सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

व्यक्ति-पूजा का विष और सभ्यताओं का पतन


आज का समय साधारण नहीं है। यह वह दौर है जब दुनिया भर में विचारों की आँधी चल रही है, लेकिन भारत के भीतर एक विशेष प्रकार का संकट गहराता जा रहा है—व्यक्तियों को भगवान बनाने का संकट। किसी महापुरुष का सम्मान करना, उसके चरण छूकर आशीर्वाद लेना, उसकी तस्वीर अपने घर में लगाना– यह सब स्वाभाविक है; पर किसी भी मनुष्य को ईश्वर के स्तर पर बैठा देना, उसके हर शब्द को अंतिम सत्य घोषित कर देना, उसे आलोचना, तर्क और पुनर्विचार से ऊपर उठा देना—यह प्रवृत्ति किसी भी सभ्यता के लिए घातक सिद्ध होती है। यही मूल बिंदु है, जिसे समझे बिना न तो वर्तमान सामाजिक विषमता का कारण पकड़ा जा सकता है, न भविष्य के विनाश को रोका जा सकता है।


सनातन धर्म की महान दार्शनिक परम्परा में यह विश्वास रहा है कि इस संसार का प्रत्येक जीव उसी ब्रह्म के प्रकाश से आलोकित है। परन्तु यह परम्परा उतनी ही स्पष्ट यह भी कहती है कि ब्रह्मत्व हर मनुष्य को जन्म से प्राप्त नहीं होता।
उपनिषद् कहते हैं — “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” — आत्मा दुर्बल और असंयमी मन को प्राप्त नहीं होती।
यही कारण है कि ईश्वरत्व किसी देह, नाम, वंश या उपाधि से नहीं, बल्कि स्व-बोध से जन्म लेता है।
जब मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, लाभ–हानि और अहंकार से मुक्त हो जाता है, तभी उसके भीतर ब्रह्म का उदय होता है।
अपने स्व को जान लेना ही ईश्वरत्व है।

महाभारत का प्रसंग इसका सबसे सशक्त प्रमाण है।
अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा था — सामने उसके ही अपने कुल के लोग थे, गुरु थे, बंधु थे।
वह डगमगाया — और तब श्रीकृष्ण ने कहा:
“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ” — दुर्बल मत बनो।
और फिर आदेश दिया:
“उत्तिष्ठ” — उठो, युद्ध करो।

कौरव भी उसी सृष्टि के पुत्र थे, उनमें भी उसी चेतना का अंश था, पर श्रीकृष्ण ने कहा “इनका संहार करो”, क्योंकि वे अधर्म के मार्ग पर थे।
यदि केवल जीवित होना ही ईश्वरत्व होता, तो यह आदेश कैसे सम्भव होता?
अतः सनातन विचार यह नहीं कहता कि हर जीव अपने आप ईश्वर है।
जो अपने को जान ले, वही ईश्वर के निकट पहुँचता है।

मनुष्य की यात्रा व्यष्टि से समष्टि, और समष्टि से परमेष्ठी की ओर है।
इस यात्रा का उद्देश्य है — मनुष्य को मनुष्य से आगे उठाना,
मनुष्य को देवत्व तक ले जाना।

इसलिए सनातन परम्परा ने मूर्ति–स्थापना और व्यक्तिपूजा को श्रेष्ठ नहीं माना।
स्मृति कहती है — “गुणाः प्रधाना न तु रूपम्” — महत्त्व गुणों का है, शरीर का नहीं।
गुण ही देव हैं, गुण ही पूजा है, गुण ही मन्दिर हैं, जो मन में निर्मित होते हैं।
नर अपनी करनी से नारायण बनता है; बनाया नहीं जा सकता।
जो बनाकर खड़ा किया जाएगा, उसमें सुगन्ध नहीं होगी — और समय आने पर वह मिट जाएगा।

भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण इसलिए पूज्य हैं कि उनके चरित्र ने दिव्यता को सिद्ध किया।
राम केवल एक आदर्श राजा नहीं—मर्यादा पुरुषोत्तम।
कृष्ण केवल योद्धा या राजनीतिज्ञ नहीं—योगेश्वर।
उनका ईश्वरत्व किसी सभा, समूह, दल या समाज की घोषणा से नहीं आया,
बल्कि उनके धर्मसंरक्षण, करुणा, न्याय, सत्य और लोककल्याण से प्रकट हुआ।

गीता में कृष्ण कहते हैं —
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ 
साधुजनों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए, मैं हर युग में प्रकट होता हूँ |

और उसी संवाद में वे अर्जुन से कहते हैं —
“विमर्श्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु”
सब सुनकर, अब तू स्वयं विचार कर, और जैसा उचित लगे वैसा कर।

इन दो वचनों के बीच वही गहरा संतुलन है —
जहाँ ईश्वरत्व का प्रकाश भी है,
और मनुष्य के विवेक और स्वतंत्र निर्णय का सम्मान भी।

इसलिए हर व्यक्ति भगवान नहीं हो सकता। कोई महापुरुष कितना ही महान क्यों न हो, वह ईश्वर नहीं होता; उसका सम्मान होता है, उसकी शिक्षा का अनुकरण होता है, पर उसे अचूक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान नहीं मान लिया जाता। जहाँ मनुष्य को भगवान बना दिया जाता है, वहीं से संकट शुरू होता है। क्योंकि फिर उसकी भूल भी सत्य घोषित हो जाती है, उसकी राजनीति भी धर्म बना दी जाती है, और उसकी आलोचना करना पाप मान लिया जाता है। यही व्यक्ति-पूजा का विष है, जो धीरे-धीरे पूरे समाज की नसों में फैल जाता है।

इतिहास हमें बार-बार यह सीख देता है कि जब समाज मनुष्यों को भगवान बनाकर सिर पर बिठा लेता है, तब उसका पतन अनिवार्य हो जाता है। रोमन साम्राज्य इसका सबसे सटीक उदाहरण है। एक समय था जब रोम शक्ति, समृद्धि, संस्कृति और व्यवस्था—हर क्षेत्र में विश्व का शिखर था। कानून-व्यवस्था, सैनिक बल, स्थापत्य कला, साहित्य, दर्शन—सब कुछ अपने सर्वोच्च उत्कर्ष पर था। पर धीरे-धीरे वहाँ एक विचित्र प्रवृत्ति जन्म लेने लगी—देवत्व का पतन और मनुष्यों का देवत्वीकरण।

रोम में आरंभिक काल में देवताओं को आदर्श, अनुशासन और नैतिकता का प्रतीक माना जाता था। पर बाद के समय में देवताओं को ठीक मनुष्यों की तरह ईर्ष्या, क्रोध, भोग-विलास और व्यक्तिगत द्वंद्व से युक्त दिखाया जाने लगा। देवत्व की ऊँचाई नीचे गिरने लगी और धर्म आस्था से अधिक मनोरंजन का विषय बन गया।

इसी बीच दूसरी दिशा में एक और परिवर्तन चल रहा था—सम्राटों को देवता माना जाने लगा। पहले यह सम्मान मृत सम्राटों को दिया जाता था, पर बाद में जीवित सम्राटों को भी ईश्वर का रूप मानने का चलन बन गया। नीरो और कैलीगुला जैसे शासकों को भी “देव-पुरुष” कहा गया, जबकि इतिहास गवाह है कि वे सत्ता-मद, विलासिता और क्रूरता के प्रतीक थे। उनके पागलपन को भी समाज ने प्रशंसा और सम्मान का रूप दे दिया—क्योंकि जब कोई मनुष्य भगवान बना दिया जाता है, तब उसके पाप भी धर्म बन जाते हैं और उसकी गलतियाँ भी पवित्रता का आवरण पहन लेती हैं।

यहीं से रोमन समाज की रीढ़ टूट गई।
नैतिकता बिखरने लगी, चरित्र का मूल्य गिरा, न्याय व्यक्तियों के हाथ की कठपुतली बन गया, और भ्रष्टाचार ने पूरे साम्राज्य को खोखला कर दिया।
जो समाज विवेक, साहस और अनुशासन पर टिका था, वह भीड़ और अंध-भक्ति के सहारे चलने लगा।

इतिहासकार एडवर्ड गिबन ने सही लिखा था—
“रोम बाहरी शत्रुओं से नहीं, भीतर की गिरावट से नष्ट हुआ।”

476 ईस्वी में जब साम्राज्य ढहा, तो तलवारों ने केवल अंतिम वार किया था—शव तो पहले ही भीतर से सड़ चुका था।
और उस सड़न की जड़ यही थी कि देवता जमीन पर उतार दिए गए और मनुष्यों को देवत्व का मुकुट पहना दिया गया।

इसलिए इतिहास की आवाज साफ है: जहाँ व्यक्ति भगवान बन जाते हैं, वहाँ समाज का विवेक मर जाता है।
और जहाँ विवेक मर जाता है, वहाँ कोई सभ्यता अधिक समय तक टिक नहीं पाती।

आज भारत में भी एक अलग रूप में वही प्रक्रिया चल रही है। संविधान को “आसमानी किताब” की तरह पेश किया गया, और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे युगपुरुष को लगभग पैगंबर जैसा दर्जा दे दिया गया। वे निस्संदेह एक महत्त्वपूर्ण विचारक, विधिवेत्ता और समाज-सुधारक थे, पर वे भगवान नहीं थे। न आंबेडकर, न बिरसा मुंडा,न महात्मा गांधी न, ज्योतिराव फुले—इनमें से कोई भी ईश्वर नहीं हैं। जब इन महापुरुषों को ईश्वर जैसा अचूक बना दिया जाता है, तब उनके नाम पर तर्क का गला घोंटा जाता है, उनके नाम पर समाज को बाँटा जाता है, उनके नाम पर स्थायी घृणा की राजनीति खड़ी की जाती है।

आज हाल यह है कि हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग खासकर दलित और वंचित समाज का एक हिस्सा अपनी मूल सनातन परंपरा और धर्म के प्रति ही घृणा से भर दिया गया है। 20–30 साल पहले गाँवों में यह स्थिति नहीं थी। मैं स्वयं ग्रामीण पृष्ठभूमि से हूँ, पंद्रह वर्ष पहले तक गाँवों में SC, ST, ओबीसी और सवर्णों में इतना ज़हरीला वैमनस्य नहीं था, जितना आज हवा में तैरता दिखता है। लोग मिलकर त्यौहार मनाते थे, रिश्ते-नाते निभते थे; मत-भेद थे, पर मन-भेद नहीं था। आज परिस्थिति बदली है—“भीमकरण” और लगातार चलाए गए प्रोपेगैंडा ने एक वर्ग को स्थायी अपराधबोध में और दूसरे वर्ग को स्थायी शत्रुता में धकेल दिया है।

दूसरी ओर, जब कोई अद्भुत वैदिक उपलब्धि सामने आती है, तब वही वर्ग जो “वैज्ञानिक सोच” की बात करता है, अचानक जातिगत घृणा पर उतर आता है। उन्नीस वर्ष के एक बालक – पंडित देवव्रत महेश रेखे – ने जो साधना की है, वह किसी भी कसौटी से असाधारण है। 25 लाख से अधिक पद, जिनमें करोड़ों शब्द निहित हैं; 2000 से अधिक श्लोक; और 50 दिनों तक लगातार, एक ही वेग से, बिना एक भी पन्ना देखे, बिना एक भी त्रुटि के, केवल दूसरी बार में, शुक्ल यजुर्वेद का ऐसा कंठस्थ पाठ – यह केवल स्मरणशक्ति का चमत्कार नहीं, यह तो वेदपरंपरा और गुरु-परंपरा की जीवंतता का प्रमाण है। यह उपलब्धि पूरी मानवता के लिए गौरव का विषय होनी चाहिए थी।

लेकिन क्या हो रहा है? नवबौद्ध, वामपंथी, तथाकथित “भीमवादी” इस अद्भुत उपलब्धि को नीचा दिखाने में लगे हैं; इसे “ब्राह्मणवाद”, “जातिवाद” और “किस काम का है” जैसे तंजों में बदल रहे हैं। यही नहीं, तमाम प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं—“इससे गरीबों का क्या भला होगा?”, “इससे देश की GDP कितनी बढ़ेगी?”, “इससे कितने रॉकेट लॉन्च होंगे?” इत्यादि। यही प्रश्न यदि हम पलटकर पूछें, तो तस्वीर और साफ दिखती है।

चीनी एथलीट गोल्ड मेडल जीतते हैं—क्या चीन के सभी गरीब उस दिन अमीर हो जाते हैं?
अरुंधति रॉय को बुकर प्राइज मिला—उससे भारत की GDP कितने प्रतिशत बढ़ी?
अंबेडकर की हजारों करोड़ की मूर्तियाँ लग गईं—उससे राष्ट्रहित में कौन-सी निर्णायक आहुति पड़ गई?
बीथोवेन और मोजार्ट ने अमानुषिक जटिल संगीत रचनाएँ कीं—उनसे कितने अकाल-पीड़ितों को भोजन मिला?
रोनाल्डो और मेसी के हर गोल से हमारी थाली में क्या बढ़ जाता है?

फिर भी पश्चिमी कलाकार, लेखक, खिलाड़ी “सभ्यता की ऊँचाई” माने जाते हैं; पर जैसे ही कोई सनातनी बालक वेदों की विराट परंपरा को अपने कंठ में धारण करता है, उसे “अप्रासंगिक”, “बेकार”, “जातिवादी” घोषित कर दिया जाता है। यह केवल अज्ञान नहीं, एक सुनियोजित मानसिक गुलामी है।

इसी मानसिक गुलामी का एक उदाहरण यह भी है कि जब कोई पारसी न्यायाधीश RF Nariman ज़ेन्द-अवेस्ता कंठस्थ कर लेते हैं, तो उदारतावादी वर्ग वाह-वाह करता है; पर उसी वर्ग को यजुर्वेद जैसे कठिन वेदांश का कंठस्थ स्मरण चुभने लगता है। क्यों? क्योंकि 1835 के मैकॉले मिनट के बाद से शिक्षा और विमर्श की पूरी धारा इस प्रकार मोड़ी गई कि भारतीय अपने ही धर्म, शास्त्र, वेद और गुरु-परंपरा से संकोच करने लगे। हमें अपनी ही सभ्यता की सर्वोच्च उपलब्धियों पर संदेह करने के लिए प्रशिक्षित किया गया।

आज “विज्ञान बनाम धर्म” का झूठा नैरेटिव खड़ा किया गया है। जबकि सत्य यह है कि धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं। चरक, सुश्रुत, पाणिनि, कणाद, कात्यायन, आर्यभट, भास्कराचार्य – ये सभी ऋषि थे और साथ ही अद्वितीय वैज्ञानिक भी। हमारी परंपरा ने कभी किसी विचारक को प्रश्न पूछने पर फाँसी नहीं दी; गैलीलियो, ब्रूनो की तरह विज्ञान-पुरुषों को जला नहीं डाला। हमने तो बार-बार “शोध”, “तर्क”, “संवाद” और “अन्वेषण” को धर्म का ही अंग माना। श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञ अपनी कुलदेवी की प्रेरणा से ऐसे सूत्र लिखते हैं कि हार्डी जैसे पाश्चात्य विद्वान भी दंग रह जाते हैं; यह धर्म और विज्ञान की पूरकता का जीवंत उदाहरण है, न कि द्वंद्व का।

लेकिन जब किसी समाज का विवेक कमज़ोर हो जाता है, तब वह व्यक्ति को विचार से बड़ा मानने लगता है। हिटलर को “जर्मनी का उद्धारकर्ता” कहा गया, परिणाम – विश्वयुद्ध और लाखों की मृत्यु। माओ को देवता जैसा बना दिया गया, परिणाम – सांस्कृतिक क्रांति और करोड़ों लोग भूख व हिंसा का शिकार। जिन्ना को “कौम का मसीहा” कहा गया, परिणाम – भारत का विभाजन और लाखों लाशें। जहाँ-जहाँ मनुष्य भगवान बना, वहाँ-वहाँ समाज बिखर गया।

इसीलिए सनातन परंपरा बार-बार कहती है – महापुरुषों का सम्मान करो, पर उन्हें भगवान मत बनाओ।
भगवान का स्थान मंदिर में है,
महापुरुष का स्थान हृदय और आचरण में।

आज हमें यह भी समझना होगा कि किसी भी समाज का चरमोत्कर्ष GDP से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि उस समाज ने मनुष्य की मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्षमताओं को कितनी ऊँचाई तक पहुँचाया। लियोनार्डो दा विंची, माइकलएंजेलो, होमर, टॉलस्टॉय – यदि कोई पूछे कि इनसे कितने रॉकेट लॉन्च हुए, तो शायद उत्तर में हँसी ही आएगी। उसी तरह यदि कोई पूछे कि यजुर्वेद के दुष्कर खंड का कंठस्थ पारायण करने से कितने गरीबों को अनाज मिलेगा, तो समझ लेना चाहिए कि प्रश्न में ही बीमारी है, उत्तर में नहीं।

भारत को आज सबसे अधिक आवश्यकता इसी बात की है कि वह अपनी सभ्यता, अपनी वेदपरंपरा, अपने ऋषियों, अपने गुरुओं और अपने वैदिक ज्ञान पर गर्व करना फिर से सीख ले। अंग्रेज अपनी इतिहास-परंपरा पर गर्व करते हैं, फ्रांसीसी अपने फैशन पर, इतालवी अपनी कला पर; यदि भारतवासी अपनी वैदिक धरोहर पर और अपनी गुरु-परंपरा पर गर्व नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

लेकिन यह गर्व तभी स्वस्थ रहेगा, जब हम एक स्पष्ट रेखा खींचें –
भगवान राम और कृष्ण ईश्वर हैं,
पर हर महापुरुष ईश्वर नहीं है।
आंबेडकर, महात्मा गांधी, बिरसा, फुले, विवेकानंद, शिवाजी, भगत सिंह – ये सब महापुरुष हैं, प्रेरणा-पुंज हैं, पर ईश्वर नहीं।
उनकी मूर्ति, उनकी तस्वीर, उनकी शिक्षाएँ – इन सबका सम्मान हो, पर उन्हें आलोच्य, विचारणीय और पुनर्मूल्यांकन से ऊपर न बना दिया जाए।

यदि हम मनुष्यों को भगवान बनाते रहे, विधि-ग्रंथों को आसमानी किताब की तरह अचूक मानते रहे, और विचार की जगह व्यक्ति को सर्वोच्च रखते रहे, तो आने वाले समय में हिन्दू समाज को लंबे समय तक संगठित रखना लगभग असंभव हो जाएगा।

समय की माँग साफ़ है –
व्यक्ति-पूजा नहीं, विचार-पूजा।
महापुरुषों का अनुकरण, पर उनका भगवानकरण नहीं।
श्रद्धा के साथ विवेक, आस्था के साथ तर्क।

यही मार्ग हमें रोमन साम्राज्य की तरह पतन से बचाएगा,
और यही मार्ग हमें अपने राम-कृष्ण के योग्य समाज बनने की दिशा में ले जाएगा।

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