सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

शौर्य–दिवस: पराधीनता के मलबे से आत्मगौरव के पुनर्जागरण तक

हज़ार वर्षों की आततायी आक्रमण–श्रृंखलाओं, लाखों नरसंहारों, असंख्य मंदिर–विनाशों और जिहादी अत्याचारों के उपरान्त भी हिन्दू सभ्यता हिमालय की भाँति अडिग, अचल और अमर बनी रही—यह विश्व इतिहास में अद्वितीय घटना है। जिस काल में पर्शिया का जरोअस्ट्रियन धर्म लगभग समाप्त हो गया, रोम का वैभव ध्वस्त होकर इतिहास बन गया और मिस्र की सांस्कृतिक आत्मा रेत के नीचे दब गई—उसी समय भारत की सनातन संस्कृति निरन्तर संघर्षरत रही, अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण रखती रही और अंततः विजय के सूर्य ने पुनः उदय किया। यह इस राष्ट्र की जिजीविषा, इसकी आत्म–शक्ति और अविनाशी धैर्य का प्रमाण है।

इस्लामी आक्रमणों के चौदह सौ वर्षों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी जीवंत सभ्यता ने न केवल प्रतिकार किया, बल्कि अपने पवित्र क्षेत्र को पुनः प्राप्त किया। सम्पूर्ण विश्व ने देखा कि जिसे उपहासपूर्वक ‘पराजित मूर्तिपूजक संस्कृति’ कहा जाता था, वही संस्कृति ज्वालामुखी की भाँति फूट पड़ी और अपने देवालय को पुनः प्रतिष्ठित कर विजयी बनी। रामलला के भव्य मंदिर पर लहराता भगवा–ध्वज केवल धार्मिक स्थापत्य का प्रतीक नहीं है—वह पराधीनता की जंजीरों के टूटने, आत्मगौरव की पुनर्स्थापना और राष्ट्र–चेतना के जागरण का चिह्न है। यह गौरव उन तपस्वी कारसेवकों, अदृश्य वीरों और अमर बलिदानियों का है जिन्होंने लाठियाँ सहकर, गोलियाँ झेलकर भी अपने संकल्प से विचलित होना स्वीकार नहीं किया। उनकी उद्घोषणा आज भी आकाश में गूँजती है—“लाठी गोली खाएँगे—मंदिर वहीं बनाएँगे।”

स्वतंत्र भारत में 45 वर्षों तक रामलला टिन–छप्पर के नीचे बंदिवत रहे, और तुष्टिकरण की राजनीति के कारण न्याय निरन्तर टलता रहा। जब सत्ता और व्यवस्था निष्प्राण और संवेदनहीन हो गई, तब समाज स्वयं उठ खड़ा हुआ। 6 दिसंबर 1992 को सदियों का अपमान ढह गया और वह दीवार टूटी जो राष्ट्रीय आत्मसम्मान का बोझ बनकर खड़ी थी। यह कोई साधारण घटना नहीं—आत्मगौरव की पुन:प्राप्ति और पराधीन मानसिकता से मुक्ति का क्षण था।

इस संघर्ष का उद्देश्य केवल अयोध्या तक सीमित नहीं। तथ्य यह है कि भारत में लगभग 40,000 प्राचीन मंदिर तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें या दरगाहें निर्मित की गईं। अयोध्या, काशी और मथुरा तो केवल तीन दर्पण हैं—कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, बंगाल, असम और कश्मीर तक असंख्य पवित्र स्थल न्याय और पुनर्स्थापना की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अतः 6 दिसंबर का यह दिवस स्मरण का नहीं, संकल्प का है—आने वाली पीढ़ियों की दिशा निर्धारित करने का क्षण, यह प्रतिज्ञा कि अधूरा इतिहास पूर्ण किया जाएगा।

आज यह स्पष्ट निश्चय करना चाहिए कि 6 दिसंबर 1992 में प्रारम्भ किया गया अभियान अधूरा न रहे।
रामजन्मभूमि की पुनर्प्राप्ति हमारे संघर्ष का अंत नहीं थी, बल्कि अखंड भारत की पुनर्स्थापना की दिशा में प्रथम चरण थी। जब तक यह पावन भूमि बाहरी अतिक्रमण और विकृतियों से पूर्णतः मुक्त नहीं हो जाती, तब तक यह प्रयास रुकना नहीं चाहिए।

कैलाश, हिंदूकुश, कश्मीर का शारदा पीठ, और बांग्लादेश का ढाकेश्वरी मंदिर—ये केवल भौगोलिक स्थान नहीं हैं; ये हमारी सांस्कृतिक चेतना के आधार–स्तम्भ हैं। जिस प्रकार अयोध्या की पुनर्प्राप्ति को असंभव कहा जाता था, और फिर भी समाज ने उसे सम्भव बनाकर दिखाया, उसी प्रकार इन पवित्र स्थलों की पुनर्स्थापना भी धैर्य, सामूहिक संकल्प और निरंतर प्रयत्न से अवश्य सिद्ध होगी।

6 दिसम्बर हमें यह स्मरण कराता है कि इतिहास का अपमान इतिहास में ही छोड़ देना हमारे स्वभाव में नहीं है।
अन्याय को स्वीकार करना कायरता है; परन्तु अन्याय के विरुद्ध उठ खड़ा होना ही धर्म है।
अतः आज का दिवस केवल भावनाओं का नहीं—कर्तव्य का दिवस है।

भारत का भूगोल सम्पूर्ण हो, भारत की संस्कृति सुरक्षित हो, और भारत अपनी पूर्ण पहचान में प्रतिष्ठित हो—इसी दिशा में संगठित प्रयास आवश्यक है।
इसके लिए न क्रोध की आवश्यकता है, न उतावलापन की—केवल स्थिर बुद्धि, संयमित कार्य और स्पष्ट लक्ष्य की आवश्यकता है।

हमारा उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की पुनर्स्थापना है।
यह कार्य निश्चित ही दीर्घकालिक है, किन्तु असंभव नहीं।

न रुकना है, न पीछे हटना है।
धैर्य, साहस और अध्यवसाय के साथ आगे बढ़ना ही आज का संकल्प है।

जय श्रीराम।
जय अखंड भारत। 🚩

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