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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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हिंदू सभ्यता का इतिहास धर्म, नीति और शक्ति के संतुलन का इतिहास है। यह सभ्यता तब तक अक्षुण्ण रही जब तक इन तीनों तत्वों का सामंजस्य बना रहा; और जब-जब यह संतुलन टूटा, तब अधर्म, विघटन और पराधीनता का युग आरंभ हुआ।
प्राचीन काल में जब हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण और महिषासुर जैसे असुर शक्तिशाली हुए, तब यह केवल नैतिक या धार्मिक संघर्ष नहीं था — वह धर्म और अधर्म, प्रकाश और अंधकार का शाश्वत संग्राम था। चौदह देवासुर संग्रामों और महाभारत जैसे युद्धों ने स्पष्ट किया कि धर्म की रक्षा केवल प्रवचन से नहीं, बल्कि नीति और शक्ति से होती है। जब धर्म, नीति और शक्ति का समन्वय होता है, तभी समाज का संतुलन और संस्कृति की रक्षा संभव होती है।
मौर्यकाल के पश्चात जब समाज बौद्ध मत की ओर झुका, तब भी हमारे ऋषियों और आचार्यों ने वैचारिक पुनर्जागरण का कार्य किया। आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के माध्यम से समस्त मतों को एकात्म दृष्टि में बाँधा, जिससे समाज पुनः आत्मचेतन हुआ। यह उदाहरण इस सत्य को प्रतिपादित करता है कि वैचारिक जागरण तभी फलदायी होता है जब उसके साथ नीति और शक्ति का संयोजन हो।
किन्तु वर्तमान युग का सभ्यतागत संघर्ष इससे भी गहरा और व्यापक है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी धर्म नहीं, बल्कि मज़हब और रिलिजन हैं — संगठनात्मक, विस्तारवादी और सत्तामूलक विचारप्रणालियाँ। इनका उद्देश्य आत्मानुभूति या ईश्वर साक्षात्कार नहीं, बल्कि शासन, विस्तार और मतानुयायियों की संख्या वृद्धि है। इस्लाम का आक्रमण पिछले बारह शताब्दियों से भारत पर जारी है — जिसने न केवल मंदिरों को, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता को भी ध्वस्त करने का प्रयास किया। क्रिश्चियनिटी ने उपनिवेशवाद के रूप में हमारे मनोविज्ञान, शिक्षा और आत्मगौरव को नष्ट करने का कार्य किया।
क्रिश्चियनिटी से उपजे आधुनिक विचार — वामपंथ, उदारवाद, सेकुलरिज्म, समाजवाद, पूँजीवाद, राइट-विंग, और ग्लोबल मार्केट फोर्सेज — सब उसी एक मानसिक स्रोत के अंग हैं। इनके पीछे की शक्ति “डीप स्टेट” है, जो वैश्विक सत्ता और सांस्कृतिक नियंत्रण का औजार है। यह पूरा तंत्र “अब्राहमिक” विचार की आधुनिक अभिव्यक्ति है, जिसका मूल उद्देश्य है — मनुष्य को आत्मा से काट देना, समाज को परिवार और संस्कृति से विमुख करना, और राष्ट्रों को बाज़ार व उपभोक्तावाद का दास बना देना। इस्लाम जहाँ हिंसा और भय से विजय प्राप्त करना चाहता है, वहीं क्रिश्चियनिटी और उससे जन्मे वामपंथी-वामपोषित तंत्र मानसिक दासता और सांस्कृतिक पतन के माध्यम से विजय प्राप्त करते हैं।
इन सबके विरुद्ध जो वैचारिक, रणनीतिक और सामरिक प्रतिकार अपेक्षित है, वह अभी तक सम्यक रूप में नहीं हो सका है। यह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। हम इन मज़हबी और वैचारिक आक्रमणों का उत्तर केवल नैतिक उपदेशों से देते रहे, जबकि यह संघर्ष गहन और योजनाबद्ध है। अब यह आवश्यक है कि हम इस संघर्ष को “धर्म” के स्तर पर नहीं, बल्कि “सभ्यतागत” स्तर पर समझें। यह अस्तित्व का युद्ध है — आत्मा और बाज़ार के बीच, ईश्वर और सत्ता के बीच, संस्कृति और उपभोग के बीच।
इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का विरोध “धर्म” का नहीं, बल्कि “अधर्म” का विरोध है, क्योंकि ये जीवन के सत्य से नहीं, संगठन और प्रभुत्व से संचालित हैं। अतः इनके साथ संवाद नहीं, रणनीतिक प्रतिकार आवश्यक है। जब तक मुस्लिम या क्रिश्चियन होना सामाजिक या आर्थिक लाभ का सौदा रहेगा, तब तक मतांतरण रुकेगा नहीं। इसके लिए समाज को ऐसी स्थिति बनानी होगी कि इन मज़हबी पहचानाओं से कोई व्यावहारिक लाभ न मिले। “साम, दाम, दण्ड, भेद” — इन चारों उपायों का प्रयोग समाजरक्षा के साधन के रूप में किया जाना धर्मसम्मत है, क्योंकि यह धर्मस्थापन का ही भाग है।
यह कार्य केवल संगठनों या सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता। सज्जन शक्ति को जागृत होकर सरकारों, नीति-निर्माताओं और वैचारिक संगठनों पर दबाव बनाना होगा कि वे भारत की अस्मिता की रक्षा के लिए ठोस योजना तैयार करें। संघ ने पिछले शताब्दीभर यह कार्य प्रारंभ किया है, किंतु अब यह केवल संगठन का नहीं, प्रत्येक सजग हिंदू का उत्तरदायित्व है।
सृष्टि त्रिगुणात्मक है — सत, रज और तम तीनों गुण समाज में विद्यमान हैं। सतोगुणी व्यक्ति धर्म और विचार का नेतृत्व करता है, रजोगुणी समाज को संगठित करता है, और तामसिक प्रवृत्ति वाला प्रतिकार और रक्षण का कार्य करता है। तीनों को विरोधी नहीं, पूरक मानकर एक लक्ष्य — धर्मरक्षा — की दिशा में प्रेरित करना होगा। यही “संगठन” का वास्तविक अर्थ है।
अब समय आ गया है कि हम पुनः धर्म, नीति और शक्ति के त्रिसंयोग को पुनर्स्थापित करें। धर्म हमें दिशा देता है, नीति हमें मर्यादा सिखाती है, और शक्ति हमें उस दिशा में चलने की क्षमता देती है। बिना शक्ति के धर्म असुरक्षित है, बिना नीति के शक्ति अराजक है, और बिना धर्म के नीति अर्थहीन। जब यह त्रिसूत्री पुनः एकत्र होगी, तभी सभ्यता का पुनर्जागरण होगा।
इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, वामपंथ और पूंजीवाद — ये सब एक ही वृक्ष की शाखाएँ हैं, जिसका मूल है अधर्म, भोग और सत्ता-वासना। इसके विरुद्ध केवल वही विजयी होगा जो आत्मा, सत्य और धर्म पर आधारित होगा। अतः हिंदू समाज को आत्मचेतन, आत्मबलशाली और आत्मनिर्भर बनना होगा। यही घर-वापसी का अर्थ है — शरीर का नहीं, चेतना का पुनरागमन। यही धर्म की स्थापना और भारत के शाश्वत वैभव का मार्ग है।
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