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यूजीसी के नए नियम और विश्वविद्यालयों का वैचारिक भविष्य



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 


लेफ्ट इको सिस्टम किस प्रकार कार्य करता है, इसे समझने के लिए किसी सैद्धांतिक बहस में उलझने की आवश्यकता नहीं है। यदि बीते पंद्रह–बीस वर्षों की घटनाओं को क्रम से देखा जाए, तो एक साफ़ पैटर्न उभरता है। जिन विषयों को सरकारें सीधे राजनीतिक माध्यम से लागू नहीं कर पातीं, उन्हीं विषयों को पहले न्यायालयीय व्याख्याओं के माध्यम से “संवैधानिक अधिकार” का रूप दिया जाता है। उसके बाद स्वायत्त संस्थाएँ उन व्याख्याओं को नियमों और अधिसूचनाओं में बदल देती हैं। समाज को लगता है कि यह परिवर्तन अचानक हुआ, जबकि वास्तविकता यह होती है कि उसकी वैचारिक और संस्थागत तैयारी वर्षों पहले हो चुकी होती है।
धारा 377 इसका स्पष्ट उदाहरण है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। इसके बाद क्रमशः यह तर्क स्थापित किया गया कि यौनिकता व्यक्ति की पहचान का मूल तत्व है। इसी क्रम में लिव-इन रिलेशनशिप को भी “संवैधानिक संरक्षण” की भाषा में देखा जाने लगा। संसद ने इन विषयों पर कभी व्यापक सामाजिक विमर्श नहीं किया, किंतु न्यायालय की व्याख्याओं और बाद में विभिन्न आयोगों व संस्थानों की सिफ़ारिशों ने एक नई सामाजिक-कानूनी वास्तविकता निर्मित कर दी।
अब यही प्रक्रिया शिक्षा के क्षेत्र में दिखाई दे रही है। जनवरी 2026 में University Grants Commission द्वारा अधिसूचित Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को इसी पृष्ठभूमि में समझना होगा। इसके बाद एक बड़ा वर्ग भावनात्मक प्रतिक्रिया में यह कहता दिखाई दिया कि सरकार ने गलती की है या यह निर्णय सवर्ण-विरोधी है। किंतु यह प्रतिक्रिया अधूरी है। यह अधिसूचना किसी एक सरकार की अचानक की गई पहल नहीं है, बल्कि लगभग एक दशक से चल रही न्यायालयीय प्रक्रिया और संगठित वैचारिक दबावों का परिणाम है।
इस प्रक्रिया की शुरुआत 2016 से मानी जा सकती है, जब हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी रोहित वेमुला की मृत्यु हुई। इसके बाद 2019 में मुंबई के टी.एन. टोपीवाला मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल तड़वी की मृत्यु ने पूरे देश में यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित उत्पीड़न की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता है। इन दोनों घटनाओं को आधार बनाकर 2019 में रोहित वेमुला की माता राधिका वेमुला और पायल तड़वी की माता अबेदा सलीम तड़वी ने Supreme Court of India में याचिकाएँ दायर कीं। इन याचिकाओं में यह तर्क दिया गया कि विश्वविद्यालयों में बने Equal Opportunity Cells केवल काग़ज़ी हैं, शिकायतें दर्ज तो होती हैं लेकिन उनका निस्तारण नहीं होता, और यूजीसी के 2012 के नियम व्यवहार में निष्प्रभावी हैं।
इन मामलों की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जैसिंग और उनसे जुड़े अधिकारवादी विधिक समूहों ने की। इस दौरान पीयूसीएल और एचआरएलएन जैसे मानवाधिकार संगठनों, विश्वविद्यालय-केंद्रित छात्र संगठनों और अकादमिक मंचों ने लगातार यह तर्क आगे बढ़ाया कि जाति-आधारित भेदभाव “व्यक्तिगत व्यवहार” का नहीं, बल्कि “संरचनात्मक समस्या” का परिणाम है। यही अवधारणा बाद में न्यायालयीय टिप्पणियों और यूजीसी के ड्राफ्ट दस्तावेज़ों में स्थान पाती चली गई।
2022 से 2024 के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कई सुनवाइयों में यूजीसी से यह पूछा कि देश के कितने विश्वविद्यालयों में Equal Opportunity Cells वास्तव में सक्रिय हैं, कितनी शिकायतें दर्ज हुईं और उनका निस्तारण किस समय-सीमा में हुआ। यूजीसी द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में यह सामने आया कि अधिकांश केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में या तो ये केंद्र अस्तित्व में नहीं थे, या केवल नाममात्र के लिए थे। किसी भी स्तर पर समेकित राष्ट्रीय डेटा उपलब्ध नहीं था। इसके बाद न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि केवल आरक्षण नीति पर्याप्त नहीं है, संस्थागत निगरानी और जवाबदेही का तंत्र विकसित करना होगा। इसी दबाव में 2025 में यूजीसी ने नए नियमों का मसौदा तैयार किया और 2026 में उसे अधिसूचित कर दिया।
इन नियमों की वैचारिक संरचना को समझना अत्यंत आवश्यक है। यह संरचना है—DEIA: Diversity, Equity, Inclusiveness, Accessibility। यह कोई साधारण प्रशासनिक शब्दावली नहीं है। यह पश्चिमी अकादमिक जगत में विकसित वह दृष्टि है, जिसके तहत समाज को व्यक्ति के कर्म और योग्यता से नहीं, बल्कि उसकी पहचान से देखा जाता है। Diversity यह मानती है कि समाज मूलतः असमान है; Equity यह कहती है कि समान नियम सबके लिए न्यायपूर्ण नहीं हो सकते; Inclusiveness असहमति को नैतिक समस्या में बदल देती है; और Accessibility योग्यता के मानकों को पुनर्परिभाषित करती है।
अमेरिका के विश्वविद्यालयों में इसका प्रभाव दर्ज किया गया है। 2010 के बाद जब वहाँ डाइवर्सिटी ऑफिस और बायस-रिस्पॉन्स तंत्र बनाए गए, तो 2013 से 2021 के बीच केवल कक्षा में बोले गए शब्दों, पाठ्य-सामग्री और ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर हज़ारों औपचारिक शिकायतें दर्ज हुईं। शिकागो विश्वविद्यालय और हार्वर्ड जैसे संस्थानों में प्रोफेसरों ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि वे विवाद से बचने के लिए कुछ विषयों को पढ़ाने से कतराने लगे हैं। शिक्षा का वातावरण मुक्त विमर्श से हटकर सतर्कता और भय की ओर बढ़ा।
भारत में यही ढाँचा अब जाति के माध्यम से लागू किया जा रहा है। पश्चिम में नस्ल केंद्र में थी, यहाँ जाति को केंद्र में रखा गया है। इसके अंतर्गत यह धारणा मज़बूत की जा रही है कि एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय जन्म से शोषित हैं, जबकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जन्म से शोषणकर्ता। किंतु भारत का आर्थिक इतिहास इस सरलीकरण का समर्थन नहीं करता।
आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के आँकड़ों के अनुसार 1700 के आसपास वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 22–23 प्रतिशत थी। यह समृद्धि किसी दरबारी अभिजात वर्ग के कारण नहीं थी। भारत की अर्थव्यवस्था ग्राम-आधारित थी और उसका आधार कुटीर एवं लघु उद्योग थे। बंगाल के बुनकर, दक्षिण भारत के शिल्पकार, पश्चिम भारत के सोनार-बढ़ई-लोहार और उत्तर भारत के कुम्हार-तेली-कृषक समुदाय उत्पादन और व्यापार की रीढ़ थे। आज जिन जातियों को केवल “वंचित” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उन्हीं के हाथों में उस समय भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर था।
इस व्यवस्था को सुनियोजित ढंग से ध्वस्त किया अंग्रेज़ों ने। 18वीं और 19वीं शताब्दी में लगाए गए असमान कर, ब्रिटिश मिलों के सस्ते वस्त्र और भारतीय उत्पादों पर प्रतिबंधों के कारण ढाका, मुर्शिदाबाद, बनारस और सूरत जैसे वैश्विक उत्पादन केंद्र उजड़ गए। लाखों कारीगर बेरोज़गार हुए। स्वतंत्रता के बाद नेहरूवियन समाजवादी आर्थिक मॉडल, लाइसेंस-परमिट राज और भारी उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता ने कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित होने का अवसर नहीं दिया। परिणामस्वरूप भारत का वैश्विक औद्योगिक योगदान 22–23 प्रतिशत से गिरकर लगभग 4.5 प्रतिशत पर आ गया।
इसी अधूरे इतिहास-बोध के साथ पिछले वर्षों में विश्वविद्यालय परिसरों में “ब्राह्मणवाद भारत छोड़ो”, “ब्राह्मणवाद से आजादी”, “भारत तेरे टुकड़े होंगे” और “मूलनिवासी बनाम विदेशी” जैसे विमर्श तेज़ हुए। तब तक इस वैचारिक ज़हर को फैलाने के लिए कोई औपचारिक क़ानूनी ढाँचा नहीं था। अब यूजीसी के नए नियमों ने वह ढाँचा उपलब्ध करा दिया है। Equal Opportunity Centre, Equity Committee और Equity Squads केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं हैं; वे विश्वविद्यालयों के भीतर वैचारिक अनुशासन लागू करने के उपकरण बनते जा रहे हैं। शिक्षक क्या पढ़ाता है, कैसे पढ़ाता है और किस उदाहरण का चयन करता है—यह सब संभावित शिकायत के दायरे में आ सकता है।
इसीलिए इस अधिसूचना को केवल सामाजिक न्याय की भाषा में नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक, आर्थिक और शैक्षणिक परिणामों के संदर्भ में देखना आवश्यक है। प्रश्न किसी एक जाति या वर्ग का नहीं है। प्रश्न यह है कि आने वाले वर्षों में भारतीय विश्वविद्यालय विचार और शोध के केंद्र बने रहेंगे या पहचान-आधारित वैचारिक संघर्ष के मैदान।

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