सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

संघ और ब्राह्मण विमर्श : सूचना-युद्ध, मिथ्या फ्रेमिंग और फर्जी कथनों का नैरेटिव विज्ञान


👉आज सूचना स्वयं एक युद्ध का शस्त्र है। सोशल-मीडिया के युग में सत्य घर से निकलकर चप्पल पहनता है, तब तक झूठ दुनिया का चक्कर लगा आता है। इसी परिघटना का ताज़ा उदाहरण डॉ मोहन भागवत जी के नाम से परशुराम जी (संघ बनाम ब्राह्मण) को लेकर फैलाया गया फर्जी पोस्टकार्ड है, जिसमें ‘प्रभात खबर’ का लोगो, डिज़ाइन और रंगरूप कॉपी करके एक झूठा विवाद जन्म देने का प्रयास किया गया।
वायरल कार्ड में यह कथन जोड़ा गया- “परशुराम जी बढ़ई समाज के लकड़हारे थे… वो कोई ब्राह्मण पुत्र नहीं थे।” - मोहन भागवत

💥यह कथन न सिर्फ़ तथ्यहीन है, बल्कि जानबूझकर हिंदू धार्मिक परंपरा, वर्ण-परम्परा, और परशुराम जी की ऐतिहासिक-पौराणिक स्वीकृत छवि पर वैचारिक प्रहार है। जबकि प्रभात खबर के वास्तविक पोस्टकार्ड पर केवल इतना संदेश था- “यह भारत के लिए जीने का समय है, मरने का नहीं।” - मोहन भागवत
अर्थात वास्तविक कथन राष्ट्र की सकारात्मक प्रेरणा से जुड़ा था, लेकिन एडीटेड कार्ड द्वारा उसका पूरा फोकस बदल दिया गया। बाद में प्रभात खबर ने खुद फैक्ट-चेक प्रकाशित किया और स्पष्ट किया कि परशुराम वाला कथन कभी जारी नहीं किया गया, तथा यह उनके शैली-मानक से मेल भी नहीं खाता। आजतक, पीटीआई फैक्ट-चेक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों ने भी बताया कि वायरल कार्ड एडिटेड है और दावा झूठा है।
यह घटना सामान्य ‘फर्ज़ी पोस्ट’ भर नहीं, बल्कि #FramingByOmission और वैचारिक इकोसिस्टम के उपकरणों का उदाहरण है।

👉 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर समाज और मीडिया में दो अतिवादी विमर्श समानांतर रूप से गढ़े जा रहे हैं, जो परस्पर विरोधी होने के बावजूद एक ही वैचारिक उद्देश्य की ओर संकेत करते हैं।
पहला विमर्श यह प्रस्तुत करता है कि RSS एक ब्राह्मणिकल संस्थान है, जो हिंदू समाज में ब्राह्मण वर्चस्व, वर्ण-व्यवस्था और पितृसत्तात्मक मूल्यों को संरक्षित करता है। इस नैरेटिव में संघ की शाखाओं, विचारक-परंपरा और सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की अवधारणा को ब्राह्मणवाद के उपकरण के रूप में व्याख्यायित किया जाता है।

💥 वहीं दूसरा विमर्श बिल्कुल उलटा आरोप लगाता है कि RSS मूलतः ब्राह्मण-विरोधी है, क्योंकि वह जाति-आधारित उच्चता-दावों को चुनौती देता है, जाति-भेद मिटाने की बात करता है और दलित-पिछड़े समुदायों में व्यापक पैठ बनाता है। इस formulation में संघ पर “हिंदू एकता” के नाम पर ब्राह्मणिक पहचान को dilute करने का आरोप लगता है।

इसी तरह जातिगत भेदभाव (SC/ST/OBC विरोध) और धार्मिक भेदभाव (सिख- जैन- बौद्ध- मुस्लिम-ईसाई विरोध) के परस्पर-विरोधी आरोप लगाए जाते हैं। गोया संघ कभी बहुसंख्यकवादी ब्राह्मणवाद का प्रतिनिधि बना दिया जाता है, तो कभी ब्राह्मणिक परंपरा का विघटिक विरोधी।
ये दोहरे आरोप वास्तव में multidimensional confusion creation strategy का हिस्सा हैं। उद्देश्य है- १). संगठन की वैचारिक दिशा पर धुंध फैलाना २). समाज में अविश्वास और विभाजन उत्पन्न करना ३). संघ को नैतिक, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर संदिग्ध बनाना ४). समर्थन समूहों में असुरक्षा और विरोधाभास उत्पन्न करना है।

यह भ्रम-निर्माण Framing by Omission, identity manipulation तथा cultural semiotics के उपकरणों से संचालित होता है। इसलिए आवश्यक है कि आरोपों और विमर्शों का विश्लेषण तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भ और समाजशास्त्रीय अध्ययन के आधार पर किया जाए, न कि निर्मित नैरेटिव के आधार पर।

💥फर्जी कार्ड कैसे “नैरेटिव हथियार” बनते हैं?
सूचना-युद्ध में यह एक सुनियोजित प्रक्रिया होती है।पहले एक संदिग्ध कथन गढ़ा जाता है। अधिकतम भावनात्मक, विवादित और identity- linked। कथन को प्रामाणिकता का आवरण दिया जाता है।  नामी समाचार-पत्र का लोगो, फ़ॉन्ट और डिज़ाइन कॉपी। फिर इसे संरचनाओं के नेटवर्क में फैलाया जाता है।
• व्हाट्सऐप/फेसबुक फॉरवर्ड
• ट्वीटर outrage
• वैचारिक पृष्ठों द्वारा amplification -विरोधी राजनीतिक समूह इसे तुरन्त उठाता है। आक्रोश, हंगामा, सामाजिक विभाजन, जातिगत प्रतिक्रिया।

👉जब तक खंडन आता है, झूठ अपना उद्देश्य पूरा कर चुका होता है। यह “misinformation + ideological framing + psychological targeting” काcocktail है। उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को बदनाम करना नहीं, बल्कि सामाजिक मानस में संदेह, विभाजन और अविश्वास बोना है। क्यों अक्सर ऐसे फर्जी फ्रेमिंग “हिंदू प्रतीकों” पर होती है? क्योंकि सांस्कृतिक पहचान भावनात्मक है mythological figures समाज को एकजुट करते हैं। इसलिए उन पर आघात से विभाजन पैदा होता है। identity anxiety तेज़ फैलती है। विरोधी प्रतिक्रिया में खड़ा हो जाता है। यह वैचारिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सच्चाई नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया लक्ष्य होती है।

🌹 यह प्रकरण दिखाता है कि आज सूचना-युद्ध में वास्तविक संघर्ष तथ्य बनाम झूठ का नहीं, बल्कि perception बनाम सत्य का है। फर्जी कार्ड, selectively edited statements और Framing by Omission जैसे उपकरण ideological networks द्वारा योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किए जा रहे हैं। इसलिए जागरुक नागरिकों, पत्रकारों, सभ्य समाज, अध्ययन करने वालों और शोधकर्ताओं की भी जिम्मेदारी है कि स्रोत, संदर्भ और प्रामाणिकता की जांच करें, अन्यथा झूठ का विमर्श हमपर छाया रहेगा और सत्य चप्पल पहनकर घिसड़ घिसड़ कर रेंग रहा होगा। इस जाल (trapping) में बार बार फँसने वाले स्वयंभू बुद्धिमान, तर्कशील लोगों को, स्वयं की प्रबुद्धता पर आत्ममुग्धता वालों को, इस भार से स्वयं को - मुक्त मान लेना चाहिए। 🌹🙏
#kailash_chandra  Kailash Chandra

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