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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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🖋️दीपक कुमार द्विवेदी
हिन्दू वह नहीं जो केवल किसी भूभाग में जन्मा हो, बल्कि वह है जो अपने जीवन में धर्म के मार्ग का अनुसरण करता है।
धर्म कोई संकीर्ण आस्था या पंथ नहीं, बल्कि वह शाश्वत नियम है जो मनुष्य को सत्य, अहिंसा, दया, संयम, शुचिता और न्याय के पथ पर चलना सिखाता है।
जो व्यक्ति इन मूल सिद्धान्तों से विमुख होकर अधर्म, असत्य या हिंसा का मार्ग अपनाता है, वह चाहे रक्त-संबंधी ही क्यों न हो, हिन्दू कहलाने का अधिकारी नहीं।
परंतु यदि वही व्यक्ति अपने कुकर्मों का प्रायश्चित कर धर्म की ओर लौटना चाहता है, तो उसे स्वीकार करना ही हिन्दू का धर्म है।
सनातन परंपरा दमन नहीं, बल्कि आत्मोद्धार और पुनर्जागरण की प्रेरणा देती है।
हिन्दू की पहचान भूगोल या जाति से नहीं, उसके आचरण और दृष्टिकोण से होती है।
संस्कृति का आधार धर्म है; जब धर्म क्षीण होता है, तब संस्कृति भी अपना तेज खो देती है।
प्राचीन भारत के ऋषियों ने “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” — सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ — का उद्घोष किया था।
यह साम्राज्यवाद का नहीं, बल्कि मानवता के संस्कार और सभ्यता के प्रसार का आह्वान था।
आर्यत्व का अर्थ वंश या जाति नहीं, बल्कि आचरण की श्रेष्ठता और सत्य के प्रति निष्ठा है।
सूर्यवंश और चंद्रवंश के महान राजाओं ने इसी आर्य परंपरा को युगों तक आगे बढ़ाया।
सूर्यवंश में इक्ष्वाकु, हरिश्चंद्र, रघु, दशरथ और श्रीराम जैसे नरेशों ने धर्मराज्य की प्रतिष्ठा की।
चंद्रवंश में ययाति, यदु, कुरु, युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण जैसे राजा धर्म, नीति और सत्य के प्रतीक बने।
युधिष्ठिर को “धर्मराज” कहा गया क्योंकि उन्होंने सत्ता से अधिक सत्य और न्याय को महत्व दिया।
उनके निर्णयों ने यह प्रमाणित किया कि धर्म ही राज्य और समाज का आधार होना चाहिए।
महाभारत काल के पश्चात जब भारत अनेक जनपदों में विभाजित हुआ, तब भी आर्य परंपरा की ज्योति बुझी नहीं।
गुप्तकाल में सम्राट समुद्रगुप्त ने धर्म, कला और संस्कृति के पुनरुत्थान से भारत को पुनः एकता के सूत्र में बाँधा।
बाद में सम्राट विक्रमादित्य ने उसी धारा को आगे बढ़ाया; उनके काल में भारत केवल समृद्ध ही नहीं, बल्कि विश्व का सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र बन गया।
किन्तु उसके बाद सतत विदेशी आक्रमणों — विशेषतः इस्लामी और अंग्रेज़ी शासन — ने इस प्रवाह को गंभीर आघात पहुँचाया।
वह वैदिक परंपरा, जो सम्पूर्ण मानवता को सभ्यता, आत्मसंयम और धर्म के मार्ग पर लाने के लिए अग्रसर थी, बाधित हो गई।
अब आवश्यकता है कि उसी अधूरे कार्य को पुनः आरंभ किया जाए — बिना किसी वैमनस्य के, धर्म और संस्कृति के प्रकाश से विश्व को पुनः आलोकित करने के लिए।
हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति या आस्था तक सीमित नहीं है। यह एक जीवन-दृष्टि, नैतिक संस्कार और धर्म-नीति का संपूर्ण संहिता है। हमारे प्राचीन आख्यान और शास्त्र यह स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अधर्म की ओर बढ़ता है और सुधरने से इंकार करता है, तो उसे उसके कर्मों के अनुसार दंडित करना भी आवश्यक है। यही कारण है कि हमारे देवी-देवताओं—राम, कृष्ण, शिव, जगदम्बा—को अक्सर इस रूप में दर्शाया गया है कि एक हाथ में शास्त्र (ज्ञान और उपदेश) और एक हाथ में शस्त्र (कर्म और दंड) होता है। यह हमें बताता है कि धर्म की रक्षा केवल करुणा और ज्ञान से नहीं, बल्कि न्याय और कर्तव्य से भी होती है।
आजकल हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष करते हैं और इसे हर परिस्थिति में अपनाना चाहते हैं। लेकिन यह केवल तब ही सार्थक है जब सामने वाला व्यक्ति भी धर्म के मार्ग पर चलने की इच्छा रखता हो। जो हमारी सभ्यता, संस्कृति और धर्म को नष्ट करने का प्रयास कर रहा है, उसके साथ केवल समानुभूति रखना धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इसी कारण प्राचीन काल में ‘कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्’ का उद्घोष दिया गया—जो धर्म के मार्ग पर चलना चाहता है उसे सहजता से मार्ग पर लाया जाए; जो नहीं सुधरता, उसके कृत्यों का दंड दिया जाए।
इतिहास इस दृष्टि से कई उदाहरण प्रस्तुत करता है। पृथ्वीराज चौहान ने एक अत्याचारी और अमानवीय व्यक्ति को 17 बार क्षमा किया। हर बार उन्हें विश्वास था कि वह सुधर जाएगा। लेकिन जब उसे 18वां अवसर मिला, तो उसने पृथ्वीराज चौहान के परिवार और राज्य के साथ अमानवीयता की सारी सीमाएँ पार कर दी। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि अत्यधिक दया भी तब विफल हो सकती है जब सामने वाला पूरी तरह अधर्मी हो।
अतः अमानवीय, दैत्य या असुर प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के कृत्यों के प्रति कठोर होना केवल आवश्यक नहीं, बल्कि धर्म का अनिवार्य दायित्व है। वहीं, यदि कोई—जन्म से हिंदू हो या अन्य—अधर्म छोड़कर धर्म का मार्ग अपनाना चाहता है, तो उसे प्रह्लाद, बलि या विभीषण की तरह सहज और सम्मानपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। यही संतुलन हिंदू धर्म की विशिष्टता है: दया और न्याय का सही मिश्रण।
हमारे शास्त्र स्पष्ट रूप से यह बताते हैं कि धर्म और सभ्यता की रक्षा केवल करुणा और ज्ञान से नहीं, बल्कि शक्ति और दंड से भी होती है। यदि कोई व्यक्ति, संगठन या विचारधारा—चाहे वह इस्लाम, क्रिश्चियनिटी या वामपंथ से प्रेरित क्यों न हो—हमारी सभ्यता, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र को नष्ट करने का प्रयास करता है, तो उसके लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष लागू नहीं होता। यह उद्घोष केवल उन लोगों के लिए है जो धर्म मार्ग अपनाना चाहते हैं, सुधार की संभावना रखते हैं।
शास्त्र हमें यह स्पष्ट निर्देश देते हैं कि ऐसे अधर्मी, दुष्ट और दुर्जन व्यक्तियों को दंडित करना हिंदू का धर्म है। बिना शस्त्र और शक्ति के, धर्म, राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा संभव नहीं है। यही कारण है कि हमारे देवी-देवताओं को अक्सर एक हाथ में शास्त्र और दूसरे हाथ में शस्त्र लिए दर्शाया गया है। धर्म और मानवता की रक्षा के लिए आवश्यकतानुसार कठोरता का विधान हमारे शास्त्रों में विस्तार से लिखा गया है।
अधर्मियों और दुर्जनों को दंडित करना, सज्जन शक्ति की रक्षा करना—यह हिंदू का परम कर्तव्य है। यदि सज्जनों की शक्ति बढ़ती है, तो धर्म भी बढ़ेगा; यदि दुर्जनों की शक्ति बढ़ती है, तो अधर्म और अन्याय का प्रसार होगा। इसलिए धर्म की रक्षा हेतु सज्जनों की संख्या और सामर्थ्य बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। यही संतुलन हमारी सभ्यता और मानवता के संरक्षण का मूल आधार है।
इतिहास और शास्त्र इस दृष्टि से सुस्पष्ट हैं। हमारे भगवान भी धर्म और मानवता की रक्षा के लिए समय-समय पर अवतार लेते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।
साधुजनों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए, मैं हर युग में प्रकट होता हूँ ।
यही संदेश प्रत्येक हिंदू के लिए स्पष्ट करता है कि धर्म रक्षा उसका सर्वोच्च कर्तव्य है।
इसलिए, चाहे भारत में हो या विश्व के किसी कोने में, यदि कोई धर्म मार्ग पर चल रहा हिंदू या सज्जन शक्ति धर्म की रक्षा करता है, तो हर हिंदू का धर्म है कि वह उसकी रक्षा करे। धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए सज्जन शक्ति को बढ़ाना, अधर्म और दुर्जनों के प्रभाव को रोकना—यही हिंदू का परम धर्म और कर्तव्य है।
जो मत या विचारधाराएँ हिंसा, अधर्म और संकीर्णता पर आधारित हैं — जो “मानो या मरो” जैसे सिद्धांतों से मानवता को बाँधना चाहते हैं — उनके साथ वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी भावना निभाना असंभव है।
यह सूत्र उन लोगों के लिए है जो धर्म, सत्य और करुणा का मार्ग अपनाते हैं, न कि उनके लिए जो अधर्म को धर्म पर आरोपित कर मानवता को नष्ट करना चाहते हैं।
‘विश्वकल्याण’ का उद्घोष भी उन्हीं के लिए है जो धर्म की शरण में हैं।
हमारे शास्त्रों ने दैत्य और असुर प्रवृत्तियों के प्रति अंधी सहिष्णुता नहीं, बल्कि सजगता और आत्मरक्षा का उपदेश दिया है।
हिन्दू होना केवल जन्म नहीं, एक साधना है।
यह उस अनंत यात्रा का नाम है जिसमें मनुष्य अपने भीतर के ईश्वर को पहचानता है और जगत में धर्म की प्रतिष्ठा करता है।
जो अपने भीतर के ‘नर’ को साधकर ‘नारायण’ बनने की ओर बढ़ता है, वही हिन्दू कहलाने योग्य है।
भारत का भविष्य उसी धर्म-आधारित चेतना से सुरक्षित होगा —
क्योंकि जब तक भारत धर्म पर टिका रहेगा, तब तक संसार में शांति बनी रहेगी।
हिन्दू कोई जाति नहीं, एक जीवन-पथ है —
जिसमें करुणा है, पराक्रम है, और आत्मा में ईश्वर का अनुभव है।”
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