सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

संविधान-स्तवन बनाम विवेक-विमर्श : राष्ट्र का निर्णायक क्षण




आज 26 नवम्बर—वह दिवस है जब 26 नवम्बर 1949 को भारत की संविधान-सभा ने राष्ट्र के संविधान को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। तत्पश्चात् 26 जनवरी 1950 को यह प्रभावशील हुआ और भारत एक स्वतंत्र, प्रभुत्व-सम्पन्न, लोकतांत्रिक प्रजासत्ताक के रूप में विश्व के समक्ष प्रतिष्ठित हुआ। इस घटना को आज संविधान-दिवस के रूप में उल्लिखित किया जाता है; और इस अवसर पर संविधान के विविध आयामों पर चर्चा-परिचर्चा होती रही है और आज भी होती है।

परन्तु एक गंभीर तथ्य यह है कि वर्तमान भारत में संविधान को वैचारिक विमर्श का विषय बनाने के स्थान पर उसे एक अस्पृश्य-आसमानी ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास हो रहा है। शासन-तंत्र और सत्ता-केन्द्रित समुदाय संविधान की स्तुति-गान को एक अनिवार्य संस्कार की तरह अपनाते जा रहे हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर को एक पैगंबर रूप में स्थापित करने का प्रयत्न भी इसी प्रवृत्ति का एक रूप है, जिसमें संविधान को पवित्र, अंतिम और अचल सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

संविधान बनाम मनुस्मृति का विवाद खड़ा कर पश्चिम के वर्ग-संघर्ष सिद्धांत को भारतीय समाज में स्थापित करने की दुर्भावना भी स्पष्ट दिखायी देती है। संविधान की जितनी महिमा-गाथाएँ गायी जाती हैं, वे अधिकतर सत्ता-केन्द्रित विचारधाराओं का अनुष्ठान प्रतीत होती हैं—सत्य और वास्तविक विवेक का नहीं। शासन-यन्त्र स्वभावतः अपनी बनाई व्यवस्था की स्तुति करता है; अतः संविधान-स्तवन वस्तुतः स्वयम्-स्तुति का ही रूप है—अपने ही शासन-तंत्र के प्रति मुग्ध प्रशंसा।

वस्तुतः संविधान एक नियमावली है—शासन-चालन के लिए आवश्यक विधान। जब तक शासन विद्यमान रहेगा, तब तक संविधान का पालन अनिवार्य है। परन्तु उस शासन में कौन-से गुण हैं, कौन-सी त्रुटियाँ हैं, कहाँ सुधार की आवश्यकता है—इन सबकी विवेचना करना विवेकवान एवं सजग समाज का कर्त्तव्य है। यदि केवल स्तुति और महिमा-गान किया जाए, तो वह विवेक-हीनता और अंध-भक्ति के मार्ग प्रशस्त करता है।

और यही हुआ भी है। संविधान को इस प्रकार पूज्य-ग्रंथ का स्वरूप दे दिया गया कि वैचारिक विमर्श में उसकी आलोचना तक अस्वीकार्य मानी जाने लगी। इतने के बावजूद भारत में अब तक 106 से अधिक संविधान संशोधन हो चुके हैं। 1976 का 42वाँ संविधान-संशोधन, जिसे आपातकाल की अंधेरी पृष्ठभूमि में लागू किया गया, प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखण्डता जैसे शब्द जोड़ता है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयत्न करता है। इसके प्रतिकार में 1979 का 44वाँ संशोधन लागू हुआ, जिसने 42वें संशोधन की कुछ असंगतियों को सुधारने का प्रयत्न किया।

यह तथ्य स्पष्ट करता है कि संविधान समयानुसार परिवर्तनशील दस्तावेज़ है—परिवर्तन उसका स्वभाव है। किंतु विडम्बना यह है कि जिस संविधान में निरंतर संशोधन होते रहे, वही संविधान आज अचल, अपौरुषेय, पवित्र ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

आरक्षण-आधारित राजनीति ने संविधान को कुछ जातियों के लिए केवल आरक्षण-ग्रंथ बना दिया है। अफवाह-जनित भावनाओं ने 2024 के चुनाव में यह प्रमाणित कर दिया कि संविधान के नाम पर जन-मानस को संचालित करना कितना सरल हो गया है। जिन लोगों ने संविधान-आत्मा का सर्वाधिक हनन किया, वही आज हाथ में लाल संविधान-पुस्तिका लेकर समाज को दिशा देने का दावा करते घूमते हैं।

इन सबके बीच एक मौन प्रश्न उपस्थित है—
संविधान में भारतीय सनातन-दर्शन, वैदिक-परंपरा और सांस्कृतिक अस्मिता की छाप क्यों नहीं दिखती?
संपूर्ण संविधान का ढाँचा पाश्चात्य कानूनी-प्रशासनिक सोच और वर्ग-संघर्ष सिद्धांतों की दिशा में अधिक झुका हुआ प्रतीत होता है। भारतीय समाज-व्यवस्था, परिवार-संरचना, धर्म-दर्शन, अध्यात्म-परंपरा—इन सबका प्रतिबिंब संवैधानिक पृष्ठों पर नगण्य है।

संविधान पर विमर्श का उद्देश्य उसकी स्तुति नहीं, उसकी समीक्षा होनी चाहिए।
एक-पक्षीय विमर्श सदैव घातक होता है।
संविधान यदि समाज की आवश्यकता का उत्तर है, तो समाज-परिवर्तन के साथ संविधान का परिवर्तन भी न्यायसंगत है। समाज यदि आगे मनुस्मृति या किसी अन्य भारतीय न्याय-व्यवस्था को अधिक उपयुक्त पाए, तो वह भी सम्भव है।

इसीलिए, किसी परिवर्तनशील दस्तावेज़ को ईश्वरीय ग्रंथ बनाने का प्रयास न तो विवेकपूर्ण है, न लोकतांत्रिक, न ही सांस्कृतिक रूप से उचित।

संविधान का अध्ययन हो, आलोचना हो, विमर्श हो।
क्योंकि आलोचना ही विवेक की जननी है।
और विवेक-विहीन स्तुति-गान समाज को अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं देता।

आपातकाल के अंधकारमय काल में, जब देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ निलंबित थीं, नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध था, अख़बारों पर सेंसरशिप थोप दी गई थी, और विपक्ष के अधिकांश नेता—जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई आदि—जेलों में बंद थे, उसी समय 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में दो शब्द जोड़े गए—“समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष”। यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अगुवाई में हुआ। यह परिस्थिति स्वयं इस तथ्य की गवाही देती है कि ये शब्द किसी स्वतंत्र, निष्पक्ष और स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श का परिणाम नहीं थे, बल्कि आपातकालीन सत्तावाद और वैचारिक प्रभुत्व की उपज थे।

इन समस्त चर्चाओं के मध्य जो सत्य अत्यन्त स्पष्टता के साथ स्थापित किया जाना चाहिए, वह यह है कि “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” जैसे शब्द भारतीय राष्ट्र की आत्मा और उसकी मूल सांस्कृतिक दृष्टि के प्रतिकूल हैं। भारतवर्ष का वास्तविक आधार सनातन वैदिक धर्म और उसकी लोकपरंपराएँ हैं; यही भारत की आत्मा है, यही उसकी पहचान है। इसके विपरीत सेकुलरिज़्म नामक अवधारणा आज भारत की इसी आत्मा को कुचलने का एक षड्यंत्रकारी औज़ार बन चुकी है।

भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ। इस समय संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ (Secular) और ‘समाजवादी’ (Socialist) जैसे शब्द नहीं थे। यह तथ्य इस बात को पुष्ट करता है कि भारत के संविधान-निर्माताओं ने इन शब्दों को जानबूझकर प्रस्तावना में नहीं जोड़ा था, जबकि उस समय संविधान सभा में पं. नेहरू, डॉ. अम्बेडकर, राजेन्द्र प्रसाद, और पटेल जैसे प्रमुख नेता सक्रिय थे।

संविधान सभा की वाद-विवाद कार्यवाही (Constituent Assembly Debates) में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने स्वयं ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ने का विरोध किया था, यह कहते हुए कि संविधान की मूल धारा ही व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य को तटस्थ बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।

अतः यह स्पष्ट है कि 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' का जोड़ा जाना संविधान की मूल भावना का अंग नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक निर्णय था, जिसकी पृष्ठभूमि में आपातकालीन सत्तावाद, तुष्टिकरण की राजनीति और वामपंथी विचारधारा का प्रभाव था।

अब यदि हम भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने की बात करें, तो भारतवर्ष एक धर्मप्रधान राष्ट्र रहा है, जिसकी ऐतिहासिक पहचान ‘धर्म’ के साथ जुड़ी रही है, न कि किसी पश्चिमी अवधारणा जैसे 'सेकुलरिज़्म' के साथ। धर्म यहाँ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवनपद्धति रही है, जिसमें सत्य, अहिंसा, संयम, ब्रह्मचर्य, त्याग, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान, कर्म और मोक्ष जैसे सिद्धांत निहित हैं।

इसके विपरीत ‘सेकुलरिज़्म’ की अवधारणा मूलतः यूरोपीय सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षों से उत्पन्न हुई, जहाँ चर्च और राज्य के बीच संघर्ष के कारण 'धर्म को सत्ता से अलग करने' की माँग उठी। भारत में ऐसा कोई संघर्ष कभी नहीं रहा। इसलिए यहाँ धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा थोपना, एक बाह्य वैचारिक प्रत्यारोपण (external ideological imposition) था, न कि आंतरिक आवश्यकता।

भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर सबसे अधिक प्रहार बहुसंख्यक हिन्दू समाज की धार्मिक आस्थाओं पर हुआ। उदाहरणस्वरूप:

राम जन्मभूमि आंदोलन को लंबे समय तक न्याय नहीं मिला, लेकिन हज सब्सिडी, वक्फ बोर्ड को विशेष अधिकार, और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छूट दी जाती रही।

कश्मीर में 1990 के दशक में जब चार लाख से अधिक कश्मीरी हिन्दुओं को घर छोड़कर भागना पड़ा, तब भी भारत का 'धर्मनिरपेक्ष’ तंत्र मौन रहा।

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लागू करने से आज भी तथाकथित 'सेकुलर' दल बचते हैं।

क्योंकि संपूर्ण विश्व में धर्म यदि कोई है, तो वह केवल एक है—सनातन वैदिक धर्म। इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह या तो मज़हब है या पंथ, जो सीमित, समयबद्ध और राजनैतिक प्रेरणा से उत्पन्न संरचनाएँ हैं। अतः ‘धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था’ जैसी कोई अवधारणा भारत जैसे धर्मनिष्ठ राष्ट्र में संभव नहीं, क्योंकि धर्म कोई बहुविकल्पीय तत्व नहीं, बल्कि एकमात्र शाश्वत सत्य है। धर्म सापेक्ष शासन संभव है, पर धर्मनिरपेक्ष शासन – जिसे 'धर्म से विरक्त' कहा जाए – भारत जैसे राष्ट्र के लिए केवल आत्मघात है।

जब भारत जैसे राष्ट्र को—जिसकी सभ्यता आदि काल से सजीव, सनातन और सार्वभौमिक रही है—'धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र' घोषित किया गया, तब यह कोई सामान्य राजनीतिक निर्णय नहीं था, वरन् वह एक सुनियोजित वैचारिक आक्रमण था। वह भी तब, जब 24% मजहबी उन्मादी भीड़ भारत के आँचल को फाड़कर उसका 18% भूभाग काट ले गई। जिन्होंने लाखों हिन्दुओं की हत्या, हज़ारों बहन-बेटियों के साथ बलात्कार, और करोड़ों हिन्दुओं को अपनी ही पुण्यभूमि से विस्थापित करके शरणार्थी बना दिया, उन्हीं के तुष्टिकरण के लिए और वामपंथियों की वैचारिक भूख शांत करने के लिए इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में ‘सेकुलर’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्द जोड़ दिए।

यह केवल संविधान में शब्दों का जोड़ना नहीं था, यह था – भारत की आत्मा में छुरा घोंपना। बहुसंख्यक हिन्दू समाज को, जो इस राष्ट्र की आत्मा, संस्कृति और सभ्यता का वाहक है, उसकी धार्मिक आस्थाओं, परंपराओं और गौरवशाली इतिहास के प्रति अपराधबोध से भर दिया गया। सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली, मीडिया और सिनेमा जैसे प्रभावकारी उपकरण वामपंथियों को सौंपकर हिन्दू इतिहास, संस्कृति और मानबिंदुओं को या तो छिपा दिया गया या तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया।

यहाँ तक कि युवाओं के मन में यह भर दिया गया कि – “राष्ट्र का कोई धर्म नहीं होता।” यही सबसे बड़ा पाप था, जो 'सेकुलर' शब्द के नाम पर इस राष्ट्र के साथ किया गया। इस एक शब्द के नाम पर भारत की आत्मा को प्रतिदिन छलनी किया जाता रहा, जबकि अवैदिक और आब्राहमिक मतों को विशेष संरक्षण दिया गया। यही विचारधाराएँ आज भारत की एकता और अखंडता के सबसे बड़े संकट के रूप में खड़ी हैं।

इसका एक गहरा ऐतिहासिक-सामाजिक-सांप्रदायिक कारण है। अब्राहमिक मत—इस्लाम, ईसाईयत और चर्च-प्रेरित मार्क्सवादी विचारधाराएँ—अपने मूल में विस्तारवादी, वर्चस्ववादी और असहिष्णु हैं। ये सब एक ही सूत्र से निकलते हैं—"हमें मानो या मरो!" यही नीति वामपंथ भी अपनाता है, और यही मजहब भी। और दुर्भाग्य यह कि भारत की हजार वर्षों की गुलामी में इन अवैदिक मजहबों के साथ-साथ बौद्ध पंथ जैसी संरचनाओं ने भी एक भूमिका निभाई।

‘सेकुलर’ शब्द के माध्यम से भारतीय राष्ट्र के प्रशासनिक तंत्र को धर्म से विहीन कर दिया गया—धर्म के अनुशासन, नियम और नैतिक मूल्यों से काटकर एक अधार्मिक, पैशाचिक और नास्तिक समाज की नींव रखी गई। यह सब किया गया उस क्षण जब संविधान की प्रस्तावना में यह शब्द जोड़ा गया। यह मान लिया गया कि जैसे भारत की आत्मा से धर्म को निकाल दो, तो केवल एक पार्थिव शव रह जाएगा।

क्योंकि भारत राष्ट्र का आधार ही यदि सनातन धर्म है, तो भारत का उत्थान भी उसी धर्म के उत्थान से जुड़ा है, और भारत की अवनति भी उसी धर्म की उपेक्षा से सुनिश्चित होती है।* अतः यह स्पष्ट है—

“सनातन वैदिक धर्म का उत्थान = भारत का उत्थान,
सनातन धर्म की अवनति = भारत की अवनति।”

इसलिए यदि भारत को एक, अखंड और जीवंत रखना है, तो प्रथम कार्य यही होगा कि – संविधान की प्रस्तावना से 'सेकुलर' शब्द को हटाया जाए। अन्यथा, दीर्घकाल तक भारत को एक राष्ट्र के रूप में बनाए रखना संभव नहीं होगा।

आब्राहमिक और साम्यवादी-सोशलिस्ट संरचनाएँ, समाज में समानता के नाम पर ऐसी व्यवस्था स्थापित करती हैं, जो न केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करती हैं, बल्कि समाज को आर्थिक और सामाजिक रूप से कंगाल और अराजकता की ओर धकेल देती हैं। भारत में समाजवादी राजनीति की नींव स्वतंत्रता-पूर्व ही पड़ चुकी थी, जब जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे विचारकों ने समाजवाद को भारत की राजनीति में एक वैकल्पिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया।

हालाँकि, समाजवाद एक यूरोपीय वामपंथी विचारधारा है, जिसका मूल आधार राज्य के सर्वाधिकार और व्यक्ति की भूमिका को गौण मानने की प्रवृत्ति है। भारत की राजनीति में "समाजवाद" शब्द औपचारिक रूप से पहली बार 1955 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार किया गया, जब पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत हुई और नेहरू सरकार ने इसे अपनी आर्थिक नीति का आधार बनाया। 1955 से भारत की आर्थिक दिशा समाजवादी हो गई — जिसमें राज्य ही मुख्य नियंता बन गया।

यदि हम इस समाजवादी मॉडल का विश्लेषण करें, तो यह मार्क्सवादी योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था (Command Economy) के निकट है। जो कुछ भारत में 1955 के बाद लागू हुआ, वह चीन में लागू साम्यवादी संरचना की संशोधित प्रति थी। अंतर केवल इतना था कि चीन ने इन परिवर्तनों को पाशविक हिंसा और दमन के बल पर लागू किया, जबकि भारत में इन्हें नरम भाषा और प्रचारतंत्र के माध्यम से समाज में रोपा गया।

जमींदारी उन्मूलन, संपत्ति के अधिग्रहण, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, बैंकों पर सरकारी नियंत्रण, सामूहिक खेती, और संविधान का 17वाँ संशोधन, इन सबने देश को व्यक्तिगत उद्यमिता से हटाकर राज्य-नियंत्रित तंत्र में बदल दिया। 17वें संशोधन के तहत एक छोटे किसान को भी एस्टेट-होल्डर घोषित कर उसकी ज़मीन अधिग्रहित करने का प्रावधान लाया गया, बिना पर्याप्त प्रतिफल के। यह चीन के मार्ग का ही अनुसरण था।

विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि समाजवाद भारत की मिट्टी की उपज नहीं है। यह विचार न तो हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है, न ही इसकी जड़ें भारत के सहस्रों वर्षों के सामाजिक ढांचे में हैं। भारतीय समाज का मूलाधार “धर्म, कर्तव्य और पारिवारिक उत्तरदायित्व” रहा है, न कि राज्य-नियंत्रित आर्थिक और सामाजिक संरचना। इसीलिए समाजवाद भारतीयों के मन को न कभी पुलकित कर सका, न कभी प्रेरणा दे सका।

यह भी स्मरणीय है कि संविधान सभा ने ‘समाजवाद’ शब्द को प्रस्तावना में शामिल करने का सुझाव अस्वीकार कर दिया था, किन्तु आपातकाल के दौरान 1976 में, जब देश में लोकतंत्र पूरी तरह ठप था, तब 42वें संशोधन के माध्यम से इस शब्द को जबरन जोड़ा गया। इसके पहले, 1955 से लेकर 1990 तक भारत में जो समाजवादी व्यवस्था लागू रही, उसने व्यापार, उद्योग, उत्पादन, श्रम — सभी पर राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया।

1955 से 1990 तक भारत की औसत आर्थिक विकास दर 3% से नीचे रही, जिसे पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने व्यंग्यात्मक रूप से “Hindu Rate of Growth” कहा। 1990 तक आते-आते भारत वास्तव में दिवालिया हो चुका था। विदेशी मुद्रा भंडार केवल 7 दिन के आयात लायक बचा था। भारत को अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर ऋण लेना पड़ा। उसी काल में सोवियत संघ का विघटन भी हुआ, जिससे भारत की समाजवादी प्रेरणा को गहरी चोट पहुँची।

1991 में पी.वी. नरसिंह राव की सरकार और वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा आर्थिक उदारीकरण (Liberalization) की नीतियाँ लागू की गईं। भारतीय जनता पार्टी ने भी इन सुधारों का समर्थन किया। इस सुधार ने भारत को धीरे-धीरे एक बाज़ार-आधारित, उद्यमशील अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर किया। परिणामस्वरूप आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और 2027 तक तीसरे स्थान पर पहुँचने की संभावना है।

लेकिन, दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी कुछ राजनीतिक दल समाजवादी मॉडल को लागू करने की आत्मघाती माँग करते रहते हैं, जैसे इतिहास से कोई शिक्षा ली ही न गई हो। यह सब इसीलिए संभव हुआ है क्योंकि हमने सत्य बोलने और स्वीकारने की आदत छोड़ दी है।

आज भी संविधान की प्रस्तावना में ‘सेकुलर’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्द भारत की आत्मा को कुचलते हुए वहाँ अंकित हैं। यदि कोई इन्हें हटाने की बात करता है, तो तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग कहने लगता है कि – "संविधान की आत्मा को छेड़ा नहीं जा सकता," "प्रस्तावना संविधान की आत्मा है," इत्यादि।

यह विचार इस बात का प्रमाण है कि गुलामी की मानसिकता आज भी हमारे ऊपर हावी है। परिणामस्वरूप, भारत की एकता, अखंडता और आर्थिक-सामाजिक भविष्य के लिए जो शब्द घातक सिद्ध हुए हैं, वही शब्द आज संरक्षण और पवित्रता के नाम पर ढोए जा रहे हैं।

अब समय आ गया है कि हम आत्मघाती वैचारिक भ्रमों से बाहर आएँ।
हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि—

'धर्म' एक है — सनातन वैदिक धर्म।

‘धर्मनिरपेक्षता’ नहीं, अपितु 'धार्मिक आधार पर नैतिक शासन व्यवस्था' ही भारत के लिए उपयुक्त है।

‘समाजवाद’ नहीं, अपितु ‘रामराज्य’ ही भारत का आदर्श है।

इसलिए राष्ट्रहित में अब यह माँग उठनी चाहिए कि—

> संविधान की प्रस्तावना से ‘सेकुलर’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्द हटाए जाएँ,
और उनके स्थान पर ‘सनातन वैदिक धर्म’ और ‘रामराज्य’ को संविधान की मूल प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया जाए।

केवल तभी भारत परम वैभव के शिखर पर पहुँच सकेगा।

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