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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
जब हम भारतीय समाज की बात करते हैं, तो अक्सर मुझे लगता है कि हम अपने ही घर को बाहर खड़े होकर देखने की कोशिश कर रहे हैं। हम उसकी दीवारों, खिड़कियों और छत पर तो बहस कर लेते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पाते कि वह घर इतने तूफ़ानों के बाद भी खड़ा कैसे है। शायद इसलिए, क्योंकि हमने भारतीय समाज को उसके स्वभाव और उसकी आदतों के साथ देखने का अभ्यास ही नहीं किया।
मैंने विश्वविद्यालयों में पढ़े युवाओं से भी यही सुना है—कि अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत कोई देश नहीं था, कोई व्यवस्था नहीं थी। यह बात वे पूरी सहजता से कहते हैं, मानो यह कोई स्थापित सत्य हो। लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि फिर अंग्रेज़ यहाँ आए क्यों, तो कोई उत्तर नहीं मिलता। कोई भी साम्राज्य हज़ारों मील दूर इसलिए नहीं जाता कि वहाँ कुछ नहीं है। वह वहाँ जाता है, जहाँ बहुत कुछ है।
इतिहास पढ़ते-पढ़ते यह साफ़ हो जाता है कि अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में था। यह कोई राष्ट्रवादी दावा नहीं है। एंगस मैडिसन जैसे आर्थिक इतिहासकारों के आँकड़े बताते हैं कि उस समय वैश्विक उत्पादन का लगभग एक-चौथाई हिस्सा भारत से आता था। बंगाल का कपड़ा यूरोप में बिकता था, दक्षिण भारत के बंदरगाहों से मसाले और धातुएँ जाती थीं, और पश्चिमी तट के व्यापारी अफ्रीका और अरब तक जाने-पहचाने नाम थे। यह सब किसी पाठ्यपुस्तक से नहीं, बल्कि व्यापारिक अभिलेखों और यात्रियों के वर्णनों से सामने आता है।
अंग्रेज़ यहाँ व्यापार के लिए आए थे। शासन तब शुरू हुआ, जब उन्होंने देखा कि इस समाज की आर्थिक नसें काटकर अपार संपत्ति बाहर भेजी जा सकती है। धीरे-धीरे कर-प्रणाली बदली गई, कारीगर तबाह हुए, और किसान नक़द कर के जाल में फँसते चले गए। आज जब कहा जाता है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से 40–45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले जाई गई, तो यह कोई भावनात्मक संख्या नहीं लगती, बल्कि उस लम्बी प्रक्रिया का हिसाब लगती है, जिसमें भारत गरीब होता गया और पश्चिम समृद्ध।
इसके बावजूद भारत पूरी तरह नहीं टूटा। यह बात मैंने गाँवों में, कस्बों में और तीर्थों पर जाकर महसूस की है। सत्ता बदलती रही, झंडे बदलते रहे, लेकिन परिवार की संरचना, पूजा-पाठ, मेलों और परंपराओं की लय नहीं टूटी। अगर कोई सभ्यता इतनी लंबी मार के बाद भी अपने रोज़मर्रा के जीवन को बचा लेती है, तो उसमें कोई गहरी आंतरिक शक्ति होती है।
फिर सवाल उठता है कि हम पराजित कैसे हुए। इसका उत्तर केवल तलवार या बंदूक में नहीं मिलता। महाभारत युद्ध के बाद समाज में जो थकान आई, वह केवल राजाओं की नहीं थी। वह पूरे समाज की थी। धीरे-धीरे सैन्य तैयारी, अस्त्र-शस्त्र निर्माण और रणनीतिक सोच से ध्यान हटता गया। ज्ञान रहा, दर्शन रहा, लेकिन शक्ति-संतुलन की समझ कम होती चली गई। मौर्य काल के बाद जब अवैदिक मतों को राजसत्ता का संरक्षण मिला, तो समाज का संतुलन और बदला। अहिंसा को जीवन का एकमात्र मूल्य मान लिया गया। अहिंसा अपने आप में दोष नहीं है, लेकिन जब आत्मरक्षा भी अनुचित लगने लगे, तो समाज कमज़ोर पड़ता है।
बप्पा रावल जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि जब नेतृत्व स्पष्ट होता है, तो समाज खड़ा होता है। उनके बाद समस्या यह नहीं रही कि आक्रमणकारी अपराजेय थे, बल्कि यह रही कि समाज को एक साझा लक्ष्य में बाँधने वाली नेतृत्व-परंपरा टूट गई। इसके बावजूद संघर्ष रुका नहीं। शायद यही कारण है कि जब इस्लाम दुनिया के बड़े हिस्से में फैल चुका था, तब भी भारत में लगभग हज़ार वर्षों के शासन और आक्रमणों के बाद कुल मतांतरण 10–15 प्रतिशत के भीतर ही रहा। अंग्रेज़ों के समय ईसाई मतांतरण भी लगभग 1 प्रतिशत तक सीमित रहा।
इतिहास को केवल घटनाओं की सूची की तरह पढ़ने से बात समझ में नहीं आती। सभ्यताओं का अंत कैसे होता है, यह तब स्पष्ट होता है जब हम यह देखते हैं कि किसी क्षेत्र में आज क्या बचा है और क्या पूरी तरह लुप्त हो गया। इस दृष्टि से देखें तो इस्लाम, क्रिश्चियनिटी और वामपंथ—तीनों ने अलग-अलग समय में दुनिया की कई विकसित सभ्यताओं को निगल लिया। यह निगलना अचानक नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे हुआ—पहले सत्ता बदली, फिर शिक्षा बदली, फिर स्मृति बदली, और अंत में समाज स्वयं को ही भूल गया।
इस्लाम का राजनीतिक और सैन्य विस्तार सातवीं शताब्दी से शुरू हुआ। फारस, जो कभी जरथुस्त्री दर्शन, विज्ञान और प्रशासन का केंद्र था, इस्लामी विजयों के बाद अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान खो बैठा। आज ईरान में फारसी भाषा तो है, लेकिन फारसी सभ्यता का जीवन-दर्शन नहीं है। मिस्र की सभ्यता, जो लगभग पाँच हज़ार वर्षों तक चली, इस्लामी शासन के बाद केवल स्मारकों तक सिमट गई। मेसोपोटामिया—जिसे मानव सभ्यता की जननी कहा जाता है—आज अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान से पूरी तरह कट चुका है। मध्य एशिया में गांधार और बामियान जैसी बौद्ध परंपराएँ या तो नष्ट कर दी गईं या इतिहास की किताबों तक सीमित रह गईं।
मध्यकाल में जनगणना नहीं होती थी, इसलिए सटीक संख्या बताना कठिन है, लेकिन आधुनिक इतिहासकारों—जैसे विल ड्यूरैंट और अन्य—के आकलन के अनुसार इस्लामी विस्तार से जुड़े युद्धों, नरसंहारों, दास-व्यापार और जबरन धर्मांतरण के कारण कई शताब्दियों में अनुमानतः 6 से 8 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। यहाँ संख्या से अधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है—जहाँ इस्लाम स्थायी सत्ता बना, वहाँ स्थानीय सभ्यताएँ जीवित नहीं रहीं।
क्रिश्चियनिटी का विनाशकारी स्वरूप तब सामने आया, जब वह औपनिवेशिक सत्ता के साथ जुड़ी। पंद्रहवीं शताब्दी के बाद यूरोपीय साम्राज्यों ने लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में जो किया, उसके प्रमाण आज भी वहाँ की जनसंख्या संरचना में दिखते हैं। केवल अमेरिका महाद्वीप में—स्पेनिश और पुर्तगाली विजय के बाद—माया, इंका और एज़्टेक जैसी उन्नत सभ्यताएँ लगभग पूरी तरह नष्ट हो गईं। इतिहासकारों का अनुमान है कि यूरोपीय आक्रमण, बीमारियों और जबरन धर्मांतरण के कारण लगभग 5 से 6 करोड़ मूल निवासियों की मृत्यु हुई। उत्तर अमेरिका के रेड इंडियन समाज, अफ्रीका की जनजातीय परंपराएँ और ऑस्ट्रेलिया के एबोरिजिनल समाज—इन सभी की सभ्यताएँ आज जीवित नहीं, केवल संग्रहालयों में दर्ज हैं।
वामपंथ ने यह काम तलवार या धर्म के नाम पर नहीं किया, बल्कि “विज्ञान” और “समता” के नाम पर किया। बीसवीं शताब्दी में सोवियत संघ, माओ के चीन, पोल पॉट के कंबोडिया और पूर्वी यूरोप में जो हुआ, उसके आँकड़े आज छिपे नहीं हैं। विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों—जैसे The Black Book of Communism—के अनुसार वामपंथी शासन और प्रयोगों में लगभग 8 से 10 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। इनमें युद्ध से अधिक मौतें योजनाबद्ध अकाल, श्रम शिविर, सामूहिक दमन और वैचारिक शुद्धिकरण के कारण हुईं। इसके बावजूद भारत में इन्हीं विचारों को अकादमिक पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं में “समाज सुधारक विचार” के रूप में पढ़ाया जाता है, उनके परिणामों का उल्लेख किए बिना।
अब सवाल यह नहीं है कि भारत पर आक्रमण हुए या नहीं।
आक्रमण तो हुए—और लंबे समय तक हुए।
यह भी कोई रहस्य नहीं है कि यहाँ इस्लामी सत्ता लगभग हज़ार वर्षों तक रही और अंग्रेज़ों का शासन दो सौ वर्षों तक चला।
स्वतंत्रता के बाद वैचारिक रूप से वामपंथ को भी व्यापक स्थान मिला।
इन तथ्यों को नकारने से कुछ नहीं बदलता।
असल सवाल यह है कि इन सबके बावजूद भारत का समाज टूटा क्यों नहीं।
दुनिया के कई हिस्सों में ऐसा हुआ कि सत्ता बदली और समाज भी साथ-साथ बदल गया।
फारस में सत्ता बदली तो वहाँ की धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन-पद्धति भी समाप्त हो गई।
लैटिन अमेरिका में सत्ता बदली तो माया, इंका और एज़्टेक सभ्यताएँ कुछ ही पीढ़ियों में इतिहास बन गईं।
वहाँ लोग रहे, लेकिन सभ्यता नहीं रही।
भारत में ऐसा नहीं हुआ।
यहाँ शासन बदला, लेकिन लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी उसी ढर्रे पर चलती रही।
राजा बदले, दरबार बदले, लेकिन परिवार की संरचना नहीं बदली।
मंदिर तोड़े गए, लेकिन घरों में पूजा का क्रम नहीं टूटा।
शासन ने कर वसूले, लेकिन त्योहार नहीं छीन पाए।
यही कारण है कि इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद भी मतांतरण सीमित रहा।
इतिहासकारों के अनुमान बताते हैं कि लगभग हज़ार वर्षों के इस्लामी शासन के बाद भी भारत में मतांतरण 10–15 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ सका।
अंग्रेज़ी शासन के दौरान ईसाई मतांतरण लगभग 1 प्रतिशत तक सीमित रहा।
इसके उलट, स्वतंत्रता के बाद कुछ क्षेत्रों में मतांतरण का अनुपात तेज़ी से बढ़ा—यह संकेत देता है कि सबसे बड़ा झटका बाहर से नहीं, भीतर की वैचारिक उलझन से आया।
फिर भी, आज भारत में करोड़ों लोग वही जीवन-पद्धति जीते दिखाई देते हैं, जिसे उनके पूर्वज जीते थे।
लगभग 80 करोड़ लोग स्वयं को धर्मनिष्ठ हिंदू मानते हैं—यह कोई सरकारी दावा नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता है ।
पिछले वर्ष प्रयागराज के महाकुंभ में लगभग 67 करोड़ लोग स्नान के लिए पहुँचे। किसी ने बुलाया नहीं था, कोई निर्देश नहीं था। लोग अपने विश्वास से आए। यह किसी आयोजन का नहीं, बल्कि उस परंपरा का प्रमाण था जो अब भी समाज के भीतर चल रही है।
भारत इसलिए नहीं बचा कि यहाँ कोई एक विचार हमेशा सही रहा।
भारत इसलिए भी नहीं बचा कि यहाँ सब कुछ आदर्श था।
भारत इसलिए बचा क्योंकि यहाँ जीवन किसी एक सत्ता या संस्था के निर्देश पर नहीं चलता था।
यहाँ धर्म किसी किताब का नाम नहीं था।
धर्म किसी आदेश या मत का नाम भी नहीं था।
धर्म वह तरीका था, जिससे लोग जीते थे—
कैसे जन्म होता है,
कैसे विवाह होता है,
कैसे मृत्यु को स्वीकार किया जाता है,
और कैसे पीढ़ियाँ आगे बढ़ती हैं।
इसी कारण भारत की सभ्यता सत्ता के गिरने से नहीं गिरी।
क्योंकि उसकी नींव सत्ता में नहीं, समाज में थी।
और जब तक जीवन का यह ढंग बना रहेगा—
न पूरी तरह बदला हुआ,
न पूरी तरह जड़—
तब तक भारत केवल नक़्शे पर नहीं,
समाज के रूप में भी बना रहेगा।
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