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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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आज सोने और चाँदी की कीमतें जिस गति से बढ़ रही हैं, उसे केवल बाज़ार की हलचल या त्योहारी माँग कहकर नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे एक गहरी और असहज सच्चाई है—दुनिया का भरोसा उस व्यवस्था से उठ रहा है, जो पूरी तरह डॉलर और काग़ज़ी मुद्रा पर टिकी हुई थी।
बीते वर्षों में जो घटनाएँ हुईं, उन्होंने इस भरोसे को गंभीर रूप से झकझोर दिया। जब रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका व उसके सहयोगी देशों ने रूस के लगभग तीन सौ अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज़ कर दिया, तब पहली बार यह साफ़ दिखा कि विदेशी मुद्रा भंडार भी संकट में सुरक्षित नहीं रहते। वेनेज़ुएला का उदाहरण भी इसी दिशा में इशारा करता है। वहाँ कोई प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण नहीं हुआ, लेकिन वर्षों से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंधों, विदेशी परिसंपत्तियों की जब्ती और डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली से बहिष्कार ने देश को लगभग पंगु कर दिया। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार होने के बावजूद वेनेज़ुएला अपने संसाधनों—जिनका मूल्य 15 से 20 ट्रिलियन डॉलर आँका जाता है—का स्वतंत्र उपयोग नहीं कर सका।
इन घटनाओं के बाद दुनिया के कई देशों ने यह सवाल खुद से पूछा—यदि डॉलर ही हथियार बन जाए, तो सुरक्षा कहाँ है? यहीं से सोने की ओर वापसी शुरू होती है। आज अमेरिका के पास आठ हज़ार टन से अधिक सोना है, जर्मनी, फ्रांस, इटली और रूस के पास दो हज़ार टन से ऊपर। चीन भी लगातार सोना खरीद रहा है। इसके विपरीत भारत के पास लगभग 880 टन सोना है, जबकि हमारा लगभग 85–86 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर और डॉलर आधारित परिसंपत्तियों में रखा है।
यहीं भारत की कमजोरी उजागर होती है। यदि कभी भारत पर भी रूस जैसी आर्थिक पाबंदियाँ लगें, तो इतनी अधिक डॉलर निर्भरता देश को गहरे संकट में डाल सकती है। इसलिए यह केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है कि भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार का कम से कम 30–40 प्रतिशत हिस्सा सोने में रखे। आदर्श स्थिति में यह अनुपात 50 प्रतिशत होना चाहिए। इसका अर्थ है कि भारत को आने वाले वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार को 880 टन से बढ़ाकर लगभग तीन हज़ार टन तक ले जाना होगा।
अब बात केवल सोने की नहीं है। चाँदी की कीमतें भी इसी कारण नहीं, बल्कि कुछ अलग कारणों से तेज़ी से बढ़ रही हैं।
चाँदी आज केवल निवेश धातु नहीं रही। वह आधुनिक उद्योग की रीढ़ बन चुकी है। सौर ऊर्जा पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, 5G नेटवर्क, चिकित्सा उपकरण और रक्षा तकनीक—इन सबमें चाँदी अनिवार्य है। हर सोलर पैनल में चाँदी का उपयोग होता है, और जैसे-जैसे दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, चाँदी की औद्योगिक माँग तेज़ी से बढ़ रही है। दूसरी ओर, चाँदी का खनन सीमित है और नई खदानें तेज़ी से विकसित नहीं हो पा रही हैं। यही कारण है कि माँग और आपूर्ति के बीच बढ़ता अंतर चाँदी की कीमतों को ऊपर धकेल रहा है। इसी पृष्ठभूमि में कई विश्लेषक 2026 तक चाँदी के तीन लाख रुपये प्रति किलो तक पहुँचने की संभावना जता रहे हैं
गोल्ड स्टैंडर्ड की अवधारणा को समझे बिना आज सोने की बढ़ती माँग को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ स्वर्ण-आधारित मौद्रिक प्रणाली पर चलती थीं। इस व्यवस्था में प्रत्येक देश की मुद्रा एक निश्चित मात्रा के स्वर्ण से जुड़ी होती थी। केंद्रीय बैंक जितनी मुद्रा जारी करता था, उसके बदले उसके पास उतने ही अनुपात में स्वर्ण भंडार होना अनिवार्य था। इससे मुद्रा की आपूर्ति पर एक स्वाभाविक नियंत्रण बना रहता था और सरकारें या बैंक अपनी इच्छा से असीमित नोट नहीं छाप सकते थे।
गोल्ड स्टैंडर्ड के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी स्थिरता बनी रहती थी। विभिन्न देशों की मुद्राओं के विनिमय मूल्य स्वर्ण की मात्रा के आधार पर तय होते थे, जिससे विनिमय दरों में अचानक और अनियंत्रित उतार–चढ़ाव नहीं होता था। इसके परिणामस्वरूप व्यापारिक संतुलन अपेक्षाकृत स्थिर रहता था और दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहन मिलता था। इसी काल में वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत सीमित रही और ऋण का विस्तार नियंत्रित दायरे में बना रहा।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध खर्चों को पूरा करने के लिए कई देशों ने गोल्ड स्टैंडर्ड को अस्थायी रूप से शिथिल किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के अंतर्गत एक नई व्यवस्था बनाई गई, जिसमें डॉलर को स्वर्ण से जोड़ा गया और अन्य मुद्राओं को डॉलर से। यह व्यवस्था भी अंततः टिक नहीं सकी। 1971 में अमेरिका ने डॉलर को स्वर्ण से पूरी तरह अलग कर दिया, जिसे आधुनिक फ़िएट करेंसी प्रणाली की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। इसके बाद मुद्रा निर्गम का सीधा संबंध किसी ठोस संपत्ति से समाप्त हो गया।
फ़िएट करेंसी व्यवस्था में सरकारें और केंद्रीय बैंक आवश्यकता या नीति के आधार पर मुद्रा जारी कर सकते हैं। इससे अल्पकालिक रूप से आर्थिक गतिविधि को गति तो मिलती है, लेकिन दीर्घकाल में इसके दुष्परिणाम सामने आते हैं। अत्यधिक मुद्रा निर्गम से मुद्रास्फीति बढ़ती है, ऋण आधारित अर्थव्यवस्था फैलती है और परिसंपत्ति मूल्यों में असंतुलन पैदा होता है। पिछले पाँच दशकों में वैश्विक स्तर पर बढ़ता सार्वजनिक ऋण, वित्तीय संकटों की आवृत्ति और संपत्ति का सीमित हाथों में सिमटना इसी प्रक्रिया के परिणाम माने जाते हैं।
आज जब कई देश डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को अस्थिर मानने लगे हैं, तो गोल्ड स्टैंडर्ड या स्वर्ण-समर्थित मुद्रा की चर्चा फिर से इसलिए लौट रही है क्योंकि यह मुद्रा आपूर्ति पर अनुशासन लगाने का एक व्यावहारिक तरीका प्रदान करती है। केंद्रीय बैंक जब अपने स्वर्ण भंडार बढ़ाते हैं, तो उसका उद्देश्य केवल मूल्य संरक्षण नहीं होता, बल्कि भविष्य की मौद्रिक अनिश्चितताओं से सुरक्षा भी होता है। इसी संदर्भ में सोना आज केवल निवेश साधन नहीं, बल्कि मौद्रिक विश्वसनीयता का आधार बनकर उभर रहा है।
सोने और चाँदी दोनों की यह बढ़त अंततः हमें एक पुराने, लेकिन आज फिर प्रासंगिक प्रश्न तक ले जाती है—गोल्ड स्टैंडर्ड। एक समय था जब मुद्रा का आधार स्वर्ण हुआ करता था। हर नोट के पीछे सोने की गारंटी होती थी, इसलिए न तो अनियंत्रित नोट छप सकते थे और न ही बेलगाम ऋण दिया जा सकता था। गोल्ड स्टैंडर्ड के समाप्त होते ही फ़िएट करेंसी आई, ऋण आधारित अर्थव्यवस्था फैली और उपभोक्तावाद हावी हो गया। आज जो मुद्रास्फीति, कर्ज़ और असमानता दिखती है, उसकी जड़ें यहीं हैं।
आँकड़े भी यही दिखाते हैं। वर्ष 2000 में सोना ₹4,400 प्रति 10 ग्राम था, 2010 में ₹20,728, 2020 में ₹50,151, और आज ₹1,00,000 के आसपास है। पिछले 20 वर्षों में केवल चार साल ऐसे रहे जब सोने की कीमतें घटीं, और वह गिरावट भी सीमित रही। यदि कोई निवेशक आज ₹10 लाख का गोल्ड बॉन्ड लेता है और औसतन 10% वार्षिक चक्रवृद्धि मानें, तो 20 वर्षों में उसकी कीमत ₹65–70 लाख के आसपास पहुँच सकती है।
भारत के लिए यह सोच कोई नई नहीं है। हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज ने अपनी बचत को सोने और चाँदी में सुरक्षित रखा। आज भी अनुमान है कि भारतीय घरों और मंदिरों में 25 से 30 हज़ार टन सोना मौजूद है। सत्ता बदली, शासन बदले, लेकिन यह आदत नहीं बदली—क्योंकि अनुभव ने सिखाया कि असली मूल्य धातु में टिकता है।
इन सब बातों को जोड़कर देखें तो मामला केवल निवेश का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि हम अपनी बचत और सुरक्षा को किस आधार पर टिकाना चाहते हैं। जब काग़ज़ी मुद्रा राजनीतिक दबाव में अस्थिर हो सकती है, जब विदेशी मुद्रा भंडार तक सुरक्षित नहीं रह जाते, तब लोग स्वाभाविक रूप से उन चीज़ों की ओर लौटते हैं जिनका मूल्य सत्ता या नीतियों से तय नहीं होता। भारत में सोना और चाँदी सदियों से इसी कारण बचत का आधार रहे हैं। आज की स्थिति में भी यही व्यवहारिक समझ काम आती है। न शेयर बाज़ार की रोज़ की उठापटक, न कर्ज़ पर टिकी योजनाएँ—बल्कि धीरे-धीरे, धैर्य के साथ, वास्तविक संपत्ति में बचत। शायद इसी वजह से, बदलती दुनिया में सोना और चाँदी फिर से केवल धातु नहीं, बल्कि भरोसे का साधन बनते जा रहे हैं।
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