सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जो दिखाई दे रहा है, वही पूरी कहानी नहीं है



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत में आज जो कुछ शिक्षा, न्याय और नीति के क्षेत्र में घटित हो रहा है, उसे यदि केवल समसामयिक घटनाओं के रूप में देखा जाएगा, तो हम मूल समस्या को कभी नहीं समझ पाएँगे। यह कोई आकस्मिक प्रक्रिया नहीं है। यह किसी एक सरकार, किसी एक अधिसूचना या किसी एक न्यायिक निर्णय का परिणाम नहीं है। यह एक दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना है, जिसकी तैयारी दशकों पहले पश्चिमी विश्वविद्यालयों में शुरू हुई थी और जिसे भारत में क्रमशः, योजनाबद्ध ढंग से लागू किया जा रहा है।
इस परियोजना की वैचारिक जड़ क्रिटिकल रेस थ्योरी में है।
पश्चिम में क्रिटिकल रेस थ्योरी का जन्म इस धारणा से हुआ कि समाज मूलतः अन्यायपूर्ण है, कि उसकी संस्थाएँ निष्पक्ष हो ही नहीं सकतीं, और कि सत्ता-संरचना जन्म से ही कुछ समूहों को शोषक तथा कुछ को शोषित बनाती है। यहाँ व्यक्ति का मूल्यांकन उसके आचरण, परिश्रम या नैतिकता से नहीं, बल्कि उसकी पहचान से किया जाता है। श्वेत समाज को जन्मजात उत्पीड़क और अन्य नस्लों को जन्मजात उत्पीड़ित घोषित कर दिया जाता है। यह दृष्टि मूलतः मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष सिद्धांत का ही सांस्कृतिक संस्करण है—जहाँ वर्ग की जगह पहचान ले लेती है।
यहीं से शोषक–शोषित की कम्युनिस्ट बाइनरी स्थायी सत्य बना दी जाती है।
भारत में इस सिद्धांत को ज्यों-का-त्यों लागू करना संभव नहीं था, क्योंकि यहाँ समाज नस्ल के आधार पर नहीं, जाति के आधार पर ऐतिहासिक रूप से संगठित रहा है। परिणामस्वरूप क्रिटिकल रेस थ्योरी का भारतीय रूपांतरण किया गया, जिसे स्पष्ट शब्दों में कास्ट रेस थ्योरी कहा जाना चाहिए। इसमें रेस के स्थान पर कास्ट रख दी गई, और वही वैचारिक निष्कर्ष आरोपित कर दिए गए—कि एक वर्ग जन्म से शोषक है और दूसरा जन्म से शोषित।
यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके लिए शब्दों की एक पूरी नई शब्दावली गढ़ी गई—इक्विटी, इन्क्लूजन, वल्नरेबिलिटी, इंस्टीट्यूशनल डिस्क्रिमिनेशन, सेफ स्पेस, सेंसिटिविटी। इन शब्दों को नैतिक आवरण देकर समाज के सामने प्रस्तुत किया गया, ताकि कोई इन पर प्रश्न न उठा सके।
13 जनवरी 2026 को University Grants Commission द्वारा जारी अधिसूचना इसी वैचारिक यात्रा का प्रशासनिक परिणाम है। इसमें प्रयुक्त “इक्विटी” शब्द को सामान्यतः “समता” समझ लिया जाता है, जबकि इसका वास्तविक अर्थ बिल्कुल भिन्न है। समता का अर्थ समान अवसर और समान नियम है; जबकि इक्विटी का अर्थ है—पहले से तय पहचान-समूहों के आधार पर असमान व्यवहार को न्याय का नाम देना। यही वह बिंदु है जहाँ नीति सामाजिक न्याय से हटकर सामाजिक इंजीनियरिंग बन जाती है।
इस वैचारिक ढाँचे को वैधता देने के लिए कुछ घटनाओं को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी Rohith Vemula की मृत्यु को केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहने दिया गया। जटिल पारिवारिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक तथ्यों को अलग रखकर यह स्थापित किया गया कि पूरी विश्वविद्यालयीय व्यवस्था ही जातिगत उत्पीड़न पर आधारित है। व्यक्ति की असफलता को प्रणाली का अपराध घोषित कर दिया गया।
इसी प्रकार, मुंबई के टी.एन. टोपिवाला मेडिकल कॉलेज की छात्रा Payal Tadvi की मृत्यु को भी एक मानवीय और बहुआयामी त्रासदी के रूप में देखने के बजाय, उसे “संस्थागत जातिवाद” का प्रमाण बना दिया गया। इन घटनाओं से जुड़ी याचिकाओं में यह सावधानीपूर्वक सुनिश्चित किया गया कि दोष किसी व्यक्ति या परिस्थिति पर न जाए, बल्कि पूरी व्यवस्था पर जाए।
यहीं से “इंस्टीट्यूशनल डिस्क्रिमिनेशन” जैसे शब्द नीति-भाषा में प्रवेश करते हैं। जब संस्थान ही दोषी घोषित हो जाएँ, तब सुधार नहीं, पुनर्गठन की माँग उठती है। और पुनर्गठन का अर्थ होता है—नई वैचारिक संरचना की स्थापना।
इस पूरी प्रक्रिया में अधिवक्ता Indira Jaising की भूमिका को अलग करके नहीं देखा जा सकता। 2019 से चली न्यायिक प्रक्रिया, समितियों की संस्तुतियाँ, और अंततः 2026 की अधिसूचना—यह सब एक निरंतर वैचारिक दबाव का परिणाम है। अधिसूचना जारी होने के बाद यह कहना कि “यह पर्याप्त नहीं है, इसे और कठोर होना चाहिए”, और फिर याचिका वापस ले लेना, यह स्पष्ट करता है कि उद्देश्य न्यायिक राहत नहीं, बल्कि नीति-दिशा तय करना था।
यह विमर्श केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहा। 2023 में National Council of Educational Research and Training से जुड़े शैक्षणिक ढाँचों में भी वही शब्दावली दिखाई देती है। इसका अर्थ यह है कि कास्ट रेस थ्योरी को सामाजिक चेतना में बचपन से ही आरोपित करने का प्रयास हो रहा है।
यदि यह प्रक्रिया यूँ ही चलती रही, तो इसके परिणाम भारत के लिए अत्यंत भयावह होंगे। समाज स्थायी रूप से शोषक–शोषित की कम्युनिस्ट बाइनरी में बँट जाएगा। व्यक्ति नागरिक नहीं रहेगा, वह केवल अपनी जाति का प्रतिनिधि बन जाएगा। योग्यता, परिश्रम और उत्तरदायित्व का स्थान पहचान ले लेगी। हर असफलता को सामाजिक उत्पीड़न कहा जाएगा, और हर सफलता को विशेषाधिकार का परिणाम।
भारत की परंपरा संघर्ष की नहीं, संतुलन और सह-अस्तित्व की रही है। किंतु कास्ट रेस थ्योरी इस संतुलन को असंभव बना देती है, क्योंकि वह संघर्ष को स्थायी बनाती है। यही कारण है कि जहाँ-जहाँ यह प्रयोग पश्चिम में लागू हुआ, वहाँ सामाजिक शांति नहीं, निरंतर वैचारिक युद्ध उत्पन्न हुआ।
आज का संघर्ष तलवारों का नहीं, शब्दों का है। और यदि शब्दों के माध्यम से समाज को शोषक और शोषित में बाँट दिया गया, तो अंततः टूटेगा समाज—व्यवस्था नहीं।

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