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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
महेन्द्र सिंह भदौरिया
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“हम लेके रहेंगे आज़ादी” – नारे का छल, विचार का जाल और समाज पर वैचारिक हमला
नारे से नैरेटिव तक: एक राष्ट्रवादी विश्लेषण
भारत की धरती पर “आज़ादी” का अर्थ कभी प्रश्न नहीं रहा। यह वह भूमि है जहाँ कोई सत्ता जनता पर थोप कर नहीं बैठी, यह वह राष्ट्र है जहाँ ऋषियों ने कहा था – “स्वाधीनता मनुष्य का स्वभाव है।” इसी कारण इस देश में स्वतंत्रता किसी सत्ता ने नहीं दी, बल्कि यह स्वभाविक अधिकार के रूप में सदियों से जीवित रही। लेकिन आज़ादी का यह पवित्र शब्द विगत कुछ दशकों में एक वैचारिक हथियार में बदल दिया गया है। जिस आज़ादी के लिए अनगिनत क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया, उसी शब्द को आज एक समूह ने अपनी राजनीतिक-सांस्कृतिक लड़ाई का नारा बना दिया है।
“हम लेके रहेंगे आज़ादी” — यह नारा जब भगत सिंह ने दिया था, तब उसकी ध्वनि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध थी। आज जब यह नारा विश्वविद्यालय परिसरों, सड़क प्रदर्शनों और वामपंथी मंचों पर गूंजता है, तो प्रश्न उठता है: आज़ादी किससे? सत्ता से या सभ्यता से? शासन से या धर्म से? विदेशी शोषण से या अपनी ही जड़ों से?
यदि इस नारे को लगाने वालों से पूछा जाए कि वे किससे आज़ादी चाहते हैं, तो उत्तर कभी स्पष्ट नहीं होता। बस इतना ही कहा जाता है कि “फासीवाद से”, “ब्राह्मणवाद से”, “हिंदू राष्ट्रवाद से”, “पितृसत्ता से”, “परंपरा से”, “संस्कृति से”। यानी युद्ध किसी सिस्टम से नहीं, बल्कि सनातन भारत की आत्मा से है। आज़ादी माँगी जाती है, पर अत्याचार पर नहीं, संस्कृति पर। और यही इस विमर्श का सबसे खतरनाक रूप है — लक्ष्य सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सभ्यता परिवर्तन है।
यही कारण है कि जो लोग “नारी की स्वतंत्रता” के नाम पर भारत की परंपराओं को कोसते हैं, वही लोग इस्लामी हिजाब या चर्च के अनुशासन को “सांस्कृतिक अधिकार” कहकर महिमामंडित करते हैं। भारत में यदि एक हिन्दू स्त्री मांग में सिंदूर लगाए, तो यह “पितृसत्ता” हो जाती है, लेकिन यदि कोई महिला बुर्का पहने तो वह “चॉइस” बन जाती है। एक सनातनी विवाह संस्कार को वे दकियानूसी बताते हैं, पर निकाह-हलाला पर मौन साध लेते हैं। होली के रंग हिंसा बन जाते हैं, पर बकरीद की कुर्बानी “धार्मिक स्वतंत्रता” कहलाती है। हिंदू बहुल समाज पर जनसंख्या नियंत्रण की नैतिकता थोपी जाती है, परन्तु जब कुछ समूह 8-10 बच्चों को “अल्लाह की देन” कहकर जनसंख्या संतुलन बिगाड़ते हैं, तब वही आज़ादी गैंग यह कहकर पीछे हट जाता है कि “यह व्यक्तिगत अधिकार है।”
यानी यह आज़ादी कभी हिजाब से नहीं मांगी जाती, यह आज़ादी तलाक, हलाला, बहुविवाह, चर्च नियंत्रण, मिशनरीकरण, शरिया न्यायालय या जेहादी मानसिकता से नहीं मांगी जाती। यह आज़ादी केवल वहीं मांगी जाती है जहाँ लक्ष्य हिंदू समाज को रक्षात्मक बना दिया जाए और उसे अपराधबोध में धकेल दिया जाए। यही कारण है कि “आज़ादी” का यह विमर्श एकतरफा है — एक ऐसे वैचारिक युद्ध का हिस्सा, जिसमें ढाल “मानवाधिकार” का है, लेकिन तलवार “राष्ट्रविरोध” की।
जो लोग स्वयं को प्रगतिशील कहते हैं, वे कभी इस प्रश्न का उत्तर नहीं देते कि महिलाओं की स्थिति सबसे दयनीय किन समाजों में है। वे कभी यह स्वीकार नहीं करते कि बुर्का, जनसंख्या जिहाद, हलाला, पत्थरबाज़ी, ईशनिंदा कानून, क्रिश्चियन मिशनरीकरण, वक्फ का कब्जा — ये सब किस आधुनिकता के प्रतीक हैं? उनके लिए प्रगति का अर्थ है — हिंदू समाज से परंपराएँ हटाओ, परंतु अन्य धर्मों की कट्टर परंपराओं को “अधिकार” कहकर सुरक्षित रखो।
वामपंथी और इस्लामो-ईसाई गठबंधन की यह रणनीति नई नहीं है। इतिहास गवाह है — पहले शब्द बदले जाते हैं, फिर अर्थ, फिर मन, और अंततः समाज। “आजादी” शब्द का अपहरण भी इसी क्रम की एक कड़ी है। यह वही लोग हैं जो अपने घर की स्त्रियों को बुर्का में बंद रखते हैं, पर हिंदू बेटी के लिए मिनीस्कर्ट को “नारी मुक्ति” बताते हैं; जो मंदिर तोड़ने वालों का समर्थन करते हैं, पर मस्जिदों पर मौन रहते हैं; जो “जय श्रीराम” को फासीवाद कहते हैं, पर “अल्लाहु अकबर” को क्रांतिकारी नारा बना देते हैं।
वास्तविक आज़ादी का अर्थ यह है कि स्त्री को अपनी वेशभूषा का अधिकार हो, पर यह भी कि उस पर कोई धार्मिक या सामाजिक दबाव न हो। स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि विचार खुला हो, पर राष्ट्र-विरोधी न हो। आज़ादी वह नहीं जो भारत के टुकड़े करने का नारा बन जाए, आज़ादी वह है जो भारत के स्वाभिमान को गढ़े।
भारत की असली आज़ादी पश्चिमी या वामपंथी परिभाषा से नहीं, बल्कि सनातन दृष्टि से ही समझी जा सकती है। यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ “मैं” नहीं, “हम” है। यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासन से टकराव नहीं, बल्कि धर्म (कर्तव्य) के भीतर जीने की सामूहिक क्षमताओं का विकास है। यही कारण है कि भारत में आज़ादी माँगने की आवश्यकता आज भी केवल उसी को पड़ती है — जो स्वयं को इस राष्ट्र से अलग समझता है।
और इसलिए, अब आवश्यक है कि “आज़ादी” का अर्थ भारत अपने शब्दों में पुनः परिभाषित करे। क्योंकि जब शब्द बदलते हैं, तो पीढ़ियाँ बदल जाती हैं। “आज़ादी” को यदि हम राष्ट्र-विरोधियों के हाथों में छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ी यह मान बैठेगी कि भारत ही समस्या है और भारत से मुक्ति ही समाधान। लेकिन भारत समस्या नहीं, समाधान है। आज़ादी का अर्थ वामपंथी घोषणाओं में नहीं, गीता, उपनिषद और स्वाभिमानी भारत की आत्मा में है।
भारत को आज़ादी नहीं चाहिए — भारत स्वयं आज़ादी है।
यह भूमि दासत्व से निकली नहीं, यह स्वयं मुक्ति की धारा है।
और जिसने इस देश को “टूटने की आज़ादी” का नारा दिया है, उसे यह समझना चाहिए —
भारत कभी नहीं टूटेगा, परंतु भ्रम अवश्य टूटेंगे।
लेखक
महेन्द्र सिंह भदौरिया राष्ट्रवादी विचारक
सहमंत्री साबरमती विश्व हिन्दू परिषद
उत्तर गुजरात प्रांत कर्णावती क्षेत्र
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