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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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🖋️दीपक कुमार द्विवेदी
भारत की वैचारिक भूमि वैदिक सनातन परंपरा से सिंचित रही है। यहाँ शासन का उद्देश्य राज्यसत्ता नहीं, बल्कि लोकसंग्रह — अर्थात् लोककल्याण रहा है। परंतु स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के संविधान और राजनीति में कुछ ऐसे पश्चिमोन्मुख शब्द आरोपित कर दिए गए — जैसे सेकुलरिज्म, समाजवाद, सामाजिक न्याय और समानता — जो भारतीय सभ्यता की आत्मा से असंगत हैं।
ये शब्द पश्चिमी इतिहास की उपज हैं, और इनका प्रयोग भारत में उस ऐतिहासिक संदर्भ के बिना किया गया, जहाँ से ये उत्पन्न हुए थे। परिणामस्वरूप भारत के धर्मप्रधान समाज को वैचारिक रूप से विभाजित कर दिया गया।
धर्म और रिलिजन : दो विपरीत जीवन-दृष्टियाँ
पश्चिमी सभ्यता का “Religion” और भारतीय “Dharma” — दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। यह भ्रम ही भारत के वैचारिक पतन का मूल कारण बना।
‘Religion’ शब्द लैटिन भाषा के Religare से निकला है, जिसका अर्थ है “बाँधना” या “बंधन में जोड़ना” — to bind back। इसका तात्पर्य था — लोगों को एक विशेष ईश्वर, ग्रंथ और पैगंबर के अधीन बाँध देना। इसीलिए Religion का अर्थ पश्चिम में एक संगठित विश्वास प्रणाली (Organized Belief System) माना गया। इसका लक्ष्य ‘मोक्ष’ नहीं, बल्कि अनुशासन और आज्ञाकारिता रहा।
ईसाईयत और इस्लाम — दोनों ‘Religion’ के रूप हैं, जहाँ मत-परिवर्तन (Conversion) और अविश्वासियों के प्रति असहिष्णुता एक स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है।
इसके विपरीत ‘धर्म’ का अर्थ है — “धारणात् धर्म इत्याहुः” — जो इस सृष्टि, समाज और जीवन को धारण करे वही धर्म है। धर्म कोई व्यक्ति-निर्मित मत नहीं, बल्कि सृष्टि-निर्मित सिद्धांत है। धर्म सार्वभौमिक है — जैसे सूर्य का प्रकाश देना, वायु का प्रवाहित होना, जल का शीतल होना — यह सब उनके स्वधर्म हैं।
मनुष्य का भी धर्म उसके स्वभाव, कर्तव्य और उत्तरदायित्व से निर्धारित होता है। इसीलिए भारत में राजधर्म, राष्ट्रधर्म, स्वधर्म जैसी अनेक अवधारणाएँ हैं।
धर्म आचरण का विज्ञान है — यह कहता है “श्रेयः स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्” (गीता 3.35) — अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन करना श्रेष्ठ है, चाहे उसमें त्रुटि हो।
इस दृष्टि से धर्म व्यक्ति को बाँधता नहीं, बल्कि उसे आत्मबोध और उत्तरदायित्व की ओर प्रेरित करता है।
अतः Religion धर्म नहीं है, और इसलिए धर्म का अर्थ Religion नहीं हो सकता। Religion मनुष्य को सीमित करता है; धर्म उसे सार्वभौमिक बनाता है।
सेकुलरिज्म : पश्चिमी इतिहास की उपज, भारतीय समाज पर बोझ
पश्चिम में सेकुलरिज्म शब्द चर्च और राजसत्ता के संघर्ष से उत्पन्न हुआ। यूरोप में सत्रहवीं शताब्दी में Reformation और Renaissance के बाद जब चर्च की शक्ति से समाज का जीवन घुटने लगा, तब राजसत्ता ने धर्म (Church Authority) से स्वयं को पृथक किया।
इस संघर्ष के परिणामस्वरूप सेकुलरिज्म का अर्थ हुआ — “चर्च से स्वतंत्र शासन”।
भारत में कभी ऐसा संघर्ष हुआ ही नहीं। यहाँ राज्य, समाज और धर्म एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक रहे हैं। मनुस्मृति कहती है — “राजा धर्मस्य कारणं न तु धर्मो राजस्यानुगः” — राजा धर्म का पालन करता है, धर्म राजा का नहीं।
अर्थात् धर्म शासन का नियामक है, शासन धर्म का अनुचर।
जब भारत के संविधान में 1976 में (42वें संशोधन द्वारा) “धर्मनिरपेक्ष” शब्द जोड़ा गया, तब यह एक राजनीतिक विचारधारा का आरोपण था, न कि भारतीय परंपरा का विस्तार। परिणामस्वरूप राज्य धर्मविहीन तो हुआ, परंतु धर्मद्रोही बन गया।
राज्य जब धर्म से पृथक हो जाता है, तब शासन की दिशा नैतिकता से नीतिहीनता की ओर मुड़ जाती है।
सेकुलरिज्म के नाम पर बहुसंख्यक हिन्दू समाज से उसके धार्मिक प्रतीक छीने गए, जबकि अल्पसंख्यकों की धार्मिक पहचान को “संविधानिक अधिकार” कहा गया — यह तटस्थता नहीं, पक्षपात है।
भारत का राज्य धर्मसापेक्ष होना चाहिए — अर्थात् ऐसा शासन जो निर्णय लेते समय धर्म के सिद्धांतों — सत्य, न्याय, करुणा और मर्यादा — को आधार बनाए।
समाजवाद : संघर्ष का सिद्धांत, सामंजस्य के समाज पर थोपना
समाजवाद (Socialism) का मूल सिद्धांत कार्ल मार्क्स के वर्ग-संघर्ष (Class Conflict) के सिद्धांत पर आधारित है। यह 19वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप में पूँजीपतियों द्वारा मजदूरों के शोषण की प्रतिक्रिया में उत्पन्न हुआ।
मार्क्स ने कहा — “इतिहास का हर युग वर्ग-संघर्ष की कहानी है।”
इस सिद्धांत ने समाज को दो शत्रु वर्गों में बाँट दिया — शोषक और शोषित।
भारत का समाज इस संघर्ष-आधारित दृष्टि पर कभी नहीं टिका। यहाँ वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म और गुण रहा है, जन्म नहीं। गीता (4.13) कहती है — “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः” — अर्थात् वर्ण का निर्धारण व्यक्ति के कर्म और गुण से होता है, न कि उसकी जाति से।
समाजवाद ने इस वैज्ञानिक व्यवस्था को “Class System” कहकर कलंकित किया। भारत में इस सिद्धांत के राजनीतिक प्रयोग ने परिश्रम, गुणवत्ता और स्वावलंबन का ह्रास कर दिया। 1950 से 1990 तक की नियंत्रित अर्थनीति (License Raj) इसी समाजवादी सोच की देन थी, जिसने भ्रष्टाचार, नौकरशाही और अकर्मण्यता को जन्म दिया।
सामाजिक न्याय और समानता : राजनीतिक छल का औजार
‘सामाजिक न्याय’ का नारा सुनने में जितना आकर्षक है, व्यवहार में उतना ही विध्वंसकारी सिद्ध हुआ। यह नारा सामाजिक एकता का नहीं, विभाजन का माध्यम बना। जातीय जनगणना, आरक्षण की राजनीति और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ जैसे घोषणाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि इस विचारधारा का उद्देश्य समाज में शांति नहीं, संघर्ष पैदा करना था।
भारतीय दृष्टि में न्याय का अर्थ है — प्रत्येक व्यक्ति को उसके गुण, कर्म और योग्यता के अनुसार स्थान देना। समानता का अर्थ सभी को एक जैसा बना देना नहीं, बल्कि सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना है। प्रकृति में भी पूर्ण समानता नहीं, बल्कि संतुलन है — यही सनातन धर्म का सिद्धांत है।
किन्तु आधुनिक राजनीति ने इस सिद्धांत को विकृत कर समानता के नाम पर ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया। इससे हिन्दू समाज का आंतरिक तंतु टूटने लगा, जातीय अस्मिता को राजनीतिक हथियार बनाया गया और समाजिक एकात्मता का आधार कमजोर किया गया।
सृष्टि का संतुलन : सत्त्व, रज और तम का ताना-बाना
भारतीय चिंतन सदा कहता आया है कि सृष्टि तीन गुणों से बनी है — सत्त्व, रज और तम।
इनमें सत्त्व से प्रकाश और शांति आती है, रज से कर्म और उत्साह, और तम से विश्रांति और स्थिरता।
तीनों मिलकर ही यह संसार चलता है। यदि इनमें से कोई एक भी हट जाए या असंतुलित हो जाए, तो व्यवस्था टूट जाती है।
इसी प्रकार जीवन के तीन आयाम माने गए हैं — आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक।
मनुष्य जब केवल भौतिक जगत् तक सीमित हो जाता है, तो भीतर का संतुलन बिगड़ता है;
और जब वह इन तीनों स्तरों पर संतुलन बना लेता है, तभी जीवन में शांति आती है।
धर्म का काम यही है — इन गुणों और आयामों का समन्वय बनाए रखना।
पर आधुनिक पश्चिमी विचारधाराएँ इसी संतुलन को नकार देती हैं।
पश्चिमी विचारधाराएँ : संघर्ष की जड़ें
सेकुलरिज्म, समाजवाद और सामाजिक न्याय — ये सब सुनने में आकर्षक शब्द हैं, पर इनकी आत्मा संघर्ष में बसती है।
सेकुलरिज्म कहता है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा,
समाजवाद कहता है कि समाज दो वर्गों में बँटा है — एक शोषक और दूसरा शोषित,
और सामाजिक न्याय कहता है कि हर बात की माप केवल संख्या और हिस्सेदारी से होगी।
इन विचारों में सहयोग नहीं, विरोध है; संतुलन नहीं, बराबरी के नाम पर खींचतान है।
ये मनुष्य को केवल भौतिक स्तर तक सीमित कर देते हैं —
जहाँ आत्मा नहीं होती, केवल हित और अहित के गणित रह जाते हैं।
यही विचार आगे चलकर समाजों में वर्ग संघर्ष, जातीय विभाजन, और राजनीतिक विद्वेष का कारण बनते हैं।
पश्चिम में जो संघर्ष पूँजी और श्रम के बीच चला,
वही आज भारत में जाति और आरक्षण के रूप में दोहराया जा रहा है।
धर्म का दृष्टिकोण : विविधता में समरसता
धर्म कहता है — सृष्टि में कोई भी अनुपयोगी नहीं है।
हर मनुष्य, हर प्रवृत्ति, हर गुण — सृष्टि की किसी न किसी भूमिका में आवश्यक है।
जिस प्रकार एक शरीर में सिर, हाथ, पैर सबका अपना कार्य है,
उसी प्रकार समाज में भी प्रत्येक का अपना धर्म है।
धर्म संघर्ष नहीं सिखाता, बल्कि कर्तव्य सिखाता है।
वह कहता है — अपना धर्म करो, दूसरे के धर्म में मत उलझो।
क्योंकि जब सब अपने-अपने धर्म में स्थिर रहते हैं, तो समाज स्वाभाविक रूप से समरस बनता है।
पर सेकुलरिज्म इस संतुलन को तोड़ता है।
वह कहता है — शासन का धर्म से कोई संबंध नहीं होना चाहिए।
पर जब शासन धर्म से मुक्त हो जाता है, तो वह उत्तरदायित्व से भी मुक्त हो जाता है।
समाजवाद कहता है — समानता बाँटो; धर्म कहता है — समानता अपने कर्म से कमाओ।
सामाजिक न्याय कहता है — अधिकार पहले; धर्म कहता है — कर्तव्य पहले।
वर्ग-संघर्ष : अधर्म का आधुनिक रूप
इतिहास में देखिए —
जहाँ भी वर्ग संघर्ष हुआ, वहाँ रक्तपात हुआ।
फ्रांसीसी क्रांति में ‘समानता’ के नाम पर हत्याएँ हुईं,
रूसी क्रांति में ‘समाजवाद’ के नाम पर लाखों मारे गए,
और आज लोकतंत्र के नाम पर समाज ‘आरक्षण’ और ‘पहचान’ के संघर्ष में उलझ गया है।
इन सबका मूल एक ही है — धर्म से विच्छेद।
जब मनुष्य धर्म से दूर होता है, तो उसकी दृष्टि भौतिक हो जाती है।
वह सबमें शत्रु खोजता है, प्रतिस्पर्धा देखता है, और अंततः स्वयं भी असंतुलित हो जाता है।
धर्म : सृष्टि का संतुलन बिंदु
धर्म कोई बाहरी बंधन नहीं है, यह तो भीतर की व्यवस्था है।
जैसे शरीर में साँस का आना-जाना स्वाभाविक है, वैसे ही धर्म जीवन का प्राण है।
धर्म को हटाकर जो भी विचार पनपे — वे असंतुलन के प्रतीक बने।
सेकुलरिज्म ने समाज से आत्मा निकाल दी,
समाजवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँट दिया,
और सामाजिक न्याय ने लोगों के बीच ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा भर दी।
जबकि धर्म कहता है — सहयोग ही विकास का मार्ग है, संघर्ष नहीं।
विविधता विरोध नहीं है, बल्कि एकता का गान है।
सृष्टि में जो भिन्न है, वही सुंदर है — और यही धर्म का सार है।
धर्मविहीन नहीं, धर्मसापेक्ष भारत ही समाधान है
भारत की सभ्यता धर्म पर आधारित है, न कि Religion पर। धर्म यहाँ पूजा नहीं, नीति है; आस्था नहीं, उत्तरदायित्व है; और विश्वास नहीं, व्यवहार है।
भारत का राज्य तभी नैतिक और उत्तरदायी रह सकता है जब वह धर्म के सिद्धांतों पर आधारित हो।
धर्मविहीन राज्य केवल सत्ता का यंत्र होता है; धर्मसापेक्ष राज्य राष्ट्र का संस्कार बनता है।
भारत का पुनर्जागरण तभी संभव है जब हम पश्चिम के आरोपित शब्दों — सेकुलरिज्म, समाजवाद, सामाजिक न्याय और समानता — से ऊपर उठकर अपने धर्माधारित जीवन-दर्शन को पुनः प्रतिष्ठित करें।
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