सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

शोषण का दोषारोपण या समाज का आत्ममंथन जरूरी ?


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#सामाजिक #सामाजिक_समरसता 

भारत का इतिहास केवल विजेताओं और पराजितों की कथा नहीं, बल्कि विचार, व्यवस्था और समाज के निरंतर परिवर्तन की जीवित गाथा है। यहाँ धनानंद से लेकर मौर्य और गुप्त वंश तक अनेक शासक व समाज रहे, जिनका ध्येय और व्यवहार अपने-अपने समय में वर्चस्व का ही प्रतीक रहा। इतिहास में किसी युग का शासन कभी पूर्ण न्याय का दर्पण नहीं रहा, न ही कोई वर्ग सदा निष्पाप कहा जा सकता है।

फिर भी जब आज के विमर्शों में सामाजिक शोषण की बात आती है, तो दोष प्रायः केवल सवर्ण समाज पर केंद्रित कर दिया जाता है। यह एकांगी दृष्टि इतिहास की जटिल परतों को सरल कर देती है और समाज के सामूहिक उत्तरदायित्व को धुंधला बना देती हहै। 

भारत का इतिहास सत्ता, समाज और विचार के बदलते स्वरूपों का जीवंत साक्षी रहा है। आठ सौ वर्ष का इस्लामी शासन, दो सौ वर्ष का औपनिवेशिक शासन और सात दशक का संवैधानिक लोकतंत्र — इन सबके बाद भी जब सामाजिक शोषण की चर्चा होती है, तो दोष प्रायः केवल सवर्ण समाज पर केंद्रित कर दिया जाता है। यह दृष्टिकोण न केवल इतिहास की जटिल परतों को अनदेखा करता है, बल्कि समाज के सामूहिक उत्तरदायित्व से भी हमें दूर ले जाता है।

वास्तव में भारत का सामाजिक ढांचा केवल जाति पर आधारित नहीं रहा, बल्कि सत्ता, धर्म और अर्थनीति ने भी असमानता को आकार दिया। मध्यकालीन शासन में धार्मिक पहचान शोषण का आधार बनी, जबकि औपनिवेशिक शासन ने जाति को “Divide and Rule” की नीति का उपकरण बना दिया। ब्रिटिश जनगणनाओं और मिशनरी विमर्शों ने समाज को स्थायी रूप से “ब्राह्मण बनाम दलित” की रेखा में बाँट दिया। स्वतंत्रता के बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से समानता और न्याय का सपना साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाए, परंतु राजनीतिक वर्ग ने इस विचार को सामाजिक सुधार की बजाय वोट-बैंक की रणनीति बना दिया।
सवाल यह नहीं कि भेदभाव हुआ या नहीं — हुआ और गहरा हुआ। सवाल यह है कि क्या आज भी हम उसी दृष्टिकोण में बंधे रहना चाहते हैं, जहाँ हर असमानता का कारण केवल एक समुदाय को ठहराया जाए? सात दशकों के संवैधानिक शासन के बाद यदि हम केवल दोषारोपण में उलझे रहेंगे, तो सुधार की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। सुधार संवाद से आता है, टकराव से नहीं।

भारत के इतिहास में हर जाति, वर्ग और समुदाय ने राष्ट्र-निर्माण में अपनी भूमिका निभाई है। किसी काल में एक वर्ग प्रभावशाली था, तो दूसरे काल में किसी अन्य ने समाज को दिशा दी। आज आवश्यकता है कि हम इस सामूहिक उत्तरदायित्व को स्वीकार करें। समानता कानून से नहीं, चेतना से आती है।

अब समय है कि हम दोषारोपण की मानसिकता से ऊपर उठकर संवाद और सह-अस्तित्व की राह चुनें। सामाजिक न्याय का अर्थ किसी वर्ग को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि हर वर्ग को सहभागी बनाना है। जब हम सब मिलकर आत्ममंथन करेंगे, तभी भारत “दोष संस्कृति” से निकलकर “न्याय संस्कृति” की ओर बढ़े भविष्य तब ही उज्ज्वल होगा जब हम यह स्वीकार करेंगे कि शोषण की जड़ें किसी एक वर्ग में नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चूकों में हैं— और समाधान भी सामूहिक चेतना में ही निहित है। इतिहास में वर्चस्व अनेक रूपों में रहा है, पर भविष्य उसी का होगा जो आत्ममंथन कर न्याय, संवाद और सह-अस्तित्व की दिशा में नए सामाजिक अनुबंध को गढ़ सके।

भारत के इतिहास में सत्ता, धर्म, जाति, और कानून लगातार बदले, परंतु “शोषण का नैरेटिव” आज भी एक ही वर्ग पर केंद्रित क्यों रह गया है?
यह प्रश्न न केवल सामाजिक न्याय की बहस को चुनौती देता है, बल्कि यह भी पूछता है कि क्या हम “इतिहास की बहुस्तरीय सच्चाइयों” को देखने की क्षमता खो चुके हैं?

💥 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य- सत्ता किसके हाथों में थी?
भारत के पिछले 1000 वर्षों में तीन बड़े शासन- चक्र रहे-
• मध्यकालीन इस्लामी शासन (लगभग 800 वर्ष)
• ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन (लगभग 200 वर्ष)
• संवैधानिक लोकतंत्र (1947 के बाद 70+ वर्ष)
इन तीनों कालों में शोषण का ढाँचा सत्ता की प्रकृति से तय होता रहा, न कि केवल जातिगत संरचना से।
• इस्लामी शासन में ज़बरन धर्मांतरण, जज़िया, मंदिर-विध्वंस, और जाति से ऊपर “धार्मिक उत्पीड़न” प्रमुख था।
• ब्रिटिश शासन ने “Divide and Rule” की नीति से जाति को प्रशासनिक और जनगणना का औजार बना दिया — Herbert Risley (1901 Census) ने जाति को “Race-based hierarchy” के रूप में पुनर्परिभाषित किया।
• स्वतंत्रता के बाद बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समानता, आरक्षण, और संवैधानिक अधिकारों के माध्यम से एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की नींव रखी।
फिर प्रश्न यह उठता है। यदि शासन की प्रकृति बार-बार बदली, तो शोषण का एकल जिम्मेदार आज भी केवल “सवर्ण समाज मात्र" क्यों बताया जाता है? अथवा भारत में यह एकमात्र दोषारोपण का विमर्श और परिदृश्य कौन स्थापित कर गया?

💥 नैरेटिव की जड़ें- औपनिवेशिक और मिशनरी प्रभाव
ब्रिटिश शासन ने सामाजिक विभाजन को साम्राज्य की स्थिरता का माध्यम बनाया।
• J.H. Hutton और Census 1931 जैसे औपनिवेशिक दस्तावेज़ों में यह विचार बार-बार दोहराया गया कि “भारतीय समाज का मुख्य दोष उसकी जाति-व्यवस्था है।”
• मिशनरी शिक्षण संस्थानों और बाद में पश्चिमी मार्क्सवादी विचारधारा ने “ब्राह्मणवाद बनाम दलितवाद” का द्वंद्व स्थापित किया, जो स्वतंत्र भारत में भी “सांस्कृतिक विमर्श” के रूप में जारी रहा।
यह नैरेटिव बाद में भारतीय राजनीति, मीडिया, और शिक्षा में “सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक दोषारोपण” की रेखा में बदल गया।

💥संविधान और वास्तविकता- समानता का वादा, आचरण में कमी
संविधान ने समानता का अधिकार, आरक्षण, और सुरक्षा के अनेक प्रावधान दिए। परंतु समाज में असमानता केवल कानून से समाप्त नहीं होती है।
वह शिक्षा, संस्कृति, और व्यवहार में सुधार से मिटती है।
आज SC/ST समुदायों की आर्थिक, शैक्षिक, और राजनीतिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, परंतु सामाजिक सम्मान और आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया अभी अधूरी है।
इसका दोष केवल “सवर्ण वर्ग” का नहीं, बल्कि पूरे समाज की उदासीनता, राजनीतिक स्वार्थ और जातिगत राजनीति का है। अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण से दलित तुष्टीकरण की ओर बढ़ने से समाधान कहां मिल रहा है..? पहले वाले को ही नहीं मिला तो दूसरे को कैसे मिल सकेगा...

💥सामाजिक सुधार बनाम वैचारिक दोषारोपण
आचार्य विनोबा भावे, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, नारायण गुरु, महर्षि अरविंद, वीर सावरकर, और स्वयं बाबा साहेब अम्बेडकर —
सभी ने “संवाद आधारित सुधार” की बात की थी, न कि “संघर्ष आधारित विभाजन” की। तलवारें निकाल कर अधिकारों की लड़ाई लड़ी जा सकती है। परस्पर संघर्ष पैदा किया जा सकता है। दुखद रक्त रंजित भी हो सकते हैं। पर हाथ में क्या आयेगा•••‼️

आज आवश्यकता है उसी दृष्टि को पुनः जीवित करने की— जहाँ समाज “कौन दोषी” नहीं, बल्कि “कैसे सुधारें” पर विचार करे।
क्योंकि यदि दोषारोपण जारी रहेगा, तो इतिहास बोझ बनेगा;
पर यदि संवाद होगा, तो इतिहास मार्गदर्शक बनेगा। 

🌹दोषारोपण नहीं, परिवार भाव संवाद चाहिए
भारत की सामाजिक जटिलता एकरेखीय नहीं है।
शोषण की जड़ें धर्म, राजनीति, औपनिवेशिक नीति और मानसिक संकीर्णता— सबमें बटी हैं।
अतः किसी एक वर्ग को ही “शत्रु” घोषित करना न तो न्याय है, न ही स्थाई समाधान।
अब समय है कि भारतीय जन मन “दोष संस्कृति” से आगे बढकर " पारिवारिक संवाद संस्कृति” अपनाए। समानता, न्याय, और आत्मसम्मान••• ये तब ही संभव होंगे जब समाज का हर वर्ग “साझी जिम्मेदारी” स्वीकार करे।🌹🙏 #Kailash_Chandra Kailash Chandra Kailashchander74@gmail

(प्रकाशन हेतु उपलब्ध है। प्रकाशित करवाने वाले या करने वाले एक बार संवाद अवश्य करें।)
 संदर्भ:-
• Dr. B.R. Ambedkar, “Annihilation of Caste” (1936)
• J.H. Hutton, Census of India (1931)
• Christophe Jaffrelot, “India’s Silent Revolution” (2003)
• Vivekananda, Complete Works, Vol.3 – “Caste and Society”
• Mahatma Gandhi, Harijan (1933–47) – Untouchability Articles

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