सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भारत में विफल वामपंथी विचारकों के लिए अमेरिका में जमीन तैयार

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💥न्यूयॉर्क टाइम्स के माध्यम से वैचारिक घेराबंदी का वैश्विक संचालन

The New York Times (NYT) में प्रकाशित विस्तृत रिपोर्ट मिलकर एक महत्त्वपूर्ण संकेत देती हैं - भारत के भीतर राजनीतिक वामपंथ की वैचारिक पराजय के बाद, वैश्विक लिबरल मीडिया उसे पुनर्जीवित करने का प्रयत्न कर रहा है। यह प्रयास प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि भारत को एक “ध्रुवीकृत”, “हिंदू राष्ट्रवादी”, “सत्तावादी” देश के रूप में चित्रित करके किया जा रहा है, ताकि भारत के अंदर कमजोर होते वामपंथ को अंतरराष्ट्रीय वैधता, नैतिक समर्थन और बौद्धिक जमीन उपलब्ध कराई जा सके।
NYT की रिपोर्ट “From the Shadows to Power: How the Hindu Right Rose to Remake India” में RSS को “far-right Hindu nationalist” शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। मोदी सरकार को एक ऐसे राजनीतिक ढाँचे का नेतृत्वकर्ता बताया गया है, जो कथित रूप से संस्थाओं को प्रभावित कर “हिंदू भारत” की परिकल्पना को मूर्त रूप दे रहा है। भारत में संघ समर्थक इसे “वैचारिक हमले” का उदाहरण बताया है और संकेत दिया कि भारत में जिन मार्क्सवादी धारणाओं और बुद्धिजीवियों को व्यापक जन-समर्थन नहीं मिला, उनके लिए अब अंतरराष्ट्रीय मंचों से जमीन तैयार की जा रही है।
इस लेख में इसी बहुआयामी घटना का विश्लेषण प्रस्तुत है- NYT की रिपोर्ट के राजनीतिक-सांस्कृतिक संकेत, भारत में वामपंथ के पतन की पृष्ठभूमि, वैश्विक मीडिया-पर्यावरण की संरचना, अमेरिकी नीति-परिप्रेक्ष्य, और भारत के उभरते “सिविलाइज़ेशनल नेशन” के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय वैचारिक प्रतिस्पर्धा।

💥NYT रिपोर्ट: भारत पर वैचारिक आक्रमण का तीर
NYT की रिपोर्ट का उद्देश्य केवल RSS या मोदी सरकार की आलोचना नहीं है - यह भारत की वैचारिक दिशा को प्रभावित करने का प्रयत्न है। रिपोर्ट की भाषा, उदाहरणों का चयन, और संस्थागत “infiltration” का आरोप वही परंपरागत ढाँचा है, जो CIA कालीन शीतयुद्ध में समाजवादी देशों पर इस्तेमाल होता था।
रिपोर्ट की मुख्य बातें:
• RSS को “behind-the-scenes power” बताया गया।
• 100 वर्ष पूरे होने को “वैचारिक विस्तार” का अवसर कहा गया।
• PM मोदी को “RSS का उत्पाद” बताकर उनकी नीतियों को संघ का विस्तार बताया गया।
• Sciences Po के शोध का उल्लेख, जिसमें 2,500 RSS-संबद्ध संगठनों को संस्थागत प्रभाव का प्रमाण बताया गया।
• अयोध्या राम मंदिर, अनुच्छेद 370, और योगी सरकार की नीतियों को “माइनॉरिटी-नेगेटिव” चित्रित किया गया।
• भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण को “धार्मिक उग्रता” का नाम दिया गया।
इन बिंदुओं में एक व्यापक रणनीति छिपी है- भारतीय राजनीतिक विमर्श को इस तरह फ्रेम किया जाए कि राष्ट्रवादी उत्थान को “खतरा” और पराजित वामपंथी धारणाओं को “लोकतांत्रिक विकल्प” प्रस्तुत किया जा सके।
ध्यान देने योग्य है कि NYT, Washington Post, Economist जैसे प्लेटफ़ॉर्म अमेरिका के “progressive establishment” का बौद्धिक विस्तार हैं। भारत में वामपंथ का पतन इन प्लेटफार्मों के लिए चिंताजनक है, क्योंकि दक्षिण एशिया में वामपंथ परंपरागत रूप से उनका वैचारिक सहयोगी रहा है।

💥भारत में वामपंथ: पराजय की पृष्ठभूमि
NYT रिपोर्ट को समझने से पहले यह देखना आवश्यक है कि भारतीय वाम राजनीति किस संकट से गुजर रही है।
(क) चुनावी पतन
1950–1970 के दशक में वाम दल राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख हिस्सा थे, लेकिन आज उनकी स्थिति सीमित है:
• 2014: 6% वोट
• 2019: 5% वोट
• 2024: लगभग 3–4%
यह पतन केवल राजनैतिक हार नहीं, विचारधारा का सामाजिक विघटन है।
(ख) कैंपस-आधारित वाम का क्षरण
JNU, DU, HCU, FTII जैसे केंद्र अब पहले जैसे प्रभावशील नहीं रहे। “CAA-विरोध”, “शाहीन बाग”, “कश्मीर पर अलगपंथी रुख” जैसे अभियानों ने वाम को मुख्यधारा से दूर कर दिया।
भारत के मध्यम वर्ग ने ऐसे आंदोलनों को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण या राष्ट्रीय सुरक्षा विरोधी माना।
(ग) नक्सलवाद की पराजय
2000 के बाद राज्य ने नक्सल प्रभाव को निर्णायक रूप से सीमित कर दिया।
आदिवासी क्षेत्रों में विकास, सड़कें, शिक्षा, और सुरक्षा ने वाम-उग्रवाद की जमीन समाप्त की।
(घ) आर्थिक उदारीकरण के बाद मार्क्सवाद का संकट
1991 के बाद चीन स्वयं पूँजीवादी मॉडल अपनाकर शक्तिशाली हो गया।
भारतीय वामपंथ का “साम्राज्यवाद-विरोध” सिद्धांत अप्रासंगिक हो गया।
वामपंथ के पास न तो नया आर्थिक मॉडल था और न ही सामाजिक आधार।
इन सब कारणों से वामपंथ अब NGO, विदेशी मीडिया, अकादमिक लेखन और मानवाधिकार संस्थाओं के माध्यम से ही प्रभाव खोज रहा है।

💥NYT जैसी रिपोर्टें: भारत में वामपंथ को पुनर्जीवित करने का अमेरिकी तंत्र
(क) अमेरिका का भू-राजनीति आधारित सूचना-युद्ध
अमेरिका अक्सर “लोकतंत्र”, “नागरिक अधिकार”, “अल्पसंख्यक संरक्षण” जैसे आचरणों के आधार पर देशों को रेट करता है। इसके पीछे केवल मानवाधिकार चिंता नहीं होती- बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन भी होता है।
भारत का उभार:
• 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता देश
• पाकिस्तान और चीन के विकल्प के रूप में अमेरिका के लिए चुनौती
• हिंदू-संस्कृति आधारित “सिविलाइज़ेशनल मॉडल”
इससे अमेरिका का “लिबरल इकोसिस्टम” असहज है।
इसलिए NYT, वॉशिंगटन पोस्ट इत्यादि अक्सर भारत पर वैचारिक दबाव बनाते हैं।
(ख) “नैरेटिव शिफ्ट” की रणनीति
NYT की रिपोर्ट का उद्देश्य:
• RSS को “अदृश्य सत्ता” के रूप में चित्रित करना।
• भाजपा सरकार की लोकतांत्रिक वैधता को संदेह में डालना।
• वामपंथी विचारकों को “सही विकल्प” की छवि देना।
• भारत की नीति-CAA, 370, राम मंदिर को “अल्पसंख्यक-विरोधी” बताना।
• अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत पर दबाव बनाना।
यह वैश्विक स्तर पर “soft power intervention” का उदाहरण है।
(ग) अमेरिकी फाउंडेशन-नेटवर्क का जुड़ाव
Ford Foundation, Open Society Foundations, Amnesty, Human Rights Watch जैसे संस्थानों की रिपोर्टें अक्सर NYT का आधार बनती हैं।
ये संस्थाएँ भारत में पहले FCRA मामलों के कारण विवादों में रही हैं।
NYT इन्हीं फाउंडेशन-आधारित अध्ययन को “वैज्ञानिक शोध” के रूप में प्रस्तुत करता है।
इस प्रकार यह एक परस्पर सुदृढ़ तंत्र है:
NGO → Global Foundations → NYT/Washington Post → Academic Journals → UN Reports
→ फिर भारत के वामपंथी बुद्धिजीवी → भारतीय मीडिया में पुनर्प्रचार

💥भारत बनाम पश्चिम: दो भिन्न सभ्यतागत दृष्टिकोण
NYT की रिपोर्ट में जो वैचारिक असहमति दिखाई देती है, वह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि दो अलग सभ्यताओं के बीच टकराव है:
(क) पश्चिम का “individual-centric liberalism”
• निजी स्वतंत्रता को सर्वोपरि
• सेक्युलरिज़्म का अर्थ- पूरी तरह अनुष्ठानमुक्त समाज
• राज्य का सांस्कृतिक विरासत से दूरी
(ख) भारत का “civilizational collectivism”
• परिवार, समाज, समुदाय की पहचान
• धर्म-संस्कृति जीवन के अभिन्न अंग
• राज्य विकास का साधन, परंपरा का संरक्षक
संघ इसी “सांस्कृतिक राष्ट्रीयता” का वाहक है, जिसे पश्चिम “majoritarianism” कहता है। NYT इस अंतर को समझने के बजाय उसे “radicalization” के रूप में प्रस्तुत करता है।

💥 अमेरिका में भारत-विरोधी वामपंथ को जमीन क्यों दी जा रही है?
👉भू-राजनीतिक कारण
अमेरिका अपने मित्र-देशों में पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल देखना चाहता है।
भारत का “civilizational rise” उसे असहज करता है।
👉 वैश्विक बौद्धिक प्रभुत्व
पश्चिम की अकादमिक दुनिया (Harvard, Yale, Columbia) उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हुई।
वे अपेक्षा करते हैं कि भारत के बौद्धिक विमर्श की दिशा वही तय करें।

💥वामपंथ को नैरेटिव टूल की तरह प्रयोग करना
वामपंथ, NGO, मानवाधिकार समूह अमेरिका की सॉफ्ट-पॉवर के सहायक हैं।
भारत में इनका क्षय उन्हें चिंतित करता है।वैश्विक NGOs एक ओर मानवीय सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार में बड़ा योगदान देते हैं, वहीं दूसरी ओर कई NGOs वैचारिक, राजनीतिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक हितों का उपकरण भी बन जाते हैं।

💥भारत में उभरते राष्ट्रवाद से डर
मोदी युग में भारत की वैचारिक नींव मजबूत हुई है जैसे
• राम मंदिर के रूप में राष्ट्रीय एकात्मता
• कश्मीर में अलगाव के स्थान पर स्थिरता
• वैश्विक कूटनीति में उपलब्धियाँ
• भारतीय आर्थिक उभार सर्वाधिक
• डिजिटल क्रांति की दुनिया में मिशाल
यह सब भारत को “सांस्कृतिक शक्ति” की ओर ले जा रहा है। यह मॉडल चीन से पूर्णतः भिन्न और पश्चिम के लिए चुनौती है।

💥संघ और भारतीय समाज: NYT रिपोर्ट की चूकें
NYT का दावा है कि RSS संस्थाओं में “घुसपैठ” कर रहा है। लेकिन वास्तविकता अलग है। यहाँ 83,000 स्थानों पर एक लाख से अधिक शाखाएँ, करोड़ों निष्ठावान, प्रतिबद्ध स्वयंसेवक, आपदा राहत सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य में सक्रिय लाखों कार्यों का प्रारूप, रचनात्मक संगठनों का विस्तृत सामाजिक मॉडल खड़ा किया है। इसे “shadow government” कहना भारतीय लोकतंत्र का अपमान है।
रा• स्व• संघ भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर देशभक्त नागरिक निर्माण पर काम करता है- न कि समानांतर सत्ता के रूप में।
सत्य - इसके अतिरिक्त भारत में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ी है, प्रतिनिधित्व बना है, 80,000 से अधिक मस्जिदें बनी हैं। इन तथ्यों को NYT रिपोर्ट में स्थान नहीं दिया गया।

💥भारत वैचारिक संघर्ष के निर्णायक मोड़ पर
2025 की NYT रिपोर्ट केवल एक लेख नहीं- यह वैश्विक वैचारिक युद्ध का हिस्सा है।
भारत में पराजित वामपंथ अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया, अकादमी, NGO, फाउंडेशन नेटवर्क के माध्यम से नए आधार खोज रहा है।
लेकिन भारतीय समाज पिछले एक दशक में वैचारिक रूप से अधिक परिपक्व और आत्मविश्वासी हुआ है।
भारतीयता का उभरता मॉडल:
• सांस्कृतिक राष्ट्रीयता
• सभ्यतागत पहचान
• लोकतांत्रिक वैधता
• आर्थिक उन्नति
• वैश्विक आत्मविश्वास
इस मॉडल को पश्चिमी “लिबरल नैरेटिव” चुनौती दे रहा है, परंतु भारत की जनता अब बाहरी कथानकों से प्रभावित नहीं होती।
भारत के लिए आगे की स्व राह:
• विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता
• मीडिया साक्षरता बढ़ाना
• वैचारिक विमर्श का स्वदेशीकरण
• स्वतंत्र शोध संस्थानों को सुदृढ़ करना
• वैश्विक मंचों पर अपने नैरेटिव को मुखर करना
🌹 आज भारत सामर्थ्यवान बन नए वैचारिक युग में प्रवेश कर रहा है। जहाँ संघर्ष बम-बारूद का नहीं, बल्कि नैरेटिव, विमर्श और वैश्विक छवि का है। NYT की रिपोर्ट इस संघर्ष का एक अध्याय है- अंत नहीं। उभरता भारत किसी की आँख को चुभ रहा होगा पर भारत का उभार अब अविराम है; वामपंथ का पुनरुत्थान केवल विदेशी काग़ज़ों में ही संभव है, भारतीय जनमानस में नहीं।🌹🙏
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