सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

आवागमन का सिद्धान्त और हिन्दू एकता का दार्शनिक आधार


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारतीय दर्शन की परम्परा में कर्म और पुनर्जन्म जीवन को समझने की मूल कुंजी रहे हैं। इसी कारण भारतीय चिन्तन में जीवन को केवल एक जन्म तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे कर्मों की निरन्तर शृंखला के रूप में देखा गया। भारतीय दर्शन की परम्परा में सामान्यतः नौ दर्शनों की चर्चा की जाती है। इनमें षड्दर्शन—न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त—आत्मा, कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म को स्वीकार करते हैं। ब्रह्म के स्वरूप को लेकर इनमें मतभेद अवश्य हैं, किंतु कर्म-फल और आवागमन का सिद्धान्त इन सभी दर्शनों में समान रूप से विद्यमान है।

इनके अतिरिक्त बौद्ध और जैन दर्शन भी कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म को स्वीकार करते हैं। जैन दर्शन जीव को कर्म-बन्धन में आबद्ध मानता है और उसी बन्धन से मुक्ति को मोक्ष कहता है। बौद्ध दर्शन स्थायी आत्मा की संकल्पना को स्वीकार नहीं करता, पर चित्त-सन्तान या विज्ञान-प्रवाह के रूप में कर्मानुसार पुनर्जन्म को मानता है। वेद-प्रामाण्य को न मानने के कारण इन्हें परम्परागत रूप से नास्तिक दर्शन कहा गया, परन्तु कर्म और पुनर्जन्म के प्रश्न पर वे भारतीय चिन्तन से बाहर नहीं जाते। इसके विपरीत चार्वाक दर्शन ही ऐसा एकमात्र दर्शन है, जो आत्मा, ब्रह्म, कर्म-सिद्धान्त, पुनर्जन्म और वेद—इन सभी का निषेध करता है। इस प्रकार भारतीय दर्शन की समग्र परम्परा में आठ दर्शन कर्म और पुनर्जन्म को स्वीकार करते हैं और केवल चार्वाक दर्शन इस धारा से पृथक खड़ा दिखाई देता है।

इसी अविच्छिन्न भारतीय दार्शनिक परम्परा में संत गुरु गोविन्द सिंह जी का चिन्तन स्थित है। दशम ग्रन्थ में पुनर्जन्म कोई अप्रत्यक्ष संकेत या सांकेतिक विचार नहीं है, बल्कि स्पष्ट रूप से प्रतिपादित सिद्धान्त है। गुरु गोविन्द सिंह जी स्वयं अपने अवतरण को ईश्वर की प्रेरणा से जोड़ते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि उनका जन्म किसी आकस्मिक सामाजिक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि दैवी प्रयोजन से हुआ है। विचित्र नाटक में यह भाव बार-बार प्रकट होता है कि जीवात्मा अपने कर्मों और ईश्वर की आज्ञा के अधीन देह धारण करती है।

दशम ग्रन्थ में पुनर्जन्म का सबसे स्पष्ट और व्यापक प्रतिपादन विचित्र नाटक के उस प्रसिद्ध अंश में मिलता है, जहाँ गुरु गोविन्द सिंह जी समस्त योनियों का वर्णन करते हुए कहते हैं—

केते कच्छ मच्छ केते उन कउ करत भच्छ,
केते अच्छ बच्छ हुइ सपच्छ उड जाहिंगे।
केते नभ बीच अच्छ पच्छ कउ करेंगे भच्छ,
केते प्रतच्छ हुए बचाइ खाड़ जाहिंगे।
काल के बनाइ सबै काल ही चबाहिंगे।
तेज जिऊँ अतेज में अतेज जेसे तेज लीन,
ताही ते उपज सबै ताही में समाहिंगे॥
(विचित्र नाटक, पृष्ठ ४१)

यहाँ दशम ग्रन्थ पुनर्जन्म को केवल मनुष्य तक सीमित नहीं करता, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को कर्म और काल के अधीन दिखाता है। कछुए, मछलियाँ, पशु, पक्षी, आकाश में विचरण करने वाले जीव—सब अपने कर्मों के अनुसार योनियाँ प्राप्त करते हैं। कोई भी जीव काल से मुक्त नहीं है। सभी योनियाँ काल द्वारा रची गई हैं और काल ही उनका भक्षण करता है। अंततः सभी उसी परम सत्ता से उत्पन्न होकर उसी में विलीन हो जाते हैं। यह कथन पुनर्जन्म को किसी धार्मिक कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि-नियम के रूप में प्रस्तुत करता है।

दशम ग्रन्थ के अनुसार जीवात्मा अपने कर्मों का फल भोगने के लिए बार-बार जन्म लेती है। यही पुनर्जन्म-सिद्धान्त का मूल है। जैसा कर्म, वैसी योनि—यह नियम अटल है। इसी कारण मनुष्य-योनि को गुरु गोविन्द सिंह जी विशेष महत्त्व देते हैं। यह योनि इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं कि यहाँ भोग के साधन अधिक हैं, बल्कि इसलिए कि यहाँ विवेक और कर्म-चयन की क्षमता है। उत्तम कर्मों के द्वारा आवागमन के बन्धनों से मुक्त होना ही जीव का परम धर्म कहा गया है।

आवागमन से मुक्ति के विषय में दशम ग्रन्थ किसी पलायनवादी वैराग्य का समर्थन नहीं करता। गुरु गोविन्द सिंह जी स्पष्ट रूप से उस वैराग्य की आलोचना करते हैं, जो संसार को पूर्णतः मिथ्या बताकर मनुष्य को कर्तव्य से विमुख कर देता है। मध्यकालीन संत-परम्परा की भाँति उनका यह दृढ़ विश्वास है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ईश्वर की आराधना और मुक्ति सम्भव है। स्वयं वे लौकिक जीवन के उत्तरदायित्वों के निर्वाह को अनिवार्य मानते हैं और कहते हैं कि संघर्षमय जीवन जीते हुए भी जन्म-जन्मान्तर के बन्धनों से मुक्त हुआ जा सकता है—

छत्री के पूत हीं बामन को नहिं के तपु आवत है जु कीं।
अस अउर जंजार जितो गृह को, तुहि त्याग कहा चित तामै धरौं॥
(अकाल स्तुति, छन्द ८८)

दशम ग्रन्थ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल शुष्क ज्ञान, तीर्थ, व्रत, तप, उपवास, स्नान या मंत्र-पाठ से पुनर्जन्म के भय से मुक्ति सम्भव नहीं है। यदि जीवन का आचरण नहीं बदलता, तो ये सब निरर्थक हैं—

लिख पढ़ं थाके जंत्र मंत्र हारे।
कितिओ तंत्र साधे जु जनम बिताओ।
मस्ट फोकटं एकै काज न आयो॥
(अकाल स्तुति)

गुरु गोविन्द सिंह जी के अनुसार जन्म-मरण के भय से मुक्त करने वाली एक ही शक्ति है—प्रभु की निश्छल भक्ति और निष्काम कर्म। बिना प्रभु की शरण के न सुख सम्भव है, न मुक्ति—

बिना सरन ताकी न अठरे उपायं।
(विचित्र नाटक)

सनातन वैदिक धर्म से निकली जितनी भी शाखाएँ हैं—चाहे वे वैदिक दर्शनों की परम्परा हों, बौद्ध और जैन चिन्तन हों या सिख परम्परा—सभी ने किसी न किसी रूप में कर्म के विधान और आवागमन के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। यही वह साझा दार्शनिक आधार है, जिस पर भारतीय सभ्यता की विविध धाराएँ खड़ी रही हैं। दशम ग्रन्थ इसी निरन्तरता का साक्ष्य है, जहाँ जीवात्मा का पुनर्जन्म, कर्मफल की अनिवार्यता और मनुष्य-योनि की नैतिक जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होती है। यदि आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म जैसे मूल सिद्धान्तों को अलग रखकर हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व या हिन्दू एकता की परिभाषा गढ़ने का प्रयास किया जाएगा, तो वह परिभाषा अपनी ही जड़ों से कट जाएगी। वास्तविक एकता उसी वैचारिक भूमि पर सम्भव है, जहाँ जीवन को केवल वर्तमान क्षण का उपभोग नहीं, बल्कि कर्म के दीर्घ उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाता है। दशम ग्रन्थ का पुनर्जन्म-दर्शन इसी सत्य की ओर लौटने का आग्रह है—और वही आग्रह हिन्दू एकता का वास्तविक आधार बन सकता है।

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