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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
अल्पसंख्यक की परिभाषा और भारतीय दृष्टि : पश्चिमी प्रतिमानों के विरुद्ध सांस्कृतिक एकात्मता का प्रश्न
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से कहा है कि वह “अल्पसंख्यक” की परिभाषा और पहचान पर तीन महीने में निर्णय ले। यह निर्देश भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर दिया गया, जिन्होंने इस विषय पर वर्षों पहले आयोग को ज्ञापन सौंपा था। याचिका का मूल प्रश्न यह है कि भारत में “अल्पसंख्यक” कौन हैं, और इस पहचान का निर्धारण किन मानकों पर होना चाहिए — जनसंख्या के अनुपात से, या किसी धार्मिक-राजनीतिक घोषणा से?
भारत की अध्यात्मपरक परम्परा : विविधता में एकता का दर्शन
भारत की अध्यात्मपरक परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है। यहाँ विविधता कभी विभाजन का कारण नहीं बनी, अपितु एकता का सौन्दर्य बनी। शैव, शाक्त, वैष्णव, गणपत, तांत्रिक, चार्वाक, जैन, बौद्ध, वेदान्ती, सांख्य, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, आगम-निगम, वैदिक और श्रमण — ये सभी परम्पराएँ एक ही विराट सनातन जीवन-दर्शन की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। कोई निराकार ब्रह्म का उपासक है, तो कोई साकार रूप में उसी परम सत्य की आराधना करता है। सभी का लक्ष्य एक ही — आत्मा की मुक्ति और ब्रह्म के साक्षात्कार की अनुभूति। अतः यह कहना उचित होगा कि ये सब एक ही वृक्ष की शाखाएँ हैं, जिसकी जड़ वेदों और उपनिषदों में प्रतिष्ठित है।
औपनिवेशिक प्रभाव और ‘Religious Classification’ की नीति
किन्तु औपनिवेशिक युग के बाद जब भारत की शासन और शिक्षा प्रणाली पश्चिमी दृष्टि के प्रभाव में आई, तब इस समग्र दृष्टि को खण्डित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। अंग्रेज़ों ने ‘Religious Classification’ की नीति के माध्यम से भारतीय समाज को “धर्म” की अब्राह्मिक परिभाषा में बाँधने का प्रयास किया — जहाँ धर्म केवल ईश्वर, पुस्तक और पैगम्बर पर आधारित होता है। इस दृष्टि से बौद्ध, जैन, सिख, आर्यसमाजी आदि को हिन्दू धर्म से पृथक “धर्म” के रूप में परिभाषित किया गया।
राजनीति और मिशनरी एजेंडा की संगति
धर्म और रिलिजन : भारतीय और पश्चिमी दृष्टि का मौलिक अंतर
पश्चिमी सभ्यता में “Religion” का अर्थ किसी एक ईश्वर, एक पुस्तक और एक उपासना पद्धति तक सीमित है; जबकि भारत में “धर्म” का अर्थ “धारण करने” से है — जो लोक और जीवन को धारण करता है, वही धर्म है। अतः धर्म और रिलिजन में मौलिक भेद है। परंतु हमारे संविधान निर्माताओं और उसके पश्चात की सरकारों ने सनातन हिन्दू धर्म को पश्चिमी दृष्टिकोण से देखा और उसी के आधार पर नीतियाँ निर्मित कीं। परिणामतः हिन्दू समाज की व्यापक, बहुपरतीय, आध्यात्मिक परंपरा को रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कहकर उपेक्षित किया गया
यह प्रश्न केवल कानूनी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक आत्मा से जुड़ा हुआ है। क्योंकि “अल्पसंख्यक” शब्द की जड़ें भारतीय नहीं, बल्कि पश्चिमी हैं। पश्चिम में “रिलिजन” का अर्थ एक ईश्वर, एक पैग़म्बर और एक पवित्र ग्रंथ पर आधारित विश्वास से है, जबकि भारत में “धर्म” का अर्थ है — वह जो धारण करने योग्य है, जो लोक और जीवन को स्थिरता देता है। यहाँ धर्म का अर्थ विश्वास नहीं, आचरण है; मत नहीं, मार्ग है। यही कारण है कि भारत में धर्म कभी विभाजन का कारण नहीं रहा, बल्कि सह-अस्तित्व का आधार रहा है।
राजनीति और मिशनरी एजेंडा की संगति
स्वतंत्र भारत की सरकारें अक्सर भारत को पश्चिमी नजरिए से देखती रहीं। उन्होंने धर्म को सामाजिक समस्या माना और उसे सीमित करने के लिए “धर्मनिरपेक्षता” का प्रयोग किया। परंतु इस “धर्मनिरपेक्षता” ने धीरे-धीरे हिन्दू धर्म की मूल भावना को कमजोर किया। इसी पृष्ठभूमि में क्रिश्चियन मिशनरियों और वामपंथी विचारधाराओं ने “पहचान की राजनीति” को जन्म दिया।
वामपंथ का मूल दर्शन संघर्ष पर आधारित है — वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष या जेंडर संघर्ष। पश्चिम में यह विचार क्रिटिकल रेस थ्योरी के रूप में विकसित हुआ, और भारत में इसे “आइडेंटिटी पॉलिटिक्स” का नाम मिला। इस सिद्धांत का उपयोग समाज को टुकड़ों में बाँटने के लिए किया गया — दलित, आदिवासी, पिछड़े, लिंग, भाषा, क्षेत्र और धर्म के नाम पर।
मिशनरियों ने इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाया। उन्होंने हिन्दू समाज के भीतर की विविधताओं को अलग धर्मों के रूप में स्थापित करने का अभियान चलाया। कभी “लिंगायत धर्म” के रूप में, कभी “सरणा कोड” के नाम पर, और कभी दलितों के बीच बौद्ध धर्म के प्रचार द्वारा — यह सब उसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा रहा, जिसका उद्देश्य हिन्दू समाज को अपनी जड़ों से काटना था।
अल्पसंख्यक दर्जे का इतिहास और वैचारिक पृष्ठभूमि
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी यह औपनिवेशिक दृष्टि समाप्त नहीं हुई। 1956 में बौद्ध धर्म को “अल्पसंख्यक” का दर्जा दिया गया, जो वास्तव में डॉ. भीमराव अंबेडकर के “नवबौद्ध आंदोलन” से जुड़ा था। उस समय यह कहा गया कि यह ‘सामाजिक सुधार’ का कदम है, परन्तु इसके पीछे एक गहरी वैचारिक रणनीति कार्यरत थी — हिन्दू समाज को जाति के आधार पर विभाजित कर उसके भीतर ‘असंतोष की पहचान’ स्थापित करना।
1970 के दशक में सिखों को पृथक धार्मिक इकाई के रूप में संवैधानिक मान्यता दी गई। 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन ने इसी विभाजनकारी प्रवृत्ति को उग्र रूप दिया। 1990 के दशक में “लिंगायत” समुदाय को अलग धर्म घोषित करने की मांग उठी, और अब दलित, आदिवासी, कबीरपंथी, रविदासिया आदि अनेक समुदायों को “हिन्दू नहीं” सिद्ध करने की मुहिम चल रही है।
संविधान में अनुच्छेद 29 और 30 द्वारा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार दिए गए। उद्देश्य तो संरक्षण का था, परंतु इसकी परिभाषा कभी स्पष्ट नहीं हुई। 1992 में पारित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) ने केंद्र सरकार को यह अधिकार दे दिया कि वह अपनी मर्जी से किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित कर सकती है। इसके बाद 23 अक्टूबर 1993 की अधिसूचना के माध्यम से पाँच समुदाय — मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी — को अल्पसंख्यक घोषित किया गया। वर्ष 2013 में जैन समाज को भी इस सूची में जोड़ दिया गया।
संविधान और अल्पसंख्यक अधिकार : संरक्षण या विभाजन?
परंतु यह विचार कभी नहीं किया गया कि सिख, बौद्ध और जैन धर्म भारतीय परंपरा से अलग नहीं हैं। ये सब उसी सनातन मूलधारा की शाखाएँ हैं — जहाँ ब्रह्म, आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष और अहिंसा जैसे सिद्धांत समान रूप से प्रवाहित हैं। इनका दर्शन विरोध का नहीं, पूरकता का है। परंतु राजनीतिक दृष्टि ने इन्हें “अलग धर्म” बताकर हिन्दू समाज से पृथक कर दिया।
ये सारे प्रयास केवल समाज सुधार के नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक हैं। “अल्पसंख्यक” का दर्जा आज केवल सांस्कृतिक अधिकार नहीं, बल्कि राजनैतिक लाभ का साधन बन गया है — विशेषकर आरक्षण, सरकारी योजनाओं, शिक्षा संस्थानों और धार्मिक निधियों में विशेषाधिकार प्राप्त करने के लिए। परिणामतः समाज में यह मनोवृत्ति फैल रही है कि “हिन्दू कहलाने से लाभ नहीं, पर अल्पसंख्यक कहलाने से विशेषाधिकार मिलते हैं।”
पश्चिमी विचारधारा से प्रेरित पहचान की राजनीति
यह प्रवृत्ति पश्चिमी विचारधारा “Identity Politics” और “Critical Race Theory” से प्रेरित है। इन दोनों सिद्धांतों की जड़ वामपंथी विचारधारा में है, जिसका मूल उद्देश्य समाज में वर्ग या पहचान आधारित विभाजन करना है। भारत में यह विचार अंग्रेज़ों के ‘Divide and Rule’ की नीति के नए रूप में सामने आया है — अब तलवार नहीं, बल्कि “पहचान” हथियार बन गई है।
वामपंथी विचारधारा का जन्म वास्तव में क्रिश्चियनिटी के ‘पाप और प्रक्षालन’ सिद्धांत से हुआ — पहले व्यक्ति में अपराधबोध जगाना, फिर उसे उसके ईश्वर से विमुख कर देना, और अंततः एक नया “विचारधारात्मक ईश्वर” देना। इसी पद्धति का प्रयोग क्रिश्चियन मिशनरियाँ भी करती हैं — पहले हिन्दुओं में उनके धर्मग्रन्थों, देवताओं और परम्पराओं के प्रति अविश्वास जगाती हैं, फिर उन्हें यह विश्वास दिलाती हैं कि उनका उद्धार केवल किसी “नए प्रभु” के माध्यम से ही सम्भव है।
सनातन परम्पराओं का कृत्रिम विभाजन और सांस्कृतिक विघटन
आज हम देख रहे हैं कि कैसे शैव, शाक्त, वैष्णव, जैन, बौद्ध या आदिवासी परम्पराएँ — जिन्हें कभी एक ही सांस्कृतिक धारा का अंग माना जाता था — अब कृत्रिम रूप से अलग-अलग पहचान में बाँटी जा रही हैं। यह विभाजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक है। जब कोई परम्परा अपनी जड़ों से कट जाती है, तो वह अपने मूल से विमुख होकर बाहरी प्रभावों की ओर झुकने लगती है। यही कारण है कि जो समुदाय “हम हिन्दू नहीं हैं” कहने से प्रारम्भ करता है, वह धीरे-धीरे अपने देवताओं, अपने संस्कारों और अंततः अपने धर्म से भी दूर हो जाता है — और एक दिन ईसाई या इस्लामी प्रभाव के अधीन आ जाता है।
वर्तमान स्थिति : जनसंख्या अनुपात और संवैधानिक विरोधाभास
आज भारत के कई राज्यों में स्थिति उलटी हो चुकी है।
लक्षद्वीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में हिन्दू जनसंख्या अल्पसंख्यक है, पर वहाँ “अल्पसंख्यक अधिकार” बहुसंख्यक समुदायों को प्राप्त हैं।
दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और केरल में मुसलमानों की जनसंख्या 25–35 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, फिर भी वे “अल्पसंख्यक” कहलाते हैं।
यह विरोधाभास न केवल तर्कहीन है, बल्कि संविधान के मूल उद्देश्य के भी विपरीत है।
यदि अल्पसंख्यक का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर हो, तो हर राज्य में स्थिति भिन्न होगी। और यदि यह धार्मिक पहचान पर आधारित हो, तो फिर भारत का बहुलवादी धर्म-संरचना ही खंडित हो जाएगी।
मिशनरी एजेंडा और अलगाव की राजनीति का ताना-बाना
वर्तमान दशकों में ईसाई मिशनरी संगठनों और इस्लामी संगठनों ने “अल्पसंख्यक अधिकार” को धार्मिक विस्तार के औजार के रूप में उपयोग किया है। झारखंड में “सरना धर्म कोड”, कर्नाटक में “लिंगायत को अलग धर्म” घोषित करने की माँग, और तमिलनाडु या केरल में “ड्रविड़ आंदोलन” — ये सब उसी दीर्घकालिक रणनीति के भाग हैं, जिसका उद्देश्य हिन्दू समाज की सांस्कृतिक एकता को विखंडित करना है।
सरकारों ने भी अज्ञानवश या राजनीतिक स्वार्थवश इन आंदोलनों को प्रोत्साहित किया। सनातन धर्म के अंतर्गत आने वाले सिख, बौद्ध, जैन, लिंगायत, चार्वाक, वैदिक, आगमिक, शैव और वैष्णव — सबको अलग-अलग धार्मिक पहचान दी गई। इससे “धर्म” का नहीं, केवल “धार्मिक पहचान” का विस्तार हुआ, जो पश्चिमी रिलिजन की परिभाषा से मेल खाता है।
न्यायपालिका की भूमिका : भारतीयता आधारित परिभाषा की आवश्यकता
यदि न्यायपालिका ने भी पश्चिमी मानदण्डों पर “अल्पसंख्यक” की परिभाषा दी, तो यह स्थिति और जटिल हो सकती है। सनातन धर्म की वैदिक और श्रवण परम्पराएँ परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं। परन्तु संविधान की व्याख्या में इन्हें विरोधी रूप में प्रस्तुत किया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय यदि “अल्पसंख्यक” की परिभाषा पश्चिमी सिद्धान्तों पर करेगा, तो वह केवल “एक ईश्वर, एक पुस्तक” वाले धर्मों को मान्यता देगा; जबकि सनातन धर्म हजारों मत, पंथ, सम्प्रदाय, दर्शन, आगम-निगम, वैदिक और श्रमण परम्पराओं से युक्त है। यहाँ निराकार ब्रह्म की उपासना करने वाले भी हैं और साकार ब्रह्म को मानने वाले भी — परन्तु सबका आधार एक ही है।
भारतीय दृष्टि से ‘अल्पसंख्यक’ की पुनर्परिभाषा और सांस्कृतिक एकात्मता का मार्ग
अल्पसंख्यक की परिभाषा क्षेत्रीय जनसंख्या के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक लाभ या विभाजन की नीति पर। जब देश में लगभग 25 करोड़ मुसलमान हैं, तो उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता। वहीं जिन क्षेत्रों में हिन्दू जनसंख्या अत्यल्प है — जैसे पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ — वहाँ हिन्दुओं को अल्पसंख्यक दर्जा दिया जाना चाहिए।
परिभाषा का उद्देश्य हिन्दू समाज को तोड़ना नहीं, अपितु उसे एकात्म दृष्टि से देखना होना चाहिए। पर आशंका है कि सर्वोच्च न्यायालय भी निर्णय पश्चिमी प्रतिमानों के आधार पर ही देगा, जिससे भारतीय सांस्कृतिक एकता को पुनः आघात पहुँच सकता है।
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