सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

घर की देहरी से बाज़ार की चौखट तक



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

उपभोक्तावाद, भौतिकतावाद, ऋण आधारित अर्थतंत्र और ग्लोबल मार्केट फोर्सेज़—इन सबने मिलकर आज मानव समाज को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ लाभ ही अंतिम सत्य बन चुका है। जिस व्यवस्था में लाभ सर्वोच्च मूल्य बन जाए, वहाँ धर्म, परिवार, संस्कृति और मानवीय संवेदना स्वतः ही हाशिये पर चले जाते हैं। आज की दुनिया में यही हो रहा है। पश्चिम प्रेरित पूँजीवाद और समाजवाद, वैश्वीकरण, भौतिकतावाद और उपभोक्तावाद ने मिलकर ऐसा जाल बुन दिया है कि परिवार टूट रहे हैं, रिश्ते कमजोर हो रहे हैं, सभ्यता का नैतिक आधार डगमगा रहा है। भाई भाई का प्रतिद्वन्द्वी बन गया है, माता-पिता और संतान के बीच भी आर्थिक गणित आ खड़ा हुआ है।

ग्लोबल मार्केट फोर्सेज़ का काम केवल माल बेच देना नहीं है; वे हमारे सोचने, चाहने, जीने और संबंध बनाने के तरीके बदलती हैं। चौबीसों घंटे चलने वाला विज्ञापन उद्योग हमें समझाता है कि खुशी अधिक वस्तुओं में है, सम्मान महँगे ब्रांड में है, और सफलता दूसरों से आगे दिखने में है। जीवन का केंद्र धीरे-धीरे घर, परिवार और समाज से हटकर बाज़ार और स्क्रीन पर आ बसता है। संयुक्त परिवार, जहाँ एक ही छत के नीचे कई पीढ़ियाँ साथ रहती थीं, अब आर्थिक दबाव, नौकरी की अनिश्चितता और शहरों की भागदौड़ में टूटते जा रहे हैं। ग्लोबल मार्केट फोर्सेज़ के लिए यह स्थिति लाभकारी है, क्योंकि अकेला, असुरक्षित, तनावग्रस्त व्यक्ति सबसे बड़ा उपभोक्ता होता है—वह वस्तुओं, दवाओं, मनोरंजन, सब पर ज़्यादा खर्च करता है।

पूंजीवादी उपभोक्तावाद मनुष्यता को किस हद तक निगल चुका है, इसका एक ताज़ा उदाहरण आज ही देश में देखने को मिला। इंडिगो एयरलाइंस की उड़ानें अचानक बड़े पैमाने पर रद्द हुईं, और जैसे ही सेवाएँ बाधित हुईं, हवाई किरायों में अप्रत्याशित उछाल आ गया। दिल्ली से चेन्नई तक की यात्रा, जिसका टिकट सामान्य दिनों में कुछ हज़ार रुपये में मिल जाता है, आज इतनी महँगी हो गई कि एक साधारण व्यक्ति उसके बारे में सोच भी नहीं सकता।

जो लोग किसी बीमार परिजन से मिलने, किसी पारिवारिक संकट या अनिवार्य कारण से यात्रा करना चाहते थे, वे हतप्रभ खड़े रह गए। कोई रास्ता नहीं, कोई विकल्प नहीं — मानो उनके दुख और मजबूरी भी बाज़ार की नज़र में सिर्फ कमाई का अवसर भर हों।

आज की यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि आधुनिक आर्थिक सोच में इंसान की ज़रूरत, संवेदना और संकट का कोई अर्थ नहीं रह गया है। जहाँ मनुष्य होना चाहिए था, वहाँ अब केवल लाभ का हिसाब दिखाई देता है। सेवा की जगह व्यापार, और जिम्मेदारी की जगह फायदा सोचने की इस मानसिकता ने जीवन की गरिमा तक को छोटा कर दिया है।

पूरे देश आज कर्ज़ के बोझ तले दबे हुए हैं। विकसित कहे जाने वाले राष्ट्र हों या विकासशील देश—ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएँ ऋण के सहारे साँस ले रही हैं। सरकारें उधार लेकर अपने बजट चलाती हैं, अर्थव्यवस्था ऋण लेकर गति पाती है, और अंततः इस बोझ का भार आम नागरिक की छाती पर आ गिरता है।

भारत में तीस-पैंतीस हज़ार रुपये महीने कमाने वाला एक साधारण व्यक्ति जब अपनी मेहनत के बल पर एक छोटा-सा घर, एक गाड़ी और बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का सपना देखता है, तो वह सपना अक्सर कर्ज़ के पहाड़ में बदल जाता है। जैसे ही वह गृह-ऋण या वाहन-ऋण लेता है, उसकी आधी से ज़्यादा कमाई हर महीने की ईएमआई निगल जाती है। बच्चों की फीस, दवाइयाँ, बिजली-पानी, किराया या राशन—सब कुछ उसी कम आय में समाना पड़ता है, और देखते-ही-देखते पूरी ज़िंदगी किस्तों में बँटने लगती है। घर बनाने के लिए लाखों रुपये चाहिए, शिक्षा और स्वास्थ्य इतना महँगा हो चुका है कि बीमारी भी अब आर्थिक डर का नाम बन गई है।

इसी दबाव ने परिवार की जड़ों को हिला दिया है। संयुक्त परिवार जो कभी आर्थिक और भावनात्मक सहारा होते थे, आज टूट रहे हैं—क्योंकि पैसे की कमी ने रिश्तों को बोझ बना दिया है। शहरों में एक-कमरे के घरों में जीवन सिमट गया है, और युवा पीढ़ी विवाह और परिवार की जिम्मेदारी से कतराने लगी है, क्योंकि उसे भविष्य अवसरों से अधिक अनिश्चितताओं और खर्चों से भरा दिखाई देता है।

उधर कॉरपोरेट संस्कृति और आक्रामक पूँजीवाद ने मानवीय जीवन को निरंतर संघर्ष और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में धकेल दिया है। काम के घंटे बढ़ते जा रहे हैं, परिवार के लिए समय घटता जा रहा है, और मानसिक तनाव अब एक सामान्य अनुभव बन चुका है। सुबह से रात तक काम, वीकेंड तक नौकरी की पकड़, मोबाइल तक दफ्तर की छाया—इन सबके बीच मनुष्य खुद को खोता जा रहा है।

आज अमेरिका जैसे देशों की स्थिति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया की मात्र छह प्रतिशत आबादी वहाँ रहती है, लेकिन अवसाद और अकेलेपन की दवाइयों की वैश्विक खपत का बहुत बड़ा हिस्सा वहीं उपयोग होता है। इसका अर्थ यह है कि भौतिक सम्पन्नता, चमकदार जीवन, ऊँची तनख्वाहें और विशाल उपभोक्ता बाजार मनुष्य को भीतर से शांत या संतुष्ट नहीं कर पाए।

यह संकट किसी एक देश या एक समाज का नहीं—यह पूरे आधुनिक, बाज़ार-प्रधान मॉडल की विफलता का सबसे स्पष्ट सबूत है। यह व्यवस्था सुविधाएँ देती है, पर सुरक्षा छीन लेती है; चीजें बढ़ाती है, पर संबंध कम करती है; साधन देती है, पर मनुष्य को अकेला छोड़ देती है।

और यही प्रश्न आज सबसे गहरा है—
क्या जीवन का यह रूप मंज़ूर करने योग्य है?
क्या मनुष्य वस्तु बनकर ही जीने के लिए पैदा हुआ था?

यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि पूँजीवाद और समाजवाद मूलतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पूँजीवाद में उत्पादन के साधन और आर्थिक शक्ति कुछ बड़े पूँजीपतियों और कंपनियों के हाथ में सिमट जाती है; समाजवाद में वही केंद्रीकरण राज्य के हाथ में चला जाता है। दोनों ही परिस्थितियों में समाज और परिवार, स्थानीय समुदाय और सामान्य व्यक्ति निर्णय प्रक्रिया से बाहर होते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि मनुष्य अपनी आर्थिक और सामाजिक जीवन पर स्वयं नियंत्रण नहीं रख पाता, वह या तो बाजार का गुलाम बनता है या सत्ता का।

इसी पृष्ठभूमि में यदि किसी एक आर्थिक चिंतन में मानवता के उद्धार की संभावना दिखती है, तो वह है सनातन हिन्दू आर्थिक मॉडल। यह मॉडल न तो केवल भारतीय भूगोल तक सीमित है, न किसी कालविशेष तक; यह मानव जीवन के शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित एक दृष्टि है। इसका मूल यह है कि अर्थ—धन, संसाधन, उत्पादन—जीवन का केंद्र नहीं, बल्कि धर्म के अधीन एक साधन है।

सनातन आर्थिक मॉडल कोई जड़ सिद्धांत या बंद संरचना नहीं है, बल्कि एक जीवित प्रवाह है—गंगा की तरह, जिसमें सैकड़ों नदियाँ आकर मिलती हैं, पर वह अपनी पहचान नहीं खोती। उसमें विविधता है, लेकिन विघटन नहीं; विस्तार है, लेकिन विस्मृति नहीं; परिवर्तन है, लेकिन मूल तत्त्व की स्थिरता बनी रहती है। यही सनातन का अर्थ है—जो गतिमान भी है और शाश्वत भी।

सनातन आर्थिक मॉडल का आधार गाँव और नगर के संतुलित सह-अस्तित्व में है। प्राचीन भारत में गाँव और नगर दो विरोधी ध्रुव नहीं, बल्कि एक ही शरीर के दो अंग थे। गाँव जीवन की जड़ें थे—उत्पादन, श्रम, जल, भूमि और सामाजिक सहयोग के केंद्र; और नगर शाखाएँ—ज्ञान, वाणिज्य, संगठन और कला-संस्कृति के केंद्र। गाँव के बिना नगर बंजर होते और नगर के बिना गाँव सीमित। यही सह-अस्तित्व समाज को पूर्ण बनाता था। यह प्रणाली किसी ग्रामीण आदर्शवाद पर आधारित नहीं, बल्कि इस समझ पर आधारित थी कि समृद्धि तब ही संभव है जब जड़ें और पंख दोनों सुरक्षित हों।

सनातन आर्थिक मॉडल किसी मानव-निर्मित विचारधारा का उत्पाद नहीं, बल्कि सृष्टि के प्राकृतिक नियम—ऋत (Cosmic Order) की अभिव्यक्ति है। प्रकृति में कोई अति नहीं है: समुद्र जितना पानी सम्हाल सकता है, उतना ही मेघ उठाकर लौटाता है; वृक्ष अपने लिए कम और संसार के लिए अधिक बनाता है; नदी बहती है, ठहरती नहीं, और इसलिए जीवन देती है। यही सिद्धांत जब मनुष्य के अर्थ-व्यवहार में उतरता है, तो अर्थ लोभ या संचय का साधन नहीं, बल्कि प्रवाह का साधन बनता है। धन तभी जीवित रहता है जब वह बहता है—जैसे जल बहने पर गंगा कहलाती है और ठहरने पर दलदल बन जाती है।

इस संतुलन को जीवन में स्थापित करने के लिए ही पुरुषार्थ-चतुष्टय—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—का सिद्धांत दिया गया। धर्म अर्थ को मर्यादा देता है, अर्थ काम को दिशा देता है, और इन दोनों के संरक्षण में ही मोक्ष सम्भव होता है। धर्म से रहित अर्थ शोषण बन जाता है, अर्थ से रहित धर्म असहाय, काम यदि संयम से अलग हो जाए तो विषयासक्ति बन जाता है, और बिना इन तीनों के मोक्ष केवल कल्पना।

यही संतुलन वर्णाश्रम व्यवस्था का वास्तविक आशय था, जो जन्म से नहीं, कर्तव्य, गुण और कर्म से निर्धारित सामाजिक उत्तरदायित्व-विभाजन था। प्रत्येक वर्ण समाज का अंग था, कोई ऊपर-नीचे नहीं; ब्राह्मण ज्ञान और न्याय के संरक्षक, क्षत्रिय संरक्षण और शासन के रक्षक, वैश्य उत्पादन और व्यापार के संचालक, और शूद्र श्रम और सेवा शक्ति—सब मिलकर एक शरीर की तरह चलते थे।

सनातन न्याय व्यवस्था भी समाज-आधारित थी—न्याय तत्काल, स्थानीय और सुधारात्मक। ग्राम सभाएँ और जनपद सभा समाज की समस्याओं को वहीं सुलझाती थीं, जहाँ वे उत्पन्न होती थीं। न्याय का उद्देश्य दंड नहीं, संतुलन था।

इसी के साथ जुड़ी हुई सनातन राज्य व्यवस्था भी अत्यंत स्पष्ट थी। राज्य सर्वशक्तिमान नहीं था; राज्य समाज के ऊपर नहीं था। वह केवल रक्षा, न्याय, राजस्व और विदेश नीति तक सीमित था। शिक्षा, उत्पादन, व्यापार, सेवा, स्वास्थ्य, समाज-सुरक्षा—ये सब कार्य समाज स्वयं करता था। इसलिए राज्य छोटा और समाज बड़ा था, और नागरिक स्वतंत्र और सुरक्षित।

इस पूरी व्यवस्था का तंतु सूत्र था—
अर्थ-तंत्र का विकेंद्रीकरण और सत्ता का केंद्रीकरण।
अर्थ समाज में फैला रहे—किसी एक वर्ग, कंपनी या समूह के हाथ में केंद्रित न हो;
और सत्ता राष्ट्र की सुरक्षा और न्याय के लिए केंद्र में मजबूत रहे—अराजकता न पैदा हो।
इसी संतुलन ने भारत को सहस्राब्दियों तक स्थिर रखा—न अत्याचारी बाज़ार, न अत्याचारी राज्य, केवल समाज-केंद्रित जीवन का सह-अस्तित्व।

सनातन आर्थिक मॉडल इसीलिए न पूँजीवाद है और न समाजवाद—यह सहअस्तित्ववादी मॉडल है।
पूँजीवाद में प्रतियोगिता द्वेष को जन्म देती है, समाजवाद में नियंत्रण दासत्व को;
परंतु सनातन में सहयोग विकास को जन्म देता है, और संतुलन स्वतंत्रता को।

इस दृष्टि से समाधान केवल इतना नहीं कि हम वर्तमान मॉडल की आलोचना कर दें; समाधान यह है कि अर्थ-तंत्र का विकेंद्रीकरण और सत्ता का केंद्रीकरण—इस सूत्र को समझते हुए नई व्यवस्था की ओर बढ़ें। अर्थ समाज और समुदाय के हाथ में रहे, ताकि कोई कॉर्पोरेट या सत्ता-तंत्र मानव जीवन को पूरी तरह नियंत्रित न कर सके; और सत्ता इतनी संगठित रहे कि राष्ट्र सुरक्षित रहे, न्याय की व्यवस्था बनी रहे, अराजकता न पनपे।

आज यदि परिवार, संस्कृति, धर्म और समाज को बचाना है, तो हमें उपभोक्ता-केंद्रित दृष्टि से हटकर मनुष्य-केंद्रित दृष्टि अपनानी ही होगी। ग्लोबल मार्केट फोर्सेज़ ने जिस तरह परिवार, धर्म और संस्कृति की जड़ों को हिलाया है, उसके प्रतिरोध में केवल वही आर्थिक मॉडल खड़ा हो सकता है जो धर्माधारित हो, समाज-केंद्रित हो और मनुष्य के आत्मसम्मान पर आधारित हो। यही सनातन हिन्दू आर्थिक मॉडल है—यही वह चिंतन है जो इस संकटग्रस्त समय में मानवता के लिए आशा की किरण बन सकता है।

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