सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

राष्ट्रऋषि श्रद्धेय श्री कृष्णकुमार अष्ठाना जी को विनम्र श्रद्धांजलि

राष्ट्रऋषि श्रद्धेय श्री कृष्णकुमार अष्ठाना जी को विनम्र श्रद्धांजलि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मालवा प्रांत के पूर्व संघचालक, ‘देवपुत्र’ जैसे राष्ट्रबोधक साहित्य के माध्यम से पीढ़ियों को संस्कारित करने वाले देवपुत्र के पितृपुरुष, वरिष्ठ पत्रकार एवं विद्याभारती मध्य क्षेत्र के पूर्व सचिव श्रद्धेय श्री कृष्णकुमार अष्ठाना जी के देवलोकगमन का समाचार अत्यंत हृदयविदारक है। उनका जाना साहित्य, शिक्षा और राष्ट्रवादी चिंतन के क्षेत्र में एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं।
राष्ट्र, संस्कृति और संस्कार को समर्पित जीवन
श्रद्धेय कृष्णकुमार अष्ठाना जी ने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, संस्कृति, शिक्षा और संस्कार की सेवा में समर्पित कर दिया। वे केवल एक संगठनकर्ता या साहित्यकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसे राष्ट्रसाधक थे जिन्होंने विचार, लेखन और कर्म—तीनों स्तरों पर राष्ट्रनिर्माण का कार्य किया।
पिछले तीन दशकों तक उन्होंने अग्रणी बाल साहित्य पत्रिका देवपुत्र के माध्यम से हिंदी भाषा, भारतीय जीवन-मूल्यों, राष्ट्रप्रेम और चरित्र निर्माण को बालमन तक पहुँचाने का अद्वितीय कार्य किया। देवपुत्र केवल एक पत्रिका नहीं रही, बल्कि वह संस्कारों की पाठशाला बनी, जिसने करोड़ों छात्र-छात्राओं के मन में राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यबोध और सनातन मूल्यों का बीज रोपा।
सरस्वती शिशु मंदिर आंदोलन के सशक्त स्तंभ
विद्याभारती के माध्यम से श्रद्धेय अष्ठाना जी ने सरस्वती शिशु मंदिर आंदोलन को सुदृढ़ करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनके मार्गदर्शन, परिश्रम और दूरदृष्टि से देश के विभिन्न भागों में हजारों शिशु मंदिरों का शुभारंभ हुआ। इन शिक्षण संस्थानों के माध्यम से राष्ट्रनिष्ठ, चरित्रवान, संस्कारित और समाजदायित्व से युक्त नागरिकों की पीढ़ियाँ तैयार हुईं।
वे यह दृढ़ता से मानते थे कि शिक्षा केवल आजीविका अर्जन का साधन नहीं है, बल्कि वह राष्ट्र निर्माण का यज्ञ है—और इस यज्ञ के वे आजीवन यजमान बने रहे।
संघ जीवन: अनुशासन, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा का आदर्श
संघ कार्यकर्ता के रूप में उनका जीवन अनुशासन, त्याग, सादगी और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा का जीवंत उदाहरण था। उनका चिंतन स्पष्ट, लेखन ओजस्वी और संगठन कौशल प्रेरक था। उन्होंने शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन से राष्ट्रसेवा का मार्ग दिखाया।
उनका मार्गदर्शन, विचार और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।
अपूरणीय क्षति, अमिट विरासत
ऐसे तपस्वी, विचारऋषि और राष्ट्रऋषि व्यक्तित्व का देवलोकगमन साहित्यिक, शैक्षिक और राष्ट्रवादी जगत के लिए गहन शोक का विषय है। भले ही उनका भौतिक शरीर हमारे बीच न रहा हो, परंतु उनके विचार, संस्कार और कर्मयोग सदा राष्ट्रजीवन को दिशा देते रहेंगे।
ईश्वर पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिवार, संघ परिवार, विद्याभारती परिवार और उनके असंख्य शिष्यों को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
ॐ शांति:।
महेन्द्र सिंह भदौरिया 
राष्ट्रीय विचारक लेखक 
एक समर्पित स्वयंसेवक 

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