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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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✍️दीपक कुमार द्विवेद्वी
हिंदू समाज की मानसिकता के विषय पर मैंने पूर्व में यह लिखा था कि हिंदू समाज स्वयं नारायण का साक्षात् स्वरूप है। यह कथन भारतीय दर्शन की मूल आत्मा से उत्पन्न होता है, जहाँ प्रत्येक जीव में परमात्मा का अंश स्वीकार किया गया है और समाज को विराट पुरुष के रूप में देखने की परंपरा रही है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त से लेकर उपनिषदों के आत्मा-ब्रह्म एकत्व तक यह भाव निरंतर प्रवाहित होता रहा है। इस दृष्टि से हिंदू समाज का नारायण-स्वरूप होना तत्वतः सत्य है। किंतु यह सत्य केवल दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भ तक ही पूर्णतः लागू होता है। जब इसी अवधारणा को सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में यथार्थ परीक्षण के बिना लागू कर दिया जाता है, तब यह आत्मबोध के स्थान पर आत्ममुग्धता का रूप ले लेता है।
वास्तविकता यह है कि समय, काल और परिस्थितियों के साथ हिंदू समाज की प्रवृत्तियों में अनेक ऐसी त्रुटियाँ विकसित हुई हैं, जिन पर गंभीर विमर्श आवश्यक है। कोई भी समाज केवल अपने आध्यात्मिक आदर्शों के आधार पर जीवित नहीं रहता; उसके व्यवहार, उसकी संस्थाएँ और उसकी शासन-व्यवस्था भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। हिंदू समाज की समस्या यह रही है कि उसने अपने दार्शनिक आदर्शों और व्यवहारिक संरचनाओं के बीच बढ़ते अंतर को समय रहते स्वीकार नहीं किया।
आज हम जिस शासन-व्यवस्था में रह रहे हैं, उसे सामान्यतः लोकतंत्र कहा जाता है, किंतु वर्तमान संदर्भ में “लोकतंत्र” शब्द का प्रयोग भ्रामक हो जाता है। वस्तुतः यह व्यवस्था लोकतंत्र नहीं, बल्कि डेमोक्रेसी है। लोकतंत्र का मूल भाव लोक और तंत्र के नैतिक संतुलन पर आधारित होता है, जहाँ लोक की चेतना और तंत्र की मर्यादा एक-दूसरे को नियंत्रित करती हैं। इसके विपरीत डेमोक्रेसी एक संख्या-आधारित भीड़-तंत्र है, जिसमें बहुमत ही सत्य बन जाता है। इस व्यवस्था में गुण, विवेक, चरित्र और धर्म का स्थान धीरे-धीरे गौण होता चला जाता है और भावनाएँ, प्रचार तथा संख्यात्मक शक्ति निर्णायक बन जाती है।
भारत में जो वर्तमान डेमोक्रेटिक व्यवस्था स्थापित है, उसकी वैचारिक जड़ें भारतीय परंपरा में नहीं, बल्कि पश्चिमी चिंतन में हैं। यह ढाँचा मुख्यतः यूरोपीय राजनीतिक इतिहास, चर्च और राज्य के संघर्ष तथा ईसाई मिथकीय अवधारणाओं की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ है। पश्चिम में धर्म और सत्ता के बीच जो टकराव रहा, उसी के परिणामस्वरूप वहाँ धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा विकसित हुई। भारत में ऐसा कोई ऐतिहासिक संघर्ष कभी नहीं रहा, फिर भी वही मॉडल यहाँ यथावत लागू कर दिया गया।
भारतीय संविधान का लगभग पचानवे प्रतिशत भाग ब्रिटिश, अमेरिकी तथा अन्य पश्चिमी संविधानों से लिया गया है। शासन-प्रणाली, न्यायिक ढाँचा, प्रशासनिक संरचना और विधायी प्रक्रिया—सभी औपनिवेशिक अनुभवों से प्रभावित हैं। यह तथ्य स्वयं इस बात को स्पष्ट करता है कि आधुनिक भारतीय राज्य-व्यवस्था भारतीय सभ्यता के स्वाभाविक विकास का परिणाम नहीं, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता की निरंतरता है।
संविधान की मूल प्रति में सेना तथा कुछ संवैधानिक संस्थाओं के नामकरण में सनातन वैदिक परंपरा के प्रतीक अवश्य दिखाई देते हैं, किंतु यह प्रतीकात्मकता वास्तविक आचरण में परिवर्तित नहीं हो सकी। भारत की आत्मा—अर्थात् सनातन वैदिक धर्म की सामूहिकता, उसका सामाजिक अनुशासन, उसका कर्तव्यबोध और उसका नैतिक ढाँचा—वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में कहीं भी सक्रिय रूप में परिलक्षित नहीं होता। राज्य स्वयं को धर्म से पूर्णतः पृथक मानता है और धर्म को केवल निजी आस्था का विषय घोषित कर देता है।
इस वैचारिक दूरी को औपचारिक रूप से स्थायी बनाने का कार्य आपातकाल के दौरान किया गया, जब संविधान की प्रस्तावना में सेकुलरिज़्म और समाजवाद जैसे शब्द जोड़े गए। यह केवल शब्दों का जोड़ नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य की आत्मा को पश्चिम-प्रेरित विचारधाराओं के अनुरूप ढालने का प्रयास था। इसके पश्चात् भारतीय संविधान को एक ऐसे ढाँचे के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो स्वयं को धर्मविहीन घोषित करता है, किंतु नैतिक रूप से उत्तरदायी राज्य का निर्माण नहीं कर पाता।
इस प्रक्रिया का प्रभाव केवल राज्य तक सीमित नहीं रहा। हिंदू समाज ने भी धीरे-धीरे धर्म को जीवन-व्यवस्था के बजाय केवल पूजा-पद्धति और व्यक्तिगत आस्था तक सीमित कर लिया। धर्म समाज को अनुशासित करने वाली सामूहिक चेतना न रहकर निजी कर्मकांड बन गया। परिणामस्वरूप समाज राजनीतिक निर्णयों, राष्ट्रीय संकटों और दीर्घकालिक नीतिगत प्रश्नों पर संगठित और धर्मबद्ध प्रतिक्रिया देने की क्षमता खो बैठा।
यहीं से हिंदू समाज की मानसिकता में एक गहरी निष्क्रियता और यथास्थितिवाद ने जन्म लिया। समाज ने जो हो रहा है, उसे नियति मानकर स्वीकार करना सीख लिया। शासन-व्यवस्था की वैचारिक दिशा, संवैधानिक संरचना और राज्य की भूमिका पर प्रश्न उठाने के स्थान पर समाज स्वयं को परिस्थितियों के हवाले करता चला गया। यही मानसिक पृष्ठभूमि आगे चलकर हिंदू समाज की अनेक आंतरिक कमजोरियों को जन्म देती है, जिनका प्रभाव केवल राजनीति तक नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन तक फैलता चला जाता है।
समाजवाद और सेकुलरिज़्म—ये दोनों विचार भारतीय सभ्यता की उपज नहीं हैं। इनका जन्म यूरोप के विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भों में हुआ, जहाँ चर्च और राज्य के बीच लंबे संघर्ष, औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पन्न वर्ग-संघर्ष और पूँजी के केंद्रीकरण ने वैचारिक प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। समाजवाद मूलतः यूरोपीय कम्युनिस्ट चिंतन से निकला हुआ विचार है, जिसकी जड़ें कार्ल मार्क्स और उसके बाद विकसित हुई भौतिकवादी दर्शन-परंपरा में हैं। यह दर्शन मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई के रूप में देखता है और समाज को वर्ग-संघर्ष का परिणाम मानता है। भारतीय चिंतन में समाज को कभी भी केवल आर्थिक वर्गों का जोड़ नहीं माना गया, बल्कि उसे धर्म, कर्तव्य, संस्कार और परस्पर उत्तरदायित्व से बँधी एक जीवंत इकाई के रूप में देखा गया है।
इसी प्रकार सेकुलरिज़्म भी भारतीय समाज की स्वाभाविक आवश्यकता से उत्पन्न विचार नहीं है। यह अवधारणा यूरोप में चर्च और राजसत्ता के टकराव से जन्मी, जहाँ धर्म सत्ता का दमनकारी उपकरण बन गया था। भारत में धर्म कभी सत्ता का विरोधी नहीं रहा, बल्कि सामाजिक अनुशासन और नैतिक मर्यादा का आधार रहा है। इसके बावजूद भारत में सेकुलरिज़्म को एक सार्वभौमिक समाधान के रूप में लागू कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि राज्य ने स्वयं को धर्म से पृथक घोषित कर दिया, परंतु किसी वैकल्पिक नैतिक ढाँचे का निर्माण नहीं कर सका। धर्मविहीनता को आधुनिकता मान लिया गया, जबकि धर्मपरायणता को पिछड़ापन घोषित कर दिया गया।
इन्हीं आयातित विचारधाराओं का प्रभाव यह हुआ कि पूरा प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र धीरे-धीरे धर्मविमुख होता चला गया। यह तंत्र न तो धर्मपरायण रहा और न ही नर-नारायण की उस मूल अवधारणा को स्वीकार करने को तैयार हुआ, जिसमें प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर का अंश मानकर उसके प्रति उत्तरदायित्व का भाव विकसित होता है। प्रशासनिक निर्णय मूल्य-निरपेक्ष होते चले गए, जहाँ नीति का आधार न्याय, औचित्य और कर्तव्य नहीं, बल्कि प्रक्रिया, नियम और सत्ता-संतुलन बन गया।
आज हमारे राजनीतिक दल स्वयं को राष्ट्रवादी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, सेकुलरिस्ट, लेफ्ट या राइट विंग कहकर परिभाषित करते हैं। यह स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राजनीति अपनी पहचान पश्चिमी शब्दावली और वैचारिक खाँचों में खोज रही है। ये सभी शब्द यूरोप में जन्मे हैं और वहीं की ऐतिहासिक परिस्थितियों की देन हैं। भारतीय सभ्यता में इनका कोई मौलिक संदर्भ नहीं मिलता। भारत में कभी “लेफ्ट” और “राइट” जैसा राजनीतिक विभाजन नहीं रहा। यहाँ समाज को संतुलन के सिद्धांत पर चलाने की परंपरा रही है, जहाँ विभिन्न मत और दर्शन परस्पर सहअस्तित्व में विकसित होते रहे हैं।
विशेष रूप से “राष्ट्रवाद” शब्द पर विचार करना आवश्यक है। यह शब्द यूरोप के नेशनलिज़्म की अवधारणा से आया है, जहाँ राष्ट्र को एक राजनीतिक इकाई और सत्ता-संरचना के रूप में देखा गया। भारतीय दृष्टि में राष्ट्र केवल भूभाग या सत्ता-संरचना नहीं है, बल्कि वह एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता है, जिसे माता के रूप में देखा गया है। भारत में राष्ट्र के प्रति भाव “नेशन-स्टेट” का नहीं, बल्कि “मातृभूमि” का रहा है। यहाँ राष्ट्र की सेवा किसी वैचारिक वाद के प्रति निष्ठा के रूप में नहीं, बल्कि साधना और भक्ति के रूप में की जाती है।
इसी कारण भारतीय परंपरा में “राष्ट्रवादी” की अपेक्षा “राष्ट्रभक्त” शब्द अधिक उपयुक्त है। राष्ट्रभक्ति में समर्पण है, कर्तव्य है और त्याग का भाव है, जबकि किसी भी “वाद” से जुड़ते ही विचार एक सीमा के बाद संकीर्ण परिधि में बँध जाता है। वाद व्यक्ति को अनुयायी बनाता है, जबकि धर्म व्यक्ति को उत्तरदायी बनाता है। यही अंतर भारतीय दृष्टि और आयातित वैचारिक ढाँचों के बीच मूलभूत भेद को स्पष्ट करता है।
यहीं से यह भी स्पष्ट होता है कि जब हिंदू समाज इन आयातित विचारधाराओं को अपनी स्वाभाविक चेतना मानकर स्वीकार कर लेता है, तब वह अनजाने में अपनी ही सभ्यतागत दृष्टि से कट जाता है। प्रशासन, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श—तीनों में भारतीयता शब्दों तक सीमित रह जाती है, जबकि निर्णय और सोच की दिशा पश्चिमी वैचारिक ढाँचों से संचालित होने लगती है। यही प्रक्रिया आगे चलकर समाज को वैचारिक रूप से भ्रमित, विभाजित और आत्मविस्मृत करती चली जाती है।
यदि हमें अपनी वास्तविक पहचान और अपनी मौलिक विचारधारा का सही रूप में प्रकटीकरण करना है, तो सबसे पहले हमें यह स्पष्ट करना होगा कि हमारी विचारधारा किसी आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत, किसी आयातित “वाद” या किसी सीमित भौगोलिक परिभाषा से उत्पन्न नहीं हुई है। हमारी विचारधारा उस ब्रह्म-वाणी से प्रवाहित होती है, जो वेदों की ऋचाओं, संहिताओं, उपनिषदों और वेदांत दर्शन में अभिव्यक्त हुई है। वही चेतना पुराणों, श्रुति-स्मृति परंपरा और धर्मशास्त्रों के माध्यम से समाज के आचार और व्यवहार में ढली है। आत्मा और ब्रह्म की एकता, कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत, कारण-कार्य का नियम और ऋत का शाश्वत विधान—ये सभी तत्व किसी दार्शनिक कल्पना के परिणाम नहीं हैं, बल्कि सहस्राब्दियों के चिंतन, साधना और अनुभव से उपजे जीवन-सिद्धांत हैं।
भारतीय सभ्यता की विशेषता यह रही है कि उसने समाज को एकांगी दृष्टि से नहीं देखा। ब्राह्मण और श्रमण—दोनों परंपराएँ समानांतर रूप से समाज को संतुलित करती रही हैं। ब्राह्मण परंपरा ने ज्ञान, तत्त्वचिंतन और शास्त्रीय अनुशासन दिया, तो श्रमण परंपरा ने वैराग्य, करुणा और आत्मसंयम का मार्ग प्रशस्त किया। यही द्वैत नहीं, बल्कि पूरकता है, जिसने भारतीय समाज को हजारों वर्षों तक जीवंत बनाए रखा। यह समाज किसी एक पुस्तक, किसी एक पूजा-पद्धति या किसी एक मत पर आधारित नहीं रहा, बल्कि सत्य की खोज को निरंतर प्रवाहमान बनाए रखने वाली चेतना रहा है।
इस चेतना का तन-स्वरूप लोकपरंपराओं में बहता है। गाँवों के उत्सव, ऋतु-अनुसार पर्व, कृषि-संस्कार, लोकगीत, लोकदेवता, नदी-पूजन, पर्वत-वंदना और सूर्य-चंद्र के साथ जुड़ी आस्थाएँ—ये सब किसी संगठित धर्मसंस्था की देन नहीं हैं, बल्कि जीवन के साथ बहती हुई सनातन परंपरा की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसी प्रकार इस सभ्यता की आत्मा खेत-खलिहानों में, नदियों की धारा में, पर्वतों की अचलता में, सूर्य के प्रकाश और चंद्र की शीतलता में प्रवाहित होती रही है। यह धर्म किसी मंदिर या ग्रंथ में बंद नहीं रहा, बल्कि जीवन की प्रत्येक क्रिया में साकार होता रहा है।
इसी विराट धर्मरूपी चेतना को धारण करने वाला व्यक्ति स्वयं को केवल किसी राजनीतिक पहचान से परिभाषित नहीं कर सकता। मैं उसी वैदिक-सनातन परंपरा का धारक हूँ, जो हिंदुत्व को किसी संकीर्ण अर्थ में नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि के रूप में स्वीकार करती है। यह हिंदुत्व किसी आक्रामक पहचान का नाम नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक आत्मबोध का नाम है, जो विविधता को स्वीकार करता है, मतभेद को सहअस्तित्व में ढालता है और सत्य की खोज को अंतिम सत्य मानता है।
हमारी विचारधारा सनातन हिंदुत्व की है, क्योंकि वह किसी एक “वाद” में सीमित नहीं है। वाद समय के साथ जन्म लेते हैं और समय के साथ समाप्त हो जाते हैं, किंतु सनातन धर्म समयातीत है। वह किसी एक भूगोल में सीमित नहीं, क्योंकि उसका आधार भूमि नहीं, चेतना है। वह राष्ट्रधर्म से आरंभ होकर विश्वधर्म तक विस्तारित होता है, क्योंकि वह सृष्टि के शाश्वत नियम—ऋत—को स्वीकार करता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में “धर्म” कोई संप्रदाय नहीं, बल्कि वह नियम है जो धारण करता है, जो समाज, प्रकृति और मानव को संतुलन में रखता है।
इसीलिए जब हम अपने विचार प्रकट करते हैं, तो हमें स्वयं को किसी आयातित राजनीतिक लेबल में बाँधने के बजाय अपनी पहचान को स्पष्ट रूप से “सनातनी विचारधारा” के रूप में अभिव्यक्त करना चाहिए। यह पहचान न तो विरोध पर आधारित है, न ही किसी अन्य परंपरा के निषेध पर। यह पहचान आत्मबोध पर आधारित है—अपने मूल, अपने शास्त्र, अपने जीवन-दर्शन और अपनी सभ्यतागत निरंतरता के स्वीकार पर आधारित। यही वह आधार है, जिस पर हिंदू समाज अपनी वैचारिक स्पष्टता, आत्मविश्वास और दीर्घकालिक दिशा को पुनः स्थापित कर सकता है।
विचारों की बात हो चुकी है, किंतु हिंदू समाज की मानसिकता को समझने के लिए विचार और व्यवहार के बीच के गहरे अंतर को समझना और भी आवश्यक है। हिंदू समाज अनेक विषयों पर अत्यंत आदर्शवादी है। हम चाहते हैं कि पूरी दुनिया सात्त्विक हो जाए, कि समाज पूर्णतः नैतिक, पवित्र और आदर्शों से संचालित हो। किंतु यह अपेक्षा स्वयं सृष्टि के स्वभाव के विपरीत है। सृष्टि त्रिगुणात्मक है—सत्त्व, रज और तम का संतुलन ही उसका स्वभाव है। यही त्रिगुणात्मक स्वभाव मानव समाज का भी है और इसी का प्रतिबिंब हिंदू समाज की प्रवृत्तियों में दिखाई देता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब हम इस स्वभाव को स्वीकार करने के बजाय उससे आँख चुराकर आदर्शवाद का आवरण ओढ़ लेते हैं।
हिंदू समाज का स्वभाव प्रश्नाकुल रहा है। यह प्रश्नाकुलता उसकी शक्ति भी है और उसकी कमजोरी भी। इस समाज ने जगत्जननी माँ सीता के चरित्र पर प्रश्न उठाए, भगवान राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम के निर्णयों पर भी शंका प्रकट की। यह प्रवृत्ति बताती है कि हिंदू समाज किसी भी सत्ता, किसी भी व्यक्तित्व या किसी भी आदर्श को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करता। किंतु यही प्रवृत्ति जब आत्मसंयम और विवेक से रहित हो जाती है, तब वह निरंतर संदेह, अस्थिरता और विघटन का कारण बनती है। इसलिए हिंदू समाज के स्वभाव को समझना आवश्यक है, न कि केवल उसके आदर्शों का गुणगान करना।
व्यवहारिक जीवन में यह विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है। जो लोग सार्वजनिक मंचों पर बड़े-बड़े आदर्शों की बातें करते हैं, नैतिकता और ईमानदारी के उपदेश देते हैं, उन्हीं में से अनेक लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में अनैतिक आचरण करते हुए पाए जाते हैं। इसके विपरीत, जो व्यक्ति ऊँचे आदर्शों का ढोल नहीं पीटता, जो स्वयं को नैतिकता का ठेकेदार घोषित नहीं करता, उसका जीवन प्रायः अधिक संयमित, संतुलित और नैतिक होता है। यह अंतर केवल व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सामाजिक ढाँचे में व्याप्त है।
आज के समाज का एक सजीव चित्रण प्रशासनिक व्यवस्था में दिखाई देता है। कोई युवक जब यूपीएससी जैसी परीक्षाओं की तैयारी करता है, तब वह स्वयं को व्यवस्था-परिवर्तन का वाहक मानता है। वह कहता है कि वह भ्रष्टाचार समाप्त कर देगा, कि वह सत्ता में जाकर ईमानदारी से कार्य करेगा, कि वह कभी अनैतिक नहीं बनेगा। इन घोषणाओं में भावनात्मक सच्चाई भी होती है, किंतु इनमें व्यवहारिक समझ का अभाव रहता है। जैसे ही वही व्यक्ति परीक्षा उत्तीर्ण कर आईएएस या आईपीएस बनता है, वैसे ही वह उसी तंत्र का हिस्सा बन जाता है, जिसे बदलने का संकल्प उसने किया था।
धीरे-धीरे वही व्यक्ति अनैतिक समझौतों को “प्रक्रियागत विवशता” कहकर स्वीकार करने लगता है। सत्ता, सुविधा और प्रभाव का स्वाद उसे व्यवस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर सुरक्षित स्थान खोजने की ओर ले जाता है। परिणामस्वरूप वह व्यक्ति, जो कभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलता था, वही व्यक्ति देश के संसाधनों को घुन की तरह चाटने वाले तंत्र का हिस्सा बन जाता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे मानसिक स्तर पर घटित होता है, जहाँ आदर्श व्यवहारिक समझ के नाम पर त्याग दिए जाते हैं।
यह केवल व्यक्तिगत पतन की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की संरचनात्मक समस्या है। प्रशासनिक व्यवस्था जिस वैचारिक आधार पर टिकी हुई है, वह धर्मविहीन सेकुलर स्टेट की अवधारणा है। इस अवधारणा में नैतिकता, आदर्श और उत्तरदायित्व को किसी उच्चतर मूल्य से नहीं जोड़ा गया है। यहाँ नियम और प्रक्रिया सर्वोपरि हैं, किंतु नियम का नैतिक औचित्य गौण हो जाता है। जब राज्य स्वयं को धर्म और कर्तव्य से अलग कर लेता है, तब अधिकारी भी स्वयं को समाज के प्रति नहीं, बल्कि केवल सत्ता और पद के प्रति उत्तरदायी मानने लगते हैं।
यहीं से हिंदू समाज की मानसिकता का एक और पक्ष उजागर होता है। हम आदर्शों की बात तो बहुत करते हैं, किंतु ऐसे संस्थागत ढाँचे के निर्माण पर गंभीरता से विचार नहीं करते, जो व्यक्ति को नैतिक बने रहने में सहायक हों। परिणामस्वरूप व्यक्ति और व्यवस्था के बीच संघर्ष होता है, और अधिकांश मामलों में व्यवस्था व्यक्ति को निगल जाती है। यह स्थिति केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे पूरे सामाजिक जीवन में फैल जाती है, जहाँ आदर्श शब्दों में जीवित रहते हैं और व्यवहार में दम तोड़ देते हैं।
एक उदाहरण से हिंदू समाज की सोचने, प्रतिक्रिया देने और निर्णय करने की क्षमता को और अधिक गहराई से समझा जा सकता है। इस देश में स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक हज़ारों विकास परियोजनाएँ संचालित हुई हैं—राष्ट्रीय राजमार्ग, रेल लाइनें, बाँध, बिजली संयंत्र, शहरी पुनर्विकास योजनाएँ और औद्योगिक कॉरिडोर। इन परियोजनाओं के दौरान अनेक बार पुराने ढाँचे प्रभावित हुए, कहीं मंदिरों का स्वरूप बदला, कहीं पुनर्स्थापन की आवश्यकता पड़ी। किंतु इन परिवर्तनों का उद्देश्य दीर्घकालिक सामाजिक हित रहा है—सुविधाओं का विस्तार, जनजीवन की सुगमता और आर्थिक गतिविधियों को गति देना। इसके बावजूद वही समाज, जिसे इन परियोजनाओं से प्रत्यक्ष लाभ मिलना होता है, अक्सर निर्माण कार्य के समय भावनात्मक विरोध, धरना और प्रदर्शन की राह पकड़ लेता है।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस परियोजना के आरंभ होते ही यह प्रचार किया गया कि आस्था पर आघात हो रहा है और परंपरा नष्ट की जा रही है। जबकि तथ्य यह है कि कॉरिडोर निर्माण से पहले काशी विश्वनाथ क्षेत्र में श्रद्धालुओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी—संकरी गलियाँ, अव्यवस्थित दुकानें, खुले नाले, जलनिकासी का अभाव और आपात स्थिति में सुरक्षित निकास का न होना। प्रतिवर्ष पाँच से छह करोड़ श्रद्धालु काशी आते थे, किंतु उनके लिए बुनियादी नागरिक सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं थीं। कॉरिडोर के निर्माण के बाद परिसर का क्षेत्रफल कई गुना बढ़ा, भीड़-प्रबंधन संभव हुआ, सुरक्षा और स्वच्छता में सुधार हुआ और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी प्रत्यक्ष लाभ पहुँचा। आज वही लोग, जो निर्माण के समय तीव्र विरोध कर रहे थे, मौन हैं। यह विरोध नहीं, बल्कि यथास्थितिवादी मानसिकता का उदाहरण है—परिवर्तन से पहले भय और शंका, परिवर्तन के बाद सहज स्वीकार्यता।
इसी यथास्थितिवादी मानसिकता के कारण देश में जिन नीतियों और विचारों का समय रहते तीव्र विरोध होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। समाज अक्सर किसी भी व्यवस्था को नियति मानकर स्वीकार कर लेता है। यही प्रवृत्ति नेहरूवियन समाजवादी आर्थिक नीतियों के संदर्भ में भी दिखाई देती है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने केंद्रीकृत योजना, राज्य-नियंत्रित उद्योग, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और निजी पूँजी के प्रति अविश्वास पर आधारित आर्थिक मॉडल अपनाया। इसके परिणाम आँकड़ों में स्पष्ट दिखाई देते हैं। 1955 से 1990 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर लगभग 3 से 3.5 प्रतिशत के बीच सिमटी रही। इसी अवधि में जनसंख्या वृद्धि दर लगभग 2 प्रतिशत के आसपास थी, अर्थात् वास्तविक प्रति व्यक्ति आय वृद्धि अत्यंत सीमित रही। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में महँगाई दर 25 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गई थी और कर-प्रणाली इतनी दमनकारी हो चुकी थी कि उच्च आय वर्ग पर प्रभावी कर बोझ 90 से 97 प्रतिशत तक पहुँच गया। उद्योग स्थापित करने के लिए दर्जनों लाइसेंस, स्वीकृतियाँ और वर्षों की प्रतीक्षा सामान्य बात थी।
इसके बावजूद समाज का एक वर्ग यह कहता रहा कि “सब मिल जाएगा”—नेहरू ने बड़े बाँध बनाए, इस्पात संयंत्र लगाए, पीएसयू खड़े किए, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। किंतु इन निर्णयों का दीर्घकालिक प्रभाव क्या पड़ा, इस पर समाज स्तर पर गंभीर विमर्श नहीं हुआ। उसी कालखंड में भारत के आसपास या उसके बाद स्वतंत्र हुए देशों की स्थिति देखें, तो अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाता है। Japan द्वितीय विश्वयुद्ध में परमाणु हमलों से पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था, फिर भी 1950 से 1970 के बीच उसने तीव्र औद्योगिक पुनर्निर्माण किया और 1968 तक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। Singapore 1965 में स्वतंत्र हुआ, उसके पास न संसाधन थे, न बड़ा भूभाग, फिर भी मुक्त व्यापार, प्रशासनिक दक्षता और निवेश-अनुकूल नीतियों के कारण कुछ दशकों में उसकी प्रति व्यक्ति आय भारत से कई गुना आगे निकल गई।
सबसे महत्त्वपूर्ण तुलना China की है। चीन स्वयं को कम्युनिस्ट कहता था, किंतु उसने भी यथार्थ को स्वीकार किया। 1978 के बाद चीन ने कृषि सुधार आरंभ किए, सामूहिक खेती को समाप्त किया और 1979 तक बंद आर्थिक मॉडल से बाहर निकलकर विदेशी निवेश के लिए द्वार खोल दिए। आर्थिक नीति में उसने पूँजीवाद को अपनाया, जबकि प्रशासनिक ढाँचे को कम्युनिस्ट अनुशासन में बनाए रखा। परिणामस्वरूप 1990 से 2010 के बीच चीन की औसत विकास दर 9 से 10 प्रतिशत रही। वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा चीन की ओर चला गया और यूरोप तथा अमेरिका का निवेश वहीं केंद्रित हो गया।
भारत ने वही सुधार लगभग एक दशक बाद, 1991 में, वह भी गंभीर आर्थिक संकट और विदेशी मुद्रा भंडार के लगभग समाप्त हो जाने के दबाव में किए। उस समय तक चीन वैश्विक सप्लाई चेन का प्रमुख केंद्र बन चुका था। भारत मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का अवसर खो बैठा और सेवा क्षेत्र पर निर्भर अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ गया। यह अंतर केवल नीतियों का नहीं था, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम था, जो परिवर्तन के समय विरोध करती है, व्यवस्था को नियति मानकर स्वीकार कर लेती है और उसके दीर्घकालिक दुष्परिणामों पर समय रहते प्रश्न नहीं
आज 2026 में यह कहा जा रहा है कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। यह कथन आँकड़ों के एक सीमित सत्य को तो दर्शाता है, किंतु उसके भीतर छिपी संरचनात्मक वास्तविकताओं को नहीं। भारत का आर्थिक आकार मुख्यतः उसकी विशाल जनसंख्या के कारण बड़ा दिखाई देता है। कुल जीडीपी का बढ़ना अपने आप में शक्ति का संकेत नहीं होता, यदि प्रति व्यक्ति आय, उत्पादकता और औद्योगिक क्षमता उसी अनुपात में न बढ़ रही हो। आज भी भारत की प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों से ही नहीं, बल्कि कई मध्यम आय वाले देशों से भी काफी पीछे है। इसका अर्थ यह है कि आर्थिक आकार बढ़ रहा है, किंतु आम नागरिक की वास्तविक समृद्धि उसी गति से नहीं बढ़ रही।
आर्थिक इतिहास यह बताता है कि कोई भी देश केवल सेवा क्षेत्र के बल पर दीर्घकालिक महाशक्ति नहीं बन सकता। वास्तविक, टिकाऊ और व्यापक रोजगार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से ही उत्पन्न होते हैं। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। जब तक वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 20 से 25 प्रतिशत के आसपास नहीं पहुँचती, तब तक सेवा क्षेत्र आधारित विकास मॉडल की अपनी सीमाएँ बनी रहेंगी। आज भी वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत के आसपास ही है, जबकि चीन लंबे समय तक 12 से 15 प्रतिशत के बीच रहा है। मैन्युफैक्चरिंग में भारत की हिस्सेदारी जीडीपी में लगभग 15 प्रतिशत के आसपास अटकी हुई है, जबकि पूर्वी एशियाई देशों में यह अनुपात 25 से 30 प्रतिशत तक रहा है।
इसके बावजूद भारत में उद्यमियों के लिए अनुकूल वातावरण बनने के बजाय सरकारी नीतियाँ अधिकतर अल्पकालिक राजनीतिक लाभ पर केंद्रित दिखाई देती हैं। सब्सिडी, मुफ्त राशन, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और विभिन्न प्रकार की मुफ्त योजनाएँ—विशेषकर महिलाओं को नकद राशि देने की घोषणाएँ—राजनीति का प्रमुख औज़ार बन चुकी हैं। इन योजनाओं का तात्कालिक सामाजिक प्रभाव भले ही दिखाई दे, किंतु उनका दीर्घकालिक आर्थिक भार केंद्र और राज्यों की वित्तीय स्थिति को लगातार कमजोर कर रहा है। आज कई राज्य अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा केवल वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में खर्च कर रहे हैं। विकासात्मक पूँजीगत व्यय का अनुपात सिमटता जा रहा है। केंद्र और राज्य दोनों कर्ज लेकर शासन चला रहे हैं, और यह स्थिति दीर्घकाल में 1990 के दशक जैसी वित्तीय संकट की पृष्ठभूमि तैयार करती दिखाई देती है।
संविधान की प्रस्तावना में निहित समाजवाद जैसी अवधारणा इस मानसिकता को वैचारिक आधार देती है, जहाँ राज्य को उत्पादनकर्ता नहीं, बल्कि वितरक के रूप में देखा जाता है। 2024 के चुनावों में महिलाओं को प्रतिमाह आठ हजार रुपये देने जैसी घोषणाएँ इसी प्रवृत्ति का विस्तार थीं। आज अलग-अलग राज्यों में 1500, 2000 या 2500 रुपये मासिक नकद सहायता की योजनाएँ चल रही हैं। यदि यही मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य बनता है, तो उसका परिणाम वही होगा, जो 1980 के दशक के अंत में हुआ था—बढ़ता राजकोषीय घाटा, घटता निवेश, विदेशी मुद्रा संकट और अंततः नीतिगत मजबूरियाँ।
शिक्षा और मानव संसाधन के क्षेत्र में स्थिति और भी चिंताजनक है। भारत में अनावश्यक डिग्रियों का अंबार खड़ा किया जा रहा है। हर वर्ष लाखों स्नातक और परास्नातक निकलते हैं, किंतु उनके पास उद्योग की आवश्यकता के अनुरूप कौशल नहीं होता। स्किल डेवलपमेंट की योजनाएँ काग़ज़ों और विज्ञापनों तक सीमित रह जाती हैं। वास्तविकता यह है कि दुनिया आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन की ओर तेज़ी से बढ़ चुकी है, जबकि भारत का बड़ा हिस्सा अब भी पारंपरिक परीक्षाओं और रटंत आधारित चयन प्रणालियों में उलझा हुआ है।
यूपीएससी, पीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं के पाँच से दस वर्ष तक खप जाना सामान्य बात हो गई है। इस दौरान उनका सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक काल परीक्षा-प्रणाली की भेंट चढ़ जाता है। विडंबना यह है कि जहाँ विश्व अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी उद्यमिता पर आगे बढ़ रहा है, वहीं भारत में इंटरव्यू और परीक्षाओं में जाति, विचारधारा और मनगढ़ंत नैरेटिव पर चर्चा होती दिखाई देती है। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे विषयों को भी वैचारिक लेबलिंग और जातिगत दृष्टि से देखा जाने लगा है। यह स्थिति ज्ञान-समाज के निर्माण के विपरीत जाती है।
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी संवेदनशील प्रणालियों में भी गुणवत्ता के प्रश्न उठ रहे हैं। ऐसे उदाहरण सामने आते हैं, जहाँ न्यूनतम अंकों के साथ उत्तीर्ण व्यक्ति भी डिग्रियाँ प्राप्त कर लेता है, जबकि उत्कृष्ट संस्थानों से शिक्षित प्रतिभाएँ विदेश पलायन कर जाती हैं। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से निकले भारत के श्रेष्ठ मस्तिष्क यूरोप और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाओं को सशक्त बना रहे हैं। यह केवल ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि नीति और वातावरण की विफलता का संकेत है।
इसी के साथ समाज में जाति के नाम पर निरंतर विष फैलाया जा रहा है। इतिहास से काट-छाँट कर यह कथाएँ गढ़ी जा रही हैं कि कुछ वर्गों ने हजारों वर्षों तक दूसरों को पानी तक नहीं पीने दिया, और अब उसका बदला आने वाले हजारों वर्षों तक आरक्षण के माध्यम से लिया जाएगा। इस प्रकार का नैरेटिव विद्यालयों, महाविद्यालयों, मीडिया, फ़िल्मों और राजनीतिक भाषणों के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि समाज भविष्य की प्रतिस्पर्धा और तकनीकी परिवर्तन की तैयारी करने के बजाय अतीत के विकृत संस्करणों में उलझता चला जा रहा है। जब विश्व रोबोटिक्स और एआई की दौड़ में आगे बढ़ रहा है, तब भारत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी जातिगत ध्रुवीकरण और पहचान की राजनीति में फँसा हुआ दिखाई देता है।
2014 से 2024 के बीच नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आधारभूत ढाँचे और गरीब कल्याण के क्षेत्र में ऐसे कार्य किए, जिनकी तुलना स्वतंत्र भारत के किसी भी एक दशक से सहजता से नहीं की जा सकती। यह केवल घोषणाओं का काल नहीं था, बल्कि ठोस क्रियान्वयन का समय था। सड़क, रेल, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली उत्पादन, डिजिटल अवसंरचना—इन सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। वहीं सामाजिक स्तर पर रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को राज्य की प्राथमिकता बनाया गया। करोड़ों परिवारों को पक्के आवास उपलब्ध कराए गए, शौचालयों के माध्यम से खुले में शौच से मुक्ति दिलाई गई, हर घर जल योजना के अंतर्गत पेयजल की पहुँच बढ़ाई गई और उज्ज्वला जैसी योजनाओं के माध्यम से रसोई तक गैस पहुँची। यह सब केवल काग़ज़ी आँकड़े नहीं थे, बल्कि ग्रामीण और शहरी जीवन में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले परिवर्तन थे।
इतना व्यापक कार्य होने के बावजूद 2024 के चुनावों में जिस प्रकार का वातावरण बनाया गया, वह हिंदू समाज की मानसिकता को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत देता है। विपक्ष द्वारा यह अफवाह फैलायी गई कि यदि सत्तारूढ़ दल को 400 से अधिक सीटें मिल गईं, तो संविधान बदल दिया जाएगा और आरक्षण समाप्त कर दिया जाएगा। यह भय-आधारित नैरेटिव तथ्यों पर नहीं, बल्कि आशंकाओं और ऐतिहासिक अविश्वास पर टिका हुआ था। इसके बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग इस प्रचार से प्रभावित हुआ। परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों तक सिमट गई। यह परिणाम उस कार्य-प्रदर्शन के अनुपात में नहीं था, जो पिछले दस वर्षों में हुआ था।
यह भी उल्लेखनीय है कि यदि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण न हुआ होता, तो हिंदू समाज का समर्थन और भी कमज़ोर पड़ सकता था। मध्यप्रदेश, ओडिशा और गुजरात जैसे राज्यों की भूमिका इस 240 के आँकड़े में निर्णायक रही। यह स्थिति स्वयं में प्रश्न उठाती है कि जब किसी सरकार द्वारा बुनियादी सुविधाएँ, सम्मानजनक जीवन और विकास दिया जाता है, तब भी यदि समाज केवल अफवाह के आधार पर निर्णय लेता है, तो यह केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक समस्या बन जाती है।
यही वह यथास्थितिवादी मानसिकता है, जिसके संदर्भ में कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा समय-समय पर यह कहा गया कि जो गटर में रहना चाहता है, वह वहीं रहे—उसके लिए काम करने की क्या आवश्यकता है। यह कथन केवल अहंकार नहीं, बल्कि एक लंबे समय तक अपनाए गए राजनीतिक मॉडल की अभिव्यक्ति है। इसी मानसिकता के कारण दशकों तक कांग्रेस शासन में हिंदू समाज के बड़े वर्ग को रोटी, कपड़ा, मकान, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा गया। उस मॉडल में विकास नहीं, बल्कि निर्भरता को प्राथमिकता दी गई। यह मान लिया गया कि यदि जनता को न्यूनतम सहायता देकर जीवित रखा जाए, तो वह सत्ता को “माई-बाप” मानकर स्वीकार करती रहेगी।
यही कम्युनिस्ट-साम्यवादी आर्थिक और राजनीतिक मॉडल का मूल सिद्धांत रहा है—व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकार-आश्रित बनाना। इस मॉडल में नागरिक की स्वतंत्रता धीरे-धीरे सीमित होती जाती है और राज्य सर्वशक्तिमान संरक्षक के रूप में स्थापित हो जाता है। नेहरूवियन समाजवाद ने इसी मानसिकता को संस्थागत रूप दिया। उत्पादन, उद्यमिता और स्वावलंबन के स्थान पर सब्सिडी, नियंत्रण और वितरण को प्राथमिकता दी गई। परिणामस्वरूप हिंदू समाज की मानसिकता धीरे-धीरे यथास्थिति स्वीकार करने वाली और जड़ होती चली गई।
जब समाज लंबे समय तक इसी ढाँचे में रहता है, तो उसे वास्तविक परिवर्तन असहज लगने लगता है। जो व्यवस्था उसे दशकों तक न्यूनतम पर जीवित रखती आई हो, उससे बाहर निकलने का साहस वह आसानी से नहीं कर पाता। यही कारण है कि जब पहली बार बड़े पैमाने पर बुनियादी सुविधाएँ और सम्मानजनक जीवन दिया गया, तब भी समाज का एक हिस्सा भय, अफवाह और असुरक्षा के भाव से संचालित हुआ। यह स्थिति केवल किसी एक चुनाव की कहानी नहीं है, बल्कि उस मानसिक ढाँचे की निरंतरता है, जिसे नेहरूवियन समाजवाद और साम्यवादी सोच ने वर्षों तक पोषित किया।
हिंदू समाज की मानसिकता की एक गहरी समस्या यह है कि हम अपने आदर्शों और अपने आचरण के बीच के अंतर को स्वीकार नहीं करना चाहते। हमें नेतृत्व भगवान राम जैसा चाहिए—मर्यादा, त्याग, धर्म और न्याय से युक्त—लेकिन व्यवहार में हम रावण की प्रवृत्तियों को अपनाते हैं। हमें व्यवस्था रामराज्य जैसी चाहिए, किंतु अपने दैनिक जीवन में हम रावणराज्य का आचरण करते हैं। हम नैतिक शासन, शुद्ध प्रशासन और आदर्श समाज की बातें करते हैं, लेकिन अपने घर, परिवार और संबंधों में मर्यादा निभाने को तैयार नहीं होते। भाई-भाई का गला काटने को उतारू रहते हैं, संपत्ति और स्वार्थ के लिए रिश्तों की सीमाएँ लाँघ देते हैं, और फिर भी स्वयं को धर्मनिष्ठ समाज का प्रतिनिधि मानते हैं।
हम आर्थिक रूप से सक्षम होते हुए भी सामाजिक उत्तरदायित्व से बचते हैं। हमारे मोहल्ले में कोई भूखा सो रहा हो, कोई संकट में हो, तो उसका हाल-चाल पूछने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई है। धर्म, राष्ट्र और समाज की बड़ी-बड़ी बातें करने वाला हिंदू समाज, जब वास्तविक सेवा, त्याग और बलिदान की बात आती है, तब अपने घर के दरवाज़े बंद कर लेता है। हम हिंदू राष्ट्र की चर्चा करते हैं, किंतु हिंदू राष्ट्र के लिए व्यक्तिगत सुविधा छोड़ने का समय आए, तो हम पीछे हट जाते हैं। हम क्रांति की बातें करते हैं, पर जब क्रांतिकारी निकलने का समय आता है, तो हम चाहते हैं कि भगत सिंह पड़ोसी के घर से निकले—हमारे घर से नहीं।
यह मानसिकता केवल वर्तमान की उपज नहीं है, बल्कि दशकों से पोषित की गई है। 1960 के दशक में जब सरकार ने “हम दो, हमारे दो” का नारा दिया, तो हिंदू समाज ने बिना किसी गहन चिंतन के उसे भेड़-चाल की तरह अपना लिया। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर यह सामाजिक प्रयोग बिना सांस्कृतिक और सभ्यतागत संदर्भ के लागू किया गया। आज उसके परिणाम सामने हैं—हिंदू समाज की प्रजनन दर 2.1 से नीचे गिर चुकी है, जबकि अन्य समुदायों की जनसंख्या संरचना अपेक्षाकृत संतुलित बनी हुई है। भविष्य की जनसांख्यिकीय तस्वीर में असंतुलन के संकेत स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, किंतु समाज अभी भी इस पर खुलकर चर्चा करने से बचता है।
हमारी मानसिकता का एक और गंभीर पक्ष यह है कि हम आसानी से बहक जाते हैं। कोई कुछ कह दे, कोई अफवाह फैला दे, और हम उसे सत्य मान लेते हैं। “कौआ कान ले गया” जैसी कहावत हमारी सामूहिक सोच का रूपक बन चुकी है। बिना तथ्य, बिना इतिहास और बिना विवेक के हम कथनों को स्वीकार कर लेते हैं। इसी प्रवृत्ति का लाभ लेकर दशकों तक समाजवाद के नाम पर हमें हाँका गया। नेहरू, इंदिरा, राजीव और उनके बाद की पीढ़ियाँ, साथ ही समाजवादी और कम्युनिस्ट नेता, बार-बार हमें यह समझाते रहे कि यही मार्ग देश के लिए श्रेष्ठ है। हम उनके पीछे चलते रहे—चाहे देश आर्थिक रूप से दिवालिया हो जाए, चाहे समाज जड़ होता चला जाए।
1947 में देश का विभाजन हुआ, करोड़ों हिंदुओं का नरसंहार हुआ, लाखों लोग विस्थापित हुए, किंतु इसके लिए जिन नेताओं की भूमिका निर्णायक थी, उनसे समाज ने कभी कठोर प्रश्न नहीं पूछे। आधा कश्मीर पाकिस्तान के पास चला गया, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न उठे, फिर भी हमने इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया। यही नियतिवाद हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। हम सच को जानते हुए भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहते, क्योंकि स्वीकार करने का अर्थ होता है—प्रश्न करना, संघर्ष करना और असुविधा झेलना।
पिछले एक हज़ार वर्षों के इतिहास में भारत ने बार-बार आक्रमण, हिंसा और नरसंहार देखे। इसके बावजूद हम स्वयं को यह कहकर सांत्वना देते रहते हैं कि “सब एक जैसे नहीं होते।” हाल की घटनाएँ—जहाँ धर्म पूछकर हत्या की जाती है, या पड़ोसी देशों में वैचारिक और धार्मिक हिंसा सामने आती है—हमें चेतावनी देती हैं, किंतु समाज का बड़ा हिस्सा इन्हें भी क्षणिक घटनाएँ मानकर भूल जाना चाहता है। यह भूलने की आदत हमें बार-बार उसी चक्र में धकेल देती है।
यही हिंदू मानसिकता की मूल समस्या है—आदर्श और यथार्थ के बीच का अस्वीकार। हम इतिहास से सीखना नहीं चाहते, वर्तमान की कठिन सच्चाइयों को स्वीकार नहीं करना चाहते और भविष्य के लिए कठोर निर्णय लेने से बचते हैं। परिणामस्वरूप हम बार-बार वही भूलें दोहराते हैं, वही भ्रम पालते हैं और वही प्रश्न अनुत्तरित छोड़ देते हैं।
यह तथ्य अब केवल वैचारिक विमर्श नहीं, बल्कि आर्थिक इतिहास में प्रमाणित निष्कर्ष है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान British Empire ने भारत से योजनाबद्ध ढंग से अपार संपदा का निष्कर्षण किया। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक इतिहासकारों के शोध के अनुसार 1765 से 1938 के बीच भारत से लगभग 45 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (आज के मूल्य पर) के समतुल्य धन का स्थानांतरण हुआ। यह धन किसी एक माध्यम से नहीं, बल्कि कई संरचनात्मक तरीकों से निकाला गया—भू-राजस्व की कठोर वसूली, व्यापारिक असंतुलन, भारतीय राजकोष से ब्रिटिश प्रशासन और युद्धों का खर्च, मुद्रा विनिमय पर नियंत्रण, तथा भारत को कच्चे माल के निर्यातक और तैयार माल के उपभोक्ता के रूप में सीमित कर देना।
अंग्रेज़ों के आगमन के समय भारत विश्व अर्थव्यवस्था में अग्रणी स्थान रखता था। 1700 के आसपास भारत का वैश्विक उत्पादन में योगदान लगभग 22 से 23 प्रतिशत था। उस समय भारत केवल कृषि प्रधान समाज नहीं था, बल्कि वस्त्र निर्माण, धातुकर्म, जहाज़ निर्माण, काग़ज़, चीनी, मसाले और हस्तशिल्प का वैश्विक केंद्र था। 18वीं शताब्दी में विश्व के निर्यातित वस्त्रों का बड़ा हिस्सा भारत से जाता था। ढाका का मलमल, बंगाल और कोरोमंडल तट का कपड़ा, बनारस और कांचीपुरम का रेशम—ये अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में मानक माने जाते थे। 19वीं शताब्दी के अंत तक यही हिस्सेदारी गिरकर 4.6 प्रतिशत रह गई और 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत का वैश्विक योगदान घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत रह गया। इतनी तीव्र गिरावट किसी तकनीकी पिछड़ेपन या सामाजिक जड़ता का परिणाम नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक नीतियों का सीधा परिणाम थी।
इस प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभावित वही समुदाय हुए, जिन्हें आज दलित, शोषित या पिछड़ा कहकर प्रस्तुत किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से यही समुदाय भारत की उत्पादन-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे। कृषि, बुनाई, कताई, रंगाई, चमड़ा उद्योग, धातु-कार्य, कुटीर उद्योग और शिल्प निर्माण—इन सभी क्षेत्रों में स्थानीय जातीय और सामाजिक समूहों की पीढ़ियों से विकसित विशेषज्ञता थी। अंग्रेज़ों ने इन उद्योगों को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया। 1813 और 1833 के चार्टर एक्ट्स के बाद ब्रिटिश मिलों में बने कपड़ों को भारत में बिना या बहुत कम शुल्क के उतारा गया, जबकि भारतीय वस्त्रों पर भारी कर लगाए गए। परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी के अंत में जहाँ भारत का वस्त्र उद्योग विश्व में अग्रणी था, वहीं 19वीं शताब्दी के मध्य तक लाखों बुनकर और कारीगर बेरोज़गार होकर कृषि मज़दूरी या भुखमरी की ओर धकेल दिए गए। संपन्न उत्पादन-समुदाय धीरे-धीरे निर्धन और आश्रित बनते चले गए।
इसी आर्थिक शोषण का सबसे भयावह रूप कृत्रिम अकालों के रूप में सामने आया। 1770 के बंगाल अकाल में अनुमानतः एक करोड़ से अधिक लोग मारे गए। 1876–78 के अकाल में मद्रास, दक्कन और मैसूर क्षेत्रों में 50 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। 1896–97 और 1899–1900 के अकालों में फिर लाखों जानें गईं। इन सभी अकालों के दौरान यह तथ्य दर्ज है कि अन्न की कुल उपलब्धता समाप्त नहीं हुई थी। ब्रिटिश प्रशासन ने अनाज का निर्यात जारी रखा, कर-वसूली में कोई छूट नहीं दी और राहत कार्यों पर न्यूनतम खर्च किया। अकाल आयोगों की रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि नीति का उद्देश्य जनजीवन की रक्षा नहीं, बल्कि राजस्व और व्यापार को बनाए रखना था। कुल मिलाकर 18वीं और 19वीं शताब्दी के बीच इन कृत्रिम अकालों में पाँच से छह करोड़ भारतीयों की मृत्यु हुई।
इसके बावजूद भारतीय समाज में आज भी यह धारणा प्रचलित है कि अंग्रेज़ों ने भारत को आधुनिक बनाया। कहा जाता है कि अंग्रेज़ रेल लाए, प्रशासनिक व्यवस्था दी, प्रतियोगी परीक्षाओं की शुरुआत की। परंतु इन तथ्यों का दूसरा पक्ष अक्सर छिपा दिया जाता है। रेल नेटवर्क भारतीय औद्योगीकरण के लिए नहीं, बल्कि कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुँचाने और ब्रिटिश माल को भारत के भीतर तक खपाने के लिए विकसित किया गया था। प्रशासनिक ढाँचा समाज-निर्माण के लिए नहीं, बल्कि सीमित कर्मचारियों के माध्यम से विशाल भूभाग पर नियंत्रण और कर-वसूली के लिए बनाया गया था। प्रतियोगी परीक्षाएँ भारतीय प्रतिभा को सशक्त करने का साधन नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन के लिए एक आज्ञाकारी, अंग्रेज़ी-प्रशिक्षित नौकरशाही तैयार करने का उपकरण थीं।
विडंबना यह है कि हम इस संरचनात्मक शोषण की चर्चा करने के बजाय अपनी ही सामाजिक “कमियों” को प्रमुख कारण बताने में अधिक रुचि लेते हैं। हमें अपनी तथाकथित फॉल्ट-लाइन पर चर्चा करना सरल लगता है—सरकार यह कर रही है, नेता वह कर रहे हैं। डेमोक्रेसी में संख्या और भीड़ निर्णायक हो जाती है; विचार, गुणवत्ता, ऐतिहासिक विवेक और दीर्घकालिक आदर्श पीछे छूट जाते हैं। डेमोक्रेसी की प्रकृति ही ऐसी है कि उसमें सत्ता के लिए एक पूर्णतः संगठित और ऐतिहासिक रूप से सचेत समाज असहज हो सकता है, जबकि विभाजित समाज, निरंतर असंतोष और अलग-अलग प्रकार का अनरेस्ट अधिक प्रबंधनीय होता है।
यही कारण है कि औपनिवेशिक शोषण के इतने ठोस आँकड़े, दस्तावेज़ और प्रमाण उपलब्ध होने के बावजूद हम उस ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करने से बचते हैं। एक संपन्न, उत्पादन-आधारित समाज को योजनाबद्ध ढंग से गरीब और आश्रित बनाया गया—इस सच्चाई पर गंभीर विमर्श करने के बजाय हम डेमोक्रेसी के भीतर केवल आरोप-प्रत्यारोप, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और भीड़-आधारित निष्कर्षों तक सीमित रह जाते हैं।
यही वह बिंदु है जहाँ हिंदू समाज का स्वभाव स्वयं उसके मार्ग में बाधा बन जाता है। हम तब साथ खड़े होते हैं, जब कोई हमारे अनुसार चले। जो व्यक्ति काम करता है, व्यवस्था को बदलता है, वही सबसे पहले अकेला पड़ जाता है। यह कोई वैचारिक कथन नहीं है, यह हमने 2024 में प्रत्यक्ष देखा। हमने एक ऐसे प्रधानमंत्री को रुला दिया, जिसने वास्तव में काम किया था।
मैं यह बात किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि अपने गाँव के अनुभव से कह रहा हूँ। मेरे गाँव में सामान्य गरीब परिवार दशकों तक झोपड़ियों में रहे। कांग्रेस लगभग साठ वर्षों तक सत्ता में रही, लेकिन उन घरों की छत पक्की नहीं हो सकी। खुले में शौच सामान्य था, बरसात में घर टपकते थे, पानी और बिजली अनिश्चित थी। लोग इसे अपनी नियति मान चुके थे। फिर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में परिवर्तन आया। आज उसी गाँव में लगभग नब्बे प्रतिशत घर पक्के हैं। शौचालय हैं, नल से पानी आता है, बिजली नियमित है। यह कोई आँकड़ों की बाज़ीगरी नहीं है, यह प्रत्यक्ष सामाजिक परिवर्तन है, जिसे कोई भी ग्रामीण देख सकता है।
इतने स्पष्ट परिवर्तन के बाद भी हमने एक अफवाह को सच मान लिया। कहा गया कि यदि चार सौ सीटें आईं, तो संविधान बदल जाएगा, आरक्षण समाप्त कर दिया जाएगा। हमने यह नहीं पूछा कि जिसने दस वर्षों में किसी का अधिकार नहीं छीना, जिसने कल्याणकारी योजनाओं को सामाजिक न्याय से जोड़ा, वह अचानक ऐसा क्यों करेगा। हमने कर्म को नहीं देखा, हमने आशंका को देखा। यही हमारी मानसिकता की मूल समस्या है।
यह प्रवृत्ति नई नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता (3.39) स्पष्ट कहती है—
“आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा”
अर्थात भय और कामना मनुष्य के विवेक को ढक देती हैं। जब विवेक ढक जाता है, तब मनुष्य कर्म का मूल्यांकन नहीं करता, केवल आशंका के आधार पर निर्णय करता है। हिंदू समाज आज इसी स्थिति में बार-बार फँसता है।
हम आदर्शों की बातें बहुत करते हैं, पर व्यवहार में यथास्थिति से चिपके रहते हैं। जबकि हमारे वेद इस प्रवृत्ति को अस्वीकार करते हैं। ऋग्वेद (1.164) में ऋत का सिद्धांत आता है—ऋत अर्थात सृष्टि का वह शाश्वत नियम, जिसके अनुसार सब कुछ गतिशील है। सूर्य चलता है, ऋतुएँ बदलती हैं, नदी बहती है। जो ठहर जाता है, वह सड़ने लगता है। समाज भी यदि परिवर्तन से डरने लगे, तो वह जड़ हो जाता है। यह प्रकृति का नियम है, कोई राजनीतिक विचार नहीं।
उपनिषद इस जड़ता को अविद्या कहते हैं। ईशोपनिषद में कहा गया है कि जो परिवर्तनशील जगत को स्थिर मान लेता है, वह सत्य से दूर चला जाता है। जब समाज अपने भीतर परिवर्तन की आवश्यकता को नकार देता है, तब उसका पतन आरंभ होता है। यही कारण है कि केवल शासन बदलने से समाज नहीं बदलता, समाज की चेतना बदले बिना कोई स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता।
हम रामराज्य की बात करते हैं, लेकिन रामराज्य का अर्थ केवल एक आदर्श शासक नहीं है। वाल्मीकि रामायण में राम का मूल्यांकन उनके त्याग, संयम और लोकमंगल के आधार पर होता है, न कि केवल सत्ता के आधार पर। रामराज्य का मूल तत्व समाज का आचरण है। यदि समाज स्वार्थी, भयभीत और अफवाह-प्रेरित होगा, तो रामराज्य केवल नारा बनकर रह जाएगा।
महाभारत (विदुर नीति) में स्पष्ट कहा गया है कि जो अन्याय और असत्य को जानते हुए भी मौन रहता है, वह भी दोषी होता है। लेकिन हिंदू समाज ने मौन को विवेक और पलायन को संतुलन मान लिया। 1947 के विभाजन को हमने नियति कह दिया। भूगोल के सिमटने को भी नियति कह दिया। यह नियतिवाद शास्त्रीय नहीं है, यह मानसिक पराजय है।
हम तभी इस आदर्शवाद के भवसागर से बाहर निकल सकते हैं, जब यथास्थिति को त्यागने का साहस करेंगे। समाजवाद, सेकुलरिज़्म, डेमोक्रेसी, राइट–लेफ्ट, पूँजीवाद—ये सब आधुनिक प्रशासनिक ढाँचे हो सकते हैं, लेकिन ये जीवन-दर्शन नहीं हैं। सनातन परंपरा ने कभी “वाद” नहीं दिए, उसने जीवन-पद्धति दी। धर्म को आचरण से जोड़ा, कर्तव्य को अधिकार से ऊपर रखा, और विकेंद्रीकृत सामाजिक संरचना को प्राथमिकता दी।
पुराणों में बार-बार कहा गया है कि जैसा समाज होगा, वैसा शासक होगा। राजा समाज का प्रतिबिंब होता है, निर्माता नहीं। इसलिए रामराज्य ऊपर से नहीं आता, वह समाज की चेतना से जन्म लेता है। जब व्यक्ति बदलेगा, तभी परिवार बदलेगा। परिवार बदलेगा, तभी समाज बदलेगा। समाज बदलेगा, तभी राष्ट्र बदलेगा।
इतिहास इसका साक्षी है कि जो सभ्यताएँ समय के साथ अपनी मानसिकता नहीं बदल पाईं, वे धीरे-धीरे अपने भूगोल, प्रभाव और पहचान से वंचित होती चली गईं। 83 लाख वर्ग किलोमीटर से 32 लाख वर्ग किलोमीटर तक सिमटना केवल राजनीतिक घटना नहीं थी, वह मानसिक पराजय का परिणाम था। आज भी समय वही प्रश्न हमारे सामने रख रहा है—हिंदू समाज यथास्थिति में जीना चाहता है या ऋत के नियम को स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहता है। मानसिकता बदले बिना कोई भी परिवर्तन टिकता नहीं, और यही सत्य हमारे वेद, उपनिषद, स्मृति और इतिहास—सब एक स्वर में कहते हैं।
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