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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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दिल्ली की इस सर्द सुबह में जब मैंने घर से बाहर कदम रखा, तो ठंड से अधिक चुभन हवा में थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी ने धुएँ और धूल का घना आवरण शहर पर ओढ़ा दिया हो। सड़क पर चलते लोग मास्क अब बीमारी से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपनी साँसों की रक्षा के लिए पहन रहे थे। आँखों में जलन, गले में खराश और सीने में भारीपन—ये सब दिल्ली के जीवन का नया सामान्य बन चुका था। प्रदूषण–मापक यंत्रों की सूइयाँ लगातार लाल पर टिकी रहतीं और शहर का मनोबल धीरे–धीरे उस स्थिति को नियति की तरह स्वीकार करता जा रहा था।
इन्हीं दिनों राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों में युवा, छात्र और नागरिक पोस्टर लेकर खड़े दिखाई देते थे—“हम हवा माँगते हैं”, “हमारी साँसें लौटा दो” या “Climate Justice Now”। यह दृश्य देखकर एक क्षण के लिए मन में आशा जगी—नई पीढ़ी जागी है, पर्यावरण की रक्षा के लिए चिंतित है, और भविष्य के प्रति उत्तरदायी है।
किन्तु उसी भीड़ के मध्य अचानक एक नारा उठा—“हिड़मा अमर रहे!”
क्षण भर को समझ ही नहीं आया कि यह कौन–सा संघर्ष है—स्वच्छ हवा का या लहू का? क्या यह प्रदर्शन वास्तव में प्रदूषण के विरुद्ध था, या फिर उसके पीछे किसी और ही पटकथा का अभ्यास चल रहा था?
जिस नाम का नारा लगाया गया, वह था मदवी हिड़मा। हिड़मा कोई सामान्य आदिवासी कार्यकर्ता नहीं, बल्कि CPI (माओवादी) का डंडकारण्य क्षेत्र में सक्रिय सबसे खतरनाक कमांडरों में से एक था। सुरक्षा एजेंसियों की सूचनाओं और वर्षों से दर्ज मामलों के अनुसार वह कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड रहा – 6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के चिंतलनार–ताड़मेटला क्षेत्र में CRPF के 76 जवानों पर घात लगाकर किया गया हमला, जिसे उस समय तक नक्सल इतिहास का सबसे भीषण हमला माना गया; इसके बाद कुछ ही हफ्तों में दंतेवाड़ा में बस में बारूदी विस्फोट कर दर्जनों जवानों और आम नागरिकों की हत्या; 24 अप्रैल 2017 को सुकमा के बुर्कापाल क्षेत्र में CRPF की टुकड़ी पर हमला कर 25 से अधिक जवानों की हत्या; और 3 अप्रैल 2021 को सुकमा–बीजापुर सीमा पर मुठभेड़ में 22 जवानों की शहादत – इन सब में उसका नाम सामने आता रहा।
लगभग दो दशक तक वह बस्तर के जंगलों में PLGA (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) के बटालियन–1 का नेतृत्व करता रहा, CPI (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सदस्य बना और उस पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी समेत कई एजेंसियों ने बड़ा इनाम घोषित कर रखा था। अंततः 18–19 नवम्बर 2025 को आन्ध्र प्रदेश के अल्लुरी सीताराम राजू ज़िले के मारेदुमिल्ली जंगल क्षेत्र में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिड़मा, उसकी पत्नी राजक्का और उसके साथियों की मौत हुई। यह मुठभेड़ पिछले कई वर्षों से चल रहे माओवादी विरोधी अभियानों की एक बड़ी सफलता मानी गई, क्योंकि हिड़मा को छत्तीसगढ़–तेलंगाना–आंध्र के पूरे बेल्ट में नक्सली हिंसा का मुख्य चेहरा माना जाता था।
ऐसे व्यक्ति के समर्थन में “अमर रहे” के नारे, और वह भी दिल्ली के प्रदूषण–विरोधी छात्र आंदोलन के बीच – यह किसी भावुक गलती से अधिक एक सोचा–समझा संकेत लगता है। यह बताता है कि केवल हवा की चिंता नहीं, बल्कि किसी वैचारिक एजेंडे की रेखा भी वहाँ समानान्तर चल रही थी।
यह “पैटर्न” अचानक से पैदा नहीं हुआ, इसकी पृष्ठभूमि पिछले पाँच–छह वर्षों की कई घटनाओं में दिखाई देती है। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित हुआ, जिसे लोकसभा ने 9 दिसंबर और राज्यसभा ने 11 दिसंबर 2019 को मंज़ूरी दी। कानून का घोषित उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान से आए उन हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी शरणार्थियों को नागरिकता का मार्ग आसान करना था जिन्हें वहाँ धार्मिक आधार पर उत्पीड़न झेलना पड़ा। लेकिन देश के भीतर और बाहर, कई राजनीतिक और वैचारिक समूहों ने इस कानून को मुस्लिम–विरोधी बताते हुए इसके खिलाफ़ अभियान चलाया। 15 दिसंबर 2019 को दिल्ली के शाहीन बाग़ में महिलाओं के नेतृत्व में धरना शुरू हुआ, जो कई महीनों तक चला और राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय मीडिया का केंद्र बन गया।
शुरुआत में मंच पर “संविधान बचाओ” और “नागरिक अधिकार बचाओ” जैसे नारे प्रमुख थे; पर समय बीतने के साथ कुछ जगहों से “आजादी” और “टुकड़े–टुकड़े” वाली भाषा भी सुनाई देने लगी। सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेशों, फर्जी वीडियो और इस्लामिक और वामपंथी इको सिस्टम ने माहौल में ज़हर घोल दिया। अंततः 23 से 29 फरवरी 2020 के बीच उत्तर–पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों – जाफराबाद, मौजपुर, भजनपुरा, करावल नगर आदि – में हिंसा भड़क उठी, जिसे 2020 Delhi riots के नाम से दर्ज किया गया। इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई, दो सौ से अधिक लोग घायल हुए और भारी पैमाने पर संपत्ति नष्ट हुई। दंगों की जाँच और मुकदमों का दौर आज भी जारी है, पर इतना स्पष्ट है कि महीनों तक चली वैचारिक और राजनीतिक उकसाहट ने दिल्ली को उस बिन्दु तक ला खड़ा किया जहाँ एक चिंगारी पर्याप्त थी।
इसी के थोड़े समय बाद सितंबर 2020 में तीन कृषि कानून पारित किए गए और इसके विरोध में किसानों का लंबा आंदोलन शुरू हुआ। औपचारिक रूप से 9 अगस्त 2020 से विभिन्न जगहों पर विरोध शुरू हुआ और 26 नवंबर 2020 से दिल्ली की सीमाओं – सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर – पर किसानों का जमावड़ा लगने लगा। यह आंदोलन 11 दिसंबर 2021 तक चला, जब सरकार ने तीनों कानून वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की। किसानों की वास्तविक चिंताएँ थीं – MSP की गारंटी, निजी कंपनियों की भूमिका, मंडी व्यवस्था का भविष्य, फ़सल का दाम और किसानों की आय। लेकिन आंदोलन के नेतृत्व में केवल पारंपरिक किसान संगठन नहीं थे; वहाँ वामपंथी पृष्ठभूमि की किसान यूनियनें, छात्र संगठन, विभिन्न विचारधाराओं के एक्टिविस्ट और कई ऐसे चेहरे भी सक्रिय दिखे जो हर बड़े विरोध–आंदोलन में उपस्थित रहते हैं।
26 जनवरी 2021 की घटना इस आंदोलन का सबसे विवादास्पद मोड़ बनकर सामने आई। गणतंत्र दिवस पर घोषित ट्रैक्टर रैली के लिए दिल्ली पुलिस और किसान संगठनों के बीच जो मार्ग तय हुआ था, उससे हटकर कुछ जत्थे बैरिकेड तोड़ते हुए शहर के संवेदनशील क्षेत्रों की ओर बढ़े। ITO, नांगलोई और कई अन्य स्थानों पर पुलिस से भिड़ंत हुई, और अंततः एक बड़ा समूह लाल किले तक पहुँच गया। किले की प्राचीर पर चढ़कर कुछ प्रदर्शनकारियों ने निशान साहिब और संगठनों के झंडे फहरा दिए। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार इस दिन 89 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, 100 से ज़्यादा लोग चोटिल हुए और करीब 200 लोगों को गिरफ़्तार किया गया। बाद में संयुक्त किसान मोर्चा के कई नेताओं ने इस हिंसक मोड़ से स्वयं को अलग बताया और इसे “भटके हुए या घुसे हुए तत्वों” की हरकत कहा, लेकिन यह तथ्य फिर भी बना रहता है कि आंदोलन का स्वर केवल MSP या कानून वापसी तक सीमित नहीं रहा था; उसे “प्रणाली बनाम संघर्ष” की दिशा में मोड़ने की कोशिश स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी।
इन दोनों उदाहरणों – CAA विरोध और किसान आंदोलन – के बाद जब हम दिल्ली के प्रदूषण विरोधी आंदोलन में “हिड़मा अमर रहे” का नारा सुनते हैं, तो यह एक अलग–थलग घटना नहीं लगती; बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप के उसी सिलसिले की कड़ी दिखाई देती है, जिसमें हर वैध सामाजिक मुद्दे को एक व्यापक राजनीतिक–वामपंथी संघर्ष का हिस्सा बनाने की कोशिश की जाती है।
अगर पर्यावरण के प्रश्न को थोड़ा व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है। 1970 और 80 के दशक में केरल की साइलेंट वैली में प्रस्तावित हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के विरुद्ध आंदोलन चला, जिसे वैज्ञानिकों, स्थानीय जनता और सामाजिक संगठनों का समर्थन मिला। 1973 में योजना आयोग ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी थी, लेकिन 1983 तक चले विरोध और विशेषज्ञों की रिपोर्टों के बाद यह परियोजना रद्द हुई; 1984 में यह क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान के रूप में सुरक्षित घोषित किया गया और 1985 में Silent Valley National Park के रूप में अधिसूचित हो गया। यहाँ पर्यावरण आंदोलन का स्वर मुख्यतः वैज्ञानिक–सामाजिक रहा।
इसके बाद मध्य भारत में नर्मदा घाटी में बड़े बाँधों, विशेषकर सरदार सरोवर परियोजना, के विरुद्ध नर्मदा बचाओ आंदोलन खड़ा हुआ। 1985 में मेधा पाटकर और उनके साथियों ने इस परियोजना से विस्थापित होने वाले लोगों की स्थिति देखकर आंदोलन की शुरुआत की। अगले कई वर्षों में यह आंदोलन विश्व बैंक की फंडिंग, पुनर्वास नीति, पर्यावरणीय प्रभाव और “विकास की वैकल्पिक अवधारणा” के प्रश्नों पर राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन गया।
2005 में ओडिशा के जगतसिंहपुर ज़िले में दक्षिण कोरियाई कंपनी POSCO के साथ लगभग 12 बिलियन डॉलर के इस्पात संयंत्र के लिए MoU साइन हुआ। इसके बाद अगस्त 2005 से शुरू हुआ एंटी–POSCO आंदोलन लगभग 2017 तक चला, जिसमें भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण, तटीय पारिस्थितिकी और स्थानीय आजीविका के मुद्दे उठाए गए। 2013 में विस्फोट की एक घटना में चार लोगों की मौत भी हुई। अंततः मार्च 2017 में POSCO ने औपचारिक रूप से परियोजना से हाथ खींच लिए और अधिगृहित ज़मीन राज्य सरकार के लैंड बैंक को स्थानांतरित कर दी गई।
इसी श्रेणी में ओडिशा के नीयामगिरि पहाड़ियों में वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना के विरोध को भी देखा जा सकता है, जहाँ 2013 में ग्राम सभाओं ने एकमत से खनन का विरोध किया और सर्वोच्च न्यायालय ने भी आदिवासी समुदायों के धार्मिक–सांस्कृतिक अधिकारों को मान्यता देते हुए निर्णय दिया कि अंतिम अनुमति ग्राम सभाओं की होगी।
तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टर के विस्तार के खिलाफ़ कई वर्षों से पर्यावरण–स्वास्थ्य सम्बंधी शिकायतें उठती रहीं। जब 2018 में विरोध ने चरम रूप लिया तो 22 मई 2018 को 100वें दिन की रैली पर पुलिस द्वारा की गई फायरिंग में 13–14 लोगों की मौत हुई, 80–100 लोग घायल हुए और उसके बाद संयंत्र को बंद करने के आदेश दिए गए। यह घटना भी एक ऐसे मोड़ की तरह रही जहाँ पर्यावरण, उद्योग, पुलिस हिंसा और राजनीतिक–वैचारिक सक्रियता सब एक–दूसरे में उलझ गए।
उत्तराखंड की चारधाम ऑल–वेदर रोड परियोजना में भी प्रारंभिक दौर में पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने पहाड़ों की कटान, भूस्खलन के खतरे और नदियों पर दबाव की बातें उठाईं, जबकि सरकार की ओर से सेना की आवाजाही, सीमा सुरक्षा और तीर्थयात्रियों की सुविधा की दलील दी गई। 14 दिसंबर 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने तीन सामरिक मार्गों के लिए 10 मीटर चौड़ी डबल लेन पेव्ड शोल्डर (DL–PS) सड़क की अनुमति दी, साथ ही पर्यावरणीय प्रभाव की निगरानी के लिए समिति बनाने का आदेश भी दिया।
अंडमान–निकोबार के ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का मामला अभी ताज़ा उदाहरण है, जहाँ लगभग 72,000 करोड़ रुपये की लागत से अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, टाउनशिप और पावर प्लांट सहित कई घटकों वाली परियोजना को भारत की सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दूसरी ओर पर्यावरणविदों, समुद्री जीव–विज्ञानियों और कई एक्टिविस्ट समूहों ने लगभग 130 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र के प्रभावित होने, स्थानीय जनजातियों की जीवन शैली बदलने और जैव विविधता पर ख़तरे की बात कहकर इसका विरोध शुरू कर दिया है।
इन सभी उदाहरणों में एक साझा बात यह दिखती है कि पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन खोजने की वास्तविक जटिलता के साथ–साथ कई बार ऐसे समूह सक्रिय हो जाते हैं जो हर बड़ी राष्ट्रीय परियोजना को केवल “कॉरपोरेट बनाम जनता”, “राज्य बनाम आदिवासी” या “विकास बनाम पर्यावरण” के फ्रेम में पेश करते हैं। इन समूहों में वामपंथी पृष्ठभूमि के एक्टिविस्ट, छात्र संगठन, मजदूर यूनियनें और विदेशी फंडिंग से चलने वाले NGO प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। 2015 में केंद्र सरकार द्वारा ग्रीनपीस इंडिया के विदेशी चंदा (FCRA) लाइसेंस पर कार्रवाई और उसके बाद हुई कानूनी–राजनीतिक जंग ने यह भी दिखाया कि विकास–परियोजनाओं, कोयला खनन और ऊर्जा नीति पर काम करने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को सरकारें किस प्रकार “राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा में बाधा” के रूप में देखती हैं, जबकि वे स्वयं अपने काम को “विकल्प आधारित विकास दृष्टि” की लड़ाई बताते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वातावरण की चर्चा केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों और उत्सर्जन के आँकड़ों तक सीमित नहीं रही। 20 अगस्त 2018 से स्वीडन की किशोरी ग्रेटा थनबर्ग ने संसद के बाहर “स्कूल स्ट्राइक फ़ॉर क्लाइमेट” शुरू किया, जो कुछ ही महीनों में “Fridays for Future” नाम से वैश्विक अभियान में बदल गया। 23 सितंबर 2019 को उसने न्यूयॉर्क में UN Climate Action Summit के मंच से विश्व नेताओं को “हाउ डेयर यू” वाले भाषण में लताड़ा और कहा कि आपने हमारा भविष्य चुरा लिया है, हम आपको देख रहे हैं। लाखों विद्यार्थियों ने अलग–अलग देशों में स्कूल छोड़कर जलवायु–हड़तालों में हिस्सा लिया। धीरे–धीरे इस आंदोलन की भाषा केवल कार्बन उत्सर्जन या जलवायु नीति तक सीमित नहीं रही; इसमें पूँजीवाद–विरोध, “ग्लोबल नॉर्थ” की जवाबदेही, उपनिवेशवाद और विकास–मॉडल पर प्रश्न शामिल होते गए
पर्यावरण निस्संदेह हमारी समय की सबसे गंभीर चिंताओं में से एक है। दिल्ली की हवा, यमुना का विषाक्त जल, कार्बन उत्सर्जन, वन संकट, जलवायु असंतुलन—ये सब वास्तविक और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। परंतु जब प्रदूषण के विरोध की रैली में माओवादी हिंसा का गुणगान होने लगे, तब प्रश्न पर्यावरण का नहीं, बल्कि वैचारिक प्रयोगशाला का हो जाता है।
कल्चरल मार्क्सवाद की यही विशेषता है—वह समाज के हर क्षेत्र में संघर्ष खड़ा करने का प्रयास करता है। कभी किसान को सरकार के विरुद्ध, कभी छात्र को विश्वविद्यालय के विरुद्ध, कभी स्त्री को पुरुष के विरुद्ध, कभी समुदाय को राष्ट्र के विरुद्ध, और अब—पर्यावरण को विकास के विरुद्ध खड़ा किया जाता है। वास्तविक मुद्दा पीछे हट जाता है, और उसकी जगह आती है—स्थायी असंतोष की संरचना।
हर आंदोलन धीरे–धीरे लोकतांत्रिक विमर्श से मुड़कर वैचारिक युद्धभूमि बन जाता है।
विश्व स्तर पर भी यही प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। जलवायु–न्याय की भाषा का प्रयोग करते–करते आंदोलनकारियों का लक्ष्य पर्यावरणीय समाधान नहीं रह जाता, बल्कि पूँजीवाद, लोकतंत्र, राष्ट्र–राज्य और आर्थिक विकास के विरुद्ध संघर्ष खड़ा करना बन जाता है। “Climate Justice” धीरे–धीरे “System Change” बन जाता है। और जब “system change” कहा जाता है, तो उसका अर्थ शासन या नीति–सुधार नहीं, बल्कि व्यवस्था–विनाश होता है।
भारत का संकट यह है कि यहाँ पर्यावरण का प्रश्न अत्यंत वास्तविक है—हवा विषैली है, नदियाँ अस्वस्थ हैं, वन कम हो रहे हैं, और संतुलित विकास की आवश्यकता अत्यावश्यक है। परंतु इसी सच्चाई की आड़ में यदि वैचारिक फौजें अपनी प्रयोगशाला बनाना चाहें, तो असली प्रश्न धुँध में खो जाता है। उस धुँध में ही “हिड़मा अमर रहे” का नारा संभव हो पाता है।
लोकतांत्रिक आंदोलनों को अपहरण कर उन्हें क्रांति–रोमांटिक हिंसा की दिशा में मोड़ दिया जाता है।
पर्यावरण बचाने का संघर्ष धीरे–धीरे राष्ट्र को अस्थिर करने की परियोजना बन सकता है, यदि हम उस सूक्ष्म अंतर को पहचान न सकें।
भारत की सांस्कृतिक दृष्टि प्रकृति को युद्धभूमि नहीं मानती। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”—यह वाक्य मानव और पृथ्वी के मध्य सह–अस्तित्व का घोष है। हमारा आदर्श विकास प्रकृति को परास्त कर नहीं, उसके साथ संतुलन बनाकर चलने का है।
और यदि वास्तव में इस देश को पर्यावरण बचाना है, तो सबसे पहले हमें यह पहचानना होगा कि कौन संघर्ष हमारी साँसों के लिए है, और कौन संघर्ष रक्त की राजनीति के लिए।
दिल्ली की हवा में धुआँ जितना खतरनाक है, उससे अधिक घातक वह वैचारिक धुआँ है जो वास्तविक पीड़ा, वास्तविक समाधान और वास्तविक पर्यावरण–संघर्ष को अपनी प्रयोगशाला की सामग्री बना लेता है।
सच्चा प्रश्न यही है —
क्या हम हवा को बचाएँगे, या हवा के नाम पर चल रहे वैचारिक युद्ध में अपनी चेतना खो देंगे?
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लेखक परिचय — दीपक कुमार द्विवेदी निवासी : ग्राम चचाई, जिला रीवा (मध्यप्रदेश) पद : प्रधान संपादक – www.jaisanatanbharat.com | संस्थापक – जय सनातन भारत समूह | संस्थापक-सदस्य – भारतीय मेधा परिषद टोली दीपक कुमार द्विवेदी समकालीन भारतीय वैचारिक विमर्श के एक प्रखर लेखक हैं, जो सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता एवं आधुनिक वैचारिक चुनौतियों पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। आप जय सनातन भारत समूह तथा भारतीय मेधा परिषद टोली के माध्यम से वैचारिक जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के विविध अभियानों का नेतृत्व कर रहे हैं। वर्तमान में आप TRS कॉलेज, रीवा से MBA (HR) का अध्ययन कर रहे हैं तथा वैचारिक लेखन और अध्ययन-साधना में निरंतर सक्रिय हैं। प्रकाशित पुस्तकें (Amazon) 1. सनातन का नवोदय : वर्तमान वैचारिक संघर्ष और हमारी दिशा 🔗 https://amzn.in/d/1ujqzeE 2. सनातन आर्थिक मॉडल : धर्मधारित विकास की दिशा 🔗 https://amzn.in/d/60hEjhG
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