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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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👉 गोवा का गजनी सिलेंडर हादसा केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं थी; यह उस नंगी सच्चाई का क्रूर उद्घाटन थी कि भ्रष्टाचार कभी काग़ज़ों में नहीं मरता- वह लोगों में मरता है। जिस क्लब को पंचायत ने नियमों के अनुसार ध्वस्त करने का आदेश दिया था, कुछ लोगों के भ्रष्ट आचरण ने उसे बचाए रखा। यह वही क्षण था, जहाँ कानून किनारे पड़ा और लालच ने शासन किया। नतीजा - 25 घरों के चिराग बुझ गए, 25 परिवारों के बड़े बुढ़े, बच्चें उनके अरमान, भविष्य और संभावनाएं हमेशा के लिए टूट गए, और अनगिनत जीवन संवेदना, विस्मय और शोक के बोझ तले दब गए।
भ्रष्टाचार की सबसे भयानक बात यह है कि उसका दंड हमेशा अपराधी को नहीं मिलता; कई बार वह उन लोगों को मिलता है जिनका उस अपराध से कोई लेना-देना नहीं होता। यही सामाजिक त्रासदी है, यही नैतिक विफलता। निर्दोष लोग उन अपराधों की सज़ा भुगतते हैं जिनमें उनका कोई योगदान नहीं था। जीवन की आकस्मिक घटनाओं में यह सत्य और भी भयावह होकर प्रकट होता है- दोष किसी और का, किंतु दंड किसी और को। गोवा का यह हादसा इसी विडंबना की सबसे दर्दनाक मिसाल है।
इस त्रासदी की जड़ में केवल तकनीकी त्रुटि नहीं थी; अग्निशमन यंत्र, आपातकालीन द्वार, मार्ग आदि व्यवस्था नहीं थी, ये सच है। साथ ही जड़ में था वह अदृश्य हिंसक हाथ- भ्रष्टाचार का हाथ, जो रिश्वत, अनदेखी, अनुमति और लालच के सहारे वर्षों से कानून का गला दबा रहा था। जिस इमारत को गिरना था, उसे ग़ैर-कानूनी सुरक्षा मिली, और जब समय आया, वह इमारत स्वयं गिर गई। किन्तु अपने साथ निर्दोषों को लेकर। यही भ्रष्टाचार का अपरिहार्य स्वभाव है: वह अपने आसपास की हर चीज़ को खा जाता है- विश्वास, सुरक्षा, जीवन और भविष्य। भारतीय दर्शन सदैव चेतावनी देता आया है- “अधर्म का अंत निश्चित है; जो धर्म की रक्षा करता है, वही सुरक्षित रहता है।”
यह कोई धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि मनुष्य-समाज के व्यवहार का मनोवैज्ञानिक नियम है। भ्रष्टाचार में कमाया गया हर पैसा एक कर्म-ऋण लेकर आता है। यह ऋण आज नहीं तो कल—किसी रूप में चुकता ही होता है। हम अक्सर देखते हैं कि अधर्म का दंड वही नहीं भुगतता जो अधर्म करता है; कई बार समाज, व्यवस्था और निर्दोष जन-जीवन उसकी कीमत चुकाता है।
गोवा की यह घटना बताती है कि भ्रष्टाचार “प्रशासनिक कमजोरी” या “सिस्टम का दोष” नहीं है; यह सीधी-सीधी मानव-हत्या की प्रक्रिया है। यह एक सामाजिक महामारी है, जो धीरे-धीरे नहीं—बल्कि अचानक, बिना चेतावनी के, जन-जीवन को तबाह कर देती है। समाज में जब कानून और नैतिकता का स्थान पैसे और प्रभाव ले लेते हैं, तब सुरक्षा एक भ्रम बन जाती है और दुर्घटनाएँ नियति नहीं, बल्कि योजना-बद्ध परिणाम बन जाती हैं।
इस हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी संवेदनाएँ केवल घटना तक सीमित रहेंगी? क्या 25 जीवन केवल आँकड़ा बनकर हमारा ध्यान खींचेंगे, या यह त्रासदी हमें यह समझने पर मजबूर करेगी कि भ्रष्टाचार किसी एक व्यक्ति का दोष नहीं- यह समाज की सामूहिक सहिष्णुता का परिणाम है?
गोवा की यह पीड़ा हमें याद दिलाती है कि भ्रष्टाचार का फल किसी भी रूप में प्रकट होता ही है- कभी सत्ता के पतन में, कभी परिवारों के विनाश में, और कभी मासूम जीवन की अकाल मृत्यु में।
इसलिए प्रश्न मात्र यह नहीं कि यहाँ पर अपराधी कौन है- प्रश्न यह भी है कि हम कब जागेंगे? अपने आचरण से कब सावधान होंगे। सावधानी हटी- दुर्घटना घटी, अब करणीय क्या है ये व्यक्ति, समाज, राज्य प्रशासन और सभी सरकारों को विचार और कार्य करना है। अन्यथा सबसे सरल है कि नियति को दोष देकर बच निकलिये..😇🌻
#kailash_chandra Kailash Chandra
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