सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सनातन आर्थिक मॉडल : धर्माधारित विकास की दिशा




“सनातन आर्थिक मॉडल : धर्माधारित विकास की दिशा” पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है जैसे कोई हमें आज की अंधी विकास-दौड़ से उठाकर उस गहरी जड़ तक ले जाता है, जहाँ अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल धन इकट्ठा करना नहीं, बल्कि मनुष्य को मनुष्य बनाए रखना था। यह किताब पढ़ते-पढ़ते कई बार मन रुकता है, सोचता है और अपने भीतर उतर जाता है—क्योंकि इसमें लिखे विचार हमें हमारी ही भूली हुई सभ्यता का आईना दिखाते हैं।

लेखक जिस सहजता और आत्मीयता से अर्थशास्त्र को धर्म, संस्कृति, समाज और मानव-मूल्यों से जोड़ते हैं, वह आज की भाषा में बहुत दुर्लभ है। यहाँ धर्म किसी संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, करुणा और संयम की वह धुरी है, जिसके सहारे भारत ने सदियों तक एक संतुलित और समरस समाज को जीवित रखा। किताब यह बताती है कि जब अर्थ धर्म से कट जाता है, तब विकास असंतुलित हो जाता है और समाज टूटने लगता है—और जब अर्थ धर्म के मार्गदर्शन में चलता है, तो समृद्धि सबकी होती है, न कि कुछ हाथों में सिमटकर रह जाती है।

किताब की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका स्वर और संवेदनशीलता है। इसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे लेखक कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव और पीढ़ियों की संचयित बुद्धि हमें सौंप रहे हों। वे पश्चिमी पूँजीवाद या समाजवाद की आलोचना केवल इसलिए नहीं करते कि वे गलत हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने मनुष्य को मशीन बना दिया है—उपभोक्ता और श्रमिक से आगे कुछ नहीं। इसके विपरीत, सनातन आर्थिक दृष्टि मनुष्य को केंद्र में रखती है—उसकी गरिमा, उसकी परिवारिकता, उसकी संस्कृति और उसके श्रम के सम्मान को।

इस किताब में एक बात और बहुत प्रभावित करती है—परंपरा और आधुनिकता को परस्पर विरोधी न मानने की दृष्टि। लेखक बड़े सहज भाव से समझाते हैं कि गाँव की अर्थव्यवस्था, गौ-आधारित कृषि, हस्तकला और स्थानीय उत्पादन की परंपरा, और दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन, नव ऊर्जा और आधुनिक तकनीक—ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथ मिलकर एक आत्मनिर्भर, न्यायपूर्ण और टिकाऊ राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

किताब पढ़ते हुए कई बार मन में यह विचार आता है कि अगर सच में आर्थिक नीतियाँ धर्म के दायरे में चलें—तो शायद समाज में न विषमता इतनी गहरी होती, न बेरोज़गारी इतनी भयावह होती, न मानसिक तनाव इतना बढ़ा होता। किताब हमें यह एहसास कराती है कि विकास का असली अर्थ मनुष्य का विकास है—न कि केवल अर्थव्यवस्था का विस्तार।

और अंत में, किताब पढ़ते-पढ़ते एक मजबूत विश्वास जन्म लेता है—कि भारत के पास आज भी विश्व का नेतृत्व करने के लिए एक वैकल्पिक मॉडल मौजूद है, बशर्ते हम उसे पहचानें और अपनाने का साहस करें। यह किताब उसी साहस का आह्वान है।

संक्षेप में कहा जाए, तो यह किताब केवल पढ़ी नहीं जाती—मन में बस जाती है, और विचारों की अन्तर्धारा को बदल देती है।
यह एक ऐसी किताब है जो आज के आर्थिक विमर्श को केवल चुनौती ही नहीं देती, बल्कि एक नई दिशा भी दिखाती है—धर्माधारित, मानवीय और संतुलित विकास की दिशा।



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