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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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🖋️कैलाश चंद्र
हाथी के मुँह के गन्ने चुहे खाना चाहते है।
न्यूयॉर्क सिटी के नवीन मेयर जोहरान ममदानी द्वारा यूएपीए के तहत 2020 से जेल में बंद उमर खालिद के प्रति दिखाई गई “एकजुटता” ने न केवल अमेरिका की राजनीति में अनावश्यक दखलंदाजी का नया अध्याय खोला है, बल्कि भारत की संप्रभु न्याय-व्यवस्था पर सवाल उठाने की एक संगठित प्रवृत्ति को भी उजागर किया है। अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद जिम मैकगवर्न और जेमी रस्किन जैसे नेताओं का भी इस अभियान में शामिल होना बताता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा नैरेटिव गढ़ने की कोशिश लगातार चल रही है जिसमें भारतीय कानून, भारतीय न्यायपालिका और भारतीय सुरक्षा संस्थानों को कटघरे में खड़ा किया जा सके। यह वही मानसिकता है जो भारत में सक्रिय कुछ “टुकड़े-टुकड़े” समूहों को नैतिक वैधता प्रदान करने की कोशिश करती है।
उमर खालिद की पार्टनर बनज्योत्सना लाहिड़ी द्वारा मेयर ममदानी के संदेश को सोशल मीडिया पर प्रचारित करने के बाद देश में अपेक्षित प्रतिक्रिया शुरू हुई। पांच वर्ष से अधिक समय से दिल्ली दंगों के गंभीर आरोपों में जेल में बंद एक आरोपी के लिए विदेशी नेताओं का यह “सहानुभूति पत्र” किसी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान नहीं, बल्कि स्पष्ट राजनीतिक दखल है। यह वही उमर खालिद है जो उस दौर का प्रतिनिधि चेहरा था जब भारत के भीतर खुले मंचों से “भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगाए गए। राष्ट्रविरोधी अभियान का हिस्सा बनते वक्त शायद इन्हें यह स्मरण नहीं रहा कि कानून, न्यायालय, और संविधान इन्हीं नीतियों का प्रतिफल है जिनका ये खुले तौर पर विरोध कर रहे थे। फूलों की माला पहनकर क्रांति का नशा चढ़ाने वाले इन लोगों को अब हाथ में हथकड़ी देखकर बेचैनी हो रही है, जबकि इन्हें चिंता इस बात की होनी चाहिए थी कि ऐसे अभियानों का परिणाम किसी भी राष्ट्र में कितना कठोर होता है।
भारतीय कानून तो फिर भी अत्यधिक उदार है—अदालतें छुट्टी के दिन आधी रात को भी सुनवाई कर देती हैं; बड़े-बड़े वकील अपराधियों का “मानव अधिकार” लेकर खड़े हो जाते हैं; जमानत की असीम संभावनाएँ उपलब्ध रहती हैं। फिर भी यदि इस उदार व्यवस्था को “तानाशाही” कहकर वैश्विक मंचों पर बदनाम किया जाए, तो यह केवल तथ्यहीन आलोचना नहीं बल्कि भारत-विरोधी अभियान का हिस्सा लगता है। ऐसी ही हरकतें यदि किसी मुस्लिम राष्ट्र में की जाएँ—वहाँ की सत्ता को चुनौती दी जाए, विभाजन के नारे लगाए जाएँ, सरकार को उखाड़ फेंकने की बात कही जाए—तो दुनिया जानती है कि परिणाम कितना निर्मम होता है। वहाँ न आधी रात को कोर्ट खुलता है, न मानवाधिकार का ढोल पीटा जाता है, न आरोपी को राजनीतिक नायक बनाया जाता है।
भारत के भीतर यह भी एक विचित्र प्रवृत्ति है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त व्यक्ति अपने आपको किसी विशेष धर्म का “पीड़ित” बताकर विक्टिम कार्ड खेलते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इस देश में मुसलमान राष्ट्रपति बने हैं, मुख्यमंत्री बने हैं, राज्यपाल, कुलपति, न्यायाधीश, वैज्ञानिक, सैन्य अधिकारी, पुलिस अधिकारी, क्रिकेट टीम के कप्तान, लेखक, फिल्म निर्माता—हर क्षेत्र में योग्यता के आधार पर शीर्ष स्थान प्राप्त करते रहे हैं। यदि यह देश “दमनकारी” होता, तो क्या यह संभव होता? यह राष्ट्र हर नागरिक को अवसर देता है—जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र किसी भी आधार पर भेदभाव किए बिना।
इसलिए राष्ट्रविरोध के प्रश्न को “मुस्लिम” या किसी अन्य समुदाय के चश्मे से देखना ही गलत है। राष्ट्रविरोध सिर्फ एक ही श्रेणी का अपराध है—और अपराधी चाहे किसी भी जाति, पंथ, धर्म, विचारधारा, विश्वविद्यालय या राजनीतिक समूह से हो—सजा सिर्फ कठोरतम होनी चाहिए। एक राष्ट्र की अस्मिता, उसकी अखंडता और उसका स्वाभिमान सर्वोपरि होते हैं। यदि इन पर प्रहार करने वालों को दंडित करने में राष्ट्र हिचकिचाने लगे तो वह राष्ट्र मृत कहा जाएगा—उसकी सरकार कमजोर मानी जाएगी, उसका कानून निष्प्रभावी मान लिया जाएगा, उसके न्यायालय बेबस प्रतीत होंगे, और उसकी जनता नपुंसक समझी जाएगी। ऐसा देश विश्व मंच पर सम्मान नहीं, उपहास का पात्र बनता है।
इसलिए भारत की न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए, और विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेपों द्वारा भारतीय कानून को चुनौती देने की यह श्रृंखला समाप्त होनी चाहिए। राष्ट्र किसी व्यक्ति-विशेष की सहानुभूति पर नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और सुरक्षा पर खड़ा रहता है—और कोई भी अभियान, कोई भी नारा, कोई भी अंतरराष्ट्रीय प्रायोजक इस बुनियाद को कमजोर करने की अनुमति नहीं पा सकता।
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