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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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इस्लाम धर्म नहीं, सत्ता की राजनीति है
आज दिल्ली में हुए बम धमाकों ने और इससे पहले 22 अप्रैल को पहलगाम में इस्लामिक आतंकवादियों ने हिंदुओं की धर्म पूछकर पैंट उतरवाकर हत्या की थी आज दिल्ली की के बंम धामके एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि इस्लामिक आतंकवाद अब किसी क्षेत्रीय या सीमित समस्या का नाम नहीं है — यह एक वैश्विक, सुनियोजित और वैचारिक युद्ध है। इसे केवल कुछ हिंसक व्यक्तियों की हरकत कहकर नज़रअंदाज़ करना अपने आप से छल करने जैसा है।
हम दशकों से यह कहकर इस समस्या को टालते आए हैं कि “सभी मुसलमान एक जैसे नहीं होते”, “संवाद और सह-अस्तित्व से समाधान संभव है” या “कट्टरता को तर्क से हराया जा सकता है” — परंतु यह दृष्टिकोण वास्तविकता से कोसों दूर है। इस्लाम न तो वैदिक परंपरा की तरह तर्क-संगत विमर्श का धर्म है, न ही श्रमण परंपरा की तरह आत्मानुशासन का पथ। यह एक राजनीतिक व्यवस्था है, जिसका आधार सत्ता, नियंत्रण और प्रभुत्व है।
इस्लामी सिद्धांत दुनिया को तीन भागों में बाँटते हैं — दारुल-इस्लाम (जहाँ इस्लामी शासन है), दारुल-हरब (जहाँ इस्लामी शासन नहीं है, जिसे ‘युद्धभूमि’ माना गया है) और दारुल-अहद (जहाँ अस्थायी संधि है)। इस्लामी विद्वानों और मज़हबी ग्रंथों में भारत को सदियों से दारुल-हरब के रूप में वर्णित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि इस्लाम का उद्देश्य यहाँ आध्यात्मिक प्रसार नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभुत्व है।
इस्लाम की शुरुआत सातवीं सदी में अरब की धरती से हुई। शुरुआत में यह एक विचार था, लेकिन बहुत जल्दी ही यह सत्ता का रूप लेने लगा। मोहम्मद के जीवनकाल में मदीना में जो शासन-व्यवस्था बनी, उसमें समाज, कानून और प्रशासन सब एक ही नियंत्रण में आ गए। उसी से इस्लाम के राजनीतिक ढांचे की नींव पड़ी। मोहम्मद के बाद जो ख़िलाफ़त व्यवस्था बनी, उसने इस्लाम को एक केंद्रीकृत सत्ता में बदल दिया। कुछ ही दशकों में अरब से लेकर अफ्रीका और मध्य एशिया तक इस्लामी सेनाओं का विस्तार हुआ। यह विस्तार केवल प्रचार या उपदेशों से नहीं हुआ, यह युद्ध और शासन का परिणाम था।
उमय्यद और अब्बासी साम्राज्यों ने इस विचार को स्थायी रूप दे दिया। शासन का पूरा ढांचा शरिया पर आधारित हुआ, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता से अधिक महत्व सत्ता और आदेश को दिया गया। यही वह बिंदु था, जहाँ से इस्लाम केवल आस्था नहीं रहा, बल्कि शासन और नियंत्रण का विचार बन गया। इतिहास की यही धारा बाद में सल्तनतों और ओटोमन साम्राज्य के रूप में आगे बढ़ी।
भारत इस प्रवाह से अलग नहीं रह सका। 711 ईस्वी में जब मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर हमला किया, तब भारत पहली बार राजनीतिक इस्लाम के संपर्क में आया। उसके बाद दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल तक यह प्रवाह लगातार बढ़ता गया। उस दौर में केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, समाज की संरचना भी बदली। हजारों मंदिर टूटे, लाखों लोग मारे गए या अपने घर-बार छोड़ने को मजबूर हुए। ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताते हैं कि उस समय भारत की जनसंख्या में भारी गिरावट आई, क्योंकि शासन का स्वरूप आक्रामक और एकरूपता पर आधारित था।
अंग्रेज़ों के आने से सत्ता तो बदली, लेकिन मानसिकता का यह टकराव नहीं मिटा। 1893 के बंबई दंगे, 1921 का मोपला विद्रोह, 1946 के नोआखली और कलकत्ता के दंगे — ये सब उसी वैचारिक तनाव की अलग-अलग परतें थे। 1947 का विभाजन उसी सोच की पराकाष्ठा थी। अनुमान है कि उस समय करीब 10 से 15 लाख लोग मारे गए और लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। इतने बड़े पैमाने पर जनसंहार का अनुभव शायद ही किसी समाज ने किया हो।
आज़ादी के बाद भारत ने लोकतंत्र को अपनाया, लेकिन वैचारिक चुनौती समाप्त नहीं हुई। कश्मीर का विवाद, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध, फिर 1989 के बाद घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन — ये सब उसी सोच के परिणाम थे जो भारत की एकता को स्वीकार नहीं करती। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 1990 से 2020 के बीच आतंकवाद से जम्मू-कश्मीर में करीब 42 हज़ार लोग मारे गए। देश के बाकी हिस्सों में भी सैकड़ों बम धमाके हुए — दिल्ली, मुंबई, जयपुर, वाराणसी, पुणे, हैदराबाद — कोई शहर अछूता नहीं रहा।
1980 के दशक में जब अफग़ानिस्तान में सोवियत विरोधी युद्ध चल रहा था, तब पाकिस्तान और पश्चिमी देशों ने “जिहाद” को हथियार बनाया। वही लड़ाके और वही सोच बाद में भारत के खिलाफ खड़ी हुई। तालिबान, अल-क़ायदा, आईएसआईएस — ये सब उसी विचार के नए चेहरे हैं। इनका लक्ष्य कहीं सीमित नहीं, बल्कि एक वैचारिक विस्तार है जो सत्ता को अंतिम लक्ष्य मानता है।
भारत में इस विचार का असर केवल हिंसा तक सीमित नहीं रहा। कट्टरपंथी समूहों ने धीरे-धीरे सामाजिक और वैचारिक क्षेत्र में भी प्रवेश किया। वे अपने आपको पीड़ित बताकर, “अल्पसंख्यक अधिकारों” की आड़ में, राजनीतिक सहानुभूति प्राप्त करते रहे। यह वही रणनीति थी जिसे पश्चिम एशिया में पहले से आजमाया गया — हिंसा और प्रचार का मिश्रण।
लेकिन भारत की सभ्यता का स्वभाव अलग है। यहाँ विचारों का संघर्ष तलवार से नहीं, तर्क से होता आया है। भारत की जड़ें “वसुधैव कुटुम्बकम्” में हैं, जहाँ सबको साथ लेकर चलना ही लक्ष्य है। यही कारण है कि भारत ने अब तक इस चुनौती को केवल सुरक्षा की दृष्टि से नहीं, बल्कि समाज के आत्मविश्वास से भी संभाला है।
फिर भी यह सच है कि राजनीतिक इस्लाम का विचार आज भी भारत की एकता और स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यह किसी व्यक्ति या समाज के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ संघर्ष है जो स्वतंत्रता और विविधता को स्वीकार नहीं करती। इसका उत्तर बंदूक से नहीं, स्पष्ट सोच से निकलेगा — इतिहास की सच्चाई को स्वीकार करके, शिक्षा में विवेक बढ़ाकर, और नीति में दृढ़ता लाकर।
राजनीतिक इस्लाम और ‘उम्माह’ की अवधारणा : सत्ता के विस्तार का वैचारिक तंत्र
इस्लाम के भीतर एक बुनियादी विचार है — उम्माह। इसका अर्थ है “समूचे मुसलमानों का एक वैश्विक समुदाय” जो जाति, भाषा, भूगोल या राष्ट्रीयता से ऊपर है। इस अवधारणा के अनुसार, पूरी दुनिया के मुसलमान एक शरीर के समान हैं — किसी एक हिस्से पर आघात हो तो बाकी हिस्सा भी प्रतिक्रिया दे।
पहली नज़र में यह एकता और बंधुत्व का भाव प्रतीत होता है, परंतु राजनीतिक इस्लाम ने इसे केवल धार्मिक एकता तक सीमित नहीं रखा; उसने इसे सत्ता और शासन की रणनीति का आधार बना दिया।
उम्माह की यह धारणा किसी भी राष्ट्र की सीमाओं को नहीं मानती। यह मानती है कि दुनिया दो हिस्सों में बंटी है — दारुल-इस्लाम (जहाँ इस्लामी शासन है) और दारुल-हरब (जहाँ नहीं है)। इसलिए इस्लाम के राजनीतिक स्वरूप में हर गैर-इस्लामी भूमि को “युद्धभूमि” माना जाता है, जब तक कि वहाँ इस्लामी शासन स्थापित न हो जाए। यही सोच “जिहाद” की वैचारिक जड़ है।
राजनीतिक इस्लाम इसी विचार से पनपा — कि धर्म केवल व्यक्ति की आस्था नहीं, बल्कि शासन, क़ानून, शिक्षा और समाज पर नियंत्रण का माध्यम है। इस्लामिक शरिया को अंतिम और ईश्वरीय क़ानून मानते हुए यह व्यवस्था मनुष्य निर्मित संविधान या लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्वीकार करती है। परिणामतः, जहाँ-जहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ा, वहाँ धर्म और राजनीति का घालमेल होकर एक राजनीतिक धार्मिक तंत्र खड़ा हुआ।
इतिहास इसका साक्षी है — अरब साम्राज्य के विस्तार से लेकर उमय्यद और अब्बासी खलीफाओं तक, ओटोमन साम्राज्य और मुग़ल सल्तनत तक — हर जगह इस्लामी शासन ने उम्माह के नाम पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित किया। आधुनिक काल में भी यही सोच मुस्लिम ब्रदरहुड, जमात-ए-इस्लामी, तालिबान, अल-क़ायदा और आई.एस.आई.एस. जैसे संगठनों में दिखाई देती है।
ये संगठन किसी विशेष राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को एक “इस्लामी उम्माह” में बदलने के लिए काम करते हैं। यही कारण है कि उनका लक्ष्य सीमित भूभाग नहीं, बल्कि वैचारिक अधिपत्य है।
भारत जैसे देश के लिए यह सोच विशेष चुनौती है, क्योंकि यहाँ की संस्कृति राष्ट्रीयता को धर्म से ऊपर रखती है। हमारे लिए “राष्ट्र” मातृभूमि है — जबकि उम्माह की सोच के लिए राष्ट्र, झंडा, या संविधान गौण है; केवल इस्लामी एकता सर्वोपरि है। इसीलिए भारत में बार-बार विभाजन, आतंकवाद, कश्मीर की समस्या और दंगे जैसे संकट इसी वैचारिक टकराव का परिणाम रहे हैं।
भारत की सबसे बड़ी भूल यही रही कि उसने इस्लाम को हमारे धर्मों जैसा समझा — एक आस्था या पूजा-पद्धति के रूप में। परंतु इस्लाम अपने मौलिक स्वरूप में राजनीतिक ढाँचा है, जो सत्ता और नियंत्रण की आकांक्षा रखता है। जब तक हम यह भेद नहीं समझेंगे कि “राजनीतिक इस्लाम” का उद्देश्य आध्यात्मिकता नहीं, बल्कि शासन है, तब तक इस चुनौती का समाधान संभव नहीं।
राजनीतिक इस्लाम एक वैचारिक शासन-व्यवस्था है जो मज़हब के माध्यम से राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करती है। इसका सबसे शक्तिशाली औजार है — “उम्माह” की वैश्विक चेतना। यही चेतना आज पाकिस्तान की नीति, अरब देशों के हित, और पश्चिमी देशों में सक्रिय कट्टरपंथी नेटवर्क को जोड़ती है।
> “जहाँ धर्म व्यक्ति को ईश्वर तक पहुँचाता है, वहीं राजनीतिक इस्लाम उसे सत्ता का साधन बना देता है।”
आधुनिक युग में भी यही प्रवृत्ति पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अरब देशों के माध्यम से जारी है। तालिबान, अल-क़ायदा, आई.एस.आई.एस., और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन उसी विचारधारा की आधुनिक उपज हैं — एक ऐसी सोच जो पूरी दुनिया को दारुल-इस्लाम में बदलने का लक्ष्य रखती है।
भारत की सबसे बड़ी भूल यह रही कि हमने इस्लाम को एक “धर्म” मान लिया, जबकि यह मूलतः एक राजनीतिक-सामाजिक ढांचा है। इसका घोषित लक्ष्य आत्मा की मुक्ति नहीं, बल्कि इस्लामी सत्ता की स्थापना है। परिणामस्वरूप, इस्लामी राजनीति ने शिक्षा, जनसंख्या, मीडिया, और संस्कृति के माध्यम से धीरे-धीरे समाज में घुसपैठ कर ली है। वह स्वयं को अल्पसंख्यक और पीड़ित बताकर सहानुभूति अर्जित करता है, जबकि भीतर से उसका उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक एकता को खंडित करना है।
हम अक्सर पाकिस्तान को दोष देते हैं, या सरकारों के तुष्टिकरण पर आक्रोश व्यक्त करते हैं, परंतु असली कारण — पॉलिटिकल इस्लाम की विचारधारा — पर चर्चा ही नहीं करते। जब तक हम इस्लाम की वैचारिक जड़ों को नहीं समझेंगे, तब तक आतंकवाद का समाधान असंभव रहेगा।
> “जब तक समाज में सच बोलने का साहस नहीं होगा, तब तक अधर्म को बल मिलता रहेगा।”
इस्लामिक आतंकवाद केवल सुरक्षा की समस्या नहीं है, यह एक वैचारिक चुनौती है। इसे समझने के लिए भावनात्मक नहीं, बौद्धिक दृष्टिकोण चाहिए। यह संघर्ष किसी व्यक्ति या समुदाय से नहीं, बल्कि उस विचारधारा से है जो भारत के सनातन धर्म, उसकी सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व की अवधारणा के विपरीत खड़ी है।
“घर-वापसी”अपने मूल सनातन वैदिक धर्म में और सत्य और कर्तव्य की ओर लौटने का प्रतीक है। जब समाज यह समझ लेगा कि इस्लाम धर्म नहीं, बल्कि एक राजनीतिक माफिया मज़हब है जो सत्ता के लिए उपासना पद्धति और विश्वास का उपयोग करता है, तभी भारत में सच्ची वैचारिक मुक्ति संभव होगी।
आवश्यक है कि भारत का बौद्धिक वर्ग इस्लामिक राजनीतिक सिद्धांत का गहन अध्ययन करे — उसके इतिहास, सिद्धांत, जिहादी तंत्र, जनसंख्या नीति और वैश्विक नेटवर्क को समझे। समाधान न भावनाओं में है, न नफ़रत में — समाधान है ज्ञान, जागरूकता और वैचारिक स्पष्टता में।
भारत को यह स्वीकार करना होगा कि यह संघर्ष केवल आतंकवाद के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक ऐसी विचारधारा के विरुद्ध है जो हमारी सभ्यता के अस्तित्व को चुनौती दे रही है। जब यह बोध समाज में जागेगा, तब ही भारत इस वैचारिक युद्ध में विजयी होगा।
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