः संप्रदायिक-लक्षित विधेयक का ही अद्यतन वैचारिक संस्करण है। अल्ट्रा-लेफ्ट के इन्हीं विषैले विमर्शों के कारण आज पूरी मानवता संकट में है, किंतु हम प्रश्न उठाने के स्थान पर अपनी ही सरकार का बचाव करने में ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं।
अब इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में UGC की 13 जनवरी 2026 की अधिसूचना को देखना चाहिए। पश्चिम में Critical Race Theory के माध्यम से जिस प्रकार समाज को स्थायी रूप से “शोषक” और “शोषित” की श्रेणियों में बाँटा गया, वही प्रयोग भारत में जाति के माध्यम से किया जा रहा है। यहाँ SC-ST-OBC होना जन्मजात पीड़ित माना जा रहा है और सवर्ण होना जन्मजात अपराध।
DEIA का मूल सिद्धांत यही है—परिणाम पहले तय करो, फिर नियम बनाओ।
और जब परिणाम तय हो जाए, तो “neutral” दिखने वाली भाषा भी उसी दिशा में काम करती है।
अगर वर्णाश्रम व्यवस्था के हिसाब से अंग्रेज़ों से पहले के भारत को देखा जाए, तो बहुत-सी बातें अपने-आप साफ़ हो जाती हैं। उस समय भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था में करीब 33 प्रतिशत तक योगदान देता था। यह किसी एक जाति या वर्ग की वजह से नहीं था, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक व्यवस्था के कारण था। आज जिन जातियों को पिछड़ा, शोषित या वंचित कहा जाता है, वास्तव में उस समय उनके पास भी संपन्नता थी, सत्ता थी और सामाजिक सम्मान था। जिन्हें आज शोषणकर्ता बताया जाता है, वही ब्राह्मण तब दूसरों पर आश्रित रहते थे, क्योंकि उनका काम सत्ता या संपत्ति नहीं, बल्कि ज्ञान और शिक्षा था।
इसे ऐसे समझिए—संपन्नता की बात करें तो कई बार शूद्र कहे जाने वाले वर्ग वैश्य से भी अधिक समृद्ध होते थे। उनके पास स्वतंत्रता भी थी और साधन भी। क्षत्रिय समाज की रक्षा करते थे, युद्ध और शासन का दायित्व निभाते थे। ब्राह्मण शिक्षा देते थे, ज्ञान सँभालते थे और समाज को दिशा देते थे। इसी कारण तीनों वर्णों के लोग ब्राह्मण के ज्ञान का सम्मान करते थे और उसकी सुरक्षा भी करते थे। हमारे यहाँ गुरु को परब्रह्म से ऊपर इसलिए रखा गया, क्योंकि ज्ञान को सर्वोच्च माना गया, न कि धन या सत्ता को।
इस संतुलित व्यवस्था को सबसे पहले अंग्रेज़ों ने तोड़ा। उन्होंने जानबूझकर समाज की स्वाभाविक संरचना को तोड़-मरोड़कर पेश किया। उसके बाद स्वतंत्रता के बाद की सरकारों ने भी इस परंपरा को ठीक करने के बजाय उसी औपनिवेशिक सोच को आगे बढ़ाया। ईसाई मिशनरियों के एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए भारतीय समाज को भीतर से अपराधबोध में डालने का काम किया गया, ताकि मतांतरण आसान हो सके। यह सब पूरी तरह अधर्म था, लेकिन दुर्भाग्य से हमारी सरकारें भी इसी रास्ते पर चलती रहीं।
आज यूजीसी की अधिसूचना के बाद उसी सोच को नए रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। सवर्ण अपराध-बोध की मानसिकता को जानबूझकर हवा दी जा रही है। अगर हम इस पूरे मुद्दे को केवल जाति के चश्मे से देखेंगे, तो हम बहुत बड़ी भूल करेंगे। यह सवर्ण बनाम एससी-एसटी-ओबीसी का मामला नहीं है। यह ईसाई-इस्लामी-वामपंथी नेक्सस द्वारा हिंदू सभ्यता पर किया गया सुनियोजित वैचारिक हमला है।
अगर हम इसे केवल सवर्ण जातियों पर हमले के रूप में देखने लगेंगे, तो असली खेल समझ ही नहीं पाएँगे। यही प्रयोग पहले संप्रदायिक-लक्षित विधेयक के ज़रिये किया गया था और अब वही काम यूजीसी की अधिसूचना के माध्यम से किया जा रहा है। इसका सीधा असर भविष्य में भारत की बौद्धिक स्वतंत्रता पर पड़ेगा। शिक्षा व्यवस्था को क्रिटिकल रेस थ्योरी के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत बाइनरी में बाँट दिया जाएगा, जिससे सोचने-समझने की आज़ादी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
इसीलिए इस वैश्विक षड्यंत्र का जवाब भावुक नारों से नहीं, बल्कि गंभीर बौद्धिक पुरुषार्थ से देना होगा। आज यह एजेंडा स्कूलों में आया है, कल सरकारी दफ्तरों में जाएगा और फिर निजी क्षेत्र में पहुँचेगा। अगर हम सब एक-एक हिंदू के रूप में इसका जवाब नहीं देंगे, अगर यूजीसी को यह अधिसूचना वापस लेने के लिए मजबूर नहीं करेंगे, तो यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है और समाज को लगातार भीतर से तोड़ता चला जाएगा।
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