सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

नवजागरण के देवदूत महर्षि अरविंद



    -डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल

                      महर्षि अरविंद का जन्म 1871 बंगाल के एक बहुत प्रसिद्ध डॉक्टर कृष्णधन घोष के यहाँ हुआ । पिता सिविल सर्जन के पद पर काम करते थे जो अत्यंत परोपकारी और उदार स्वभाव के थे। वे अपने रोगियों की दवा दारू द्वारा ही सहायता नहीं करते थे वरन आवश्यकता जान पड़ती तो उनके लिए पथ्य और वस्त्र की सहायता भी अपनी तरफ से करते थे। पिता ने 7 वर्ष की अबोध आयु में ही अपने एक अंग्रेज मित्र के पास इंग्लैंड में रहने और पढ़ने के लिए भेज दिया। अरविंद ने छोटी अवस्था में ही लैटिन भाषा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था और लैटिन भाषा की विशेष योग्यता को देखकर हेडमास्टर ने दूसरी प्राचीन भाषा ग्रीक पढ़ाना आरंभ कर दिया, जिसे उन्होंने शीघ्र ही सीख लिया । इसी विद्वता के बल पर कैंब्रिज के किंग्स कॉलेज के लिए 80 पॉइंट लगभग ₹1100 की सर्वोच्च छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली एवं 14 वर्ष की आयु में उन्होंने एक 'कविता पुस्तक' रच डाली जिसकी अनेक विद्वानों ने प्रशंसा की, यहां तक की कैंब्रिज विश्वविद्यालय में जो पुरस्कार दिए जाते थे, वह प्रतिवर्ष इन्हीं को मिलते थे।
               महर्षि अरविंद जो अध्यात्म मार्ग के पथिक थे, वे राजनीतिक आंदोलन में भाग लेने के साथ ही आध्यात्मिक शक्तियों को बढ़ाने के लिए कई प्रकार के योग संबंधी अभ्यास करते रहते थे। जब क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जेल में जा बैठे तब अपनी कोठरी में बैठकर समस्त मन प्राण से भगवान का ध्यान करने लगे। इसलिए वे अपनी जेल यात्रा को 'आश्रम वास' कहने लगे। वहां उन्हें गहरी साधना का अवसर मिला और वे 'ब्रह्म चेतना' तक पहुंच गए जो अध्यात्म साधना का सर्वोच्च स्तर माना जाता है। कहते हैं की जेल में प्राणायाम का अभ्यास करते समय उनका शरीर एक तरह से हवा में ऊंचा उठ जाता था। जेल में रहते हुए उनकी ब्रह्म भावना इतनी बढ़ गई कि उनको सर्वत्र लीलामय प्रभु के दर्शन होने लगे । जब वे जेल से बाहर निकले तो संसार के अणु-अणु में उनको भगवान का ही अनुभव होता था। इस तरह जेल के भीतर योग साधना करने वाले श्री अरविंद सच्चे अर्थों में एक युग -पुरुष थे।
                   पिता के आदेश से श्री अरविंद ने आई सी एस (इंडियन सिविल सर्विस) की परीक्षा बिना किसी शिक्षक से सहायता लिए ही दे डाली और उसमें उच्च श्रेणी में पास हो गए किन्तु उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी नहीं की। 
              इंग्लेंड के अंतिम दिनों में श्री अरविंद का संपर्क कुछ ऐसे भारतीय युवकों से हो गया। जिन पर यूरोप के क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव पड़ चुका था और इसलिए उनको अपने देश की पराधीन अवस्था खटकने लगी थी। फलस्वरुप लंदन में ही एक संस्था की स्थापना की गई जिसका नाम 'लोटस एंड डगर" ''कमल और कटार' था। इसके प्रत्येक सदस्य को इस बात की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी कि वह कोई ऐसा कार्य करेगा जिससे भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हो सके। अत: अरविंद जैसे सदस्यों ने व्यक्तिगत रूप से उस शपथ को अच्छी तरह पूरा करके दिखा दिया।
       बड़ौदा में श्री अरविंद ने जो 13 वर्ष व्यतीत की है उन्हें हम उनके भावी कार्यक्रम राजनीतिक ,आध्यात्मिक और योग की तैयारी का समय मान सकते हैं। सबसे पहले वे दर्शनिक और आध्यात्मिक विषयों की ओर झुके। भारत के प्राचीन साहित्य का अवलोकन करके उन्होंने यह समझ लिया कि यह देश वास्तव में एक ऐसी महान संस्कृति का उत्तराधिकारी है, जिसकी तुलना संसार में अन्यत्र मिल सकनी संभव नहीं है पर साथ ही यहां की लज्जा जनक पराधीनता और करोड़ों लोगों की भीषण गरीबी को देखकर उनको खेद भी कम नहीं होता था। भारत वासियों के जीवन में से प्राचीन काल के उत्तम गुणों का तो लोप हो गया और उनका स्थान अनेक मोह जनित कुसंस्कारों,हानिकारक रूढियों ने ले लिया। इसलिए भारत के उद्धार की अकांक्षा करने वाले किसी भी व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य यह था कि वह सबसे पहले समाज के भीतर जमा हो जाने वाले इस कूड़ा- करकट की सफाई कर डालें।
           श्री अरविंद ने इस तथ्य को भली भांति हृदयगम किया । पर उनको यह भी अनुभव हुआ कि समाज की सफाई का कार्य आरंभ करने से पहले हमको अपनी सफाई कर डालनी चाहिए । भारतवर्ष एक धर्म प्रधान देश है, यहां की अशिक्षित जनता भी गलत या सही ढंग से धार्मिक भावों से ही संचालित होती है, इसलिए उसका सुधार- उत्थान करने वाले को पहले आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं अपने को कुछ योग्य बना लेना चाहिए।
              श्री अरविंद की बचपन से पूरी शिक्षा इंग्लैंड में अंग्रेजी परिवेश में ही हुई थी,इस कारण अब तक यूरोपियन सभ्यता को आदर की दृष्टि से देखते थे और कभी उस पर आक्षेप या व्यंग नहीं करते थे। पर भारत में आकर यहां की पराधीनता तथा अंग्रेजों के अहंमान्य्ता पूर्ण व्यवहार को देखकर उनमें जातीयता का भाव बढ़ने लगा और वे उग्र शब्दों में विदेशी शासन की आलोचना करने लगे। इस समय उन्होंने मुंबई के ' *इंदू प्रकाश* ' पत्र में ' *पुराने की जगह नए चिराग* ' शीर्षक लेखमाला प्रकाशित कराई थी। जिसमें उन राजनीतिज्ञों कि कठोर आलोचना की गई थी जो अंग्रेजों की खुशामद करके कुछ अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा किया करते थे। 
             श्री अरविंद की आध्यात्मिकता की झलक उनके अनेक पत्रों में मिलती है जो उन्होंने बड़ौदा से अपनी नव विवाहिता पत्नी को लिखे थे - " मैं एक पागल हूं और मेरी पागलपन की तरंगों में से जो तीन तरंगे मुख्य उनमें से एक यह की संसार की सारी संपत्ति उस परमात्मा की है। दूसरी यह कि मैं परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिए व्यग्र हूं और पूर्ण असन्वित हूं कि मैं उसके दर्शन पाकर रहूंगा, और तीसरी यह कि मैं अपने देश की भूमि उसके पहाड़, नदियों तथा वनों को मात्र भौगोलिक सत्ता नहीं मानता बल्कि समस्त जड़ -चेतन प्रकृति को माता मानता हूं और उसी अनुसार उसकी पूजा उपासना करता हूं।"
     भारतवर्ष में नर्मदा तट के चौंदोद स्थान में प्रतिष्ठित गंगा -मठ के सद्गुरु ब्रह्मानंद ने दर्शन देकर श्री अरविंद के लिए योग मार्ग को प्रस्तुत किया एवं 3 वर्ष पश्चात उन्होंने ग्वालियर के श्री 'लेले' को अपना सहायक बनाया और इससे योग मार्ग में अच्छी प्रगति हुई।
           *क्रांतिकारी आंदोलन में सहयोग*
               श्री अरविंद ने कभी शास्त्रस्त की शिक्षा ,बम बनाना ,हथियार जमा करने के कामों को स्वयं नहीं किया। आंदोलन का यह विभाग भाई वारेंद्र की जिम्मे था और उसने इसके लिए कुछ साथी भी बना लिए थे । अरविंद तो इस कार्य में भाग लेने वाले युवकों को प्रेरणा दिया करते थे और आवश्यक होने पर मार्गदर्शन करते थे । जब छुट्टी मिलती तो बंगाल के विभिन्न स्थानों का दौरा करके ऐसे लोगों से संपर्क स्थापित करते जिससे इस कार्यक्रम में सहायता मिल सकती थी। उन्होंने महाराष्ट्रीयन क्रांतिकारियों से भी संपर्क स्थापित कर लिया था। रविंद्र नाथ ठाकुर, योगेंद्र मुखर्जी, चारुचंद्र दत्त जैसे उच्च स्तरीय व्यक्तित्व का राष्ट्र कार्य में सहयोग प्राप्त होता रहा । सिस्टर निवेदिता जो स्वयं अंग्रेज थी किन्तु भारत से साहनुभूति रखने के कारण आंदोलन में सहायता पहुंचाने लगी। इस प्रकार उन्होंने भारतवर्ष को पराधीनता के बंधनों से छुड़ाने वाले आंदोलन को अग्रसर बनाकर मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। उस समय वे भारतीय क्रांतिकारियों के एक प्रमुख संचालक थे।
            महर्षि अरविंद अपनी लेखो से वातावरण को गर्म कर रहे थे जिसमे आध्यात्मिकता के साथ कर्तव्य पालन के रूप में भारत माता की वेदी पर सर्वस्व निछावर कर देने का उपदेश होता था। वह कहते थे कि विदेशी हुकूमत अच्छी हो तो भी अपने शासन स्वराज की समता नहीं कर सकती। अरविंद के 'वंदेमातरम ' में प्रकाशित लेख राजद्रोह से भरे रहते थे। पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। श्री अरविंद के लेख की चतुर्ता और अंग्रेजी भाषा के प्रयोग का कौशल वास्तव में प्रशंसनीय रहता था ।

        श्री अरविंद ने जो 'आर्य ' नामक मासिक पत्र प्रकाशित किया था उसमें उच्च श्रेणी के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक लेख प्रकाशित हुआ करते थे। प्रथम 5 - 6 वर्षों में जो लेख प्रकाशित हुए थे उनमें से कुछ विशेष महत्व के ये थे- 'गीता निबंधावाली' , 'दैवी जीवन' , 'योग समन्वय' , 'वेद रहस्य' , ' मानव एकता का आदर्श' , ' भारतीय संस्कृति के पक्ष में' , 'सामाजिक विकास का मनोविज्ञान' कुछ लेख तो ऐसे हैं जो सार्वभौम दृष्टि से स्थाई निधि हैं ।
         श्री अरविंद भविष्य के बारे में कहते हैं - " एक और स्वप्न है, संसार को भारत की तरफ से आध्यात्मिकता का उपहार, जिसका श्री गणेश हो चुका है । भारत की आध्यात्मिकता यूरोप और एशिया में पर्याप्त परिमाण में प्रवेश पा चुकी है। यह आंदोलन बढ़ता ही जाएगा। युग संकटों के साथ ही संसार की आधिकाधिक आंखें उसकी ओर आशा से देख रही हैं और बहुसंख्यक लोग उसका क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करने को आ रहे हैं।"
            अंतिम स्वप्न है विकास की ओर एक नया कदम जिससे मनुष्य वर्तमान की अपेक्षा उच्च और विशाल चेतना की ओर अग्रसर हो सके। वह उन समस्याओं को हल कर सके जिनका हल करने में आज तक परेशानी और किंकर्तव्य विमुढ़ता अनुभव कर रहा है। यह एक ऐसा आदर्श है जिसका प्रभाव भारत और पश्चिम की प्रगतिशील मस्तिष्कों पर पड़ने लगा है। कुछ कठिनाइयां हैं किंतु जगत नियंता की इच्छा हुई तो शीघ्र ही उनका अंत हो जाएगा। कार्य का आरंभ आत्मा और अंतर चेतना की शक्ति द्वारा किसी देश में हो सकता है यद्यपि इसका लक्ष्य सार्वभौम होगा पर इसका केंद्र भारत में ही रह सकता है।"

      श्री अरविंद ने भारतीय संस्कृति की बुराई करने वाले 'विलियम आर्थर' नामक अंग्रेज लेखक की आलोचनाओं का बड़ा जोरदार उत्तर दिया व उन्होंने सिद्ध किया कि - कम से कम 3000 वर्ष से भारत संसार को बहुत कुछ देता और सिखा रहा है और उसने मानव क्रियाशीलता कि हर क्षेत्र में मानवता को अग्रसर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज भी उसकी देन जारी है और संसार के बड़े-बड़े विद्वान इस तथ्य को कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं।

            इस योगयुक्त अवस्था में मुझे दो संदेश मिले। पहला यह था, "मैंने तुम्हें एक काम सौंपा है और वह है इस जाति के उत्थान में सहायता देना। शीघ्र ही वह समय आयेगा, जब तुम्हें जेल के बाहर जाना होगा; क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इस बार तुम्हें सजा हो या तुम अपना समय, औरों की तरह अपने देश के लिये कष्ट सहते हुए बिताओ। मैनें तुम्हें काम के लिये बुलाया है और यही वह आदेश है जो तुमने माँगा था। मैं तुम्हे आदेश देता हूँ कि जाओ और मेरा काम करो।"
                     दूसरा संदेश *"इस एक वर्ष के एकांतवास में तुम्हें कुछ दिखाया गया है, वह चीज दिखायी गयी है, जिसके बारे में तुम्हें संदेह था, वह है हिंदू धर्म का सत्य। इसी धर्म को मैं संसार के सामने उठा रहा हूँ, यही वह धर्म है जिसे मैंने ऋषि-मुनियों और अवतारों के द्वारा विकसित किया और पूर्ण बनाया है और अब यह धर्म अन्य राष्ट्रों में मेरा काम करने के लिये बढ़ रहा है। मैं अपनी वाणी का प्रसार करने के लिये इस राष्ट्र को उठा रहा हूँ। यही वह सनातन धर्म है जिसे तुम पहले सचमुच नहीं जानते थे, किंतु जिसे अब मैंने तुम्हारे सामने प्रकट कर दिया है।"* 
                " *जिसे हम हिंदूधर्म कहते हैं वह वास्तव में सनातन धर्म है, क्योंकि यही वह विश्वव्यापी धर्म है जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है। यदि कोई धर्म विश्वव्यापी न हो तो वह सनातन भी नहीं हो सकता। "* 

         कुल मिलाकर महर्षि अरविंद भारत- भारतवासी व विश्व मानवता के कल्याण में समर्पित रहे। उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने हेतु सभी प्रकार की भूमिकाएं अदा की। युवकों को क्रांति के लिए प्रेरित किया एव्ं योग की शक्ति के द्वारा वातावरण को गर्म किया तभी अंग्रेज भारत छोड़कर गए। *महृषि अरविंद ने आंतरिक पवित्रता रखते हुए लोक कल्याण में संलग्न रहकर ईश्वर प्राप्ति संभव है, ऐसा संदेश दिया और साथ ही 'हिंदुत्व' के रहस्य को प्रकट करते हुए उसे 'सनातन धर्म' कहा।*
             अगले दिनों विश्व में क्रांति का सूत्र पात्र भारत से होगा और देखते-देखते सारा विश्व एक नैतिक -बौद्धिक - आध्यात्मिक क्रांति से आप्लावित होगा। भारत विश्व को विनाश के मार्ग से हटाकर उज्जवल पथ पर ले जाएगा, फिर भारतीय संस्कृति-विश्व संस्कृति होगी । भारत अपनी सारी आंतरिक -वाहा समस्याओं पर विजय प्राप्त करके 'विश्वगुरु' बनेगा ,प्राचीन गौरव गरिमा को प्राप्त करेगा । अब यही भारत की नियति है।

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