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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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पिछले कुछ वर्षों में समाज के भीतर एक अजीब सा आत्मविश्वास पैदा हुआ है। कुछ विचार ऐसे हैं जिन्हें दोहराते ही व्यक्ति प्रगतिशील, उदार और बौद्धिक घोषित कर दिया जाता है। अमेरिका के लेखक और मनोवैज्ञानिक रॉब हेंडरसन ने इसी प्रवृत्ति को Luxury Beliefs कहा है। उनका कहना है कि पहले संपन्न लोग अपनी सामाजिक श्रेष्ठता दिखाने के लिए महंगे गहने, विशाल भवन और विलासपूर्ण जीवन का प्रदर्शन करते थे। आज वही काम एलीट वर्ग विचारों के माध्यम से करता है। फर्क बस इतना है कि पहले विलासिता की कीमत अमीर खुद चुकाता था, आज विचारों की कीमत समाज का साधारण नागरिक चुकाता है।
आज यह कहना फैशन बन गया है कि विवाह की क्या आवश्यकता है, परिवार क्यों चाहिए, राष्ट्र और सीमाएँ अर्थहीन हैं, सेना और पुलिस दमनकारी संस्थाएँ हैं, धर्म और संस्कृति केवल ब्राह्मणवादी जकड़न हैं जिन्हें समाप्त कर देना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि समाज जन्म से ही शोषक और शोषित में बँटा हुआ है—जहाँ दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री हमेशा पीड़ित हैं और शेष समाज अपराधी। इन बातों को कहने वाला आधुनिक कहलाता है, और जो इनके सामाजिक परिणामों की बात करे, उसे प्रतिक्रियावादी ठहरा दिया जाता है।
यह वैचारिक प्रवाह भारत की मिट्टी से नहीं निकला। इसकी जड़ें पश्चिमी विश्वविद्यालयों में हैं—हार्वर्ड, येल, कोलंबिया जैसी संस्थाओं में विकसित पोस्ट-मॉडर्निज़्म, क्रिटिकल थ्योरी, मार्क्सवाद और आइडेंटिटी पॉलिटिक्स में। वहाँ यह पढ़ाया गया कि परिवार सत्ता की इकाई है, विवाह स्त्री-दमन का औज़ार है, राष्ट्र एक कल्पना है, सेना-पुलिस दमन के उपकरण हैं और धर्म-संस्कृति शोषण को बनाए रखने की संरचनाएँ हैं। यह विमर्श वहाँ अकादमिक बहस तक सीमित रहा, लेकिन भारत में इसे नीति, न्याय और सामाजिक नैतिकता के रूप में लागू करने का प्रयास हुआ।
सबसे पहले निशाने पर परिवार और विवाह संस्था आई। यह तर्क दिया गया कि विवाह की क्या ज़रूरत है, दो लोग सहमति से साथ रहें, जब चाहें अलग हो जाएँ। यह सुनने में स्वतंत्रता जैसा लगता है, लेकिन जिन समाजों में यह प्रयोग सबसे पहले हुआ, वहीं इसके परिणाम भी सामने आए। अमेरिका के CDC और Brookings Institution के आँकड़े बताते हैं कि दो-अभिभावक परिवारों की तुलना में टूटे परिवारों में पले बच्चों में अपराध, नशा, अवसाद और स्कूल ड्रॉपआउट की दर कहीं अधिक है। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत कैदी ऐसे परिवारों से आते हैं जहाँ पिता या माता में से कोई एक अनुपस्थित था।
भारत में भी यही सोच फिल्मों, मीडिया और न्यायिक विमर्श के माध्यम से सामान्य बनाई गई। आज स्थिति यह है कि पारिवारिक विवाद भारतीय अदालतों में सबसे अधिक लंबित मामलों में हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार घरेलू हिंसा और वैवाहिक कलह से जुड़े मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। लेकिन इन मामलों को न एलीट वर्ग झेलता है, न उनके बच्चे। यह बोझ मध्यम और निम्न वर्ग उठाता है।
यही दोहरापन प्रेम विवाह के विमर्श में दिखाई देता है। फिल्मों और मीडिया में प्रेम विवाह को आधुनिकता का प्रतीक बताया जाता है, जबकि व्यवस्थित विवाह को पिछड़ेपन की निशानी। लेकिन व्यवहार में देखें तो भारत के बड़े उद्योगपति, शीर्ष नौकरशाह, नेता और न्यायाधीश—लगभग सभी अपने बच्चों के लिए सामाजिक स्तर, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक पृष्ठभूमि देखकर ही विवाह तय करते हैं। सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाला नेता भी अपने बेटे-बेटी का विवाह किसी अत्यंत गरीब परिवार में नहीं करता। प्रयोग समाज के साधारण बच्चों पर होता है, और जब वह असफल होता है तो तलाक़, कोर्ट-कचहरी और मानसिक टूटन का सामना वही करता है।
न्यायपालिका में Luxury Beliefs का प्रवेश सबसे स्पष्ट रूप से पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के निर्णयों और दृष्टिकोण में दिखाई देता है। व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते समय यह तर्क दिया गया कि विवाह के भीतर नैतिकता तय करना राज्य का काम नहीं। यह तर्क पश्चिमी उदारवादी विधि-दर्शन से लिया गया था, जहाँ विवाह केवल निजी अनुबंध माना जाता है। लेकिन भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्व की इकाई है। इस निर्णय के बाद अवैध संबंधों, तलाक़ और उनसे जुड़े हिंसक अपराधों में जिस प्रकार वृद्धि हुई, उस पर गंभीर आत्ममंथन कभी नहीं हुआ। कानून ने एक नैतिक अवरोध हटाया, लेकिन समाज को संभालने की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली।
इसी वैचारिक प्रवृत्ति का विस्तार समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट की लंबी सुनवाई में भी दिखा। जिस देश में लगभग पाँच करोड़ मामले वर्षों से लंबित हों, वहाँ सर्वोच्च न्यायालय का हफ्तों तक इसी विषय पर केंद्रित रहना केवल अधिकार का प्रश्न नहीं, बल्कि वैचारिक प्राथमिकता का संकेत है। विवाह को केवल “दो वयस्कों की पसंद” तक सीमित कर देना भारतीय सामाजिक संरचना की अनदेखी है।
सेना और पुलिस की क्या आवश्यकता है—यह प्रश्न भी इसी आयातित सोच का हिस्सा है। पश्चिम में “डिफंड द पुलिस” जैसे प्रयोग हुए और FBI के आँकड़ों ने दिखाया कि जहाँ पुलिस को कमजोर किया गया, वहाँ हिंसक अपराध बढ़े। इसके बावजूद, वही विचार भारत में नैतिक आदर्श की तरह प्रस्तुत किए जाते हैं। यह भूलकर कि भारत जैसे देश में सेना और पुलिस केवल संस्थाएँ नहीं, बल्कि आम नागरिक की सुरक्षा की अंतिम दीवार हैं। यह प्रश्न उठाने वाले लोग स्वयं जेड-प्लस सुरक्षा और सुरक्षित इलाकों में रहते हैं।
फिर कहा जाता है कि राष्ट्र की क्या आवश्यकता है। राष्ट्र को काल्पनिक निर्माण बताया जाता है, सीमाओं को अर्थहीन कहा जाता है। यह बात उन लोगों को सहज लगती है जिनका एक पैर अमेरिका या यूरोप में सुरक्षित रहता है। लेकिन भारत जैसे विविध और संवेदनशील समाज में राष्ट्र की भावना ही वह सूत्र है जो समाज को जोड़े रखता है। जब इस भावना को कमजोर किया जाता है, तो उसका असर सीमावर्ती राज्यों, संसाधनों और सामाजिक संतुलन पर पड़ता है—न कि एलीट वर्ग पर।
धर्म और संस्कृति को भी इसी तरह निशाना बनाया गया। कहा गया कि ये सब ब्राह्मणवादी जकड़न हैं, इन्हें समाप्त कर देना चाहिए। दलित और अल्पसंख्यक को जन्म से ही शोषित घोषित कर दिया गया। इससे वास्तविक सामाजिक सुधार नहीं हुआ, बल्कि समाज स्थायी पीड़ित और स्थायी अपराधी में बँट गया। पहचान की राजनीति ने सामाजिक समरसता को क्षति पहुँचाई।
इन सभी विचारों का एक समान सूत्र है। इन्हें गढ़ने और फैलाने वाला वर्ग स्वयं सुरक्षित रहता है—हाई सिक्योरिटी में, विदेशी नागरिकता और संपत्ति के विकल्पों के साथ। लेकिन इन्हीं विचारों के आधार पर बनने वाली नीतियों और न्यायिक व्याख्याओं का भुगतान आम मध्यम और निम्न वर्ग करता है। वही परिवार टूटता है, वही असुरक्षित होता है, वही अदालतों और अस्पतालों के चक्कर काटता है।
यही Luxury Beliefs का असली खतरा है। ये विचार सुनने में नैतिक और मानवीय लगते हैं, लेकिन व्यवहार में समाज की नींव—परिवार, सुरक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता—को कमजोर करते हैं। जब विचार विलासिता बन जाएँ और उनके परिणाम गरीब और मध्यम वर्ग पर थोप दिए जाएँ, तो यह प्रगति नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय बन जाता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कौन आधुनिक है और कौन परंपरावादी। असली प्रश्न यह है कि आप जिन विचारों की वकालत कर रहे हैं, उनकी कीमत कौन चुका रहा है। जो समाज अपने सबसे कमजोर वर्ग को प्रयोगशाला बना देता है, वह चाहे जितना प्रगतिशील कहलाए—अंत में वह स्वयं को ही खो देता है।
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