सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

मानव-चेतना पर आक्रमण : जेंडर कन्फ्यूजन, विक्टिम कार्ड और ग्लोबल मार्केट की रणनीति


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

आज का समय सामान्य नहीं है। यह ऐसा समय है जब रणभूमि धरती पर नहीं, मानव-चेतना के भीतर खड़ी की जा रही है। यह युद्ध शस्त्रों का नहीं, ideas का युद्ध है; इसमें रक्त नहीं बहता, पर समाज की आत्मा घायल होती है। कोई शोर नहीं उठता, पर चुप्पी के भीतर विभाजन की गूंज गहरी होती जाती है। यह संघर्ष बाहरी शत्रुओं के विरुद्ध नहीं, मनुष्य को मनुष्य से, समाज को समाज से, और व्यक्ति को स्वयं से अलग करने का संघर्ष है—जो वामपंथ और उसके सांस्कृतिक स्वरूप, कल्चरल मार्क्सवाद द्वारा संचालित किया जा रहा है।

वामपंथ की रणनीति का आधार संघर्ष है। मनुष्य को उसकी पहचान के आधार पर बाँट दो—और फिर संघर्ष का बीज बो दो। जब व्यक्ति स्वयं को अलग समझने लगता है, तो समुदाय की शक्ति टूट जाती है। जब समुदाय टूटता है, तब समाज कमजोर होता है। और जब समाज कमजोर होता है, तब संस्कृति ढह जाती है। यही कारण है कि यह वैचारिक युद्ध सबसे पहले निशाना बनाता है—धर्म, संस्कृति, परिवार, पर्व-त्योहार, मठ-मंदिर, आश्रम, गुरुकुल, परिवार और परंपरागत संस्थाओं को। इन्हें नष्ट करने से पहले उनका उपहास किया जाता है, उनकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं, और उनके विपरीत तत्वों का महिमामंडन किया जाता है। जब मनुष्य अपनी जड़ों पर संदेह करने लगे, तभी उसकी पहचान सबसे कमजोर होती है।

इसी प्रक्रिया में एक अत्यंत खतरनाक वैचारिक औजार बना—Binary Theory, द्विआधारी सिद्धांत।
इस सिद्धांत का सार है—हर स्थान पर दो विरोधी खेमे निर्मित करो।
राम बनाम रावण, दुर्गा बनाम महिषासुर, ब्राह्मण बनाम अब्राह्मण, सम्पन्न बनाम विपन्न, यह समाज—वह समाज, मालिक—मज़दूर, उद्योगपति—मजदूर, पुरुष—महिला।
जब समाज एक-दूसरे को शत्रु की दृष्टि से देखने लगता है तो संवाद समाप्त होता है और संघर्ष आरंभ होता है।
और संघर्ष ही वह औज़ार है जिसके सहारे सत्ता-चिन्तन समाज पर नियंत्रण प्राप्त करता है।

पहचान-राजनीति इसी बाइनरी लॉजिक का विस्तार है।
अमेरिका में इसका रूप Critical Race Theory के रूप में प्रकट हुआ—जिसने कहा कि श्वेत जन्म से शोषक और अश्वेत जन्म से शोषित।
भारत में यही विचार Caste–Race Theory के रूप में लागू किया गया—कि ब्राह्मण जन्म से अपराधी और दलित, ओबीसी, आदिवासी जन्म से पीड़ित।
जबकि सत्य यह है कि भारत में जाति-आधारित असमानता का बड़ा भाग कृत्रिम रूप से निर्मित और बढ़ाया गया नैरेटिव है।
इतिहास में कुछ अपवाद घटनाओं को पूरे समाज का चेहरा घोषित कर देना—और संवाद के स्थान पर प्रतिशोध को प्रतिष्ठित कर देना—इसी विचारधारा का उद्देश्य था।
पीड़ा को मिटाने की जगह, पीड़ा को पहचान और राजनीति का आधार बना दिया गया।
यह अत्यंत खतरनाक परिवर्तन था।

जब जाति का नैरेटिव पर्याप्त न रहा, तब संघर्ष का नया मैदान बनाया गया—Gender War।
प्रकृति में तीन लिंग हैं—पुरुष, स्त्री और उभयलिंगी।
पर विचारधारा ने कहा—जेंडर जैविक सत्य नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णय है।
अचानक दुनिया में 126 से अधिक जेंडर पहचानों का सृजन कर दिया गया—gender fluid, demi-sexual, pan-sexual, non-binary, queer इत्यादि।
पहले पहचान मनुष्य की शक्ति होती थी; अब पहचान भ्रम का स्रोत बन गई।
युवा पीढ़ी स्वयं से पूछने लगी—“मैं कौन हूँ?”, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।
यह भ्रम एक नए संकट—identity crisis—का रूप ले चुका है।

इसी संकट को गहराने के लिए एक और औजार सामने आया—victim card politics।
इस विचार में कहा गया—जो स्वयं को पीड़ित घोषित करे, वही नैतिक श्रेष्ठता का दावा करेगा।
जिस समूह को अधिक दर्द का प्रदर्शित इतिहास हो, उसे नैतिक अधिकार प्राप्त है।
अब संघर्ष न्याय का नहीं, प्रतिस्पर्धी पीड़ाओं का युद्ध बन गया।
मनुष्य मनुष्य से नहीं लड़ रहा, पीड़ा पीड़ा से लड़ रही है।
और जब पीड़ा पहचान बन जाती है, तो समाधान कोई नहीं चाहता—क्योंकि समाधान से राजनीति समाप्त हो जाएगी।

इसके पीछे ग्लोबल मार्केट फोर्सेज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
एक टूटे हुए व्यक्ति से बड़ा उपभोक्ता कोई नहीं।
जेंडर-कन्फ्यूजन, मानसिक असुरक्षा, पहचान संकट—ये सब multi-billion dollar industry बन चुके हैं।
हॉर्मोन थैरेपी, gender transition surgery, mental counseling, identity merchandise, corporate inclusivity projects, NGO funding networks—सभी का लाभ तभी है जब समाज स्थायी रूप से विभाजित रहे।
इसलिए जगत की आर्थिक शक्तियाँ इस संघर्ष को प्रोत्साहित करती हैं, इसे fuel देती हैं, इसे लाभ में बदलती हैं।
एक अराजक समाज ही सबसे बड़ा बाजार होता है।

परंतु यह लड़ाई केवल विचारों की नहीं, मानवता की लड़ाई है।
जब परिवार टूटता है, तब समाज टूटता है।
जब समाज टूटता है, तब राष्ट्र टूटता है।
और जब राष्ट्र टूटता है, तब मानवता बिना आधार के रह जाती है।
यह संघर्ष ऐसा है जो मनुष्यता को जड़ से काट देता है—क्योंकि मनुष्य बिना पहचान, बिना संस्कृति, बिना परिवार, बिना जिम्मेदारी—एक खाली खोल बन जाता है।
और खाली खोलों से सभ्यता नहीं बनती—अराजकता बनती है।

अब प्रश्न केवल विचारधारा का नहीं, मानव अस्तित्व का प्रश्न है।
क्या आने वाली पीढ़ी भ्रम में जन्म लेगी?
क्या बच्चे यह पहचान ही नहीं पाएंगे कि वे कौन हैं?
क्या परिवार और समाज केवल इतिहास की पुस्तकों में रह जाएंगे?
क्या मनुष्य अकेला, विभाजित, डरा हुआ और दिशाहीन प्राणी बन जाएगा?

या हम यह समझने के लिए उठ खड़े होंगे कि
यह लड़ाई किसी वर्ग, धर्म, जाति या लिंग की नहीं—मानवता की रक्षा की लड़ाई है।

समय आ चुका है कि हम संघर्ष की भाषा नहीं, समरसता की भाषा में लौटें।
सत्य की ओर लौटें।
संवाद की ओर लौटें।
क्योंकि मनुष्य विभाजन से नहीं, एकता से जीता है।
मनुष्य संघर्ष से नहीं, सहअस्तित्व से खिलता है।

यह युद्ध विचारों का है—और इसकी विजय भी विचारों से ही होगी।
और वह विचार केवल एक है—
मनुष्य मनुष्य के विरुद्ध नहीं; मनुष्य मनुष्य के लिए है।

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