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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
मेरा सुधारवादियों से एक बुनियादी और सीधा प्रश्न है।
सनातन हिन्दू धर्म किसी एक ग्रंथ, एक विधान या एक मत-पंथ तक सीमित नहीं है। इसमें सहस्रों ग्रंथ हैं, अनेक दर्शन हैं और साकार तथा निराकार ब्रह्म की उपासना के असंख्य मार्ग हैं। कोई निर्गुण को सत्य मानता है, कोई सगुण साकार को, और कोई दोनों को एक ही तत्त्व की भिन्न अभिव्यक्तियाँ स्वीकार करता है। अब यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इतिहास के किस कालखंड में किसी एक स्मृति—विशेषतः मनुस्मृति—को सम्पूर्ण हिन्दू समाज पर सार्वकालिक और अनिवार्य क़ानून के रूप में लागू किया गया था। स्वयं स्मृतियाँ अनेक हैं और उन्हें देश, काल तथा सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार मान्य माना गया है। आज के समय में भी यह तथ्य सामने है कि बहुत कम हिन्दू परिवार अपने जीवन-व्यवहार को किसी स्मृति-ग्रंथ के निर्देशों के अनुसार संचालित करते हैं।
सनातन परम्परा की एक विशिष्टता यह है कि इसमें आस्तिक और नास्तिक—दोनों के लिए स्थान रहा है। लोक-परम्पराएँ, क्षेत्रीय आस्थाएँ, दार्शनिक मत, साधना-पद्धतियाँ और सामाजिक व्यवहार—इन सबका समन्वय ही हिन्दू धर्म की वास्तविक संरचना करता है। यहाँ धर्म किसी एक विचार को थोपने का उपकरण नहीं, बल्कि जीवन को धारण करने की पद्धति के रूप में विकसित हुआ है।
सनातन परम्परा में ईश्वर की कल्पना भी इसी निकटता के साथ की गई है। ईश्वर केवल दूर बैठा हुआ न्यायाधीश नहीं, बल्कि जीवन के साथ चलने वाला तत्त्व है—कहीं पिता के रूप में, कहीं भ्राता के रूप में, कहीं सखा के रूप में। भगवान नारायण जब श्रीराम के रूप में अवतरित हुए, तो उन्होंने स्वयं को सर्वशक्तिमान शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी उन्होंने वनगमन स्वीकार किया, ऋषि-मुनियों, वनवासियों, वानरों और रीछों के साथ जीवन बिताया और उन्हीं के सहयोग से रावण से युद्ध किया। यदि वे चाहते, तो राजसत्ता और विशाल सेना के बल पर भी युद्ध संभव था, परन्तु उन्होंने लोक के साथ खड़े होकर संघर्ष का मार्ग चुना। यही लोकधर्मी दृष्टि श्रीकृष्ण के जीवन में भी दिखाई देती है। देवी-परम्परा में जगज्जननी को करुणा, ममता और संरक्षण का स्वरूप माना गया है, जो भक्तों के जीवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी रहती हैं।
इसके विपरीत, अब्राहमिक मजहबी परम्पराओं में ईश्वर की संकल्पना एक दूरस्थ, सर्वशक्तिमान न्यायाधीश के रूप में की गई है, जो सातवें आसमान में स्थित होकर क़यामत या जजमेंट-डे के दिन अंतिम निर्णय देता है। वहाँ पाप और पुण्य की व्यवस्था एक ही जीवन और एक निर्णायक दिन तक सीमित मानी जाती है। क्षमा और दण्ड ईश्वर की इच्छा पर निर्भर होते हैं, न कि कर्म की अनिवार्य परिणति पर। इन मजहबी ढाँचों में असहमति को वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि ईश्वर-विरोध और ईशनिंदा के रूप में देखा गया।
इतिहास इसका साक्षी है कि इन मजहबों में प्रश्न करने वालों, आलोचना करने वालों और उन्हें न मानने वालों को जीवित जलाया गया, मारा गया और यातनाएँ दी गईं। चर्च-प्रणाली के अंतर्गत ‘हेरिटिक’ घोषित कर लोगों को आग में झोंका गया, इनक्विज़िशन जैसे अभियानों में असंख्य लोग मारे गए। इस्लामी शासन क्षेत्रों में ‘काफ़िर’ और ‘मुर्तद’ घोषित कर हत्या और बहिष्कार की परम्पराएँ रहीं। मूर्ति-भंजन भी केवल सांस्कृतिक टकराव नहीं था, बल्कि आस्था-निषेध का साधन रहा। भारत सहित अनेक क्षेत्रों में मंदिरों, मूर्तियों और पूजा-स्थलों को इसलिए नष्ट किया गया क्योंकि वे उस मजहबी ईश्वर-कल्पना से मेल नहीं खाते थे। यह प्रवृत्ति अतीत तक सीमित नहीं रही; आज भी मूर्तियाँ तोड़ी जाती हैं।
इन मजहबी अवधारणाओं में ‘नॉन-बिलीवर’ या ‘काफ़िर’ को समान अधिकार वाला मानव नहीं माना गया। अनेक व्याख्याओं में यह धारणा रही कि अविश्वासी को जीवित रहने का अधिकार नहीं है, या वह धार्मिक रूप से हीन है। क़यामत और जजमेंट-डे से जुड़ी मान्यताओं में यह विचार भी मिलता है कि अंतिम निर्णय से पूर्व संसार से अविश्वासियों का अंत होना चाहिए। इसके बावजूद, इन मजहबों के भीतर सुधार, आत्मालोचना या पुनर्विचार की सामाजिक माँग दिखाई नहीं देती।
इसके विपरीत, हिन्दू समाज में ग्रंथों की आलोचना और यहाँ तक कि ग्रंथ-दहन तक की घटनाएँ हुई हैं। रामचरितमानस और मनुस्मृति को जलाने की घटनाएँ सार्वजनिक रूप से हुईं। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं द्वारा रामचरितमानस पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के समर्थकों द्वारा मनुस्मृति-दहन ऐतिहासिक तथ्य है। इन सबके बावजूद, किसी को ईशनिंदा के आरोप में जीवित नहीं जलाया गया, न भीड़ द्वारा मार दिया गया। विरोध हुआ, तीखा हुआ, परन्तु विचार और असहमति को हिंसक दमन में नहीं बदला गया।
अब यहाँ एक सहज प्रश्न उठता है। यदि किसी ने कर्म-सिद्धान्त की बात की, या यह कहा कि पापों की क्षमा किसी दूरस्थ ईश्वर द्वारा नहीं होती—तो क्या हिन्दू समाज ने उसे ईशनिंदा के आरोप में जिंदा जला दिया? क्या मूर्तिपूजा और पुराणों की आलोचना करने पर स्वामी दयानन्द सरस्वती को जीवित जलाया गया? नहीं। इसके विपरीत, उन्हें ‘महर्षि’ की उपाधि दी गई। उनकी आलोचना एक वैचारिक धारा बनी, न कि अपराध।
हिन्दू परम्परा में वेदों, उपनिषदों, पुराणों और यहाँ तक कि ईश्वर की अवधारणा पर भी प्रश्न उठाए गए। चार्वाक दर्शन वेदों को प्रमाण नहीं मानता, फिर भी उसे भारतीय दार्शनिक परम्परा से बाहर नहीं किया गया। बौद्ध और जैन दर्शनों ने वेदों की सत्ता अस्वीकार की, फिर भी उन्हें सम्मान मिला। कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार करने के कारण उन्हें पूर्णतः नास्तिक नहीं माना गया। गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार किया जाना सनातन परम्परा की समावेशी प्रवृत्ति को दर्शाता है।
यही कारण है कि प्रश्न और गहरा हो जाता है। जो धर्म आलोचना सहता है, ग्रंथ-दहन सहता है, असहमति को स्थान देता है—उसी धर्म में बार-बार कमियाँ गिनाकर सुधार और क्रान्ति की बात क्यों की जाती है। और जिन मजहबों का इतिहास प्रश्न करने वालों को जलाने, मारने, मूर्तियाँ तोड़ने और अविश्वासियों के अस्तित्व को नकारने से भरा रहा है—उनके भीतर सुधार की चर्चा क्यों नहीं होती। यह असमान दृष्टि स्वयं में एक वैचारिक पक्षपात को उजागर करती है।
मेरा तथाकथित सुधारवादियों से एक सीधा और बुनियादी प्रश्न है।
क्या यही प्रश्न पैग़म्बर मोहम्मद, जीसस क्राइस्ट और मूसा के जीवन-चरित्रों पर पूछे जा सकते हैं? क्या उनकी उसी प्रकार सार्वजनिक आलोचना सम्भव है, जैसी सनातन वैदिक परम्परा में भगवानों की होती रही है, वेदों-उपनिषदों की होती रही है? क्या इस्लाम, ईसाईयत और यहूदी मज़हबों में यह व्यवहारिक रूप से सम्भव है?
इसी प्रश्न से जुड़ा दूसरा, और अधिक ठोस प्रश्न उनकी मज़हबी पुस्तकों को लेकर है।
क्या क़ुरान, बाइबिल या यहूदी मज़हबी पुस्तक को उसी प्रकार सार्वजनिक रूप से अस्वीकार या जलाया जा सकता है, जैसे भारत में मनुस्मृति जलाई गई? कुछ वर्ष पहले एक नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थकों द्वारा रामचरितमानस तक जलाया गया। इन घटनाओं पर विवाद हुआ, विरोध हुआ, पर ईशनिंदा के नाम पर संगठित हत्या को सामाजिक या कानूनी स्वीकृति नहीं मिली। क्या ऐसा व्यवहार पैग़म्बर-केन्द्रित मज़हबी व्यवस्थाओं में सम्भव है—यह प्रश्न तथाकथित सुधारवादी अवश्य स्पष्ट करें।
जो लोग सनातन धर्म में सुधार की बातें करते हैं, वे यह भी समझें कि सनातन किसी एक ग्रंथ या एक व्यक्ति पर खड़ा नहीं है। यह हजारों-लाखों ग्रंथों और दर्शनों की परम्परा है। यहाँ निराकार से साकार तक, आस्तिक से नास्तिक तक विचारों की पूरी श्रृंखला है। नौ दर्शन हैं; वेदान्त की अनेक धाराएँ हैं—द्वैत, अद्वैत और विशिष्टाद्वैत। सांख्य और योग के साथ बौद्ध और चार्वाक जैसे दर्शन भी इसी बौद्धिक परम्परा का हिस्सा रहे हैं। वैष्णव, शाक्त और कश्मीर शैव जैसी धाराएँ साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलता के कारण यहाँ प्रश्न और असहमति को विचार का अंग माना गया।
धार्मिक आचरण के स्तर पर भी यही बहुलता दिखती है। कुल-देवता, ग्राम-देवता, स्थान-देवता और प्रकृति-तत्त्व—जल, वायु, अग्नि, आकाश और पृथ्वी—की उपासना की परम्परा रही है। ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ज्ञान, भक्ति और कर्म—तीनों मार्गों को मान्यता दी गई। यहाँ धर्म किसी आदेश-सूची का नाम नहीं, बल्कि जीवन और सृष्टि के साथ संतुलन का नियम है।
अब व्यवहारिक तथ्यों पर आइए।
पैग़म्बर मोहम्मद से जुड़े कार्टूनों के प्रकाशन पर विभिन्न देशों में हिंसक प्रतिक्रियाएँ हुईं और लोगों की हत्या तक की गई—यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज तथ्य है। भारत में एक टीवी बहस के दौरान नुपुर शर्मा ने यह कहा कि बहस में उपस्थित एक मुस्लिम मौलवी ने उनके आराध्य भगवान शिव पर आपत्तिजनक टिप्पणी की। उसी संदर्भ में उन्होंने इस्लामी मज़हबी पुस्तकों से जुड़े कुछ प्रश्न रखे। इसके बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर “सर तन से जुदा” जैसे नारे लगे—यह असहमति नहीं, प्रत्यक्ष हिंसा की धमकी थी।
इसी पृष्ठभूमि में राजस्थान के उदयपुर में दर्जी कन्हैयालाल की हत्या हुई। जाँच एजेंसियों के अनुसार, यह हत्या नुपुर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया गतिविधि से जोड़कर की गई। इसी प्रकार महाराष्ट्र के अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या हुई, जहाँ भी कारण अभिव्यक्ति और समर्थन बताया गया। इन मामलों में न कोई दंगा था, न कोई युद्ध—व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के बाद लक्षित हिंसा हुई। यह तथ्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
अब इसी कसौटी पर सनातन परम्परा के भीतर की घटनाएँ देखिए।
“कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी” शीर्षक से एक पुस्तक लिखी गई थी। वह प्रकाशित हुई, कई स्थानों पर जलाई भी गई, विरोध हुआ—पर न पुस्तक से जुड़े व्यक्ति की हत्या हुई, न समर्थन करने वालों पर संगठित हिंसा हुई। विचार का उत्तर विचार से दिया गया—यह मूल अंतर है।
इतिहास में पीछे जाएँ तो यही अंतर और स्पष्ट हो जाता है।
बीसवीं सदी के आरम्भ में “रंगीला रसूल” नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के प्रकाशक राजपाल महाशय थे। यह पुस्तक पैग़म्बर मोहम्मद के जीवन से जुड़े इस्लामी स्रोतों के आधार पर लिखी गई थी। ब्रिटिश शासन के समय इस पर मुक़दमे चले; न्यायालय में बहस हुई और कानूनी स्तर पर पुस्तक के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हुई।
लेकिन न्यायालयीन प्रक्रिया के समाप्त होने के बाद भी सामाजिक उग्रता समाप्त नहीं हुई। परिणामस्वरूप पहले राजपाल महाशय की हत्या की गई और बाद में स्वामी श्रद्धानंद की भी हत्या कर दी गई। यह स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है। यहाँ प्रश्न या पुस्तक का उत्तर तर्क से नहीं, हिंसा से दिया गया।
यहीं मूल भेद स्पष्ट होता है।
जहाँ पूरा मज़हब एक पैग़म्बर और एक आसमानी किताब पर आधारित हो, वहाँ प्रश्न पूरे ढाँचे पर हमला माना जाता है और उसका उत्तर अक्सर दण्ड के रूप में दिया जाता है। इसके विपरीत, सनातन धर्म किसी एक व्यक्ति या एक ग्रंथ पर आधारित नहीं है। इसलिए यहाँ प्रश्न परम्परा को तोड़ता नहीं, बल्कि उसी का हिस्सा बनता है।
क्या यह बात अब्राहमिक मज़हबों में सम्भव है?
जिस सनातन परम्परा में मनुस्मृति को जलाने वाले भी आए, विश्वविद्यालय जलाने वाले भी आए, जहाँ तरह-तरह के सुधारक उठे, शोर मचाया और समय के साथ मिट गए—वही सनातन परम्परा आज भी उसी विराट रूप में खड़ी है। यह परम्परा किसी एक पुस्तक या एक व्यक्ति पर टिकी नहीं है। यह समुद्र की तरह है। जैसे गंगा में हजारों नदियाँ आकर मिलती हैं, फिर भी गंगा की पहचान नष्ट नहीं होती। वह गंगा ही रहती है और अंततः गंगासागर में विलीन हो जाती है। उसी तरह सनातन धर्म में हजारों मत, विचार और धाराएँ आईं, मिलीं, समाहित हुईं—पर धर्म की मूल धारा बनी रही।
पर्वतराज हिमालय हजारों वर्षों से आँधियाँ, तूफ़ान, भूकम्प और मौसम के प्रहार सहता आया है, फिर भी अडिग खड़ा है। क्या हिंदू धर्म में सुधार की बात करने वाले यह बता सकते हैं कि क्या वे सूर्य के उदय को रोक सकते हैं और पूरे जगत को अंधकार में डुबो सकते हैं? क्या वे नदियों का प्रवाह रोक सकते हैं, महासागर या हिमालय को उसकी जगह से हटा सकते हैं? क्या वे प्राणवायु को रोक सकते हैं, अग्नि को बुझा सकते हैं, या आकाश को समाप्त कर सकते हैं? यदि यह सब सम्भव नहीं, तो फिर सृष्टि के नियमों में सुधार कैसे किया जा सकता है?
क्योंकि धर्म कोई मानव-निर्मित व्यवस्था नहीं है। धर्म सृष्टि का शाश्वत नियम है। सृष्टि के नियमों में संशोधन नहीं होता। समय के साथ युगधर्म बदलता है, आचार बदलते हैं, समाज बदलता है, पर ऋत—कॉस्मिक ऑर्डर—नहीं बदलता। प्रकृति स्वयं संतुलन करती है। मनुष्य उसे बदल नहीं सकता, केवल समझ सकता है।
यह जगत परम ब्रह्म का रंगमंच है। इसी कारण ब्रह्म का एक नाम परमानंद कहा गया है। सृष्टि किसी भय, दंड या न्यायालय के लिए नहीं बनी; उसका स्वभाव आनंद है। यह संसार सृष्टि, लय और प्रलय के क्रम में वैसे ही चलता रहता है जैसे दिन और रात होते हैं, जैसे जन्म और मृत्यु का क्रम चलता है। समय बदलता है, युग बदलते हैं, विचारधाराएँ आती-जाती रहती हैं। सुधार की बातें करने वाले भी आते हैं और चले जाते हैं, पर धर्म के मूल सिद्धांत न कभी बदले हैं और न उनका स्वरूप बदला है। क्योंकि धर्म किसी मत या व्यवस्था का नाम नहीं, सृष्टि का शाश्वत नियम है।
इसी संदर्भ में हिंदू धर्म में सुधार की बात करने वालों से कुछ मूल प्रश्न उठते हैं।
क्या अर्जुन की तरह प्रश्न करने की स्वतंत्रता अब्राहमिक मज़हबों में है? क्या वहाँ उनके पैग़म्बर या दूतों से जीवन, कर्म, हिंसा, भय और मोक्ष पर वैसे प्रश्न किए जा सकते हैं, जैसे अर्जुन ने युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण से किए थे? अर्जुन ने अपने ही धर्म पर संशय किया, अपने ही कर्म पर प्रश्न उठाया—और उसे न तो चुप कराया गया, न दंडित किया गया। संवाद हुआ, विस्तार से उत्तर मिला, और अंत में निर्णय उसी पर छोड़ा गया।
यह भी बताया जाए कि क्या अब्राहमिक मतों की पुस्तकों में यह नहीं कहा गया कि उनके मज़हब को न मानने वाले काफ़िर या नॉन-बिलीवर हैं और उनके लिए जहन्नुम निश्चित है। स्वर्ग और जन्नत की अवधारणा सातवें आसमान में बैठे ईश्वर या अल्लाह द्वारा दी जाने वाली कृपा के रूप में रखी जाती है। यह अधिकार किस आधार पर दिया जाता है, इसका निर्णय कौन करता है—इन प्रश्नों पर वहाँ सुधार की चर्चा क्यों नहीं होती?
हर बार कमियाँ केवल हिंदू धर्म में ही क्यों खोजी जाती हैं—यह भी विचार का विषय है। यदि सुधार की इतनी ही आवश्यकता वहाँ भी होती, तो अब्राहमिक परम्पराओं में डॉक्टर आंबेडकर, सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा फुले या महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे लोग क्यों नहीं जन्म लेते? यहाँ इन लोगों ने ग्रंथों पर प्रश्न उठाए, सामाजिक व्यवस्थाओं की आलोचना की, फिर भी उन्हें सुना गया, उनके विचारों पर बहस हुई और वे सनातन परम्परा के भीतर ही स्वीकार किए गए।
वास्तविक समस्या यह है कि सनातन धर्म को अब्राहमिक चश्मे से देखने की कोशिश की जा रही है। जबकि सनातन दृष्टि सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप—सत्त्व, रजस और तमस—को समझने की बात करती है। मनुष्य, समाज और प्रकृति—सब इन्हीं गुणों के संतुलन या असंतुलन से चलते हैं। यही कारण है कि सनातन परम्परा जीवन को आनंदमयी मानती है और मनुष्य को भी आनंदपूर्वक जीने की राह दिखाती है।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कोई अलग-अलग खांचे नहीं हैं; ये जीवन की एक ही यात्रा के पड़ाव हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था भी किसी को बाँधने या दबाने के लिए नहीं बनी थी, बल्कि गुण, कर्म और अवस्था के अनुसार जीवन को समझने की स्वाभाविक पद्धति थी। यही स्वधर्म है—अपने स्वभाव और उत्तरदायित्व के अनुसार कर्म करना। जब व्यक्ति अपने स्वधर्म में स्थित होता है, समाज संतुलित रहता है; और जब समाज संतुलित रहता है, वही विश्व-धर्म की स्थिति बनती है।
अब्राहमिक दृष्टि से जब धर्म को देखा जाता है, तब सुधारवाद की बेचैनी बनी रहती है। जबकि सनातन परम्परा कहती है—सुधार वहाँ आवश्यक है जहाँ अधर्म है। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि धर्म की स्थापना करना हर धर्मनिष्ठ व्यक्ति का कर्तव्य है; और इसी भाव से यह भी कहा गया—धर्म की रक्षा करोगे तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा ।
सनातन वैदिक परम्परा कभी यह नहीं कहती कि पहले बाहर की दुनिया बदली जाए। वह कहती है—पहले अपने भीतर देखो। अपने कर्मों को समझो, अपने गुणों को पहचानो, अपने अहंकार और लोभ को देखो। यही वास्तविक सुधार है। स्वधर्म का पालन, कर्मों की शुद्धि और परम तत्त्व को जानने की आकांक्षा—यही मार्ग है। जब मनुष्य स्वयं को सुधारता है, तभी वह उस स्थिति तक पहुँचता है जहाँ परम तत्त्व से एकत्व सम्भव होता है, जहाँ शिव-तत्त्व का बोध होता है।
इसी सनातन दृष्टि को आदि शंकराचार्य ने स्पष्ट किया। वे अद्वैत वेदांत के आचार्य थे, ज्ञान मार्ग के प्रधान प्रवक्ता थे। उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और गीता पर भाष्य लिखकर यह बताया कि परम तत्त्व का साक्षात्कार ज्ञान से होता है। लेकिन उन्होंने यह भी समझा कि प्रत्येक साधक एक ही स्तर पर नहीं होता। इसलिए उन्होंने सामान्य जन के लिए भज गोविंदं, भज गोविंदं, मूढ़मते कहा।
इसका अर्थ यह नहीं था कि ज्ञान का निषेध किया जाए। इसका अर्थ यह था कि केवल शुष्क तर्क और शब्द-विवाद में उलझकर जीवन का उद्देश्य प्राप्त नहीं होता। नाम-स्मरण से चित्त शुद्ध होता है, कर्म-मार्ग से आचरण संयमित होता है, और ज्ञान-मार्ग से आत्म-तत्त्व का बोध होता है। यही सनातन की विशेषता है—यह किसी एक मार्ग को अंतिम नहीं मानता, बल्कि ज्ञान, भक्ति और कर्म—तीनों का समन्वय करता है।
यही कारण है कि सनातन वैदिक हिन्दू परम्परा में ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यहाँ भक्ति चित्त की एकाग्रता है, कर्म कर्तव्य-बोध है, और ज्ञान आत्म-साक्षात्कार है। जब ये तीनों एक साथ चलते हैं, तभी जीवन में संतुलन और पूर्णता आती है।
सनातन की यात्रा इसी समन्वय से आगे बढ़ती है—
कर्म से स्वधर्म तक,
स्वधर्म से राष्ट्रधर्म तक,
और राष्ट्रधर्म से विश्व-धर्म तक।
अपने कर्मों को समझना, अपने दायित्वों का पालन करना, अपने चित्त को शुद्ध रखना और आत्म-तत्त्व को पहचानना—यही धर्म है। यही उसका विराट स्वरूप है। यही उसका आनंद है। और यहीं आकर तर्क अपने आप शांत हो जाते हैं, क्योंकि तब बात केवल बुद्धि की नहीं रहती, अनुभूति की हो जाती है।
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