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भारतीय अर्थव्यवस्था : भ्रम की धुंध के पीछे उभरती सच्चाई




भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में पिछले कुछ वर्षों में जो कथा गढ़ी गई है, वह अपने-आप में अध्ययन का विषय है। देश के भीतर सक्रिय लेफ्ट इको सिस्टम लगातार यह प्रचार करता रहा है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था लगभग डेड चुकी है और मनमोहन सिंह के समय आर्थिक स्थिति कहीं अधिक बेहतर थी। टीवी की बहसों से लेकर विश्वविद्यालयों की गोष्ठियों तक, सोशल मीडिया से लेकर तथाकथित वैचारिक मंचों तक, यही रट बार-बार सुनाई देती है। लेकिन किसी भी गंभीर समाज में अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन नारेबाज़ी से नहीं, आँकड़ों और नीतिगत परिणामों से होता है। जब भावनाओं को थोड़ी देर के लिए एक ओर रखकर हम केवल उपलब्ध आँकड़ों की ओर देखते हैं, तो यह पूरा नैरेटिव अपने-आप बिखरने लगता है।

कल घोषित हुए नवीनतम आँकड़ों ने तो इस भ्रम को लगभग चकनाचूर कर दिया। वित्त वर्ष 2025–26 की दूसरी तिमाही के जो जीडीपी आँकड़े आए हैं, उनमें भारत की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है, क्योंकि यह उस समय हासिल हुई है जब पूरा वैश्विक परिदृश्य अनिश्चितताओं और दबावों से भरा हुआ है। मई 2025 में पाकिस्तान के साथ अचानक बढ़े तनाव ने निवेश वातावरण को प्रभावित किया। जुलाई में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए गए, जिनका सीधा प्रभाव निर्यात पर पड़ा और लगभग आधे क्वार्टर तक विदेशी व्यापार दबाव में रहा। सितंबर में सरकार द्वारा महत्वपूर्ण वस्तुओं पर GST दरों में कटौती की गई, जिसके परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं को राहत और बाजार में गतिशीलता लौटी। इन सुधारों के सकारात्मक प्रभाव का स्पष्ट परिणाम तीसरी तिमाही में, जब त्योहारी मांग चरम पर होगी, दिखाई देने की अपेक्षा है।


इसी अवधि में चारों श्रम संहिताएँ पिछले सप्ताह औपचारिक रूप से लागू हुईं, जिन्हें स्वतंत्र भारत के श्रम ढाँचे में सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन माना जा सकता है। इससे उद्योगों को लचीलापन, श्रमिकों को सुरक्षा और निवेशकों को स्थिरता का विश्वास प्राप्त होगा। आने वाले महीनों में रोजगार और उत्पादन दोनों पर इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई देंगे।

नीति आयोग के एक पैनल ने लंबे समय से चले आ रहे रेगुलेटर रेजीम को क्रमशः हटाने और सरल बनाने का एक प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि यदि यह ढांचा वास्तव में व्यवहार में उतर सका, नियमन कम पर पारदर्शी हो सके और उद्यमिता के लिए बाधाएँ घटें, तो भारत सैद्धांतिक रूप से 16 प्रतिशत तक की वृद्धि दर हासिल कर सकता है। यह आकड़ा फिलहाल लक्ष्य की तरह दिखता है, न कि तुरंत घटित होने वाली घटना की तरह, लेकिन यह इस बात का संकेत अवश्य है कि संभावनाएँ अभी चरम पर नहीं पहुँचीं, आगे की राह खुली हुई है।

इन सबके बावजूद 8.2 प्रतिशत की वृद्धि यह दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था न केवल झटकों को सहने में सक्षम है, बल्कि दबावों के बीच और मजबूत होकर उभरने की क्षमता रखती है। वैश्विक परिदृश्य में यह प्रदर्शन और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। चीन की वृद्धि दर 5–6 प्रतिशत, अमेरिका की 2–3 प्रतिशत, यूरोपीय देशों की लगभग शून्य के आसपास और बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, इटली तथा रूस जैसे देशों की वृद्धि 2–4 प्रतिशत की सीमा में सिमटी हुई है। ऐसे वैश्विक माहौल में भारत का 8.2 प्रतिशत तक पहुँचना गंभीर नीति-स्थिरता, निवेश-विश्वास और आंतरिक आर्थिक शक्ति का प्रत्यक्ष संकेत है।

यदि इस बहस को थोड़ा विस्तार में समझना हो तो हमें केवल एक तिमाही पर नहीं, पिछले पच्चीस वर्षों की समूची यात्रा पर नज़र डालनी होगी। भारत की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर 2000 से 2025 तक कुछ इस प्रकार रही है—2000 में 7.60 प्रतिशत, 2001 में 4.82 प्रतिशत, 2002 में 3.80 प्रतिशत, 2003 में 7.86 प्रतिशत, 2004 में 7.92 प्रतिशत, 2005 में 9.28 प्रतिशत, 2006 में 9.26 प्रतिशत, 2007 में 7.66 प्रतिशत, फिर वैश्विक मंदी के वर्ष 2008 में यह गिरकर 3.09 प्रतिशत रह गई। 2009 में पुनः 7.86 प्रतिशत और 2010 में 8.50 प्रतिशत की अच्छी वृद्धि दर्ज हुई, लेकिन इसके बाद रफ्तार कमजोर हुई—2011 में 5.24 प्रतिशत, 2012 में 5.46 प्रतिशत और 2013 में 6.39 प्रतिशत। 2014 में यह दर 7.41 प्रतिशत तक पहुँची, 2015 में 8.00 प्रतिशत और 2016 में 8.26 प्रतिशत का उच्च स्तर देखने को मिला। इसके बाद 2017 में 6.80 प्रतिशत, 2018 में 6.45 प्रतिशत और 2019 में वैश्विक परिस्थितियों के दबाव में केवल 3.87 प्रतिशत दर्ज हुई। 2020 में कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन और व्यापक आर्थिक ठहराव की वजह से विकास दर ऐतिहासिक रूप से गिरकर –5.78 प्रतिशत तक चली गई। परंतु अगला वर्ष 2021 भारत की अर्थव्यवस्था की जिजीविषा का साक्षी बना, जब वृद्धि दर उछलकर 9.69 प्रतिशत पर पहुँच गई। इसके बाद 2022 में 6.99 प्रतिशत, 2023 में 8.15 प्रतिशत, 2024 में 6.46 प्रतिशत और 2025 के लिए अनुमानित वृद्धि दर 6.20 प्रतिशत आंकी गई है। इस समूचे आंकड़े को समग्रता में देखें तो साफ दिखता है कि 2011 के बाद अर्थव्यवस्था थकने लगी थी, 2014 के बाद संरचनात्मक सुधारों और स्थिर नेतृत्व के कारण नयी ऊर्जा मिली, कोविड के झटके के बाद भी भारत ने बाकी विश्व की अपेक्षा कहीं अधिक तेज़ी से वापसी की।

इस पृष्ठभूमि में यह कहना कि “अर्थव्यवस्था डेड चुकी है”, एक नारा हो सकता है, पर वह नारे से आगे बढ़कर तर्क के स्तर पर टिक नहीं पाता। ज़रूर, हर दौर में चुनौतियाँ होती हैं, कई सेक्टर अभी भी दबाव में हैं, बेरोज़गारी, ग्रामीण आय, महँगाई जैसे प्रश्नों पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है, लेकिन समग्र रूप से वृद्धि की दिशा ऊपर की ओर है, यह आँकड़े साफ-साफ बता रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ठीक उसी समय, जब दूसरी तिमाही की 8.2 प्रतिशत GDP वृद्धि दर घोषित हुई और पूरे आर्थिक परिदृश्य में सकारात्मकता का माहौल बना, विपक्ष के कुछ प्रमुख नेताओं और वामपंथी विचारधारा से जुड़े कुछ पत्रकारों ने IMF द्वारा भारत को दी गई C-ग्रेड टिप्पणी को अचानक जोर-शोर से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया से लेकर टीवी बहसों तक यह बात इस प्रकार उछाली गई मानो IMF ने भारत की आर्थिक स्थिति को असफल करार दे दिया हो। जबकि वास्तविकता यह है कि IMF की यह टिप्पणी भारत की आर्थिक सेहत या विकास-क्षमता पर नहीं, बल्कि GDP आंकड़ों की सांख्यिकीय गणना-पद्धति पर आधारित तकनीकी सुझाव है। IMF का कहना मात्र इतना है कि भारत को GDP गणना के लिए उपयोग होने वाले आधार वर्ष को, जो वर्तमान में 2011-12 है, अद्यतन करने की आवश्यकता है ताकि आधुनिक आर्थिक संरचना का सही प्रतिबिंब सांख्यिकीय आंकड़ों में अधिक सटीकता के साथ दिखाई दे सके। इस टिप्पणी का आर्थिक प्रदर्शन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

भारत सरकार ने IMF को औपचारिक उत्तर देते हुए स्पष्ट कहा है कि अगली तिमाही से GDP की गणना नए आधार वर्ष 2022-23 पर आधारित होगी, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता और भी बढ़ेगी। सरकार ने यह भी कहा है कि GST कटौती, त्योहारी मांग तथा हाल ही में लागू हुई श्रम संहिताओं के प्रभाव का वास्तविक परिणाम अगले क्वार्टर में और स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। इसलिए IMF की C-ग्रेड टिप्पणी को “अर्थव्यवस्था के पतन” का संकेत बताना न केवल अतिशयोक्ति है, बल्कि तथ्यात्मक रूप से भी असंगत व्याख्या है।

दूसरी तरफ, वैश्विक तुलना भी हमारे सामने है। चीन की वृद्धि दर आज पाँच से छह प्रतिशत के बीच घूम रही है, बांग्लादेश, जिसकी अर्थव्यवस्था की मिसाल कुछ समय पहले तक भारत की तुलना में दी जाती थी, वह आज पाँच प्रतिशत से नीचे खिसक चुका है। ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, रूस, इटली जैसे देश दो से चार प्रतिशत के बीच सिमटे हुए हैं और यूरोप के कई हिस्से लगभग ठहराव की स्थिति में हैं। ऐसे में यह कहना कि भारत की आठ प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर “कोई उपलब्धि नहीं है”, अपने आप में तथ्य के प्रति अन्याय है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि भारत की अर्थव्यवस्था केवल आँकड़ों की ताकत पर नहीं, एक बेहद जटिल सामाजिक एवं जनसंख्या संरचना के बीच काम करती है, जहाँ करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी, कृषि से लेकर सेवा क्षेत्र तक, असंगठित से लेकर संगठित श्रम तक, सब कुछ इस गति से जुड़ा हुआ है।

इन सब तथ्यों के बीच यदि कोई फिर भी यह दावा करता है कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह डेड हो चुकी है, तो वह या तो आँकड़ों से अनभिज्ञ है, या जानबूझकर अपनी वैचारिक स्थिति को बचाने के लिए वास्तविकता से मुँह मोड़ रहा है। आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है, सरकारों से प्रश्न पूछना ज़रूरी है, नीतियों पर मतभेद स्वाभाविक और आवश्यक हैं, लेकिन आलोचना का अर्थ यह नहीं कि हम वास्तविक उपलब्धियों को नकारने का अधिकार अपने लिए सुरक्षित कर लें।

भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय संक्रमण के दौर में है—पुराने ढाँचों से बाहर निकलकर नए वैश्विक समीकरणों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। महामारी, युद्ध, व्यापार युद्ध, टैरिफ और सैंक्शन जैसी जटिल चुनौतियों के बीच भारत ने यह संकेत दिया है कि वह केवल परिस्थितियों का शिकार बनने वाला देश नहीं, बल्कि परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता भी रखता है। यह यात्रा आसान नहीं है, इसमें असमानताएँ भी हैं, प्रश्न भी हैं, लेकिन दिशा ऊपर की ओर है, यह बात अब छिपी नहीं रही।

बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ केवल आँकड़ों से नहीं, बल्कि विश्वास, स्थिरता और सामूहिक श्रम से आगे बढ़ती हैं। भारत की 8.2 प्रतिशत वृद्धि दर यही बताती है कि यह देश चुनौती के सामने झुकने के बजाय और मजबूत होकर खड़ा होने की क्षमता रखता है। आर्थिक यात्रा का वास्तविक अर्थ यही है—संकटों से सीखकर अग्रसर होना। इसलिए भारत की अर्थव्यवस्था पर निराशा और अराजकता का वातावरण निर्मित करने वाले कथनों से अधिक आवश्यक है कि हम तथ्यों को देखें, विश्व परिदृश्य की तुलना करें और यह समझें कि यह विकास किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास, दृढ़ नीतियों और समाज के धैर्य का प्रतिफल है।

देश की अर्थव्यवस्था अभी भी कई जटिल प्रश्नों और चुनौतियों के बीच मार्ग खोज रही है—परंतु दिशा स्पष्ट है और गति सकारात्मक। यही वह विश्वास है, जिसकी शक्ति किसी भी राष्ट्र की वास्तविक आर्थिक पूँजी होती है। भारत आज उसी पूँजी के सहारे आगे बढ़ रहा है। आने वाला समय इस यात्रा का साक्षी बनेगा। 

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