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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
आधुनिक समय में जब भी अर्थशास्त्र की चर्चा होती है, तो सामान्यतः उसका संदर्भ यूरोप की औद्योगिक क्रांति, बाज़ार व्यवस्था, पूँजी और राज्य की आर्थिक नीतियों से जोड़ दिया जाता है। ऐसा मान लिया गया है कि अर्थशास्त्र एक आधुनिक विद्या है, जिसका जन्म पश्चिम में हुआ और वहीं से उसने विश्व के अन्य समाजों में प्रवेश किया। इसी दृष्टि के कारण भारत की आर्थिक परंपरा या तो उपेक्षित रह जाती है, या फिर उसे केवल कौटिल्य तक सीमित कर दिया जाता है।
परंतु भारत की सनातन परंपरा इस धारणा को स्वीकार नहीं करती। यहाँ अर्थशास्त्र कभी अलग-थलग विद्या नहीं रहा। अर्थ को जीवन से काटकर नहीं देखा गया। वह धर्म से जुड़ा रहा, समाज से जुड़ा रहा और राज्य-व्यवस्था से जुड़ा रहा। इसी कारण सनातन परंपरा में अर्थशास्त्र को धर्मशास्त्र और कामशास्त्र से पृथक नहीं किया गया, बल्कि तीनों को जीवन की संयुक्त व्यवस्था के रूप में समझा गया।
परंपरा के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा द्वारा एक विशाल सहिता की रचना की गई, जिसमें जीवन से जुड़े सभी विषय समाहित थे। कालांतर में उसी सहिता से तीन प्रमुख विद्याएँ प्रकट हुईं—धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्र। आचार्य मनु ने धर्मशास्त्र को व्यवस्थित किया, आचार्य बृहस्पति ने अर्थशास्त्र को, और नंदी अथवा उशनस परंपरा ने कामशास्त्र का विस्तार किया। इस दृष्टि से आचार्य बृहस्पति को ही अर्थशास्त्र का आद्य प्रवर्तक माना जाना चाहिए।
प्रसिद्ध अंग्रेज़ी विद्वान ए.बी. कीथ ने अपने शोधग्रंथ A History of Sanskrit Literature में स्पष्ट रूप से लिखा है कि आचार्य बृहस्पति अर्थशास्त्र के प्राचीनतम संस्थापक (Primordial Founder) हैं। यह केवल आधुनिक विद्वानों का मत नहीं है; भारतीय परंपरा स्वयं भी यही स्वीकार करती है। महाभारत में आचार्य बृहस्पति को अर्थशास्त्र और राजशास्त्र का प्राचीनतम प्रवर्तक माना गया है। महाभारत में उशनस (शुक्र) और बृहस्पति—दोनों का उल्लेख राजशास्त्र के निर्माताओं के रूप में प्राप्त होता है। एक अन्य प्रसंग में बृहस्पति, विशालाक्ष (शुक्र), इन्द्र प्राचेतस, मनु, भारद्वाज और गौरशिरा मुनि—इन सभी को राजशास्त्र की परंपरा का वाहक बताया गया है।
यह केवल नामों की सूची नहीं है। यह उस दीर्घ और निरंतर बौद्धिक परंपरा का संकेत है, जिसमें राज्य, समाज और अर्थ को एक साथ समझा गया। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय आर्थिक चिंतन किसी एक व्यक्ति या एक ग्रंथ तक सीमित नहीं रहा।
बाद के काल में जब कौटिल्य का नाम सामने आता है, तो प्रायः यह मान लिया जाता है कि भारतीय अर्थशास्त्र वहीं से आरंभ होता है। किंतु स्वयं कौटिल्य इस धारणा को स्वीकार नहीं करते। अपने अर्थशास्त्र के आरंभ में ही वे शुक्राचार्य और बृहस्पति को नमन करते हैं—
“ॐ नमः शुक्रबृहस्पतिभ्याम्।”
यह नमन औपचारिक नहीं है। यह इस बात की स्वीकृति है कि कौटिल्य से पूर्व भी अर्थशास्त्र की एक समृद्ध और विकसित परंपरा विद्यमान थी। कौटिल्य स्वयं कहते हैं कि पृथ्वी की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए जितने भी पुरातन आचार्यों ने अर्थशास्त्र विषयक ग्रंथों की रचना की, उन सभी का सार संकलित कर उन्होंने अपना ग्रंथ लिखा है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मानव, बार्हस्पत्य, औशनस, पाराशर और आम्भीय—इन पाँच संप्रदायों का उल्लेख मिलता है। इनके अतिरिक्त भारद्वाज, विशालाक्ष, पिशुन, पिशुनपुत्र, कौणपदन्त, वातव्याधि, बाहुदन्तीपुत्र (इन्द्र), कात्यायन, कणिक, दीर्घचारायण, घोटमुख और किंजल्क जैसे अनेक आचार्यों के नाम आते हैं। यह स्पष्ट करता है कि सनातन आर्थिक चिंतन किसी एक व्यक्ति की बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि पीढ़ियों का संचय है।
कामदकीय नीतिसार में नारद, शुक (इन्द्र), बृहस्पति, गार्गव (शुक्र), भारद्वाज, भीष्म, पाराशर, मनु और कौटिल्य—सभी का उल्लेख इस परंपरा के वाहकों के रूप में किया गया है। नीतिप्रकाशिका में ब्रह्मा, महेश्वर, इन्द्र प्राचेतस, मनु, बृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, वेदव्यास और गौरशिरा के नाम आते हैं। बुद्धचरित में मृगु, अंगिरा, शुक्र और बृहस्पति को राजशास्त्र के निर्माता बताया गया है।
पुराणों और स्मृतियों में यह आर्थिक चिंतन और भी व्यापक रूप में मिलता है। अग्निपुराण, गरुड़पुराण, मत्स्यपुराण, मार्कण्डेय पुराण, कालिक पुराण और भागवत पुराण—इन सभी में आर्थिक जीवन से जुड़े विचार प्राप्त होते हैं। मनुस्मृति, बृहद्पाराशर स्मृति, जैन और बौद्ध ग्रंथ, रामायण, महाभारत, वेद तथा कालिदास के काव्य—सभी में अर्थ को जीवन के स्वाभाविक अंग के रूप में देखा गया है।
आचार्य बृहस्पति के अर्थशास्त्र को यदि गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि उनके लिए ‘अर्थ’ केवल धन नहीं था। उनके अर्थ में कृषि, पशुपालन, वाणिज्य, कर-व्यवस्था, राज्यकोष, दण्डनीति और लोक-कल्याण—सभी सम्मिलित थे। वे अर्थशास्त्र के तीन प्रमुख आशय बताते हैं—पहला, वार्ता, अर्थात कृषि, पशुपालन और वाणिज्य से जुड़ी जीविका-व्यवस्था; दूसरा, राज्य-व्यवस्था और दण्डनीति, जिसके बिना अर्थ की रक्षा संभव नहीं; और तीसरा, पृथ्वी की प्राप्ति और संरक्षण, जिसमें पर्यावरण-संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा शामिल है।
बृहस्पति धन के महत्व को स्वीकार करते हैं, किंतु उसे लक्ष्य नहीं बनाते। वे धन को तीन प्रकारों में विभाजित करते हैं—शुक्ल धन, जो विद्या, शौर्य, तप और न्यायपूर्ण कर्म से प्राप्त होता है; शबल धन, जो कृषि, वाणिज्य, शिल्प, शुल्क और कुसीद से प्राप्त होता है; और कृष्ण धन, जो हिंसा, छल और अधर्म से अर्जित होता है। कृष्ण धन को वे समाज के लिए विनाशकारी मानते हैं।
कर-व्यवस्था के विषय में बृहस्पति अत्यंत स्पष्ट हैं। उनका कहना है कि जो राजा केवल कोष बढ़ाने की लालसा में प्रजा पर अत्यधिक कर लगाता है, वह राष्ट्र की उन्नति नहीं करता, बल्कि उसका पतन करता है। कर का उद्देश्य लोकहित होना चाहिए। कृषि कर भूमि, ऋतु और उपज के अनुसार निर्धारित होना चाहिए—छठा, आठवाँ या दसवाँ भाग परिस्थितियों के अनुसार। कर की वसूली छमाही या वार्षिक होनी चाहिए, ताकि किसान पर अनावश्यक भार न पड़े।
वे शुल्क व्यवस्था में भी ईमानदारी और न्याय पर बल देते हैं। चुंगी-स्थलों पर होने वाला अन्याय वे राज्य की प्रतिष्ठा के लिए घातक मानते हैं। मृतक संपत्ति कर के विषय में भी वे स्पष्ट नियम देते हैं, जिससे राज्य और उत्तराधिकारी—दोनों के अधिकार सुरक्षित रहें।
राज्य-व्यवस्था केवल कर से नहीं चलती। इसलिए बृहस्पति और अन्य आचार्य अमात्यों की नियुक्ति को अत्यंत महत्त्व देते हैं। भारद्वाज सहपाठियों को अमात्य बनाने के पक्षधर हैं, जबकि विशालाक्ष इसका विरोध करते हैं। पिशुन राजभक्ति और संकट में उपयोगिता को प्रधान मानते हैं। कौणपदन्त परंपरागत कुलीनता पर बल देते हैं। वातव्याधि नये और अनुशासित अमात्यों को उपयुक्त मानते हैं। बाहुदन्तीपुत्र अनुभव और व्यवहार-कौशल को आवश्यक मानते हैं। इन मतभेदों से स्पष्ट होता है कि सनातन आर्थिक चिंतन संवादात्मक और विवेकशील था, एकरूप नहीं।
मनु सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को कर्तव्य से जोड़ते हैं। पाराशर कलियुग की परिस्थितियों में न्यायपूर्ण धनार्जन और अधर्म से दूरी पर बल देते हैं। शुक्र दण्डनीति को केंद्रीय विद्या मानते हैं। और कौटिल्य इन सभी धाराओं का समन्वय कर शासन को व्यावहारिक रूप प्रदान करते हैं।
इन सभी आचार्यों के विचारों में मतभेद हो सकते हैं, किंतु एक मूल भाव समान है—
अर्थ का उद्देश्य जीवन का संरक्षण है, उसका विघटन नहीं।
यही सनातन आर्थिक चिंतन की आत्मा है।
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