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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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💥 🌻
👉 गोहोरगंज में छह वर्षीय बच्ची के साथ हुआ अमानवीय अत्याचार केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज को भीतर तक झकझोर देने वाली घटना है। एक सप्ताह बीत चुका है। परन्तु पुलिस, प्रशासन और खुफिया तंत्र की ओर से अपेक्षित तत्परता का कहीं नामोनिशान नहीं। जिस प्रदेश में एक मासूम बच्ची की चीखें भी तंत्र को नहीं जगा पातीं, वहाँ कानून - व्यवस्था का पूरा ढांचा ही कटघरे में खड़ा हो जाता है।
💥 अपराधी सलमान द्वारा चॉकलेट का लालच देकर जंगल ले जाकर किए गए कृत्य ने सभ्यता का सिर शर्म से झुका दिया। पर उससे भी बड़ा अपराध यह है कि इतने जघन्य मामले में न पुलिस की ओर से अपराधी के स्थान स्थान पर पोस्टर लगे, न बड़ा इनाम घोषित हुआ, न जनता से सहयोग की अपील की गई। समय पर एंबुलेंस तक उपलब्ध न कराने वाला प्रशासन, अब अपराधी की धरपकड़ में भी असहाय दिख रहा है। यह लापरवाही नहीं, यह संवैधानिक दायित्वों का खुला परित्याग है।
खुफिया विभाग की भूमिका भी उतनी ही संदिग्ध है। क्या यह तंत्र केवल शक्तिशाली लोगों की सुरक्षा तक सीमित हो चुका है? क्या गरीब, कमजोर, और आम नागरिक इसकी प्राथमिकता से बाहर हो चुके हैं? यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं। बल्कि “सामाजिक असुरक्षा” का वह भयावह संकेत है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक होता है।
एक सप्ताह बाद भी अपराधी खुले में घूमता दिखाई दे- यह केवल पुलिस की विफलता नहीं, बल्कि शासन की उदासीनता का प्रतीक है। यदि यही ढिलाई जारी रही, तो यह संदेश जाएगा कि मासूमों की चीखें भी सत्ता के गलियारों तक पहुँच नहीं पातीं।
👉 ऐसे जघन्य अपराधों में “सामान्य कानूनी प्रक्रिया” नहीं, बल्कि उदाहरणात्मक, कठोरतम और भय-सृजन करने वाला दंड आवश्यक है। जिसे देखकर भविष्य का हर दरिंदा बच्चियों की ओर आँख उठाने से पहले सौ बार सोचे। न्याय में देरी भी अन्याय होती है, और वर्तमान स्थिति तो “देरी” से कहीं अधिक गंभीर - असहनीय प्रशासनिक मौन है। समाज की एकस्वर मांग स्पष्ट है-
👉 अपराधी की तत्काल गिरफ्तारी
👉 सार्वजनिक रूप से पहचान जारी करना
👉 तेज़-तर्रार विशेष न्यायिक प्रक्रिया
👉 और दंड ऐसा कि भविष्य में कोई भी दुष्ट इस प्रकार की सोच रखने से भी भयभीत हो।
मासूम की पीड़ा आज हमारे समाज की परीक्षा है। यह समय एकजुट होकर न्याय की मांग को निर्णायक रूप देने का है क्योंकि यह न्याय केवल एक बच्ची का नहीं, बल्कि हर उस परिवार का अधिकार है जो अपनी बेटी को सुरक्षित भविष्य देना चाहता है।
🌹आज हम इस मासूम बच्ची की कराह, उसकी हर सिसकती साँस और उसके रोंगटे खड़े कर देने वाले दर्द के साथ अडिग खड़े हैं। और पूरे समाज की ओर से यह स्पष्ट, प्रचंड और अटल घोषणा है-
उस दरिंदे को ऐसा दंड मिले, जो केवल सज़ा न हो, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हर संभावित अपराधी के भीतर आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला भय उत्पन्न कर दे।
जिसे सुनते ही किसी भी कृतघ्न, नीच, दुष्ट के शरीर में कंपन दौड़ जाए; जिस दंड का नाम लेते ही उसके जैसे पिशाचों की रगों में खून जम जाए।
यदि समाज में कुछ कठोर, निर्दय, और उदाहरणात्मक दंडों को खुलकर, सबके सामने, मानक के रूप में स्थापित नहीं किया गया तो यह अपराध केवल बढ़ेंगे ही नहीं, बल्कि हमारी अगली पीढ़ी के भविष्य को नोंच डालेंगे।
दया, रियायत और ढुलमुल कार्रवाई के दिन अब समाप्त होने चाहिए। अब समय है उस दंड का, जो इतिहास में दर्ज हो जाए - ऐसा दंड, जिसे देखकर भविष्य का कोई भी दुराचारी बच्चियों की ओर नज़र उठाने से पहले ही भय से घुटनों पर आ गिरे।🌹🙏 #kailash_chandra Kailash Chandra
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लेखक परिचय — दीपक कुमार द्विवेदी निवासी : ग्राम चचाई, जिला रीवा (मध्यप्रदेश) पद : प्रधान संपादक – www.jaisanatanbharat.com | संस्थापक – जय सनातन भारत समूह | संस्थापक-सदस्य – भारतीय मेधा परिषद टोली दीपक कुमार द्विवेदी समकालीन भारतीय वैचारिक विमर्श के एक प्रखर लेखक हैं, जो सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता एवं आधुनिक वैचारिक चुनौतियों पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। आप जय सनातन भारत समूह तथा भारतीय मेधा परिषद टोली के माध्यम से वैचारिक जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के विविध अभियानों का नेतृत्व कर रहे हैं। वर्तमान में आप TRS कॉलेज, रीवा से MBA (HR) का अध्ययन कर रहे हैं तथा वैचारिक लेखन और अध्ययन-साधना में निरंतर सक्रिय हैं। प्रकाशित पुस्तकें (Amazon) 1. सनातन का नवोदय : वर्तमान वैचारिक संघर्ष और हमारी दिशा 🔗 https://amzn.in/d/1ujqzeE 2. सनातन आर्थिक मॉडल : धर्मधारित विकास की दिशा 🔗 https://amzn.in/d/60hEjhG
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