सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

ममदानी का न्यूयॉर्क का मेयर बनना जो एक प्रत्यक्ष संदेश देता है,


बड़े ही आश्चर्य की बात है कि उस पर ना किसी का ध्यान जा रहा है, ना कोई चर्चा हो रही है। 
जबकि वह मानव जाति के इतिहास का एक महत्वपूर्ण सूत्र है । 

न्यूयॉर्क में ही आतंकवाद का सबसे घिनौना कारनामा हुआ था। 
न्यूयॉर्क में ही वह महत्वपूर्ण भवन थे जिन पर हवाई जहाज से आतंकवादी हमला किया गया। जहां बहुत से लोग मारे गए,बहुत से लोग घायल हुए और आतंक का परिवेश संयुक्त राज्य अमेरिका में फैलने लगा। 
इस न्यूयॉर्क के( मजहबी आतंकवाद से डरे हुए) लोगों ने यह सोचकर कि अगर हम किसी मुसलमान को मेयर बना देंगे तो शायद वह आतंकवाद पर नियंत्रण कर ले, हमदानी को वोट दिया है।।हिंदुओं ने भी। 

आक्रामक पर, बलात्कारी पर अत्याचारी पर, यह मोह, यह लगाव, यह अनुग्रह, 
भय के कारण उसके समक्ष झुकना, यह भी मानव इतिहास में एक महत्वपूर्ण सूत्र रहा है। उन मजहबी आततायी आसुरी तत्वों का अनुग्रह पाने का लोभ बड़े बड़े हिंदू संगठको मे भी दिखता है इन दिनों। 

भारत में जो लोग आज मुसलमान हैं उनमें से ज्यादातर इसी प्रकार अत्याचार से पीड़ित होकर बलपूर्वक या छलपूर्वक या दबाव से मुसलमान बनाए गए और जब उनके साथ उनके परिवार के साथ यह सब दुष्कर्म हुए और वह अवश थे, विवश थे,असहाय थे ,दीन हीन थे, 
इसी असहाय दशा मे, इसी विवशता में उनके भीतर आतताई के प्रति ,अत्याचारी के प्रति, बलात्कारियों के प्रति, व्यभिचारी के प्रति, अपराधी के प्रति ,भय की अभिव्यक्ति नकली आदर के रूप में हुई और फिर आदर की इस नकली अभिव्यक्ति का इतना अभ्यास हो गया कि अगली पीढ़ी तक यह भूल गया कि यह एक नकली अभ्यास है, फिर आदतन आदर हो गया। 

आज बहुत से लोग जिनका भारत में रहकर भी मजहबी उन्माद और पिशाच लीलाओं के प्रति इतना आदर भाव है, वे सब इसी प्रकार कभी अत्याचार से पीड़ित रहे ,सताए गए और अंत में भय, लज्जा और असहायता की दशा को ढंकने के लिए उनके प्रशंसक बन गए। 

वीर सावरकर ने एक स्वाभाविक तेजस्विता के साथ मजहबी उन्माद के प्रति उत्तर का आह्वान किया आग्रह किया परंतु भारत में मुसलमान बने लोगों की असहायता अंधकार और आंतरिक दैन्य की ओर ध्यान नहीं दिया, उसका विश्लेषण नहीं किया । 
तथापि उन्होंने जो उसका उपचार बताया, वह बिल्कुल सही था ।।

हिंदू जब तक शक्तिशाली होकर अत्याचारी को दुष्ट को दंडित नहीं करेंगे, उसे दलित नहीं करेंगे, कुचलेंगे नहीं ,दबाएंगे नहीं, सिखायेंगे नहीं, उन्मूलन नहीं करेंगे, तब तक उसके भीतर केवल भयभीत करके झुकाने की आदत जो पड़ गई है, वह बनी रहेगी। 

गाँधी जी ने मुसलमान की एक स्तर पर तो बड़ी सेवा की लेकिन दूसरे स्तर पर उनकाे आध्यात्मिक अंधकार में धकेल दिया या रहने दिया और उनके आध्यात्मिक अंधकार का पोषण किया। 
उनको एक स्वस्थ मनुष्य बनने की प्रेरणा नहीं दी।उनको इसी तरह अस्वाभाविक और अस्वस्थ रहे आने का प्रलोभन दिया और इस पर बल दिया । 
 चिंता की बात यह है कि आज भी कोई ऐसा व्यापक और प्रभावशाली हिंदू संगठन नही है, जो हिंदुओं को मानवीय इतिहास के इस सत्य का शांत चित्त से विस्तार से स्मरण कराये और इसलिए मन में ज्यादा उग्रता न रखते हुए भी मजहबी आतंकवादियों को व्यवस्थित रूप से कुचलना और उत्तर देना क्यों आवश्यक है और इसके बिना वे कैसे सामान्य स्वस्थ मनुष्य नहीं बनेंगे ,यह सिखाने वाला, यह बताने वाला, इस सत्य को सामने रखने वाला कोई भी हिंदू संगठन विद्यमान नहीं है। 
ऐसे संगठनों की आवश्यकता है जो बिना किसी रोष क्षोभ के शांत ढंग से इस तथ्य को समझाते रहें। 

एक बार समझ लेंगे तो हिंदू कर लेंगे। 
जो उन्हें करना चाहिए वह कर लेंगे। 

ईसाइयों की तो आदत है दूसरों पर अत्याचार करना और शक्तिशाली के सामने झुकना और फिर उसे फुसलाने बहलाने की कोशिश करना। जैसे कुछ अवश स्त्रियां करती हैं। 
ईसाइयत को इस मानसिकता में रहने का अभ्यास हो गया है। 
यूरोप में और USA में भी मुसलमान को जो लोग इस तरह सहला रहे हैं वह वस्तुतः स्वयं को बहला रहे हैं और मान रहे हैं कि हम मुसलमान को बहला फुसला लेंगे। 

अपनी वे जाने।

हम हिंदुओं को इस मानवीय इतिहास के बहुत ही महत्वपूर्ण एक कारक या महत्वपूर्ण तत्व और सत्य को शांत चित्त से अच्छी तरह समझ कर फिर व्यापक स्तर पर इसके व्यवहार के विषय में विचार करना चाहिए। 

 सब हिंदुओं को कोई एक बात समझा देंगे इस विचित्र मूर्खता से जो मुक्त नहीं हो, वह संगठन किसी काम का नहीं । वह निरीह व्यक्तियों का संगठन है। 
ब्रह्मा ने सब मनुष्यों को एक सा बनाया ही नहीं है। 
सतोगुणी रजोगुणी और तमोगुणी मनुष्य अलग-अलग होते हैं । 

हिंदुओं में भी बहुत से तमोगुणी होंगे ही क्योंकि भगवान ने बनाया ही ऐसा है। 
तामसिक हिंदू कभी सत्य को सुनने को तैयार होंगे इसकी कोई आशा नहीं है।।
इसलिए सब हिंदुओं को हम पहले यह सत्य समझा देंगे तब कुछ कोई कदम उठाएंगे, ऐसा कहने वाले लोग केंचुए हैं और वह जीवन में कुछ नहीं करेंगे। 

जैसा हमने देखा है कि लोग 70 ,80,90 या 100 साल से जो काम करने की घोषणा करते हैं , अंत तक वह काम नहीं कर पाते। तब राग बदल देते हैं। 
तो सबको सत्य की अनुभूति करा देने का विचित्र सा आग्रह छोड़कर जो लोग संस्कारी हो, अनुकूल हों, सजग हो ,राष्ट्रभक्त हो, सामाजिक दायित्व को समझते हो, हिंदू समाज के प्रति हिंदू लोक के प्रति हिंदू राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य समझते हो, केवल उन तक ध्यान देना चाहिए। शेष काम स्वत :ही होने लगता है।

साभार 
रामेश्वर मिश्र पंकज जी

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