- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
🎯संपादकीय विश्लेषण
👉पलायन का दर्द— बदलते मोहल्लों का मौन संकट एक चेतावनी
💥भारत के कई शहरों और कस्बों में एक नई सामाजिक प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है— “धीरे-धीरे बदलते मोहल्ले”।
पलायन की यह पीड़ा किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि भारत के सामूहिक सामाजिक ताने-बाने की पीड़ा है। जब तक प्रत्येक नागरिक को अपने ही घर में सुरक्षित और सम्मानित महसूस करने का विश्वास नहीं मिलेगा, तब तक “मोहल्ले” केवल भौगोलिक सीमाएँ रह जाएँगे— सामाजिक परिवार नहीं। अब यह कहना सही है कि यह स्थिति बदलना अब केवल प्रशासन का नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र का साझा दायित्व है। किसी एक पर दोषारोपण करने से समाधान निकलना सरल नहीं। समस्या के सतही पाठ करने से भी समाधान निकलना संभव नहीं। समाज को भी नींद से जागना है। सरकारों और प्रशासन को कड़े कदम उठाने होंगे। अन्यथा फिर एक ही मार्ग शेष बचा रहेगा, जिस राह पर योगी आदित्यनाथ, हेमन्ता विश्वाशर्मा और धामी चल रहे है•••
हाल ही में मध्यप्रदेश के सागर नगर के शुक्रवार और शनिचरी मोहल्लों से हिन्दू परिवारों के पलायन की घटनाओं ने इसी प्रवृत्ति को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। यह केवल एक शहर की स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि बदलती जनसंख्या संरचना, सामाजिक विश्वास-तंत्र की टूटन और प्रशासनिक निष्क्रियता का सम्मिलित परिणाम है।
सागर की इन बस्तियों में पाँच वर्षों के भीतर लगभग 68 हिन्दू परिवारों ने अपने घर बेच दिए या छोड़ दिए। अधिकांश परिवारों का कहना है कि जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ी, वैसे-वैसे छोटे-छोटे विवाद, आपसी तनाव और सांस्कृतिक असुविधाएँ बढ़ीं। घरों पर “बिकाऊ है” के पोस्टर इस मौन पीड़ा की दृश्य अभिव्यक्ति बन गए हैं। सवाल यह नहीं कि कौन-सा समुदाय बहुसंख्यक हुआ या अल्पसंख्यक, बल्कि यह है कि समाज के भीतर सह-अस्तित्व की परंपरा क्यों कमजोर पड़ रही है।
यह प्रवृत्ति केवल सागर की नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम, राजस्थान और केरल के अनेक हिस्सों में भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ जनसंख्या संतुलन बदलने के साथ-साथ सामाजिक दूरी और असहिष्णुता बढ़ी है। जब किसी मोहल्ले या क्षेत्र में एक ही समुदाय की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है, तो दूसरे समुदाय के लोग असुरक्षित महसूस करने लगते हैं— चाहे वह आर्थिक कारण हों, धार्मिक असहजता या प्रशासनिक निष्क्रियता। यह स्थिति भारतीय समाज के ‘बहुलतावाद’ के मूल स्वरूप को चुनौती देती है।
सामाजिक दृष्टि से यह समस्या विश्वास और संवाद की कमी का परिणाम मात्र नहीं है। अलगाववादी नेतृत्व, सोशल मीडिया की कटुता, वैश्विक विमर्श का अनचाहे भारतीय परिवेश में समावेश होना खतरनाक हो गया है। पहले मोहल्ले कभी साझा जीवन, पारिवारिक मेल-मिलाप और धार्मिक विविधता के केंद्र होते थे। अब वही मोहल्ले “मजहबी इलाकों” के रूप में विभाजित हो रहे हैं। यह विभाजन न केवल सांस्कृतिक ह्रास का प्रतीक है, बल्कि भारत की सामाजिक एकता पर गहरा प्रहार भी है।
जनसांख्यिकीय दृष्टि से यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि भारत में स्थानीय स्तर पर आबादी का घनत्व और संरचना तेजी से बदल रही है। जनगणना आँकड़े बताते हैं कि कई शहरी क्षेत्रों में धार्मिक समूहों का अनुपात पिछले दो दशकों में नाटकीय रूप से बदला है। इतना निश्चित है कि बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने से सद्भावना स्थापित नहीं हो सकती है, यह समझना होगा। अन्यथा पलायन का "फायर बैक" होगा तो प्रशासन इस बदलाव के साथ सामाजिक संतुलन बनाए रखने में असफल सिद्ध होगा, तो सम्प्रदायों का पलायन जैसी घटनाएँ स्वाभाविक परिणाम बन जाती हैं। इसलिये सम्बन्धों की डोर को मजबूत करना है पर धैर्य की भी सीमाएँ रहती है।
प्रशासनिक स्तर पर समस्या दोहरी है— एक, स्थानीय विवादों पर समय पर कार्रवाई का अभाव, हठधर्मिता का बढ़ना और दूसरे, संवेदनशीलता की कमी। मोहल्लों में छोटे-छोटे झगड़े यदि समय रहते सुलझाए जाएँ, तो वे बड़े साम्प्रदायिक टकराव का रूप नहीं लेते। इसी प्रकार, मांस-मछली की दुकानें, लाउडस्पीकर या त्योहारों के दौरान उत्पन्न विवादों को यदि पारस्परिक संवाद और स्थानीय कानून व्यवस्था से नियंत्रित किया जाए, तो पलायन की नौबत नहीं आती।
आज आवश्यकता है कि राज्य और केंद्र सरकारें इन घटनाओं को केवल “कानून-व्यवस्था” की दृष्टि से न देखें, बल्कि इन्हें सामाजिक चेतावनी संकेत के रूप में लें। नगर विकास योजनाओं में सामुदायिक एकीकरण, सांस्कृतिक संवाद और नागरिक सुरक्षा को समान प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्कूलों और सामुदायिक संस्थाओं के स्तर पर भी पारस्परिक सौहार्द और विविधता के मूल्य विकसित किए जाने चाहिए। सभ्य समाज लम्बे समय तक "विक्टिमहूड प्ले" करने से साथ नहीं चल सकता है।
भारत की ताकत उसकी एकता की विविधता में है। विविधता में एकता और एकता की ही विविधता को अपनाकर हम सन्तुलन कर सकते है। यह विविधता यदि मोहल्लों में टूटने लगी, तो राष्ट्र का सामाजिक संतुलन भी प्रभावित होगा। सागर की घटना हमें चेतावनी देती है कि पलायन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मानसिक दूरी का भी प्रतीक है। इसे मिटाने के लिए संवाद, संवेदना और सशक्त प्रशासन— यही तीन स्तंभ आवश्यक हैं।🌹🙏 #kailash_chandra Kailash Chandra #सामाजिक_समरसता #मध्यप्रदेश CM Madhya Pradesh CMO Chhattisgarh
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें