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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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🖋️दीपक कुमार द्विवेदी
सेना में जाति देखने का विचार केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं है; यह राष्ट्र की आत्मा पर वैचारिक प्रहार है। भारत की सेना उस अनुशासन और निष्ठा का प्रतीक है जहाँ जाति, धर्म या भाषा की दीवारें अर्थहीन हो जाती हैं। सैनिक की एक ही पहचान होती है—वह भारत का सिपाही है। ऐसे में जब कोई राष्ट्रीय नेता यह कहता है कि “सेना, न्यायपालिका, नौकरशाही और उद्योगों पर दस प्रतिशत लोगों का नियंत्रण है,” तो यह सिर्फ़ एक गलत बयान नहीं, बल्कि उस विश्वास पर हमला है जो भारतीय समाज और उसकी संस्थाओं के बीच पवित्र बंधन की तरह जुड़ा हुआ है।
राहुल गांधी के हालिया वक्तव्य कोई अचानक कही गई बातें नहीं हैं। पिछले तीन वर्षों में उनकी राजनीतिक भाषा लगातार एक वैचारिक दिशा की ओर मुड़ी है—जहाँ समाज को दो हिस्सों में बाँटकर देखा जाता है। 2023 में उन्होंने “जितनी आबादी, उतना हक़” का नारा दिया। यह सुनने में न्यायसंगत लगता है, पर इसका अर्थ था—हक़ योग्यता या सामर्थ्य से नहीं, बल्कि जाति और पहचान से तय हो। उसी वर्ष उन्होंने संसद में कहा कि “भारत सरकार के 90 सचिवों में केवल तीन ओबीसी हैं।” यह आँकड़ा उन्होंने कई सभाओं में दोहराया और इसे सामाजिक असमानता का प्रतीक बताया। उन्होंने यह भी कहा कि “90 प्रतिशत लोग सिस्टम से बाहर हैं, केवल दस प्रतिशत लोगों के पास सब कुछ है।”
2024 में प्रयागराज की रैली में उन्होंने इसी बात को और आगे बढ़ाया। वहाँ उन्होंने कहा कि “देश की 90 प्रतिशत आबादी सिस्टम के बाहर बैठी है।” अब “सिस्टम” शब्द उनके राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुका था। इस सोच में समाज एक स्थायी द्वंद्व के रूप में मौजूद है—एक पक्ष जिसके पास नियंत्रण है, और दूसरा पक्ष जो वंचित है। यह दृष्टिकोण पश्चिम की क्रिटिकल रेस थ्योरी से लिया गया है, जो हर संस्था को “शोषक” और “शोषित” के संबंध में परिभाषित करती है। अमेरिका में इस सिद्धांत ने नस्ल के आधार पर यही विभाजन किया—श्वेत को जन्म से वर्चस्वशाली और अश्वेत को जन्म से पीड़ित बताया गया। भारत में यही विचार जाति के रूप में स्थानांतरित हुआ। अब श्वेत-अश्वेत की जगह “सवर्ण बनाम अवर्ण”, “ब्राह्मण बनाम पिछड़ा”, “ऊँच-नीच” जैसी स्थायी रेखाएँ खींच दी गईं।
2025 में राहुल गांधी ने इस विचार को और विस्तार दिया और सेना को भी उसी फ्रेम में रख दिया। बिहार की सभा में उन्होंने कहा—“सेना, नौकरशाही और उद्योगों पर दस प्रतिशत लोगों का नियंत्रण है।” यह बयान केवल तथ्यहीन नहीं था, बल्कि खतरनाक भी था, क्योंकि पहली बार सेना जैसी निष्पक्ष संस्था को जाति और वर्ग के प्रश्न से जोड़ा गया। सेना में भर्ती का सिद्धांत “ऑल इंडिया, ऑल क्लास” है। वहाँ किसी की जाति नहीं पूछी जाती; चयन केवल योग्यता, साहस और सेवा के आधार पर होता है। सेना के भीतर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं, बल्कि अनुशासन और विश्वास ही सबसे बड़ा मूल्य है। ऐसे में यह कहना कि सेना किसी वर्ग के नियंत्रण में है, उन हजारों सैनिकों का अपमान है जो बिना किसी भेद के राष्ट्र के लिए अपने प्राण देते हैं।
राहुल गांधी के वक्तव्यों की इस श्रृंखला के पीछे एक वैचारिक पद्धति स्पष्ट दिखाई देती है। यह वही बाइनरी थ्योरी है जो समाज को दो ध्रुवों में बाँटकर हर संस्था में संघर्ष पैदा करती है। यह सोच केवल राजनीति की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक रणनीति का हिस्सा है, जो वामपंथी विचारधाराओं से प्रेरित है। भारत में इसे “कास्ट रेस थ्योरी” कहा जा सकता है—जिसमें हर असमानता को जाति के चश्मे से देखा जाता है और हर संस्था को “वर्चस्वशाली वर्ग” की साजिश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यही सोच आज कांग्रेस की वैचारिक दिशा बन चुकी है।
इस दृष्टि से राहुल गांधी के हालिया वक्तव्य अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं; वे एक निरंतरता का हिस्सा हैं। पहले समाज को “जितनी आबादी उतना हक़” के सिद्धांत से बाँटा गया, फिर शासन-प्रशासन में “तीन बनाम नब्बे” का तर्क दिया गया, फिर “सिस्टम बनाम जनता” का विरोध रचा गया, और अब सेना तक वही विभाजन पहुँचा दिया गया। यह क्रम वैसा ही है जैसा क्रिटिकल रेस थ्योरी ने पश्चिम में किया था—पहले इतिहास में दोष ढूँढना, फिर शिक्षा और संस्थाओं पर प्रश्न उठाना, और अंत में सुरक्षा व्यवस्था को भी अविश्वसनीय ठहराना।
राहुल गांधी का राजनीतिक अभियान अब एक विचार-प्रयोगशाला बन चुका है। उनके भाषणों में बार-बार “वर्चस्व”, “अन्याय”, “दमन”, “प्रतिनिधित्व” और “90 बनाम 10” जैसे शब्द आते हैं। यही वह भाषा है जो व्यक्ति और समाज के बीच स्थायी दूरी पैदा करती है। यह राजनीति जनहित की जगह असंतोष को स्थायी बनाती है। भारत के लिए यह नई चुनौती है, क्योंकि यह विभाजन केवल चुनावी स्तर पर नहीं, मानसिक स्तर पर होता है—जहाँ व्यक्ति स्वयं को समाज से अलग देखने लगता है।
सेना पर जाति का प्रश्न उठाना इस पूरी प्रक्रिया की चरम सीमा है। यह न केवल संस्था की गरिमा को ठेस पहुँचाता है, बल्कि उस नैतिक विश्वास को भी तोड़ता है जिस पर भारत की सुरक्षा टिकी है। सेना पर संदेह, राष्ट्र पर संदेह के समान है। यह विचार लोकतंत्र की बहस नहीं, बल्कि उसकी नींव हिला देने वाला प्रयोग है।
आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि कौन सत्ता में है, बल्कि यह है कि कौन समाज के भीतर विश्वास बनाए रखेगा। अगर हर संस्था पर अविश्वास बोया जाएगा, हर परम्परा को “वर्चस्व” कहा जाएगा, और हर असमानता को “शोषण” का प्रमाण माना जाएगा, तो धीरे-धीरे समाज का आंतरिक संयोजन टूट जाएगा। यही कल्चरल मार्क्सवाद का अंतिम लक्ष्य है—स्थापित व्यवस्था को भीतर से खोखला कर देना।
भारत की राजनीति को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय और सामाजिक असंतोष, दोनों में महीन अंतर है। न्याय सुधार से आता है, असंतोष विखंडन से। राहुल गांधी का यह दृष्टिकोण, चाहे जानबूझकर अपनाया गया हो या अनजाने में, उसी असंतोष की खेती करता है। और जब यह बीज सेना जैसी संस्था की भूमि में बोया जाता है, तब वह केवल राजनीति का नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।
सेना में जाति देखना न किसी सुधार का मार्ग है, न किसी न्याय का। यह केवल एक वैचारिक रोग है, जो समाज को बाँटता है और विश्वास को नष्ट करता है। सेना की शक्ति उसकी विविधता में है, और उसका धर्म केवल राष्ट्र है। जो राजनीति इसे भूल जाती है, वह अपने ही देश की रक्षा-दीवार में दरारें पैदा करती है।
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