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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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(अवश्य पढ़ें, सुने-स्वयं को टटोले, यदि संभव हो)
👉 आजकल देशभक्ति अकसर बड़ी-बड़ी बोगलों, वक्ताओं के भाषणों, चमकते माला, माईक और मंचों में दिखाई देती है। पर सच्चा राष्ट्रप्रेम तो उन पलों में होता है। जब कोई व्यक्ति चुपचाप, बिना किसी पुरस्कार, बिना किसी पहचान, अपने जीवन को राष्ट्र पर न्योछावर कर देता है। कश्मीरी सिंह की कहानी ऐसी ही मौन देशभक्ति की अनुपम मिसाल है।
हिमाचल में संघ के प्रचारक दीवान सिंह जी की भी ऐसी ही कर्मवीर वाली जीवनी है। वो भी हिमालय के बर्फीले तूफानों में अपना कर्म पूर्ण कर गये। 1982 में जब छ: माह तक उनका शरीर नहीं मिल सका तो देवलोक गमन मान लिया गया•••
💥एक साधारण व्यक्ति, असाधारण निर्णय
कश्मीर सिंह पंजाब के एक आम परिवार से थे- न कोई बड़ी पहचान, न धन-दौलत। फौज में भर्ती हुए, फिर पंजाब पुलिस में कांस्टेबल बने। घर में पत्नी और तीन बच्चे थे। जीवन किसी भी भारतीय मध्यमवर्गीय की तरह चलता- सपनों और संघर्षों के बीच।
लेकिन एक दिन देश ने उन्हें पुकारा। भारत की एक गुप्त एजेंसी ने उनसे पाकिस्तान में जाकर जानकारी लाने का अनुरोध किया। यह काम जोखिम भरा था।
पर कश्मीर सिंह ने सोचा- "देश मुझे बुला रहा है, मैं कैसे मना कर दूँ, एक कर्मवीर की अंत: पुकार?" एक क्षण में उनकी दिशा बदल गई। वे साधारण नहीं रहे - वे राष्ट्र के सजग प्रहरी बन गए।
💥सीमा के पार क्या इनका भी मिट्टी का तन- हम तुम जैसा
वे पाकिस्तान गए, महीनों तक सूचनाएँ भेजते रहे। पर एक दिन पकड़ लिए गए। कौन है वो? कहाँ से आया? क्यों आया? इन प्रश्नों का उत्तर पाकिस्तान की जेलों ने बेरहमी से समझा- पीट-पीटकर, भूखा रखकर, कोठरी में बंद करके, यहाँ तक कि उन्हें पागलखाने में डालकर भी। उन्हें बिना मुकदमे के मृत्युदंड सुना दिया गया।
लेकिन उन्हें मारा नहीं। शायद इसलिए कि वे पूरी तरह “जासूस” साबित न हुए, या शायद इसलिए कि उनका टूटना ही उन्हें मौत से भी बदतर लगता था। पर कश्मीर सिंह नहीं टूटे। उन्होंने अपनी पीड़ा को थामे रखा- देश के सम्मान के लिए।
💥35 वर्षों की अंधेरी सुरंग-फिर भी आशा जीवित
सोचिए-
35 साल…
एक-एक दिन जैसे एक-एक पहाड़। वक्त ने उनको बूढ़ा कर दिया, मांसपेशियाँ खो गईं, आँखों की रोशनी कमजोर, चलने की ताकत लगभग खत्म। पर भारत का नाम? कभी नहीं टूटा। उन्होंने किसी अदालत, किसी जेलर, किसी मंत्री को- एक शब्द भी नहीं बताया कि वे भारतीय एजेंट हैं।
ऐसा अनुशासन?
ऐसी निष्ठा?
ऐसी दृढ़ता?
ऐसी भारत भक्ति
ऐसा अपने जीवन से वन्दे मातरम कहना ये यह केवल इस माटी के सपूत योधाओं में होता है।
💥2007: जब एक चमत्कार जैसा हुआ
पाकिस्तान ने मानवाधिकार समीक्षा की। एक अधिकारी ने उनकी फाइल खोली और देखा कि एक व्यक्ति- बिना मुकदमे, बिना अपील, 35 साल से जेल में पड़ा है।
यह घोर अमानवीय था और अचानक- कश्मीर सिंह रिहा कर दिए गए। जब वे भारत पहुंचे तो पूरा पंजाब उमड़ पड़ा। लोग उन्हें “जिंदा शहीद” कहने लगे।
उनकी पत्नी, जिसने वर्षों तक इंतजार किया, उन्हें देखकर फफक उठी। बच्चे, जो पिता की उंगली पकड़कर चल नहीं पाए, अब बड़े होकर उनके बिस्तर को संभाल रहे थे। यह दृश्य किसी भी दिल को पिघला दे।
💥अंतिम वर्षों में भी वही तेज
जेल ने उन्हें शारीरिक रूप से लगभग तोड़ दिया था- 80% शरीर कमजोर, नसें काम नहीं करतीं, बोलने में कठिनाई। पर आत्मा? अब भी अडिग।
वे कहते थे- “मैंने देश के लिए किया था। देश ने मुझे याद न किया, तो भी कोई शिकायत नहीं।” यह वाक्य किसी भी ईमानदार भारतीय को भीतर तक हिला देता है।
💥2024: राष्ट्र नतमस्तक हो गया
4 फ़रवरी 2024 को कश्मीर सिंह ने अंतिम सांस ली। उनके गांव में सेना और सरकार के सम्मान के साथ अंतिम यात्रा निकली। पाकिस्तान की यातनाओं से टूटा हुआ यह शरीर आखिर देश की मिट्टी में विश्राम पा गया।
वह एक साधरण आदमी था, पर उसने अपने समर्पण से असाधारण जीवन जिया, निष्ठा, त्याग और ऐसा मौन जैसा कि वीरों के वसंत की वीरता से भरा हुआ हो।
🌹कश्मीर सिंह हमें सिखाते हैं कि देशभक्ति शोर नहीं, अडिग मौन होती है। राष्ट्र के लिए सबसे बड़े बलिदान वे देते हैं, जिनका नाम समाचारों में नहीं आता है। कोई भी व्यक्ति, कितना भी सामान्य क्यों न हो,
देश के लिए असाधारण बन सकता है और वीरता हमेशा तलवार में नहीं, कभी-कभी सहनशीलता में होती है। कश्मीर सिंह की जीवनगाथा हर भारतीय को प्रेरित करती है कि देशभक्ति केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि मन में, विचारों में और साहस में बसती है।
जी, आपने इस साधक के 'निशब्द के शब्द' उस मौन तप में सुने क्या? (मुझे क्या मिला!) जी हाँ, इस रज से ही बनते कर्मवीर, हम वन्दे मातरम नहीं बोलेंगे क्या कर लोगे? गला काट दोगे और तिल तिल क्षण क्षण हंस हंस गलकर किया तप🌹🙏 #kailash_chandra Kailash Chandra
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