सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

खंडित विग्रह और खंडित भारत — आत्मविस्मृति का दर्पण


खंडित विग्रहों को देखकर हिन्दू मन में पीड़ा क्यों नहीं जागती?
खंडित भारत को देखकर उसके हृदय में वेदना का ज्वार क्यों नहीं उमड़ता?
जब हम अपने आराध्य भोलेनाथ की टूटी प्रतिमा पर झुकते हैं,
या श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बनी मस्जिद की दीवारों को देखते हैं,
तो क्या हमारे भीतर कोई टीस नहीं उठती?
क्या हमारी चेतना अब निःस्पंद हो चुकी है?
क्या हमारे रक्त में वह ताप नहीं रहा जो धर्म की रक्षा के लिए कभी रणभूमि में प्रवाहित हुआ था?

भारत वह भूमि है जहाँ पत्थर भी पूज्य बनते हैं।
यह वही धरती है जहाँ देवत्व केवल मंदिरों में नहीं, जीवन के प्रत्येक कण में बसता है।
कभी यही भूमि विश्वगुरु कहलाती थी — यहाँ से ज्ञान, करुणा और धर्म का प्रकाश समूची पृथ्वी को आलोकित करता था।
पर आज उसी भूमि पर अपने ही आराध्यों के खंडित विग्रह पड़े हैं, और हम उन्हें देखकर भी मौन हैं।

सोमनाथ का उदाहरण हमारे सामने है।
सन् 1026 में जब महमूद ग़ज़नी ने सोमनाथ मंदिर को लूटा और नष्ट किया, तब केवल मंदिर नहीं टूटा — वह हिन्दू समाज के आत्मविश्वास पर किया गया प्रहार था।
परन्तु हम हर बार टूटे, फिर भी उठ खड़े हुए।
हमने 1706 में औरंगज़ेब के विध्वंस के बाद भी सोमनाथ को पुनः निर्मित किया।
वह केवल पत्थरों का पुनर्निर्माण नहीं था, वह हमारी आत्मा के अमरत्व का उद्घोष था।

लेकिन आज क्या हुआ?
मंदिर तोड़ने वाले चले गए, परंतु हम अपने भीतर से ही टूट गए।
वही हिन्दू समाज जो अपने आराध्य के लिए मर मिटता था, अब अपने ही धर्म को लेकर अपराधबोध में जीने लगा है।
वामपंथी इतिहासलेखन ने हमें यह सिखाया कि हमारी परंपराएँ पिछड़ी हैं, हमारे देव मिथक हैं, और हमारे ग्रंथ अंधविश्वास हैं।
अंग्रेज़ों ने हमारे गुरुकुलों को तोड़ा, हमारी शिक्षा प्रणाली को नष्ट किया, और ऐसी शिक्षा दी जिसने हमें अपनी ही संस्कृति से लज्जित कर दिया।

आज हम “वसुधैव कुटुम्बकम्” का पाठ तो करते हैं, पर उसका भाव समझे बिना।
यह उद्घोष महाउपनिषद् से लिया गया है —

> “अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”

अर्थात — “यह मेरा है, यह पराया है, ऐसा संकीर्ण विचार छोटे मन वालों का होता है; उदार चरित्र वाले तो सम्पूर्ण पृथ्वी को परिवार मानते हैं।”
पर यह उदारता केवल दैवी प्रवृत्ति वालों के प्रति थी, न कि अधर्म और असुरता के प्रति।
वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ यह नहीं था कि जो हमारी भूमि लूटे, हमारे आराध्यों का अपमान करे, उसे भी हम गले लगाएँ।
गीता का धर्म स्पष्ट कहता है —

> “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।”
अर्थात जब तक अधर्म का विनाश नहीं होता, तब तक धर्म की स्थापना अधूरी रहती है।

हमारे शास्त्रों ने सिखाया कि क्षमा तब तक ही गुण है जब तक वह कायरता का रूप न ले ले।
राम ने रावण का वध किया, कृष्ण ने कंस का — क्योंकि अधर्म को दंड देना ही धर्म का रक्षण है।
पर हम वही करते आए जो हमें विनीत दिखाता था, वीर नहीं।
हमने असुरों को क्षमा दी, म्लेच्छों को भुला दिया, और धर्म की पीड़ा को अपने भीतर दबा लिया।

हमारे ही भीतर जाति, पंथ और वर्ग के नाम पर विभाजन बो दिए गए।
कोई कहता है — “मैं हिन्दू नहीं, मैं जाट हूँ।”
कोई कहता है — “मैं दलित हूँ, हिन्दू नहीं।”
कहीं से आवाज आती है — “हम सिख हैं, हम जैन हैं, हम लिंगायत हैं, हिन्दू नहीं।”
यह भाव किसी और ने नहीं पैदा किया — यह हमारी आत्मविस्मृति का परिणाम है।
जब हिन्दू अपनी पहचान भूलता है, तब वही पहचान उसके विरुद्ध खड़ी हो जाती है।

1947 में भारत का विभाजन हुआ — लाखों हिन्दू मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए।
पर क्या हमने कभी उन असंख्य बलिदानों की स्मृति को राष्ट्रीय चेतना का अंग बनाया?
नहीं।
हमने उसे भी इतिहास के अंधकार में दफना दिया।
मुग़ल काल में मंदिर टूटे, संस्कृत ग्रंथ जले, ब्राह्मणों को मारा गया, और अंग्रेज़ों ने कृत्रिम अकालों के माध्यम से करोड़ों भारतीयों को भूख से मार डाला।
परन्तु हमने कभी उनके अपराधों का प्रतिकार नहीं किया।
हमने कभी नहीं कहा — “अब बहुत हुआ।”

इसीलिए आज भी वे असुरी प्रवृत्तियाँ पुनः सक्रिय हैं।
वे जानती हैं कि हिन्दू क्षमाशील है, लेकिन यह क्षमा अब दुर्बलता बन चुकी है।
जब तक हम अपने शत्रुओं को उनके कर्मों का उचित दंड नहीं देंगे, अधर्म का यह चक्र चलता रहेगा।

समस्या बाहर नहीं, हमारे भीतर है।
हमारे भीतर वह ज्वाला नहीं जो अधर्म को चुनौती दे सके।
हमने अपने ही धर्म को, अपने ही राष्ट्र को, अपने ही आराध्यों को उपेक्षित कर दिया।
हमारे भीतर प्रतिशोध की नहीं, हीनता की ज्वाला है।
हम अपने शत्रु से नहीं, स्वयं से पराजित हैं।

आज समय आ गया है कि हम पुनः अपने धर्म की जड़ों से जुड़ें।
यह युद्ध तलवारों का नहीं, विचारों का है — सत्य और असत्य के मध्य, धर्म और अधर्म के मध्य, सभ्यता और असभ्यता के मध्य।
यह वही सनातन युद्ध है जो युगों से चलता आया है।

प्रत्येक हिन्दू को गिलहरी की भाँति ही सही, अपना योगदान देना होगा।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म, अपने समाज, और अपने राष्ट्र के लिए एक दीप प्रज्वलित करे,
तो यह भूमि पुनः उसी प्रकाश में नहाएगी जो कभी विश्व को आलोकित करता था।

धर्मो रक्षति रक्षितः — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसी की रक्षा करता है।
और यही भारत की आत्मा का अमर संदेश है।

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