- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
👉 गत दिनों ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित बैंक्सटाउन अस्पताल से सामने आया भयावह वीडियो किसी एक संस्थान या देश की विकृति मात्र नहीं है, बल्कि यह उस जहरीले वैचारिक ढांचे का अनावरण करता है, जो मजहब के नाम पर मानव जीवन को तुच्छ मानता है। जिस पेशे का मूल उद्देश्य जीवन की रक्षा, करुणा और सेवा है। उसी चिकित्सा व्यवस्था के भीतर यदि दो नर्स यह स्वीकार करें कि उन्होंने मजहबी पहचान के आधार पर रोगियों को मरने दिया और यहूदी मरीजों को ‘जहन्नुम’ भेजने पर गर्व करें, तो यह केवल अपराध नहीं, बल्कि सभ्यता पर सीधा वैचारिक हमला है।
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बनीज द्वारा इस घटना को ‘घिनौना और शर्मनाक’ कहना इस बात का संकेत है कि पश्चिमी समाज भी अब इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकता कि तथाकथित बहुसांस्कृतिकता की आड़ में मजहबी कट्टरता संस्थागत ढांचों में घुसपैठ कर चुकी है। यह घटना इसलिए और भी चिंताजनक है क्योंकि यह आकस्मिक नहीं, बल्कि दीर्घकालीन वैचारिक प्रशिक्षण का परिणाम प्रतीत होती है।
💥यहूदी-विरोध : तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, ऐतिहासिक घृणा
आज के अनेक तर्कवादी यहूदियों के विरुद्ध बढ़ती हिंसा को 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद गाजा में इजराइली सैन्य कार्रवाई से जोड़कर देखते हैं। किंतु यह दृष्टि ऐतिहासिक रूप से अधूरी और भ्रामक है। यहूदियों के प्रति घृणा किसी एक घटना की उपज नहीं, बल्कि चौथी शताब्दी से प्रारंभ होकर ईसाई और फिर इस्लामी सत्ता संरचनाओं में पोषित होती रही है।
💥मध्यकालीन यूरोप में चर्च-समर्थित उत्पीड़न, सार्वजनिक अपमान, नरसंहार और अंततः 20वीं शताब्दी का होलो कॉस्ट यह सभी इस बात का प्रमाण हैं कि जब मजहब सत्ता और राजनीति से जुड़ता है, तब वह करुणा नहीं, बल्कि क्रूरता का औजार बन जाता है। हिटलर कोई ऐतिहासिक अपवाद नहीं था, बल्कि उस मानसिकता की चरम परिणति था, जिसने मजहबी श्रेष्ठता को मानव-विनाश का औचित्य बना दिया।
💥 आधुनिक जिहाद : रूप बदला, दर्शन वही (Ideology - Strategy)
आज वही मानसिकता नए रूपों में सामने आ रही है। कहीं अस्पतालों में, कहीं सड़कों पर, कहीं ट्रकों और चाकुओं के माध्यम से। ऑस्ट्रिया, फ्रांस और अमेरिका की हालिया घटनाएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि समस्या किसी विशेष राष्ट्र की नहीं, बल्कि एक वैश्विक जिहादी सोच की है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक भूमिका उन लोगों की है जो स्वयं हथियार नहीं उठाते, परंतु हिंसा के लिए वैचारिक जमीन तैयार करते हैं। जो आतंकवाद को ‘प्रतिरोध’ का नाम देते हैं, जो आतंकी और पीड़ित के बीच नैतिक समानता स्थापित करते हैं, और जो हर जिहादी कृत्य के लिए ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का बहाना गढ़ते हैं। यही लोग आतंकवाद के परोक्ष समर्थक हैं। चाहे वे अकादमिक मंचों पर हों, मीडिया में हों या मानवाधिकार की भाषा में बोलते हों।
💥भारतीय उपमहाद्वीप : जीवित उदाहरण
भारतीय उपमहाद्वीप इस मजहबी उन्माद का सबसे पुराना और गहन भुक्तभोगी रहा है। 8वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम से लेकर तैमूर, औरंगज़ेब और टीपू सुल्तान तक- यहाँ आक्रमण केवल राजनीतिक नहीं थे, बल्कि धार्मिक वर्चस्व और शुद्धिकरण अभियानों के रूप में हुए। परिणामस्वरूप भारत का विशाल भूभाग आज भी गैर-इस्लामी समुदायों के लिए द्वितीय श्रेणी की नागरिकता का क्षेत्र बना हुआ है।
समानांतर रूप से, गोवा इंक्विज़ीशन जैसी घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि मतांतरण और धार्मिक हिंसा किसी एक मजहब तक सीमित नहीं, बल्कि हर उस विचारधारा की पहचान है जो अपने सत्य को एकमात्र और शेष मानवता को ‘उद्धार योग्य’ या ‘वध योग्य’ मानती है।
🌹समस्या मजहब नहीं, मजहबी सर्वसत्तावाद
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह विमर्श किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस मजहबी सर्वसत्तावादी सोच के विरुद्ध है जो कहती है- “मेरे अतिरिक्त सभी या तो बदले जाएंगे, या मिटा दिए जाएंगे।”
जब तक सभ्य समाज आतंकवाद के हथियार उठाने वालों के साथ-साथ उनके बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक संरक्षकों को भी पहचानकर अस्वीकार नहीं करता, तब तक हिंसा का यह दुष्चक्र चलता रहेगा। मानवता की रक्षा केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि इस जहरीले दर्शन के वैचारिक निष्क्रमण से ही संभव है। इस्लामिक कट्टरपंथी समुदाय, विस्तारवादी शक्तियों का मार्क्सवादी वैचारिक समूह को साथ मिलकर इस कोकटेल के पोषण को पहचान कर उनके नेक्सस को नष्ट करना, यही आज की सबसे बड़ी और निर्णायक लड़ाई है। 🌹🙏
#kailash_chandra Kailash Chandra
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें