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चोरी की राजनीति और उद्यम के विरुद्ध गढ़ा गया नैरेटिव

✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

इस देश में चोरी की परिभाषा कभी नैतिक नहीं रही।
यहाँ चोर वही होता है, जो सत्ता से बाहर खड़ा होकर अपने परिश्रम, जोखिम और साधनों से कुछ खड़ा करता है।
और जो सत्ता के भीतर बैठकर व्यवस्था को खोखला करता है, वह सम्मानित बना रहता है।
पाँच हज़ार करोड़ रुपये से जुड़े नेशनल हेराल्ड मामले में राहुल गांधी और सोनिया गांधी जमानत पर हैं—यह एक सार्वजनिक तथ्य है। इसके बावजूद सार्वजनिक मंचों पर आम लोग उन्हें चोर नहीं कहते। कहा भी नहीं जाना चाहिए—यह तर्क दिया जाता है कि मामला न्यायालय में है।
लेकिन यही तर्क उसी क्षण गायब हो जाता है, जब वही राहुल गांधी रोज़ सार्वजनिक सभाओं में अडानी और अंबानी को चोर कहते हैं। न कोई न्यायिक निर्णय, न कोई सिद्ध अपराध—केवल आरोप, और उस पर तालियाँ।
कुछ वर्ष पहले “सारे मोदी चोर होते हैं” जैसा वक्तव्य भी दिया गया। बाद में कहा गया कि बात सरनेम की थी। पर उस एक वाक्य ने समाज में जो विष घोला, उसका कोई हिसाब नहीं दिया गया। न माफ़ी, न आत्मालोचना।
यह कोई नई कहानी नहीं है।
1960–1970 के दशक में कम्युनिस्ट और समाजवादी नेता जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के काल में सरकार को “टाटा–बिड़ला की सरकार” कहा करते थे। उस समय सार्वजनिक विमर्श में यह बैठा दिया गया कि टाटा और बिड़ला देश को लूट रहे हैं, वे शोषक हैं, पूँजीपति हैं—अर्थात् चोर हैं।
आज वही भाषा बदलकर “मोदी सरकार नहीं, अडानी–अंबानी सरकार” बन गई है। नाम बदले हैं, पर मानसिकता वही है।
इस देश में नेता कभी चोर नहीं होता।
सरकारी बाबू कभी चोर नहीं होता।
सिविल सेवा, सरकारी कर्मचारी, चपरासी तक—जो फ़ाइल रोककर, नियम उलझाकर, कमीशन लेकर, घुन की तरह देश के संसाधन चाटते हैं—वे भी चोर नहीं कहलाते।
एक फ़ाइल पास कराने के लिए लाखों–करोड़ों की रिश्वत लेने वाला अधिकारी यहाँ “सिस्टम” का हिस्सा माना जाता है, लगभग भगवान की तरह।
लेकिन जो व्यक्ति अपने पैसे से उद्योग लगाता है, जोखिम उठाता है, बैंक से कर्ज़ लेकर समय पर चुकाता है, टैक्स देता है, निर्यात करता है, और प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों लोगों को रोज़गार देता है—वही चोर बन जाता है।
टाटा, बिड़ला, अडानी, अंबानी—सब चोर।
तथ्य यह है कि आज भारत में संगठित क्षेत्र के रोज़गार का लगभग 80% हिस्सा निजी क्षेत्र से आता है। देश में पंजीकृत एमएसएमई इकाइयों की संख्या छह करोड़ से अधिक है, जो लगभग 11 करोड़ लोगों को रोज़गार देती हैं। इन एमएसएमई की रीढ़ बड़े उद्योग और उनकी सप्लाई चेन हैं।
यदि बड़े उद्योग बंद हो जाएँ, तो केवल शेयर बाज़ार नहीं गिरेगा—देश का सामाजिक ढाँचा हिल जाएगा। करोड़ों घरों के चूल्हे ठंडे पड़ जाएँगे। यह कोई विचारधारा नहीं, सीधा आर्थिक यथार्थ है।
अब प्रश्न उठता है—यह मानसिकता बनी कैसे?
इसका उत्तर केवल नेहरूवियन समाजवाद में नहीं, बल्कि उससे पहले की औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों में छिपा है।
अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत विश्व की कुल औद्योगिक उत्पादन क्षमता का लगभग 23–25% हिस्सा रखता था। कपड़ा, धातु, जहाज़, कृषि-उत्पाद, हस्तशिल्प—भारत के परंपरागत उद्योग विश्व-व्यापी थे। इनमें बड़ी संख्या में वही जातियाँ संलग्न थीं, जिन्हें आज पिछड़ा, दलित, शोषित, वंचित कहा जाता है—जुलाहे, लोहार, बढ़ई, कुम्हार, तेली, सुनार, नाई, धोबी, मछुआरे, किसान।
अंग्रेज़ों ने योजनाबद्ध ढंग से इन उद्योगों को नष्ट किया।
हस्तकरघा पर भारी कर लगाए गए।
भारतीय कपड़ों पर प्रतिबंध लगाए गए।
ब्रिटिश मिलों का माल जबरन भारतीय बाज़ारों में उतारा गया।
कच्चा माल भारत से इंग्लैंड भेजा गया और तैयार माल ऊँचे दामों पर भारत में बेचा गया।
परिणाम यह हुआ कि जिन समुदायों के पास पीढ़ियों से कौशल और उद्योग थे, वे मज़दूर बन गए।
स्वतंत्रता तक आते-आते भारत की औद्योगिक हिस्सेदारी घटकर लगभग 2–3% रह गई।
स्वतंत्रता के बाद इन समुदायों को पुनः उद्योग और व्यवसाय में स्थापित करने के बजाय, नेहरूवियन समाजवाद ने राज्य-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया।
लाइसेंस–परमिट राज आया।
निजी उद्योग संदेह के घेरे में आए।
कुटीर और पारंपरिक उद्योगों को संरक्षण देने के बजाय उन्हें बाज़ार के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया।
सरकारी नौकरी को सामाजिक प्रतिष्ठा का एकमात्र मार्ग बना दिया गया।
परिणाम यह हुआ कि जिन जातियों के पास कभी उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र था, वे सरकारी नौकरी की दौड़ में फँस गईं—जहाँ सीटें सीमित थीं और भ्रष्टाचार असीम।
बंगाल, कानपुर, बिहार—जहाँ कभी कपड़ा, चमड़ा, चीनी, इंजीनियरिंग उद्योग फलते-फूलते थे—वहाँ हड़ताल, यूनियन हिंसा और राजनीतिक दबाव से उद्योग बंद हो गए।
बंगाल, जो कभी भारत का औद्योगिक हृदय था, आज पलायन करने वाले राज्यों में है।
यह सब “श्रमिक हित” और “सामाजिक न्याय” के नाम पर हुआ।
इसी बीच एक वैचारिक नैरेटिव गढ़ा गया—
उद्योगपति चोर।
व्यापारी मुनाफ़ाखोर।
बनिया लुटेरा।
ब्राह्मण जन्मजात शोषक।
जबकि सच्चाई यह है कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के सबसे बड़े सामाजिक सुधार आंदोलन—महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, वीर सावरकर, डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिव गोलवलकर—इसी समाज से निकले।
सावरकर, जो स्वयं चितपावन ब्राह्मण थे, ने रत्नागिरी में अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रत्यक्ष आंदोलन चलाया। मंदिर, जलस्रोत, भोजन—सबके लिए खोले।
संघ और उससे जुड़े सेवा संगठनों—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, विद्या भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम—ने बिना सत्ता, बिना प्रचार, बिना धन-लाभ के सामाजिक समरसता का कार्य किया।
आज भी लाखों लोग तन–मन–धन से समाज को जोड़ने में लगे हैं।
पर उन्हें सम्मान नहीं, गालियाँ मिलती हैं।
यह समाज अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है।
उद्यम को गाली देता है।
बुद्धिजीवी को गाली देता है।
फिर पूछता है—हम चीन और अमेरिका से पीछे क्यों हैं?
उत्तर कठोर है, लेकिन सत्य है।
हम अपनी मानसिक जंजीरों के कारण पीछे हैं।
और जब तक हम श्रम, कौशल, उद्यम, और परंपरागत शक्ति का सम्मान करना नहीं सीखेंगे—
तब तक हम पीछे भी रहेंगे, और आगे भी नहीं बढ़ पाएँगे।

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