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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
हिंदू मानसिकता के विषय में यदि बिना आत्ममुग्धता और बिना आत्मदया के देखा जाए, तो एक तथ्य लगातार सामने आता है—यथास्थितिवाद, नियतिवाद और वैचारिक जड़ता। हमने धीरे-धीरे यह मान लिया है कि जो व्यवस्था चल रही है, वही अंतिम है; जो हो रहा है, वही नियति है; और प्रश्न करना या टकराना अनावश्यक है। इसी मानसिकता के कारण हम अपनी ही सरकारों, अपनी ही संस्थाओं और अपनी ही नीतिगत भूलों को बचाने में ऊर्जा लगाने लगते हैं। सही-गलत का प्रश्न गौण हो जाता है, और “अपनी सरकार” का तर्क प्रधान हो जाता है। आलोचना को विद्रोह और प्रश्न को अवज्ञा मानने की प्रवृत्ति सामान्य बनती जा रही है।
13 जनवरी 2026 को जारी यूजीसी का नोटिफ़िकेशन इसी प्रवृत्ति का ताज़ा उदाहरण है। शिक्षा किसी भी सभ्यता की वैचारिक रीढ़ होती है। इस अधिसूचना के संदर्भ में अकादमिक स्वायत्तता, वैचारिक संतुलन, पाठ्यचर्या-नियमन, नियुक्तियों की प्रकृति और दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव जैसे प्रश्न उठने चाहिए थे। पर समाज का बड़ा वर्ग इन प्रश्नों से बचता रहा और सरकार के पक्ष में तर्क खोजने में लग गया। यह व्यवहार किसी एक नीति तक सीमित नहीं है; यह उस अवस्था का संकेत है जहाँ हिंदू समाज ने सही-गलत कहने का नैतिक साहस धीरे-धीरे छोड़ दिया है।
यह समस्या केवल सरकार या सत्ता की नहीं है, बल्कि समाज की मानसिक संरचना में आए गहरे परिवर्तन का परिणाम है। हम धीरे-धीरे एक आज्ञापालक समाज में परिवर्तित हो रहे हैं—ठीक उसी ढाँचे में, जैसा अब्राहमिक समाजों में दिखाई देता है। वहाँ एक ग्रंथ होता है, एक पैगंबर होता है और एक अंतिम सत्य होता है। उससे बाहर प्रश्न करना, शंका करना या विवेक से विचार करना अपराध समझा जाता है। परिणामस्वरूप समाज वैचारिक रूप से जड़ हो जाता है। वह सोचता नहीं, केवल आदेशों का पालन करता है। दुर्भाग्य यह है कि वही प्रवृत्ति आज हिंदू समाज में भी प्रवेश कर रही है, जबकि सनातन परंपरा का मूल स्वभाव ही प्रश्न, संवाद और विवेक रहा है।
सनातन परंपरा में प्रह्लाद अपने पिता हिरण्यकशिपु के विरुद्ध खड़ा होता है—वह सत्ता, रक्त-संबंध और भय के विरुद्ध सत्य का पक्ष चुनता है। अर्जुन युद्धभूमि में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है—वह आदेश को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करता, बल्कि तर्क, शंका और विवेक के माध्यम से समाधान तक पहुँचता है। उपनिषदों की पूरी परंपरा प्रश्नोत्तर और आत्ममंथन पर आधारित है। “नेति-नेति” का सिद्धांत यही उद्घोष करता है कि सत्य तक पहुँचने का मार्ग प्रश्न से होकर जाता है, अंधस्वीकार से नहीं। इसके बावजूद आज डेमोक्रेसी और अब्राहमिक विचारधाराओं के सम्मिश्र प्रभाव में हम तर्क करना छोड़ चुके हैं। न हम सही के पक्ष में निर्भीक होकर खड़े हो पाते हैं, न गलत के विरुद्ध स्पष्ट बोल पाते हैं। यही हिंदू समाज की नई और सबसे खतरनाक समस्या है—बौद्धिक संकोच और वैचारिक पलायन।
इसी मानसिक विचलन का प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि आज हमारे नेता, हमारे राजनीतिक दल और यहाँ तक कि सामान्य हिंदू समाज भी अपनी पहचान पश्चिमी वैचारिक शब्दावली में खोज रहा है। कोई स्वयं को राइट कहता है, कोई लेफ्ट, कोई सेंटर, कोई समाजवादी, कोई सेकुलर, कोई कम्युनिस्ट, कोई लिबरल। यह प्रश्न कोई नहीं करता कि इन शब्दों का भारतीय सभ्यता, सनातन परंपरा और हिंदू समाज के मूल स्वभाव से क्या संबंध है। समाजवाद, सेकुलरिज़्म और डेमोक्रेसी यूरोप के ऐतिहासिक संघर्षों की उपज हैं—चर्च बनाम राजसत्ता, औद्योगिक शोषण और वर्ग संघर्ष की प्रतिक्रियाएँ। भारत में न चर्च था, न पोप, न वैसा सामंती ढाँचा। फिर भी हमने इन अवधारणाओं को बिना विवेकपूर्ण परीक्षण के अपनी राजनीतिक और सामाजिक आत्मा पर आरोपित कर लिया।
विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्षों बाद भी भारत में शायद ही कोई राजनीतिक दल, नेता या संगठन यह कहने का साहस करता है कि उसकी विचारधारा सनातन वैदिक चिंतन से आलोकित है। समाजवादी या सेकुलर कहलाना सहज है, राइट-विंग कहलाना स्वीकार्य है, पर सनातन वैदिक दृष्टि की बात करना आज भी संकोच और भय का विषय बना हुआ है। यह स्थिति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि गहरी वैचारिक हीनता का प्रमाण है।
इतिहास बताता है कि यही वैचारिक पलायन सबसे भारी मूल्य वसूलता है। 1947 का भारत विभाजन केवल एक राजनीतिक भूल नहीं था, बल्कि सभ्यतागत आत्मसमर्पण था। ऐतिहासिक आकलनों के अनुसार इस विभाजन के दौरान लगभग 14 से 20 लाख हिंदुओं और सिखों की हत्या हुई और लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ लोग अपने घरों से विस्थापित हुए। इसके बावजूद न कोई संगठित प्रतिरोध हुआ, न दीर्घकालिक सुरक्षा की कोई योजना बनी। पाकिस्तान को बिना निर्णायक संघर्ष के इस्लामी शक्तियों के हवाले कर दिया गया। इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि विभाजन के लिए उत्तरदायी वही परिवार और वही वैचारिक धारा स्वतंत्र भारत में लगभग 60 वर्षों तक सत्ता में रही। आज भी कई राज्यों में वही मानसिकता शासन कर रही है, पर इस ऐतिहासिक अपराध पर न समाज ने गंभीर आत्ममंथन किया और न वैचारिक उत्तरदायित्व तय किया।
आर्थिक क्षेत्र में भी यही वैचारिक जड़ता दिखाई देती है। नेहरूवियन समाजवाद के नाम पर भारत ने अपने सबसे मूल्यवान चार दशक खो दिए। 1950 से 1990 के बीच भारत की औसत आर्थिक वृद्धि दर लगभग 3–3.5 प्रतिशत रही—जिसे “हिंदू ग्रोथ रेट” कहा गया। इसी अवधि में चीन ने 1978 के बाद 8–10 प्रतिशत की निरंतर वृद्धि दर्ज की। 1951 में भारत और चीन की प्रति व्यक्ति आय लगभग समान थी; आज चीन की प्रति व्यक्ति आय भारत से पाँच गुना से अधिक है। सिंगापुर, जो हमारे बाद स्वतंत्र हुआ, आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में है। यह अंतर संसाधनों का नहीं, बल्कि आर्थिक दर्शन का परिणाम है। 2014 के बाद इस मानसिकता को बदलने का प्रयास हुआ, किंतु उस प्रयास की राजनीतिक कीमत 2024 के चुनावों में दिखाई दी—यह संकेत है कि समाज अभी भी गहरे परिवर्तन के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है।
हिंदू समाज की दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम भविष्य की योजना बनाकर कार्य नहीं करते। हमारे पास अगले सौ वर्षों का कोई स्पष्ट विज़न नहीं है। शिक्षा, अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, तकनीक, सुरक्षा और संस्कृति—इन सबको जोड़कर देखने की दृष्टि का अभाव है। शिक्षा प्रणाली आज भी डिग्री-केंद्रित है, जबकि कौशल, चरित्र और अनुसंधान को गौण माना जा रहा है। भारत में 1100 से अधिक विश्वविद्यालय हैं, हर वर्ष लगभग चार करोड़ विद्यार्थी उच्च शिक्षा में प्रवेश करते हैं, फिर भी विश्व की शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में हमारी उपस्थिति नगण्य है। शोध और नवाचार में हमारी वैश्विक हिस्सेदारी सीमित है, जबकि यही भविष्य की शक्ति का आधार है।
आर्थिक महाशक्ति बनने की बातें तो की जाती हैं, पर मैन्युफैक्चरिंग और वैश्विक सप्लाई-चेन में हमारी भूमिका स्पष्ट नहीं है। आज वैश्विक सप्लाई-चेन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 3–4 प्रतिशत है, जबकि चीन की 25 प्रतिशत से अधिक। यदि भारत को वास्तविक आर्थिक महाशक्ति बनना है, तो यह हिस्सेदारी 15–20 प्रतिशत तक पहुँचे—इसके लिए दीर्घकालिक औद्योगिक, तकनीकी, शैक्षणिक और सामाजिक योजना चाहिए। केवल सेवा क्षेत्र पर निर्भर रहकर कोई राष्ट्र स्थायी शक्ति नहीं बनता।
सामाजिक क्षेत्र में वामपंथ, इस्लाम और ईसाईयत से उत्पन्न वैचारिक चुनौतियाँ तथा वैश्विक बाज़ार शक्तियों द्वारा संचालित कल्चरल वार और कल्चरल मार्क्सवाद हिंदू समाज की मूल इकाई—परिवार—को लगातार कमजोर कर रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार कई राज्यों में हिंदुओं की कुल प्रजनन दर 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जा चुकी है। स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्षों में 9 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं, पर इस पर कोई गंभीर नीति-विमर्श नहीं है। विवाह संस्कार कॉन्ट्रैक्ट बनता जा रहा है, परिवार बोझ समझा जाने लगा है, और परिणामस्वरूप अकेलापन, वृद्धाश्रम, मानसिक स्वास्थ्य संकट और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है।
इसी बीच हम भ्रष्टाचार समाप्त करने, संविधान की प्रस्तावना से समाजवाद और सेकुलरिज़्म जैसे शब्द हटाने, या अखंड भारत बनाने की बातें तो करते हैं, पर उनके लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं देते। हम कहते हैं पाकिस्तान भारत में मिला लेंगे, अखंड भारत बना देंगे—पर यह नहीं बताते कि तब 60 करोड़ मुसलमानों के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा संतुलन कैसे बनेगा। नारे हैं, पर नीति नहीं; भाव हैं, पर योजना नहीं।
आज 2026 में युद्ध तलवारों से नहीं लड़े जा रहे। यह विचारधाराओं, अर्थव्यवस्था, तकनीक, डेटा, मीडिया, शोध, रोबोटिक्स और AI का युग है। इस युग में राष्ट्रों का भविष्य प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और परिवारों में तय होता है। इसके लिए अगले सौ वर्षों की स्पष्ट दृष्टि चाहिए—जो हमारे नेतृत्व और समाज दोनों में दिखाई नहीं देती।
यहीं से सनातन आर्थिक चिंतन का महत्व निर्णायक हो जाता है। सनातन आर्थिक चिंतन मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि एकात्म मानव मानता है—शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वय। यहाँ अर्थ पुरुषार्थ है, पर वह धर्म के अधीन है। धन साध्य नहीं, साधन है। उत्पादन, उपभोग और वितरण—तीनों पर औचित्य और न्याय का नियंत्रण है। महाभारत के शांति पर्व और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य का उद्देश्य केवल कर संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन बताया गया है। विकेंद्रीकरण, परिवार-आधारित अर्थव्यवस्था और सीमित संग्रह इस चिंतन के मूल आधार हैं।
सम्राट विक्रमादित्य का काल इसी सनातन आर्थिक चिंतन का सजीव उदाहरण था। उनका शासन धर्माधारित न्याय, संतुलित कर व्यवस्था, व्यापार-संरक्षण, विद्वानों और कारीगरों के सम्मान तथा परिवार-केंद्रित सामाजिक संरचना पर आधारित था। वह रामराज्य की उसी परंपरा का उत्तराधिकारी था, जहाँ राजधर्म, समाजधर्म और स्वधर्म परस्पर पूरक थे।
धर्म की रक्षा स्वयं प्रयास से होती है। धर्म का बीज सुरक्षित रखना ही समाज का पहला कर्तव्य है। हम संसार बदलने का दावा नहीं कर सकते, पर धर्म के बीज को सुरक्षित रख सकते हैं। शेष कार्य स्वयं नारायण करते हैं।
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