सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सनातन भारत की आत्मा: उत्सव केवल प्रतिक्रिया नहीं, जीवन-पद्धति है🌹

🎯सनातन भारत की आत्मा: उत्सव केवल प्रतिक्रिया नहीं, जीवन-पद्धति है🌹
 (पवन खेड़ा और कांग्रेस के समर्थन में।)

👉भारत कोई संयोग का राष्ट्र नहीं, यह सृष्टि–बोध से जन्मी सभ्यता है। वैदिक परंपराओं की यह भूमि हजारों वर्षों से नवचेतना, सह-अस्तित्व और सर्वत्र मंगलकामना का संदेश देती आई है। यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के प्रति संवेदना है। यही कारण है कि भारत में त्योहार आवेग नहीं, आविर्भाव हैं- रोज़मर्रा के जीवन में दिव्यता का उत्सव।

किन्तु पिछले कुछ वर्षों में एक नई प्रवृत्ति उभर रही है, जो चिंताजनक भी है और दुखद भी- जब कुछ लोग केवल दो-तीन त्योहारों पर, वह भी विवादास्पद स्थानों पर जाकर, राम धुन, डीजे, चालीसा या नारे लगाने को ही “धर्म” समझ बैठे हैं। यह दृश्य सनातन की उस विशालता से एकदम विपरीत है जहाँ पूजा, उपासना और उत्सव का स्वरूप आत्मा से निकलता है, आक्रोश से नहीं।

💥कौन हैं ये लोग?
ये वे लोग हैं जो दशकों तक फैले राजनीतिक तुष्टीकरण, विभाजनकारी सेक्युलरवाद और कांग्रेस द्वारा बोए गए सांस्कृतिक अविश्वास के बीजों से उपजे हैं।
यह वही “खरपतवार” है जिसने न सनातन की आत्मा को जाना, न उसकी विशालता को।
कभी मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर देश की रीति-नीति को तोड़ा गया, कभी चर्च के हितों के लिए अपने ही लोगों की पहचान को कुचल दिया गया, और जब हवा बदली तो यही वर्ग अब नया मुखौटा पहनकर कहीं चालीसा पढ़ता दिखाई दे रहा है, कहीं टोपी ओढ़कर धार्मिकता का प्रदर्शन करता है।
परंतु यह व्यवहार न तो सनातन का है, न भारत का।
यह तो राजनीतिक मानसिकता का अवशेष है—जो धर्म को संस्कृति नहीं, बल्कि टकराव का औजार मानती है।

💥सनातन केवल दो-तीन त्योहारों का नाम नहीं
सनातन धर्म 365 दिनों का उत्सव है- आरती, उपवास, पर्व, संस्कार, साधना, यात्रा, सेवा- यह सब जीवन का हिस्सा है।
यहाँ दीपावली से लेकर नवरात्रि तक, मकर संक्रांति से लेकर राम नवमी तक, गंगा दशहरा से कार्तिक पूर्णिमा तक… हर तिथि में एक संदेश है, हर क्षण में एक पवित्रता। जब सनातन समाज केवल कुछ मौकों पर ही उत्सव मनाकर अपनी पहचान खोजता है, तब वह अपनी ही विरासत को सीमित कर देता है। सनातन की शक्ति निरंतरता में है, विस्तार में है, सह-अस्तित्व में है—न कि किसी एक दिन की प्रतिक्रिया में।

💥धार्मिक संस्थानों की भूमिका - दिशा दिखाने का समय
आज समय है कि हमारे मठ, अखाड़े, मंदिर- समितियाँ, सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, गुरुकुल, पीठाधीश, आचार्य और आध्यात्मिक संस्थाएँ आगे आएँ और समाज को यह प्रेरणा दें कि:-
• भरत भूमि के उत्सव हर उपासना स्थल के पास, शैक्षणिक, सांस्कृतिक स्थानों पर मनाया जाए- भारत में मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, आश्रम, मठ या मंदिर- हर स्थान भारत का अपना है।
• यह उत्सव शांति, प्रेम, संगीत, भजन, संवाद, सद्भाव से और सेवा से भरा हो, न कि टकराव से।
• सनातन समाज का हर पर्व ऐसा हो कि उसे देखकर दूसरे समुदायों में भी शांति और सांस्कृतिक सौहार्द की अनुभूति हो।
• हमारे धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन प्रतिवर्ष अपने यहाँ कम-से-कम एक सार्वभौमिक उत्सव ऐसा आयोजित करें जो सभी पड़ोसियों, सभी समुदायों को जोड़ने वाला हो।
क्योंकि भारत की सनातन चेतना- चिति केवल मंदिरों में नहीं गूँजती- वह हर गली, हर चौराहे, हर उपासना-स्थल में समाई है।

💥जीत किसकी होगी?
वह भारत की, सनातन सत्य संस्कृति की होगी- जो विभाजन नहीं, बोलता है। जो टकराव नहीं, जोड़ता है, जो दिखावा नहीं, दिशा देता है जो धर्म नहीं थोपता, बल्कि धर्म का प्रकाश फैलाता है।
सनातन धर्म की सुंदरता इसी में है कि वह “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के भाव से जन्मा है। यदि सनातन समाज अपने त्योहारों को हर दिन, हर स्थान, और हर समुदाय के साथ सह-अस्तित्व में मनाने लगे- तो न किसी पवन खेड़ा अथवा सेक्युलरपने के रोगी दलों को इससे शिकायत रहेगी,
न किसी राजनीति को भ्रम,
न किसी समाज में दूरी।

🌹 और सबसे महत्वपूर्ण- यही भारत की उस शाश्वत संस्कृति का पुनर्जागरण होगा, जो सदैव कहती है कि उत्सव मेरा धर्म नहीं - उत्सव मेरा जीवन है। इससे बड़ा समाधान निकलना संभव नहीं। हिन्दुत्व अपने नये कलेवर में सर्व समावेशी बनकर प्रस्तुत है। सबको गले लगा रहा है। आइये इससे जुड़कर हम सभी धर्म प्राण भारतीय एकाकार बने। और सभी के स्वस्थ, निर्दोष, सुदीर्घ, द्वेश रहित संस्कारित मंगलमय जीवन की कामना करें।🌹🙏
Kailash Chandra #kailash_chandra Deepak Dwivedi Anand Rana डॉ सुदीप शुक्ल

टिप्पणियाँ