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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भ्रष्टाचार इस देश की आत्मा को बार-बार छलनी करता रहा है। यह कोई आज की बात नहीं है। पीढ़ियाँ बदल गईं, शासन बदले, नारे बदले, पर यह पीड़ा कहीं गई नहीं। जब भी हम राष्ट्र, धर्म, संस्कृति या भविष्य की बात करते हैं, यह विषय अपने-आप सामने आ खड़ा होता है। हम हिंदुत्व की बात करते हैं, सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की बात करते हैं, अखण्ड भारत, एकात्म मानववाद और सनातन आर्थिक मॉडल जैसे गम्भीर विषयों पर चर्चा करते हैं। राष्ट्र की एकता और अखण्डता की बात करते हैं। सब कुछ करते हैं, पर हर बार एक जगह आकर बात अटक जाती है—भ्रष्टाचार पर।
हमारे मन में आदर्शों की कोई कमी नहीं है। विचारों के स्तर पर हम बहुत समृद्ध हैं। पर जैसे ही इन विचारों को जीवन में उतारने की बात आती है, कोई न कोई समझौता सामने आ खड़ा होता है। तभी लगता है कि शायद समस्या केवल व्यवस्था की नहीं है, कहीं न कहीं हम सब उससे जुड़े हुए हैं। इसलिए भ्रष्टाचार हर विमर्श के केन्द्र में आ जाता है और वहीं ठहर जाता है।
आज की सरकार में ऐसे लोग हैं जो एकात्म मानववाद और हिंदुत्व की विचारधारा की बात करते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा अनुशासित, सादगीपूर्ण और दृढ़ संकल्प वाला नेतृत्व सामने है। इसके बावजूद जब नीचे तक देखते हैं, तो वही पुरानी शिकायतें, वही पुराने अनुभव सामने आते हैं। तब मन में प्रश्न उठता है—कमी कहाँ रह गई? विचारों में या उन्हें जीने वालों में?
हम यह भी जानते हैं कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी। पहले औपनिवेशिक शासन ने हमारी शिक्षा, संस्कृति और मूल्यबोध को कमजोर किया। उसके बाद तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात समाजवाद के नाम पर ऐसी नीतियाँ बनीं, जिनमें राज्य तो शक्तिशाली होता गया, पर व्यक्ति का नैतिक दायित्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया। अधिकार स्वाभाविक होते चले गए और कर्तव्य बोझ लगने लगे। यहीं से भ्रष्टाचार केवल अपराध नहीं रहा, बल्कि व्यवहार का हिस्सा बनता चला गया। आज स्थिति यह है कि यह रोग समाज के रक्त में घुल चुका है।
यदि इस रोग की समय रहते कठोर चिकित्सा नहीं हुई, तो यह देश को गहरे संकट में डाल देगा। हम रामराज्य की बात करते हैं और उसे साकार करने की इच्छा भी प्रकट करते हैं। पर रामराज्य केवल किसी शासन व्यवस्था का नाम नहीं था। वह आचरण की व्यवस्था थी। वहाँ धर्म का अर्थ था—कर्तव्य। आज हम रामराज्य की चर्चा तो करते हैं, पर यह स्वीकार करने से बचते हैं कि भ्रष्टाचार रहते हुए रामराज्य केवल कल्पना ही रह सकता है।
आज छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है। कई युवक सरकारी नौकरी की तैयारी केवल इसलिए करना चाहते हैं कि वहाँ अतिरिक्त अवैध आय की संभावना होती है—ऐसा वे खुले रूप में कहते हैं। यह सोच केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और सामान्य नागरिक—सभी किसी न किसी रूप में इस तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं। कोई रिश्वत देता है, कोई लेता है, कोई चुप रहता है। और यही चुप्पी इस व्यवस्था को चलाए रखती है।
अक्सर यह कहा जाता है कि भ्रष्टाचार की बात तो कम्युनिस्ट भी करते हैं। यह सही है कि वे समस्याएँ गिनाते हैं, आँकड़े रखते हैं और व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करते हैं। लेकिन यहीं आकर उनका विमर्श ठहर जाता है। वास्तव में वे किसी समस्या का समाधान नहीं देते। उनका सारा जोर सत्ता-संरचना, वर्ग-संघर्ष और नियंत्रण पर रहता है। वहाँ व्यक्ति का आचरण, समाज का चरित्र और नैतिक उत्तरदायित्व जैसे प्रश्न कभी केन्द्र में नहीं आते। परिणाम यह होता है कि व्यवस्थाएँ बदलती रहती हैं, नारे बदलते रहते हैं, पर भ्रष्टाचार हर नई संरचना में नया रूप लेकर सामने आ जाता है।
इसीलिए मैं यह लेख केवल समस्या गिनाने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। यहाँ भ्रष्टाचार को किसी एक प्रणाली की विफलता कहकर छोड़ नहीं दिया जाता। मेरा प्रयास उसकी जड़ तक जाने का है। सनातन धर्म की दृष्टि में भ्रष्टाचार मूलतः अधर्म का लक्षण है। जब समाज में धर्मबोध कमजोर पड़ता है, कर्तव्यभाव क्षीण होता है और मर्यादा जीवन से बाहर होने लगती है, तभी भ्रष्टाचार जन्म लेता है। इसलिए इसका समाधान केवल सत्ता परिवर्तन, कानून बनाने या नियंत्रण बढ़ाने में नहीं है। वास्तविक समाधान चरित्र के पुनर्निर्माण, समाज की सक्रिय भूमिका और राज्य की सीमाओं के संतुलित पुनर्स्थापन में निहित है।
2011 में देश ने एक बड़ा भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन देखा। लगा था कि अब सब कुछ बदल जाएगा। लोकपाल बना, कानून बने। पर आज 2025 में भी हम उन्हीं मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। इसका अर्थ साफ है—कानून बदले, पर मानसिकता नहीं बदली।
यह भी सत्य है कि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी व्यवस्थाओं से सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के कुछ रास्ते बंद हुए हैं। पर व्यवहार में यह भी देखा गया कि नए रास्ते खोज लिए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना का उदाहरण लें। काग़ज़ों में यह योजना पारदर्शिता का आदर्श मॉडल है। पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में आता है। कोई बिचौलिया नहीं, कोई नकद लेन-देन नहीं। पर ज़मीनी सच इससे बिल्कुल अलग है। गाँव में जैसे ही किसी का नाम आवास सूची में आता है, सबसे पहले उसे यह समझा दिया जाता है कि “पैसा तो खाते में आएगा, पर काम अपने आप नहीं होगा।”
सरपंच और पंचायत सचिव सीधे पैसे की माँग नहीं करते। वे इतना ही कहते हैं—“मजदूरी, सामग्री और तकनीकी काग़ज़ पूरे कराने हैं।” जब पहली किश्त खाते में आती है, तभी स्पष्ट कर दिया जाता है कि कुल राशि का एक निश्चित प्रतिशत देना होगा, नहीं तो अगली किश्त अटक जाएगी। कहीं यह प्रतिशत दस होता है, कहीं पंद्रह, और कई जगह बीस-पच्चीस प्रतिशत तक भी पहुँच जाता है।
लाभार्थी विरोध करना चाहता है, पर उसे यह भी बताया जाता है कि मकान की जियो-टैगिंग, निरीक्षण रिपोर्ट और आगे की स्वीकृति इन्हीं के माध्यम से होगी। परिणामस्वरूप वह चुपचाप सहमत हो जाता है। यह रिश्वत सीधे हाथ में नहीं ली जाती। गाँव का ही कोई दुकानदार या सामग्री विक्रेता पहले से तय रहता है। उसी की दुकान से ईंट, सीमेंट, सरिया “खरीदने” को कहा जाता है। दुकानदार बिल पूरा काटता है, पर सामग्री कम देता है या महँगी दर दिखाता है। अतिरिक्त राशि बाद में वही दुकानदार सरपंच या सचिव तक पहुँचा देता है।
यही प्रक्रिया केवल आवास योजना तक सीमित नहीं है। शौचालय निर्माण, नल-जल योजना, सड़क मरम्मत, बिजली कनेक्शन—हर जगह यही तरीका अपनाया जाता है। ऑनलाइन भुगतान के कारण नकद लेना जोखिम भरा हो गया है, इसलिए दुकानदार, ठेकेदार और सप्लायर अब मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सरकारी अधिकारी और कर्मचारी सीधे दिखाई नहीं देते, पर पूरा तंत्र उनकी सहमति से चलता है।
कई बार तो स्थिति यह होती है कि लाभार्थी को स्वयं कहा जाता है—“आप पैसा अपने खाते से अमुक दुकान में डाल दीजिए, वही काम संभाल लेगा।” बाहर से देखने पर यह सामान्य खरीद लगती है, पर भीतर से सब जानते हैं कि यह रिश्वत का ही नया रूप है। तकनीक बदल गई है, पर नीयत नहीं बदली।
यही कारण है कि जब कहा जाता है कि तकनीक से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा, तो यह आधा सत्य होता है। तकनीक ने केवल पुराने रास्ते बंद किए हैं, भ्रष्टाचारियों ने नए रास्ते खोज लिए हैं। जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक हर व्यवस्था कुछ समय बाद उसी रोग से ग्रस्त हो जाएगी।
यही वह बिंदु है जहाँ समस्या केवल “सिस्टम” की नहीं रह जाती। यहाँ व्यक्ति, समाज और सामूहिक सहमति की भूमिका सामने आती है। सरपंच अकेला नहीं होता, सचिव अकेला नहीं होता, दुकानदार अकेला नहीं होता। सब जानते हैं, सब समझते हैं, पर सब चुप रहते हैं—क्योंकि किसी न किसी स्तर पर सबको लाभ होता है या नुकसान का भय होता है।
इसीलिए भ्रष्टाचार आज छिपा हुआ नहीं है। वह खुले तौर पर, लगभग सामान्य व्यवहार की तरह स्वीकार कर लिया गया है। और यही सबसे खतरनाक स्थिति है।
यहीं से समाधान का प्रश्न उठता है, और यह समाधान सनातन आर्थिक मॉडल की मूल समझ से जुड़ा है। सनातन आर्थिक मॉडल अराजक विकेन्द्रीकरण नहीं है। इसमें राजसत्ता का केंद्रीकरण सीमित और आवश्यक विषयों तक रहता है—राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, मुद्रा , राजस्व संग्रह और सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों में। ये ऐसे विषय हैं जहाँ एकीकृत निर्णय अनिवार्य है।
पर शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और सामाजिक-आर्थिक जीवन राज्य की नौकरशाही के अधीन नहीं होते। ये समाज के पास रहते हैं। जब समाज स्वयं शिक्षा देता है, न्याय करता है और आर्थिक गतिविधियाँ संचालित करता है, तब निर्णय स्थानीय, उत्तरदायी और नैतिक होते हैं। जब यही सब राज्य के हाथ में चला जाता है, तब अनुमति, फ़ाइल और कृपा की संस्कृति जन्म लेती है—और वहीं से भ्रष्टाचार पनपता है।
सनातन दृष्टि में राज्य समाज का स्वामी नहीं, रक्षक होता है। समाज स्वयं उत्तरदायित्व उठाता है। यही संतुलन भ्रष्टाचार की जड़ों को कमजोर करता है। जब राज्य सीमित होता है और समाज सक्रिय, तब सत्ता सौदेबाज़ी का साधन नहीं बनती।
मुद्रा व्यवस्था भी इसी संतुलन से जुड़ी है। जब मुद्रा अनियंत्रित ऋण और उपभोग को बढ़ाने का साधन बन जाती है, तब काला धन और भ्रष्टाचार स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं। सनातन दृष्टि में मुद्रा स्थिरता और विश्वास का साधन है, न कि असीमित लालच का।
नैतिक शिक्षा का प्रश्न भी यहीं जुड़ता है। शिक्षा यदि केवल नौकरी और अधिकार सिखाएगी, तो भ्रष्टाचार पैदा करेगी। यदि शिक्षा कर्तव्य, मर्यादा और उत्तरदायित्व सिखाएगी, तो व्यवस्था स्वयं सुधरने लगेगी।
पर यह भी स्वीकार करना होगा कि जब भ्रष्टाचार स्वभाव और व्यवस्था दोनों बन जाए, तब केवल चेतावनी या हल्के दण्ड से काम नहीं चलता। जो व्यक्ति सार्वजनिक पद, योजनाओं या संसाधनों का दुरुपयोग कर संपत्ति इकट्ठा करता है, उस संपत्ति पर उसका कोई नैतिक अधिकार नहीं माना जा सकता। ऐसी संपत्ति की पूर्ण ज़ब्ती आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट रहे कि राष्ट्र की व्यवस्था लूट का माध्यम नहीं है।
इसी तरह योजनाबद्ध भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी, जो जानबूझकर समाज की आजीविका, सुरक्षा और भविष्य को संकट में डालती है, साधारण अपराध नहीं है। यह समाज के मूल आधार पर किया गया आघात है। ऐसे कृत्यों के लिए कठोरतम दण्ड, यहाँ तक कि मृत्युदण्ड का प्रावधान भी, इसलिए आवश्यक हो जाता है कि अधर्म को रोका जा सके और यह संदेश जाए कि समाज इस स्तर के अपराध को सहन नहीं करेगा।
पर दण्ड की सबसे प्रभावी शक्ति अंततः समाज के हाथ में ही होती है। यदि भ्रष्ट व्यक्ति धन तो जोड़ ले, पर समाज में उसका सम्मान, उसकी स्वीकार्यता और उसका स्थान समाप्त हो जाए, तो वही दण्ड सबसे गहरा बनता है। सामाजिक बहिष्कार—जहाँ ऐसा व्यक्ति न आदर पाए, न नेतृत्व, न सार्वजनिक मान्यता—भ्रष्टाचार की जड़ों को कमजोर करता है। जब समाज स्वयं दूरी बना लेता है, तब अधर्म टिक नहीं पाता।
यदि गहराई से विचार करें तो स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार केवल व्यक्तियों की दुष्प्रवृत्ति नहीं है, अपितु उस व्यवस्था का परिणाम है जिसमें प्रत्येक विषय के लिए राज्य की ओर देखने की आदत डाल दी गई है। शिक्षा हो, चिकित्सा हो, आजीविका हो अथवा सामान्य प्रशासन—सब कुछ अनुमति, अनुशंसा और कृपा पर आश्रित होता चला गया है। जब जीवन की गति फ़ाइलों और हस्ताक्षरों पर निर्भर हो जाती है, तब लेन-देन अस्वाभाविक नहीं रह जाता। धीरे-धीरे वही व्यवहार सामान्य बन जाता है, जिसे पहले अधर्म कहा जाता था।
भारतीय परंपरा में ऐसा संतुलन नहीं था। समाज अपने आंतरिक जीवन का स्वयं संचालन करता था। शिक्षा समाज देता था, न्याय का प्रथम स्तर समाज के पास होता था, और अर्थव्यवस्था स्थानीय आवश्यकताओं तथा उत्तरदायित्व के आधार पर चलती थी। राज्य की भूमिका रक्षक की थी, सर्वव्यापी स्वामी की नहीं। वह वहीं हस्तक्षेप करता था, जहाँ एकीकृत निर्णय आवश्यक होता था—जैसे बाह्य सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा और व्यापक व्यवस्था। इसी सीमित राज्य और सक्रिय समाज के संतुलन में भ्रष्टाचार पनप नहीं पाता था।
यही सनातन आर्थिक दृष्टि का मूल भाव है। इसमें राज्य शक्तिशाली होता है, पर सीमित; और समाज स्वतंत्र होता है, पर उत्तरदायी। जब यह संतुलन टूटता है, तब सत्ता सौदेबाज़ी का साधन बन जाती है और समाज मौन दर्शक। भ्रष्टाचार का वास्तविक उपचार न तो केवल दण्ड में है, न तकनीक में, न ही नए कानूनों में। उसका उपचार उस बोध में है, जिसमें व्यक्ति कर्तव्य को अधिकार से ऊपर रखता है, समाज अपनी भूमिका स्वीकार करता है और राज्य अपनी सीमाएँ पहचानता है। यदि यह बोध पुनः स्थापित नहीं हुआ, तो प्रत्येक नई व्यवस्था कुछ समय बाद उसी रोग से ग्रस्त हो जाएगी—नाम बदलेगा, स्वरूप बदलेगा, पर अधर्म बना रहेगा।
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