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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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हमारे नेतृत्व और हमारे विचारकों ने लगभग 100 वर्ष पूर्व यह कल्पना की थी कि हमें ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जो हिंदू समाज के सभी मत, पंथ, दर्शन, परंपराओं और विचारधाराओं का पालन करने वाले व्यक्तियों को एक साझा मंच के अंतर्गत जोड़ सके। इस मंच का उद्देश्य केवल संवाद और विचार-विमर्श नहीं था, बल्कि सनातन धर्म के उत्थान और राष्ट्र के सशक्त निर्माण के लिए इस आधार पर हिंदुत्व का विचार भी प्रतिपादित किया गया था।
लेकिन आज, शताब्दी के बाद, सामाजिक और रणनीतिक दृष्टि से स्थिति 100 वर्ष पूर्व से भी अधिक चुनौतीपूर्ण है। न तो हिंदू समाज के पास पर्याप्त स्ट्रीट पावर है और न ही पारिवारिक संरचना में वह नैतिक बल बचा है। भौतिकतावाद, सेकुलरिज्म और समाजवाद ने इसके मूल तत्वों को कमजोर कर दिया है। राजनीतिक संदर्भ में एकता दिखाई देती है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर कार्य करना आवश्यक था। आज भाषा, जाति और प्रांत के नाम पर संघर्ष जारी हैं। आज भी एक ही मत के लोग एक नहीं हो पा रहे हैं।
इसका मुख्य कारण यह है कि हम हिंदू परिभाषा को भौगोलिक सीमा या क्षेत्रीय आधार पर मानते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इस संसार में सृष्टि के नियमों का पालन करने वाला, धर्म के दस लक्षणों को मानने वाला ही हिंदू है। अहिंसक, धर्म का पालन करने वाला, और कॉस्मिक ऑर्डर अर्थात् ऋत का पालन करने वाला व्यक्ति ही हिंदू है।
धर्म का अर्थ है “धारण करना।” जो धर्म को धारण नहीं करता, वह हिंदू नहीं है। धर्म का अर्थ कर्तव्य से भी है। जो अपने कर्तव्यों और दायित्वों को नहीं समझता, जो धर्म के नियमों और सृष्टि के नियमों का पालन नहीं करता, वह हिंदू नहीं हो सकता। केवल भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू नहीं है। जो व्यक्ति हिंदू धर्म के नियमों को मानता है और अपने कर्तव्यनिष्ठ होकर उनका पालन करता है, वही वास्तविक रूप से हिंदू है, चाहे वह इस दुनिया में कहीं भी रहता हो।
भौगोलिक या क्षेत्रीय आधार पर हिंदू को परिभाषित करने का प्रयास विकृति उत्पन्न करता है। इसलिए हिंदू पहचान धर्म पर आधारित होनी चाहिए। संस्कृति धर्म का भाग हो सकती है, लेकिन संस्कृति स्वयं धर्म नहीं है। जैसे ही धर्म समाप्त हो जाएगा, संस्कृति और समाज का आधार भी कमजोर पड़ जाएगा।
उदाहरण स्वरूप, बंगाल में बंगाली भाषी हिंदू और बंगाली मुस्लिम दोनों के विचार और क्रियाकलापों में अंतर है, लेकिन संस्कृति एक ही है। इसका कारण यह है कि बंगाली हिंदू धर्म का पालन करता है, जबकि बंगाली मुस्लिम अधर्म का पालन करता है। अतः धर्म और संस्कृति को आधार मानकर हिंदू को परिभाषित करना गलत है।
हिंदू वही है जो धर्म को माने। यदि हम इस आधार पर हिंदू को परिभाषित नहीं करेंगे, तो यह समस्या भविष्य में और अधिक विकराल रूप लेगी, 1947 के बाद की स्थिति से भी अधिक भयावह होगी। इसलिए अब समय आ गया है कि हिंदू को धर्म के आधार पर पुनः परिभाषित किया जाए।
इस कमी का कारण स्पष्ट है। आज अनेक लोग राष्ट्र और सनातन धर्म को पश्चिमी दृष्टिकोण—राइट, लेफ्ट, समाजवाद, पूंजीवाद, सेकुलरिज्म, नेशनलिज्म जैसी अवधारणाओं के आधार पर परखते हैं। ये विचारधाराएँ प्रायः रोमन चर्च या उसके विरोधी समूहों के निर्माण से उत्पन्न हुई हैं। इनमें सनातन धर्म की समावेशी भावना, सह-अस्तित्व की दृष्टि और जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों का कोई स्थान नहीं है। परिणामस्वरूप समाज में वर्ग संघर्ष, वैचारिक असंतुलन और भ्रम उत्पन्न होता है।
हिंदू: सनातन धर्म और वास्तविक पहचान
आज के समय में हिंदू की परिभाषा प्रायः भौगोलिक सीमाओं या जन्मस्थान के आधार पर की जाती है। यह दृष्टिकोण पश्चिम के राजनीतिक और सामाजिक सिद्धांतों—जैसे राष्ट्रवाद, सेकुलरिज्म और जातीय-राजनीतिक पहचान—से प्रेरित है, और अतः यह ग़लत और अपूर्ण है। वास्तव में, हिंदू होने का अर्थ केवल जन्म या क्षेत्र से निर्धारित नहीं किया जा सकता।
सत्य यह है कि हिंदू होना एक आध्यात्मिक और कर्मशील पहचान है। हिंदू वह है जो नर से नारायण बनने का प्रयास करता है—अर्थात अपने व्यक्तित्व और कर्मों में ईश्वरत्व, सृष्टि के शाश्वत नियमों और धर्म के सिद्धांतों को आत्मसात करता है। यही वह आधार है जिस पर हिंदू की वास्तविक पहचान स्थिर होती है।
इस दृष्टिकोण से ही हिंदू परिभाषा की शुरुआत करनी चाहिए। जब हम हिंदू को केवल जन्म, जाति या भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं करेंगे, बल्कि धर्म, कर्म और आध्यात्मिक जीवनदर्शन को आधार मानेंगे, तभी हम हिंदू पहचान को स्पष्ट और स्थायी रूप से परिभाषित कर पाएंगे।
इस संदर्भ में हमें यह स्पष्ट करना होगा कि हिंदू की परिभाषा केवल जन्म, जाति या भौगोलिक सीमा का विषय नहीं है। हिंदू वह है जो सनातन धर्म के सिद्धांतों, दर्शन, परंपरा और जीवन पद्धति का पालन करता है। यह परिभाषा किसी एक पंथ या संप्रदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैदिक ज्ञान, उपनिषद, भगवद्गीता, महाभारत, ब्राह्मण और श्रमण परंपरा, योग, न्याय, मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक, वेदांत और नास्तिक मत—बौद्ध, जैन और सिख—सभी शामिल हैं। यह धर्म मानवता और सृष्टि के संतुलन का मार्ग दिखाता है।
सनातन धर्म जीवन को चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—के अनुसार संचालित करने का मार्ग बताता है। धर्म का अर्थ है नैतिकता, कर्तव्य और सृष्टि के नियमों का पालन। अर्थ वह है जो जीवन यापन और सामाजिक जिम्मेदारी को संतुलित करता है। काम इच्छाओं और आनंद का मार्ग है, परंतु यह भी धर्म और समाज के नियमों के अनुरूप होना चाहिए। मोक्ष का उद्देश्य केवल आत्मा की मुक्ति ही नहीं, बल्कि जीवन को सृष्टि के शाश्वत नियमों के अनुरूप जीने की दिशा भी देता है। यही चार पुरुषार्थ मानव जीवन की समग्रता सुनिश्चित करते हैं।
सनातन धर्म में धर्म के दस लक्षण—सत्यनिष्ठा, अहिंसा, दान, ब्रह्मचर्य, संयम, श्रद्धा, तप, योग, नियम और कर्मफल में आसक्ति का त्याग—व्यक्ति को धर्म के अनुरूप जीवन जीने की दिशा दिखाते हैं। उपनिषदों में कहा गया है—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म"—संपूर्ण सृष्टि ब्रह्म है। जो व्यक्ति इसे समझता है और अपने कर्मों में आत्मसात करता है, वही धर्म का सच्चा अनुयायी है।
सृष्टि का संचालन त्रिगुण—सत्त्व, रज और तम के आधार पर होता है। सत्त्व गुण ज्ञान, शांति और धर्म की ओर ले जाता है, रज गुण कर्म और इच्छाओं की ओर प्रेरित करता है, और तम गुण अज्ञान और अधर्म की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है। हिंदू वही है जो सत्त्व और रज गुण के माध्यम से अपने जीवन और समाज में धर्म और संतुलन बनाए रखता है।
सनातन धर्म में वर्ण और आश्रम की व्यवस्था व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक चरण में मार्गदर्शन देती है। चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—और चार आश्रम—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करते हैं। यह केवल सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि जीवन और कर्म के संतुलन का मार्गदर्शन है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
हिंदू वही है जो धर्मानुसार कर्म करता है, फल की आसक्ति नहीं रखता। वहीं यह भी कहा गया है—
"धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः।"
धर्म की रक्षा करने वाला ही समाज और व्यक्ति दोनों के लिए स्थिरता और सुरक्षा का आधार बनता है।
ब्राह्मण और श्रमण परंपरा ज्ञान, तप और अनुशासन का मार्ग दिखाती है। योग, न्याय और मीमांसा व्यक्ति को आत्मा, कर्म और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। बौद्ध, जैन और सिख मत भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा हैं, क्योंकि ये सभी कर्म, नीति और मोक्ष के मार्ग को समझाते हैं।
अब प्रश्न उठता है—हिंदू कौन है?
हिंदू कोई जाति, जन्म या भौगोलिक सीमा से नहीं बनता। हिंदू वह है जो सनातन धर्म के सिद्धांतों और परंपराओं का पालन करता है। हिंदू वही है जो अपने कर्मों में धर्म का अनुसरण करता है, सृष्टि के शाश्वत नियमों—ऋत—का सम्मान करता है, और अपने जीवन को त्रिगुणात्मक सृष्टि के संतुलन के अनुरूप संचालित करता है।
हिंदू वही है जो वर्णाश्रम व्यवस्था के आदर्शों का पालन करता है। जीवन के प्रत्येक चरण में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के नियमों को समझकर कर्म करता है। सामाजिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संतुलन बनाए रखता है।
हिंदू धर्म में समाहित सभी मत और संप्रदाय—ब्राह्मण परंपरा, श्रमण साधु, योग, न्याय, मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक, वेदांत, बौद्ध, जैन और सिख—के अनुयायी भी हिंदू हैं यदि वे धर्म के सिद्धांतों का पालन करते हैं।
जो व्यक्ति धर्म के नियमों का पालन नहीं करता, प्रकृति और ऋत का सम्मान नहीं करता, या सृष्टि में असंतुलन फैलाता है—वह हिंदू नहीं है। आब्राहमिक मत—इस्लाम, ईसाई धर्म—और जो अधर्म में लिप्त हैं, हिंदू नहीं माने जा सकते।
इस दृष्टि से हिंदू होना एक सक्रिय जीवनदर्शन और कर्मशील पहचान है। यह केवल शब्द या पहचान नहीं, बल्कि धर्म के सिद्धांतों का पालन, नैतिकता का अनुसरण, समाज और सृष्टि में संतुलन बनाए रखना और मोक्ष की ओर अग्रसर होना है।
हिंदू वही है जो—
धर्म के नियमों का पालन करता है और अधर्म से दूर रहता है।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों के अनुसार जीवन जीता है।
त्रिगुणात्मक सृष्टि और वर्णाश्रम व्यवस्था का सम्मान करता है।
अपने कर्मों और जीवनशैली में सृष्टि और समाज के संतुलन का ध्यान रखता है।
सनातन धर्म की समग्र परंपरा और दर्शन का अनुयायी है।
हिंदू होने का अर्थ केवल पहचान नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शन अपनाना और उसे अपने कर्मों में जीवित करना है। यही आधार है कि सनातन धर्म स्थिर रहे, समाज और संस्कृति सुरक्षित रहें, और व्यक्ति अपने जीवन में धर्म, नैतिकता और मोक्ष के मार्ग पर दृढ़ता से अग्रसर हो।
हिंदू की परिभाषा केवल भौगोलिक सीमाओं या जाति-समूह के आधार पर करना उचित नहीं है। हिंदू वह है जो सनातन धर्म रूपी जीवंत धारा का अनुयायी है, जो सृष्टि के शाश्वत नियमों को मानता है। जब तक धर्म और अधर्म के बीच स्पष्ट रेखा खींची नहीं जाएगी, तब तक समाज भ्रमित रहेगा।
इसलिए हमें धार्मिक आधार पर हिंदू पहचान तय करनी चाहिए, न कि भौगोलिक और जातिगत आधार पर। यही कृण्वन्तो विश्वमार्यम् के आदर्श को साकार कर सकता है। धर्म के मार्ग पर चलकर ही हिंदू को परिभाषित किया जा सकता है। किसी व्यक्ति का स्थान, देश या भौगोलिक सीमा इससे निर्धारित नहीं होती। जो व्यक्ति सनातन धर्म के सिद्धांतों और दर्शन परंपरा का पालन करता है, चाहे वह कहीं भी रहता हो, वही हिंदू है।
हर सनाती हिंदू का पहला और अंतिम लक्ष्य धर्म की स्थापना और उसकी रक्षा होनी चाहिए। धर्म की रक्षा से ही धर्म हमारी रक्षा करेगा। अखंड भारत का संकल्प धर्म की स्थापना पर आधार स्तंभ है, और इसका अंतिम लक्ष्य है कि पूरी दुनिया धर्मध्वजा के नीचे एकीकृत हो। इसी हेतु हर हिंदू को अपने जीवन और कर्मों को समर्पित करना चाहिए। इसके कार्य को करने के लिए आवश्यक हो तो साम, दाम, दण्ड, भेद के माध्यमों का प्रयोग भी करना चाहिए।
धर्म की स्थापना के लिए भगवान स्वयं अवतार लेते हैं और धर्म के नियमों का पालन करके लोगों को धर्म की ओर प्रेरित करते हैं। यही कारण है कि धर्म ईश्वर से भी श्रेष्ठ है। धर्म के आधार पर ही हिंदू को परिभाषित किया जा सकता है।
जो व्यक्ति धर्म के नियमों का पालन करता है, वही हिंदू है। जो नहीं करता, चाहे वह भौगोलिक दृष्टि से कहीं भी स्थित हो, वह हिंदू नहीं है। धर्म का पालन ही हिंदू एकता का आधार है। जब तक धर्म और अधर्म के बीच स्पष्ट रेखा नहीं खींची जाएगी, तब तक परिवर्तन संभव नहीं।
सारतः, हिंदू होना धर्म के सिद्धांतों और दर्शन परंपरा का पालन करने में है, न कि भौगोलिक सीमा या जाति में। यही स्थायी हिंदू एकता का आधार है। धर्म की स्थापना और रक्षा ही हिंदू का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।
🖋️दीपक कुमार द्विवेदी
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